19. अव्यक्त दिव्य संदेश | 26 -12- 1988

26.12.1988

https://youtu.be/f6BGImS5-Fc

मीठी-मीठी दादी के निमंत्रण प्रति…..

अपनी मीठी-मीठी दादी जी का हुज्जत और स्नेह भरा संदेश ले बापदादा के पास गई। बापदादा से सदा के प्रमाण मुस्कराती मूर्त और रूहानी नज़रों से मिलन हुआ और बाबा ने कहा – बच्ची, आज किन विचारों में मगन हो? क्या कोई विशेष समाचार है? मैं बोली- बाबा, सब ब्राह्मण बच्चों का जो बाबा से मिलन का संकल्प है वह सुनकर बहुत सोच चलता है कि यह कैसे पूर्ण हो और दादी जी के पत्र को पढ़कर तो दिल चाहता है कि कभी हमने दादी को ‘ना’ नहीं किया है, इसलिए कुछ भी हो पहुँच जाऊँ। आप तो जो चाहे कर सकते हो ! हमारा चेहरा देखते बाबा बड़ा राज़युक्त मुसकरा भी रहा था, सुन भी रहा था। फिर बाबा बोले- बच्ची, क्या तुम नहीं जानती कि बाप को तुम बच्चों से भी ज़्यादा बच्चों से मिलन मनाए बच्चों को रिफ्रेश करने का ओना है, उमंग है! क्योंकि ज़िम्मेवार तो फिर भी बाप है। साथ-साथ तुम्हारी दादियों की हुज्जत और स्नेह के संदेश प्रति बाप को मुरब्बी बच्चों का रिगॉर्ड भी है। क्योंकि निमित्त हैं, समान हैं। फिर भी बापदादा सबेरे-सबेरे एक खेल देख रहे थे, चलो तो तुम्हें मैं दिखाऊँ।

ऐसे कहते बाबा आगे बगीचे में ले चले। वहाँ क्या देखा कि एक बहुत बड़ा तराजू था, जो दूर से बहुत अच्छा चमक रहा था। बाबा बोले बच्ची, आगे जाकर देखो। मैं आगे गई तो क्या देखा कि तराजू के दो पलड़ों पर एक तरफ लिखा हुआ था ‘स्नेह’, दूसरे तरफ लिखा हुआ था ‘सेहत’ (स्वास्थ्य) और ऊपर डण्डी जो तोलने की होती है, आधार होता है, उस पर लिखा हुआ था ‘ड्रामा’। मैं देख ही रही थी तो बापदादा आगे आये और कहा देखा, किस तरफ का पलड़ा भारी है? थोड़ा-सा हिलाने से देखा कि सेहत (तबियत) का पलड़ा नीचे गया। मैंने बोला – बाबा, सदा तो स्नेह का पलड़ा भारी होता है, आज इसका रहस्य क्या है?

बाबा बोले- बच्ची, देखो, सब बच्चे कहते हैं बाबा रथ को ले आये। सिर्फ दृष्टि दे या सिर्फ रथ कमरे में बैठ जाए। अब बापदादा तो जो चाहे कर सकते हैं। रथ किसी भी हालत में हो, रथवान उसका भी चला सकता है, काम ले सकता है लेकिन बच्चे सिर्फ स्नेह, भावना और वर्तमान को जानते, बाप ड्रामा की भावी, सेहत और तीनों काल को जानता है। इसलिए अगर अब जबरदस्ती अधीन कर रथ से काम लिया तो सदा के लिए कमज़ोरी का कारण बन जायेगा। क्योंकि सिस्टम में अन्तर पड़ता ही है। बच्चे तो हुज्जत रखते लेकिन बाप की प्रवेशता होना ही कितना शक्तिशाली अव्यक्त संदेश-

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है, कोई साधारण बात नहीं है! यह तो बच्ची की नेचर इज़ी है, निःसंकल्पता के निज़ी संस्कार हैं और पुण्य का खाता जमा है। यह पार्ट देखने में इज़ी लगता है लेकिन बाप जानते हैं कि रथ पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है।

बाप स्नेहयुक्त के साथ राज़युक्त बन बच्चों को कह रहे हैं कि बच्ची तो सदा हाज़िर है, आदि से अब तक बड़ों से दिल का स्नेह होने कारण कब ‘ना’ नहीं की है, न कर सकती है और ही स्नेह में भारी बन जाती। लेकिन रथवान ज़िम्मेवार है। इसलिए वर्तमान और भविष्य को जान डायरेक्शन दे रहे हैं कि इस सीज़न में रथ को एग्जर्शन (थकावट) से बचाए इज़ी और रेस्ट देने से अगली सीजन में मुरली द्वारा मिल सकने का फायदा है। क्योंकि अब की शक्ति रथ को सदा के लिए शक्तिशाली बनाने में सहयोगी है। इसमें रथ को और दूसरों को दोनों को फायदा है।

अव्यक्त दिव्य संदेश–19

26 दिसंबर 1988

मीठी-मीठी दादी के निमंत्रण प्रति…

1. दादी जी का स्नेह भरा निमंत्रण

मीठी-मीठी दादी जी का हुज्जत और स्नेह से भरा संदेश लेकर मैं बापदादा के पास गई। बाबा से मिलन हुआ तो उनकी मुस्कराती मूर्त और रूहानी दृष्टि में स्नेह का अनुभव हुआ।

बाबा ने पूछा — “बच्ची, आज किन विचारों में मगन हो? क्या कोई विशेष समाचार है?”

मैंने बताया कि सभी ब्राह्मण बच्चों के बाबा से मिलन के संकल्प को सुनकर मन में विचार चलता है कि यह कैसे पूरा हो। दादी जी का पत्र पढ़कर दिल चाहता है कि किसी भी प्रकार बाबा से मिलन हो जाए, क्योंकि दादी जी को कभी ‘ना’ नहीं कहा है।

बाबा मेरे भावों को समझते हुए मुस्कराते रहे।

2. बच्चों से मिलने का बापदादा का उमंग

बापदादा ने कहा कि क्या तुम नहीं जानती कि बाप को बच्चों से मिलन मनाने और उन्हें रिफ्रेश करने का बच्चों से भी अधिक उमंग है?

बापदादा के लिए बच्चों से मिलना केवल मिलन नहीं, बल्कि उन्हें नई शक्ति और उत्साह देने का माध्यम है।

साथ ही दादियों की हुज्जत और स्नेह भरे संदेश के प्रति बापदादा को मुरब्बी बच्चों का रिगॉर्ड भी है, क्योंकि वे निमित्त हैं और समान हैं।

यहाँ स्नेह के साथ जिम्मेदारी और सम्मान का भाव भी जुड़ा हुआ है।

3. बगीचे में तराजू का विशेष दृश्य

बापदादा ने कहा कि सुबह-सुबह एक खेल देख रहे थे और मुझे वह दृश्य दिखाने के लिए बगीचे में ले गए।

वहाँ एक बहुत बड़ा और चमकता हुआ तराजू था। उसके दो पलड़ों पर दो शब्द लिखे थे:

  • एक पलड़े पर — स्नेह
  • दूसरे पलड़े पर — सेहत अर्थात् स्वास्थ्य

तराजू की ऊपर की डण्डी, जो तोलने का आधार थी, उस पर लिखा था — ड्रामा।

थोड़ा-सा हिलाने पर देखा कि सेहत का पलड़ा नीचे चला गया।

मैंने पूछा कि सदा तो स्नेह का पलड़ा भारी होता है, फिर आज इसका क्या रहस्य है?

यह दृश्य स्नेह, स्वास्थ्य और ड्रामा के बीच के सम्बन्ध को समझाने के लिए था।

4. स्नेह और स्वास्थ्य के बीच संतुलन

बच्चे चाहते हैं कि बाबा रथ को ले आएँ, चाहे केवल दृष्टि देने के लिए या कमरे में बैठने के लिए।

बापदादा बच्चों के स्नेह और भावना को जानते हैं। लेकिन बच्चों की दृष्टि मुख्यतः वर्तमान स्नेह और मिलन की इच्छा पर रहती है, जबकि बापदादा ड्रामा की भावी, सेहत और तीनों काल को जानते हैं।

इसलिए केवल स्नेह के आधार पर रथ से उसकी क्षमता से अधिक कार्य लेना उचित नहीं है।

स्नेह महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वास्थ्य की स्थिति और भविष्य की शक्ति को ध्यान में रखना भी आवश्यक है।

5. ड्रामा की भावी को जानकर निर्णय

तराजू की डण्डी पर लिखा ‘ड्रामा’ इस दृश्य का विशेष संकेत है।

बापदादा ने समझाया कि बच्चे वर्तमान परिस्थिति और अपने स्नेह को देखते हैं, जबकि बापदादा ड्रामा की भावी तथा तीनों काल को जानते हैं।

यदि वर्तमान में जबरदस्ती रथ से काम लिया जाए, तो आगे चलकर कमजोरी का कारण बन सकता है। इससे निर्धारित व्यवस्था में भी अन्तर पड़ सकता है।

इसलिए निर्णय केवल वर्तमान की भावना देखकर नहीं, बल्कि उसके सम्भावित प्रभाव को समझकर करना चाहिए।

6. प्रवेशता की शक्ति और रथ की जिम्मेदारी

बापदादा ने कहा कि रथ किसी भी हालत में हो, रथवान उससे काम ले सकता है। लेकिन बच्चों को यह भी समझना चाहिए कि रथ पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

बापदादा की प्रवेशता और अव्यक्त संदेश कोई साधारण बात नहीं है।

मूल संदेश में दादी जी के सहज स्वभाव, निःसंकल्पता के निजी संस्कार और पुण्य के जमा खाते का भी उल्लेख है।

यह पार्ट देखने में सहज लगता है, लेकिन बापदादा रथ पर पड़ने वाले प्रभाव को जानते हैं। इसलिए बाहरी रूप से सहज दिखाई देने वाले कार्य के पीछे की जिम्मेदारी को समझना आवश्यक है।

7. दादी जी का स्नेह और ‘ना’ न कहने का भाव

बापदादा ने स्नेहपूर्वक बताया कि दादी जी आदि से अब तक बड़ों के प्रति दिल का स्नेह होने के कारण कभी ‘ना’ नहीं कहतीं और न कह सकती हैं।

उनका स्नेह बहुत गहरा है। लेकिन इसी स्नेह के कारण वे अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारी भी ले सकती हैं।

इसलिए केवल किसी के स्नेह और तत्परता को देखकर कार्य नहीं लेना चाहिए। उसकी वर्तमान स्थिति और भविष्य की क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए।

8. रथवान की जिम्मेदारी

बापदादा ने स्पष्ट किया कि रथवान जिम्मेवार है।

बच्चों का स्नेह और मिलन की इच्छा अपनी जगह है, लेकिन रथ की सेहत और शक्ति को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है।

यदि वर्तमान में रथ को आवश्यकता से अधिक थकाया गया, तो आगे की सेवा प्रभावित हो सकती है।

इसलिए सच्चे स्नेह का अर्थ केवल मिलन की इच्छा पूरी करना नहीं, बल्कि रथ की देखभाल और भविष्य की सेवा को भी महत्व देना है।

9. इस सीज़न में रथ को आराम देने का निर्देश

बापदादा ने डायरेक्शन दिया कि इस सीज़न में रथ को अधिक थकावट से बचाया जाए तथा उसे सहजता और आराम दिया जाए।

इसका उद्देश्य अगली सीज़न में मुरली द्वारा मिल सकने वाले लाभ को सुरक्षित रखना है।

वर्तमान की शक्ति को रथ को सदा शक्तिशाली बनाए रखने में सहयोगी बनाना है।

इस प्रकार अभी रथ को आराम देना केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य की सेवा के लिए भी उपयोगी है।

10. दोनों का फायदा — रथ का भी और दूसरों का भी

बापदादा ने समझाया कि रथ को आराम देने से दोहरा लाभ है:

  1. रथ की शक्ति सुरक्षित रहती है और उसे अनावश्यक थकावट से बचाया जाता है।
  2. आगे की सीज़न में मुरली द्वारा अधिक लाभ प्राप्त करने की सम्भावना बनी रहती है।

इसलिए किसी कार्य को करने से पहले यह देखना चाहिए कि उससे वर्तमान में क्या लाभ होगा और भविष्य में क्या प्रभाव पड़ेगा।

स्नेह और जिम्मेदारी दोनों साथ रहें, तभी निर्णय संतुलित होगा।

11. मुख्य शिक्षा — स्नेह के साथ समझदारी

इस संदेश में स्नेह को कम करने की बात नहीं है। बल्कि स्नेह के साथ स्वास्थ्य, ड्रामा और भविष्य की जिम्मेदारी को समझने की प्रेरणा है।

बच्चों की भावना का सम्मान करते हुए भी बापदादा रथ की स्थिति को ध्यान में रखते हैं।

सच्चा स्नेह वही है जो केवल वर्तमान की इच्छा न देखे, बल्कि आगे की शक्ति और सेवा की सम्भावना को भी सुरक्षित रखे।

12. आत्म-चेकिंग

  1. क्या मैं स्नेह के कारण किसी पर उसकी क्षमता से अधिक जिम्मेदारी डाल देता हूँ?
  2. क्या मैं वर्तमान की इच्छा के साथ स्वास्थ्य और भविष्य का भी ध्यान रखता हूँ?
  3. क्या मैं दूसरों की भावनाओं का सम्मान करता हूँ?
  4. क्या मैं निर्णय लेते समय उसके दूरगामी प्रभाव पर विचार करता हूँ?
  5. क्या मैं स्नेह और जिम्मेदारी में संतुलन रखता हूँ?
  6. क्या मैं किसी की सहजता को उसकी असीम क्षमता समझ लेता हूँ?
  7. क्या मैं रथ की देखभाल को भविष्य की सेवा से जुड़ा हुआ समझता हूँ?
  8. क्या मैं वर्तमान के लाभ के साथ भविष्य की शक्ति भी सुरक्षित रखता हूँ?

निष्कर्ष

26 दिसंबर 1988 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने स्नेह, स्वास्थ्य और ड्रामा का गहरा सम्बन्ध समझाया है।

बच्चे स्नेह के कारण बाबा से मिलन चाहते हैं, लेकिन बापदादा रथ की सेहत, वर्तमान परिस्थिति और भविष्य की सेवा को ध्यान में रखकर निर्णय देते हैं।

मुख्य शिक्षा है — स्नेह के साथ जिम्मेदारी, वर्तमान के साथ भविष्य और मिलन की इच्छा के साथ रथ की देखभाल का संतुलन रखना।


छोटे प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. इस संदेश का शीर्षक क्या है?
उत्तर: मीठी-मीठी दादी के निमंत्रण प्रति।

प्रश्न 2. बाबा ने बच्ची से क्या पूछा?
उत्तर: आज किन विचारों में मगन हो और क्या कोई विशेष समाचार है?

प्रश्न 3. बच्चे बाबा से क्या चाहते थे?
उत्तर: बाबा से मिलन करना और उनसे रिफ्रेश होना।

प्रश्न 4. बापदादा बच्चों के मिलन के बारे में क्या कहते हैं?
उत्तर: बाप को भी बच्चों से मिलन कराने और उन्हें रिफ्रेश करने का बहुत उमंग है।

प्रश्न 5. तराजू के एक पलड़े पर क्या लिखा था?
उत्तर: स्नेह।

प्रश्न 6. दूसरे पलड़े पर क्या लिखा था?
उत्तर: सेहत अर्थात् स्वास्थ्य।

प्रश्न 7. तराजू की डण्डी पर क्या लिखा था?
उत्तर: ड्रामा।

प्रश्न 8. तराजू में कौन-सा पलड़ा नीचे गया?
उत्तर: सेहत का पलड़ा।

प्रश्न 9. बच्चे रथ से क्या चाहते थे?
उत्तर: बाबा रथ को ले आएँ, चाहे दृष्टि देने के लिए या कमरे में बैठने के लिए।

प्रश्न 10. बच्चे मुख्यतः किसे जानते हैं?
उत्तर: स्नेह, भावना और वर्तमान को।

प्रश्न 11. बापदादा किन बातों को जानते हैं?
उत्तर: ड्रामा की भावी, सेहत और तीनों काल को।

प्रश्न 12. केवल स्नेह के आधार पर रथ से काम लेने में क्या समस्या हो सकती है?
उत्तर: रथ की कमजोरी बढ़ सकती है और व्यवस्था में अन्तर पड़ सकता है।

प्रश्न 13. बापदादा ने रथ के विषय में क्या समझाया?
उत्तर: रथ की वर्तमान स्थिति और उस पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना आवश्यक है।

प्रश्न 14. दादी जी के कौन-से गुण बताए गए हैं?
उत्तर: सहज स्वभाव, निःसंकल्पता के निजी संस्कार और पुण्य का जमा खाता।

प्रश्न 15. दादी जी कभी ‘ना’ क्यों नहीं करतीं?
उत्तर: बड़ों के प्रति दिल का स्नेह होने के कारण।

प्रश्न 16. रथवान किस बात के लिए जिम्मेवार है?
उत्तर: रथ की स्थिति और उस पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए।

प्रश्न 17. इस सीज़न में क्या निर्देश दिया गया?
उत्तर: रथ को थकावट से बचाकर सहजता और आराम देना।

प्रश्न 18. रथ को आराम देने का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: अगली सीज़न में मुरली द्वारा मिलने वाले लाभ को सुरक्षित रखना।

प्रश्न 19. रथ को आराम देने से किसे लाभ होगा?
उत्तर: रथ को भी और दूसरों को भी।

प्रश्न 20. क्या स्नेह और स्वास्थ्य एक-दूसरे के विरोधी हैं?
उत्तर: नहीं, दोनों का संतुलन आवश्यक है।

प्रश्न 21. निर्णय लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: वर्तमान परिस्थिति, स्वास्थ्य, ड्रामा और भविष्य की सेवा का।

प्रश्न 22. सच्चे स्नेह का एक रूप क्या है?
उत्तर: दूसरे की स्थिति और शक्ति का ध्यान रखना।

प्रश्न 23. वर्तमान में अधिक थकावट से क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर: आगे की सेवा और शक्ति प्रभावित हो सकती है।

प्रश्न 24. बच्चों की भावना का सम्मान करते हुए क्या देखना चाहिए?
उत्तर: रथ की सेहत और भविष्य की क्षमता।

प्रश्न 25. तराजू का दृश्य किस बात को समझाने के लिए था?
उत्तर: स्नेह, सेहत और ड्रामा के सम्बन्ध को।

प्रश्न 26. बापदादा ने केवल वर्तमान को देखकर निर्णय क्यों नहीं दिया?
उत्तर: क्योंकि वे भविष्य की भावी और तीनों काल को जानते हैं।

प्रश्न 27. क्या आराम देना सेवा से पीछे हटना है?
उत्तर: नहीं, यह भविष्य की सेवा के लिए शक्ति सुरक्षित रखने का साधन है।

प्रश्न 28. स्नेह के साथ कौन-सी बात आवश्यक है?
उत्तर: जिम्मेदारी और समझदारी।

प्रश्न 29. इस संदेश में रथ की देखभाल का महत्व क्या है?
उत्तर: रथ को शक्तिशाली बनाए रखना ताकि आगे की सेवा हो सके।

प्रश्न 30. इस संदेश की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: स्नेह, स्वास्थ्य और ड्रामा का संतुलन रखकर वर्तमान और भविष्य दोनों का ध्यान रखना।

📝 19. अव्यक्त दिव्य संदेश | 26 -12- 1988

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