76. साकार मुरली | 16-10-2026

16-10-2026प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘मधुबन
“मीठे बच्चे – इस पुरानी दुनिया से बेहद के वैरागी बनो क्योंकि बाप तुम्हारे लिए नया स्वर्ग रूपी घर बना रहे हैं”
प्रश्नः-इस अविनाशी रूद्र यज्ञ में किन-किन बातों के कारण ही विघ्न पड़ते हैं?
उत्तर:-यह शिवबाबा का रचा हुआ अविनाशी रूद्र यज्ञ है, इसमें तुम मनुष्य से देवता बनने के लिए पवित्र बनते हो, भक्ति आदि छोड़ते हो इस कारण विघ्न पड़ते हैं। लोग कहते हैं – शान्ति हो, विनाश न हो और बाप ने यह रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा ही है पुरानी दुनिया के विनाश के लिए। इसके बाद ही शान्ति की दुनिया आयेगी।

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति का अर्थ बाप ने बच्चों को समझाया है। अहम् आत्मा का स्वधर्म है शान्त। शान्तिधाम में जाने के लिए कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है। आत्मा स्वयं शान्त स्वरूप, शान्तिधाम में रहने वाली है। यहाँ थोड़े समय के लिए शान्त रह सकते हैं। आत्मा कहती है मेरी कर्मेन्द्रियों का बाजा थक गया है। मैं अपने स्वधर्म में टिक जाता हूँ, शरीर से अलग हो जाता हूँ। परन्तु कर्म तो करना ही है। शान्ति में कहाँ तक बैठे रहेंगे। आत्मा कहती है – मैं शान्ति देश की रहवासी हूँ। सिर्फ यहाँ शरीर में आने से मैं टॉकी बना हूँ। अहम् आत्मा मम् शरीर है। आत्मा ही पतित और पावन बनती है। आत्मा पतित बनती है तो शरीर भी पतित बनता है क्योंकि सतयुग में 5 तत्व भी सतो-प्रधान होते हैं। यहाँ 5 तत्व तमोप्रधान हैं। सोने में खाद पड़ने से सोना पतित बन जाता है। फिर उनको साफ करने के लिए आग में डाला जाता है। उनको योग अग्नि नहीं कहा जाता। योग अग्नि भी है, जिससे पाप जलते हैं। आत्मा को पतित से पावन बनाने वाला परमात्मा है। नाम ही एक का है। बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ। ड्रामा प्लैन अनुसार सबको पतित तमोप्रधान बनना ही है। यह झाड़ है ना। उस झाड़ का बीज नीचे रहता है, इनका बीज ऊपर में है। बाप को जब बुलाते हैं तो बुद्धि ऊपर चली जाती है। जिससे तुम वर्सा ले रहे हो वह अब नीचे आया हुआ है। कहते हैं मुझे आना पड़ता है। मेरा जो यह मनुष्य सृष्टि का झाड़ है, यह अनेक वैराइटी धर्मों का है। अब वह तमोप्रधान पतित जड़जडीभूत अवस्था को पाया हुआ है।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं – सतयुग में पहले-पहले होते हैं देवी-देवतायें। अब कलियुग में हैं असुर। बाकी असुर और देवताओं की लड़ाई लगी नहीं। तुम इन आसुरी 5 विकारों पर योगबल से जीत पाते हो। बाकी कोई हिंसक लड़ाई की बात नहीं है। तुम कोई भी प्रकार की हिंसा नहीं करते हो। तुम किसको हाथ भी नहीं लगायेंगे। तुम डबल अहिंसक हो। काम कटारी चलाना, यह तो सबसे बड़ा पाप है। बाप कहते हैं – यह काम कटारी आदि-मध्य-अन्त दु:ख देती है। विकार में नहीं जाना है। देवताओं के आगे महिमा गाते हैं – आप सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी। आत्मा इन आरगन्स द्वारा जानती है। कहते हैं कि हम पतित बन गये हैं तो जरूर कब पावन थे, जो कहते हैं हम पतित बने हैं। बुलाते भी हैं हे पतित-पावन आओ। जब पावन हैं तब कोई बुलाते ही नहीं। उनको स्वर्ग कहा जाता है। यहाँ तो साधू-सन्त आदि कितनी धुन लगाते हैं पतित-पावन सीताराम… जहाँ भी जाओ गाते रहते हैं। बाप समझाते हैं कि सारी दुनिया पतित है। रावण राज्य है ना, रावण को जलाते हैं। परन्तु उनका राज्य कब से हुआ, किसको पता नहीं है। ढेर की ढेर भक्ति मार्ग की सामग्री है। कोई क्या करते, कोई क्या करते। संन्यासी भी कितने योग सिखाते हैं। वास्तव में योग किसको कहा जाता है – यह कोई को पता नहीं है। यह भी किसका दोष नहीं है। यह ड्रामा बना बनाया है। जब तक मैं न आऊं, इन्हों को अपना पार्ट बजाना है। ज्ञान और भक्ति, ज्ञान है दिन सतयुग त्रेता, भक्ति है रात द्वापर कलियुग फिर है वैराग्य। पुरानी दुनिया से वैराग्य। यह है बेहद का वैराग्य। उन्हों का है हद का वैराग्य। तुम जानते हो यह पुरानी दुनिया अब खत्म होने वाली है। नया घर बनाते हैं तो पुराने से वैराग्य हो जाता है।

देखो, बेहद का बाप कैसा है! तुमको स्वर्ग रूपी घर बनाकर देता है। स्वर्ग है नई दुनिया। नर्क है पुरानी दुनिया। नई सो पुरानी सो फिर नई बनती है। नई दुनिया की आयु कितनी है, यह किसको पता नहीं है। अभी पुरानी दुनिया में रह हम नई बनाते हैं। पुराने कब्रिस्तान पर हम परिस्तान बनायेंगे। यही जमुना का कण्ठा होगा, इस पर महल बनेंगे। यही देहली जमुना नदी पर होगी। बाकी यह जो दिखाते हैं – पाण्डवों के किले थे। यह सब ड्रामा प्लैन अनुसार जरूर फिर भी बनेंगे। जैसे तुम यज्ञ तप दान आदि करते होंगे, यह फिर भी करना होगा। पहले शिव की भक्ति करते हो। फर्स्टक्लास मन्दिर बनाते हो, उनको अव्यभिचारी भक्ति कहा जाता है। अब तुम ज्ञान मार्ग में हो। यह है अव्यभिचारी ज्ञान। एक ही शिवबाबा से तुम सुनते हो जिसकी पहले तुमने भक्ति की, उस समय कोई और धर्म होते नहीं। उस समय तुम बहुत सुखी रहते हो। देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है। नाम लेने से मुख मीठा हो जाता है। तुम एक बाप से ही ज्ञान सुनते हो। बाप कहते हैं और कोई से तुम मत सुनो। यह है तुम्हारा अव्यभिचारी ज्ञान। बेहद बाप के तुम बने हो। बाप से ही वर्सा मिलेगा। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। बाप थोड़े समय के लिए साकार में आया हुआ है। कहते हैं मुझे तुम बच्चों को ही ज्ञान देना है। मेरा यह स्थाई शरीर नहीं है, मैं इसमें प्रवेश करता हूँ। शिव जयन्ती से फिर झट गीता जयन्ती हो जाती है। उनसे ज्ञान शुरू कर देते हैं। यह रूहानी विद्या सुप्रीम रूह दे रहे हैं। पानी की बात नहीं। पानी को थोड़ेही ज्ञान कहेंगे। पतित से पावन, ज्ञान से बनेंगे। पानी से थोड़ेही पावन बनेंगे। नदियां तो सारी दुनिया में हैं ही। यह तो ज्ञान सागर बाप आते हैं, इसमें प्रवेश कर नॉलेज सुनाते हैं। यहाँ गऊ मुख पर जाते हैं। वास्तव में गऊ मुख तुम चैतन्य में हो। तुम्हारे मुख से ज्ञान अमृत निकलता है। गऊ से तो दूध मिलता है। पानी की तो बात ही नहीं, यह सब कुछ बाप बैठ समझाते हैं। जो सबका सद्गति दाता है। अब सभी दुर्गति में पड़े हैं। आगे तुम नहीं जानते थे तो रावण को क्यों जलाते हैं। अब तुम जानते हो बेहद का दशहरा होने वाला है। यह सारी दुनिया बेट (टापू) है। रावण का राज्य सारी सृष्टि पर है। जो शास्त्रों में है बन्दर सेना थी, बन्दरों ने पुल बनाई… यह सब हैं दन्त कथायें। भक्ति आदि चलती है, पहले होती है अव्यभिचारी भक्ति, फिर व्यभिचारी भक्ति। दशहरा, राखी बन्धन सब अभी के ही त्योहार हैं। शिव जयन्ती के बाद होती है श्रीकृष्ण जयन्ती। अभी कृष्णपुरी स्थापन हो रही है। आज है कंसपुरी, कल होगी कृष्णपुरी। कंस आसुरी सम्प्रदाय को कहा जाता है। पाण्डव और कौरवों की लड़ाई है नहीं। श्रीकृष्ण का जन्म है सतयुग में, वह है फर्स्ट प्रिन्स। स्कूल में पढ़ने जाता है। जब बड़ा होता है तो राजगद्दी पर बैठता है। महिमा सारी शिवबाबा की है, जो पतितों को पावन बनाने वाला है। बाकी यह रास लीला आदि यह तो आपस में खुशी मनाते होंगे। बाकी श्रीकृष्ण किसको ज्ञान सुनाये, यह कैसे हो सकता है। बाबा कहते हैं – किसको मना नहीं करनी है कि भक्ति नहीं करो। आपेही छूट जाती है। भक्ति छोड़ते हैं, विकार छोड़ते हैं, इस पर ही हंगामा होता है। बाबा ने कहा है मैं रूद्र यज्ञ रचता हूँ, इसमें आसुरी सम्प्रदाय के विघ्न पड़ते हैं। यह है शिवबाबा का बेहद का यज्ञ, जिससे मनुष्य से देवता बनते हैं। गाया हुआ है ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रगट हुई। जब पुरानी दुनिया का विनाश हो – तब तुम नई दुनिया में राज्य करेंगे। लोग कहते हैं हम कहते शान्ति हो, यह बी.के. कहते विनाश हो। ज्ञान न समझने के कारण ऐसा बोलते हैं। बाप समझाते हैं – यह सारी पुरानी दुनिया इस ज्ञान यज्ञ में स्वाहा हो जायेगी। पुरानी दुनिया को आग लगने वाली है। नेचुरल कैलेमिटीज आयेगी, सरसों मुआफिक सब पीस कर खत्म हो जायेंगे। बाकी कुछ आत्मायें बच जायेंगी। आत्मा तो अविनाशी है। अब बेहद की होलिका होनी है, जिसमें शरीर सब खत्म हो जायेंगे। बाकी आत्मा पवित्र बनकर चली जायेगी। आग में चीज़ शुद्ध होती है। हवन करते हैं, शुद्धता के लिए। वह सब हैं जिस्मानी बातें। अब सारी दुनिया स्वाहा होने वाली है। विनाश के पहले जरूर स्थापना होनी चाहिए। किसको समझाओ – पहले स्थापना फिर विनाश। ब्रह्मा द्वारा स्थापना। प्रजापिता मशहूर है आदि देव, आदि देवी… जगत अम्बा के लाखों मन्दिर हैं। कितने मेले लगते हैं। तुम हो जगत अम्बा के बच्चे ज्ञान-ज्ञानेश्वरी, फिर बनेंगी राज-राजेश्वरी। तुम बहुत धनवान बनते हो। फिर भक्ति मार्ग में लक्ष्मी से दीपमाला पर विनाशी धन मांगते हैं। यहाँ तुमको सब कुछ मिल जाता है आयुश्वान भव, पुत्रवान भव। वहाँ 150 वर्ष आयु रहती है। यहाँ तुम जितना योग लगायेंगे उतनी आयु बढ़ती जायेगी। तुम ईश्वर से योग लगाकर योगेश्वर बनते हो।

बाप कहते हैं मैं धोबी हूँ। सब मूत पलीती आत्माओं को साफ करता हूँ। फिर शरीर भी शुद्ध मिलेगा। मैं सेकेण्ड में दुनिया के कपड़े साफ कर लेता हूँ। सिर्फ मनमनाभव होने से आत्मा और शरीर पवित्र बन जायेंगे। छू मन्त्र हुआ ना। सेकेण्ड में जीवनमुक्ति, कितना सहज उपाय है। चलते-फिरते सिर्फ बाप को याद करो और कोई जरा भी तकलीफ नहीं देता हूँ। अब तुम्हारी एक सेकेण्ड में चढ़ती कला होती है। बाप कहते हैं – मैं तुम बच्चों का सर्वेन्ट बनकर आया हूँ। तुमने बुलाया है – हे पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ तो सर्वेन्ट हुआ ना। जब तुम बहुत पतित बनते हो तो जोर से चिल्लाते हो। अब मैं आया हूँ। मैं कल्प-कल्प आकर बच्चों को मन्त्र देता हूँ कि मुझे याद करो। मनमनाभव का अर्थ भी यह है। फिर विष्णुपुरी का मालिक बनेंगे। तुम आये हो विष्णुपुरी का राज्य लेने, रावण पुरी के बाद है विष्णुपुरी। कंसपुरी के बाद कृष्णपुरी। कितना सहज समझाया जाता है। बाप कहते हैं इस पुरानी दुनिया से सिर्फ ममत्व मिटा दो। अब हमने 84 जन्म पूरे किये हैं। यह पुराना चोला छोड़ हम जायेंगे नई दुनिया में। याद से ही तुम्हारे पाप कट जायेंगे, इतनी हिम्मत करनी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मुख से सदैव ज्ञान अमृत निकालना है। ज्ञान से ही सबकी सद्गति करनी है। एक बाप से ही ज्ञान सुनना है, दूसरों से नहीं।

2) चढ़ती कला में जाने के लिए चलते-फिरते बाप को याद करने का अभ्यास करना है। इस पुरानी दुनिया, पुराने चोले से ममत्व मिटा देना है।

वरदान:-बुद्धि रूपी पांव द्वारा इस पांच तत्वों की आकर्षण से परे रहने वाले फरिश्ता स्वरूप भव
फरिश्तों को सदा प्रकाश की काया दिखाते हैं। प्रकाश की काया वाले इस देह की स्मृति से भी परे रहते हैं। उनके बुद्धि रूपी पांव इस पांच तत्व की आकर्षण से ऊंचे अर्थात् परे होते हैं। ऐसे फरिश्तों को माया व कोई भी मायावी टच नहीं कर सकते। लेकिन यह तब होगा जब कभी किसी के अधीन नहीं होंगे। शरीर के भी अधिकारी बनकर चलना, माया के भी अधिकारी बनना, लौकिक वा अलौकिक संबंध की भी अधीनता में नहीं आना।
स्लोगन:-शरीर को देखने की आदत है तो लाइट का शरीर देखो, लाइट रूप में स्थित रहो।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य – “निरंतर ईश्वरीय याद की बैठक”

अब जब परमात्मा की याद में बैठते हो तो बैठने का मतलब क्या है? हमें सिर्फ परमात्मा की याद में बैठना नहीं है परन्तु अपनी ईश्वरीय याद तो नित्य चलते फिरते हर समय करनी है और याद भी उस वस्तु की रहती है जिसका परिचय हो। उसका नाम रूप क्या है, अगर हम कहें ईश्वर नाम रूप से न्यारा है तो फिर किस रूप को याद करें? अगर कहें ईश्वर सर्वव्यापी है तो उनकी व्यापकता तो सर्वत्र हो गई तो फिर याद किसको करें, अगर याद शब्द है तो अवश्य याद का रूप भी होगा। याद का मतलब है एक याद करने वाला, दूसरा जिसको याद करते हो तो जरूर याद करने वाला उनसे भी भिन्न है, तो फिर ईश्वर सर्वव्यापी नहीं ठहरा। अगर कोई कहे हम आत्मायें परमात्मा की अंश हैं तो क्या परमात्मा भी टुकड़ा टुकड़ा होता है। फिर तो परमात्मा विनाशी ठहरा! उनकी याद भी विनाशी हुई। अब इस बात को लोग नहीं जानते, परमात्मा भी अविनाशी है, हम उस अविनाशी परमपिता परमात्मा की संतान आत्मा भी अविनाशी हैं। तो हम वंश ठहरे न कि अंश। अब यह चाहिए नॉलेज, जो परमात्मा स्वयं आकर हम बच्चों को देते हैं। परमात्मा के हम बच्चों के प्रति महावाक्य हैं बच्चे, मैं जो हूँ जैसा हूँ उस रूप को याद करने से तुम मुझे अवश्य प्राप्त करोगे। अगर मैं दु:ख सुख से न्यारा पिता सर्वव्यापी होता तो फिर खेल में सुख दु:ख नहीं होता। तो मैं सर्वव्यापी नहीं हूँ, मैं भी आत्मा सदृश्य आत्मा हूँ लेकिन सर्व आत्माओं से मेरे गुण परम हैं इसलिए मुझे परम आत्मा अर्थात् परमात्मा कहते हैं। अच्छा, ओम् शान्ति।

ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

मन्सा सेवा करने के लिए सर्व के प्रति सदा ही श्रेष्ठ और नि:स्वार्थ संकल्प हों, सदा पर-उपकार की भावना हो। अपकारी पर भी उपकार की श्रेष्ठ शक्ति हो। सदा दातापन की भावना हो। सदा स्व परिवर्तन, स्व के श्रेष्ठ कर्म द्वारा औरों को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाले हो।

16 अक्टूबर 2026 — आज की मुरली मंथन


साकार मुरली
पुरानी दुनिया से ममत्व मिटाओ — बेहद का वैराग्य धारण करो!


मुख्य विषय: नया स्वर्ग रूपी घर • पुरानी दुनिया से अनासक्ति • ज्ञान यज्ञ • पवित्रता का पुरुषार्थ
उपशीर्षक: संसार में रहते हुए आसक्ति से मुक्त रहो • पुराने संस्कारों को बदलो • नई दुनिया के योग्य बनो

आज की मुरली का मुख्य संदेश है कि बाबा नई दुनिया की स्थापना के लिए ज्ञान और योग की शिक्षा देते हैं। बच्चों को पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य धारण करने, पाँच विकारों पर योगबल से विजय पाने और अपने ममत्व को कम करने की प्रेरणा दी गई है।

  1. आज का मुख्य प्रश्न
    क्या मैं पुरानी दुनिया से केवल परिस्थितियों के कारण परेशान हूँ, या ज्ञान के आधार पर पुराने संस्कारों और अनावश्यक ममत्व से मुक्त हो रहा हूँ?
  2. आज की मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
  3. बेहद का वैराग्य क्या है?
    मूल मुरली की बात: बाबा समझाते हैं कि ज्ञान और भक्ति के बाद वैराग्य की अवस्था आती है। पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य धारण करना है, क्योंकि बाबा बच्चों के लिए नया स्वर्ग रूपी घर बना रहे हैं। Pasted text.txt

हमारा मंथन: बेहद का वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार की वस्तुओं, परिस्थितियों और सम्बन्धों के प्रति अत्यधिक आसक्ति कम करना है। हम अपने कर्तव्य निभाते हुए भी मन को ममत्व, विकार और व्यर्थ आकर्षण के अधीन होने से बचा सकते हैं।
2. पुराने घर से ममत्व कम करो, नए घर की तैयारी करो
मूल मुरली की बात: बाबा पुराने घर और नए घर का उदाहरण देते हैं। नया घर बनाते समय पुराने घर से ममत्व स्वाभाविक रूप से कम हो सकता है। मुरली में इसी उदाहरण से पुरानी दुनिया के प्रति वैराग्य समझाया गया है।

हमारा मंथन: जब हमारा लक्ष्य स्पष्ट होता है, तो प्राथमिकताएँ भी बदलती हैं। यदि हमारा लक्ष्य श्रेष्ठ जीवन और श्रेष्ठ संस्कार हैं, तो हमें उन आदतों को छोड़ने का अभ्यास करना चाहिए जो हमें उसी लक्ष्य से दूर ले जाती हैं।
3. ज्ञान यज्ञ में विघ्न क्यों आते हैं?
मूल मुरली की बात: प्रश्नोत्तर में बाबा बताते हैं कि पवित्र बनने, भक्ति छोड़ने और मनुष्य से देवता बनने के पुरुषार्थ के कारण रुद्र ज्ञान यज्ञ में विघ्न पड़ते हैं। मुरली विनाश और नई दुनिया की स्थापना को इसी आध्यात्मिक संदर्भ में समझाती है।

हमारा मंथन: जब कोई व्यक्ति पुरानी आदतों को बदलने का संकल्प करता है, तो भीतर और बाहर से रुकावटें महसूस हो सकती हैं। आध्यात्मिक अभ्यास में दृढ़ता, विवेक और नियमितता आवश्यक हैं। यहाँ बाहरी विघ्नों से घबराने के बजाय अपने पुरुषार्थ पर ध्यान देना उपयोगी सीख है।
4. पाँच विकारों पर विजय — हिंसा से नहीं, योगबल से
मूल मुरली की बात: बाबा कहते हैं कि बच्चों को काम, क्रोध आदि पाँच विकारों पर योगबल से विजय पानी है। इसे किसी हिंसक लड़ाई के रूप में नहीं समझाया गया है; मुरली डबल अहिंसक रहने पर बल देती है।

हमारा मंथन: क्रोध आने पर स्वयं को रोकना, लालच आने पर विवेक से निर्णय लेना और आसक्ति बढ़ने पर अपनी प्राथमिकताओं को जाँचना—ये पाँच विकारों पर विजय के व्यावहारिक अभ्यास हो सकते हैं।
5. ज्ञान से पावन बनना
मूल मुरली की बात: बाबा ज्ञान को पावन बनने का माध्यम बताते हैं। आत्मा को पतित से पावन बनाने वाला परमात्मा है और “मनमनाभव” अर्थात् बाप को याद करने पर बल दिया गया है। Pasted text.txt

हमारा मंथन: केवल बाहरी कर्मकाण्ड या जानकारी पर्याप्त मान लेने के बजाय अपने संकल्प और कर्मों में परिवर्तन की जाँच करें। ज्ञान को अपने व्यवहार में उतारना ही पढ़ाई की वास्तविक उपयोगिता है।
6. लौकिक जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अनासक्त रहना
मूल मुरली की बात: बाबा बताते हैं कि बच्चों को अपने गृहस्थ व्यवहार में रहना है और साथ ही बाप की याद का अभ्यास करना है।

हमारा मंथन: वैराग्य का अर्थ परिवार, काम या समाज के प्रति जिम्मेदारी छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है कि जिम्मेदारी निभाते हुए भी लालच, अधिकारभाव और अनावश्यक भावनात्मक निर्भरता से अपने मन को मुक्त रखने का प्रयास करें।

  1. तुलनात्मक अध्ययन — बेहद का वैराग्य किसे कहें?
    आज की मुरली से चुना गया मुख्य विषय है:
    पुरानी दुनिया से वैराग्य — परिस्थितियों से उपजा अस्थायी वैराग्य या ज्ञान से आया स्थायी वैराग्य?
    मुरली 1 — 7 अक्टूबर 1975 | अव्यक्त मुरली
    शीर्षक: “सर्व अधिकार और बेहद के वैराग्य वाला ही राजऋषि”
    मूल मुरली की बात: बाबा राजऋषि की स्थिति को दो पक्षों से समझाते हैं—एक ओर स्वराज्य और अधिकार की स्थिति, दूसरी ओर पुरानी देह और देह की दुनिया से बेहद का वैराग्य। मुरली में केवल नाममात्र के वैराग्य और वास्तविक अनुभव के बीच अन्तर भी बताया गया है।

हमारा तुलनात्मक मंथन: 16 अक्टूबर की मुरली पुराने घर से ममत्व कम करने का उदाहरण देती है। 7 अक्टूबर 1975 की मुरली यह स्पष्ट करती है कि वैराग्य का अर्थ अधिकार या जिम्मेदारी से भागना नहीं; श्रेष्ठ स्थिति और अनासक्ति का संतुलन बनाए रखना है।
आज का प्रश्न: क्या मैं जिम्मेदारी निभाते हुए भी अपने मन को आसक्ति से मुक्त रख सकता हूँ?
7 अक्टूबर 1975 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2 — 13 दिसंबर 1990 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “तपस्या का फाउण्डेशन बेहद का वैराग्य”
मूल मुरली की बात: बाबा बेहद के वैराग्य को तपस्या का आधार बताते हैं। यह वैराग्य केवल किसी एक परिस्थिति या समय के कारण नहीं, बल्कि अपनी स्थिति और श्रीमत पर चलने के पुरुषार्थ से जुड़ा है। मुरली में मन-बुद्धि को एकाग्र रखने और व्यर्थ से बचने पर भी बल दिया गया है।

हमारा तुलनात्मक मंथन: आज की मुरली में नया घर बनने की स्मृति से पुराने घर के प्रति ममत्व कम करने का उदाहरण है। 13 दिसंबर 1990 की मुरली हमें यह जाँचने में सहायता करती है कि हमारा वैराग्य परिस्थितियाँ बदलने पर भी बना रहता है या नहीं।
निष्कर्ष: स्थायी वैराग्य परिस्थिति से भागने का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिति को श्रेष्ठ बनाने का निरन्तर अभ्यास है।
13 दिसंबर 1990 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3 — 3 अप्रैल 1996 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “सेवाओं के साथ-साथ बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा पुराने वा व्यर्थ संस्कारों से मुक्त बनो”
मूल मुरली की बात: बाबा बताते हैं कि समय या परिस्थिति के कारण उत्पन्न वैराग्य अस्थायी हो सकता है। पुराने संस्कार, देह-अभिमान और छिपे हुए आकर्षण वैराग्य को कमजोर कर सकते हैं। मुरली सेवा के साथ पुराने तथा व्यर्थ संस्कारों से मुक्त बनने की प्रेरणा देती है।

हमारा तुलनात्मक मंथन: 16 अक्टूबर की मुरली का संदेश केवल पुरानी दुनिया से वैराग्य का विचार रखने तक सीमित नहीं है। इसे अपने पुराने संस्कारों और विकारों को बदलने के अभ्यास से भी जोड़कर समझा जा सकता है।
यदि कोई व्यक्ति दुःख के समय वैराग्य अनुभव करता है, लेकिन परिस्थिति ठीक होते ही पुरानी आदतों में लौट जाता है, तो उसे अपनी आंतरिक स्थिति पर और ध्यान देना होगा।
आज का प्रश्न: क्या मेरी आसक्ति केवल किसी व्यक्ति या वस्तु से जुड़ी है, या उसके पीछे कोई पुराना संस्कार भी कार्य कर रहा है?
3 अप्रैल 1996 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 4 — 19 फरवरी 2012 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “घर का गेट खोलने के लिए बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा देह-अभिमान के मैं का त्याग करो”
मूल मुरली की बात: बाबा व्यर्थ संकल्पों और व्यर्थ समय को त्यागने, देह-अभिमान कम करने तथा चलते-फिरते देही-अभिमानी स्थिति में रहने पर बल देते हैं। मुरली में बेहद की वैराग्य वृत्ति को आगे की आध्यात्मिक यात्रा से जोड़ा गया है।

हमारा तुलनात्मक मंथन: 16 अक्टूबर की मुरली में पुराने घर के प्रति ममत्व को कम करने की बात है। 19 फरवरी 2012 की मुरली इस शिक्षा को दैनिक अभ्यास में लाती है—व्यर्थ विचार, समय और देह-अभिमान को कम करना भी वैराग्य का हिस्सा है।
निष्कर्ष: वैराग्य का एक व्यावहारिक प्रमाण यह है कि हम अपने विचारों और समय को अधिक सार्थक बनाते हैं।
19 फरवरी 2012 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
दिनांकित मुरली मुख्य शिक्षा आज की मुरली से सम्बन्ध
7 अक्टूबर 1975 राजऋषि: अधिकार और वैराग्य का संतुलन जिम्मेदारियों के साथ अनासक्ति
13 दिसंबर 1990 तपस्या का आधार बेहद का वैराग्य स्थायी आंतरिक परिवर्तन
3 अप्रैल 1996 पुराने और व्यर्थ संस्कारों से मुक्त होना परिस्थिति से आगे बढ़कर संस्कार परिवर्तन
19 फरवरी 2012 व्यर्थ संकल्प, समय और देह-अभिमान का त्याग रोज़मर्रा में वैराग्य का अभ्यास
16 अक्टूबर 2026 पुरानी दुनिया से ममत्व कम कर नए घर के योग्य बनना आसक्ति, विकार और पुराने संस्कारों में परिवर्तन
तुलनात्मक निष्कर्ष: इन मुरलियों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता। वे बेहद के वैराग्य को अलग-अलग कोणों से समझाती हैं—राजऋषि का संतुलन, तपस्या, पुराने संस्कारों का परिवर्तन और व्यर्थ संकल्पों का त्याग। ये हमारे तुलनात्मक निष्कर्ष हैं, मूल मुरली के अतिरिक्त शब्द नहीं।

  1. छोटे प्रश्न और उत्तर
    प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
    उत्तर: पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य धारण करना और नई दुनिया के योग्य बनने का पुरुषार्थ करना।
    प्रश्न 2: बेहद के वैराग्य का व्यावहारिक अर्थ क्या है?
    उत्तर: संसार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी अनावश्यक आसक्ति और पुराने विकारी संस्कारों से मुक्त होना।
    प्रश्न 3: रुद्र ज्ञान यज्ञ में विघ्न क्यों पड़ते हैं?
    उत्तर: मुरली के अनुसार पवित्रता धारण करने, भक्ति छोड़ने और देवताई जीवन के लिए पुरुषार्थ करने के कारण विघ्न आते हैं।
    प्रश्न 4: पाँच विकारों पर विजय कैसे पानी है?
    उत्तर: योगबल, ज्ञान और श्रीमत के अनुसार अपने संकल्पों तथा कर्मों को बदलकर।
    प्रश्न 5: क्या वैराग्य का अर्थ घर-परिवार छोड़ना है?
    उत्तर: नहीं। मुरली गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए भी वैराग्य और बाप की याद का अभ्यास करने की शिक्षा देती है।
    प्रश्न 6: 7 अक्टूबर 1975 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
    उत्तर: अधिकार और जिम्मेदारी के साथ बेहद का वैराग्य भी बनाए रखना।
    प्रश्न 7: 13 दिसंबर 1990 की मुरली का मुख्य सन्देश क्या है?
    उत्तर: बेहद का वैराग्य तपस्या का आधार है और उसे स्थायी बनाना चाहिए।
    प्रश्न 8: 3 अप्रैल 1996 की मुरली क्या सिखाती है?
    उत्तर: पुराने संस्कार और देह-अभिमान वैराग्य को कमजोर कर सकते हैं; इसलिए उनका परिवर्तन आवश्यक है।
    प्रश्न 9: 19 फरवरी 2012 की मुरली से क्या अभ्यास मिलता है?
    उत्तर: व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय को कम करना तथा देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करना।
    प्रश्न 10: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
    उत्तर: क्या मैं परिस्थितियों के कारण वैरागी बनता हूँ, या ज्ञान के आधार पर स्थायी परिवर्तन कर रहा हूँ?
  2. YouTube वीडियो के लिए तैयार सामग्री
    मुख्य शीर्षक
    पुरानी दुनिया से ममत्व मिटाओ — बेहद का वैराग्य धारण करो!
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उपशीर्षक
16 अक्टूबर 2026 | साकार मुरली मंथन | नया स्वर्ग रूपी घर • पुराने संस्कारों से मुक्ति • बेहद का वैराग्य
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मुख्य प्रश्न
क्या मैं पुरानी दुनिया से केवल परेशान हूँ, या सचमुच अपने पुराने संस्कारों और ममत्व को बदल रहा हूँ?
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वीडियो के प्रमुख बिंदु

  1. बेहद के वैराग्य का अर्थ।
  2. पुराने घर और नए घर के उदाहरण से वैराग्य की शिक्षा।
  3. रुद्र ज्ञान यज्ञ और विघ्नों का मुरली-संदर्भ।
  4. पाँच विकारों पर योगबल से विजय।
  5. गृहस्थ जीवन में रहते हुए अनासक्ति।
  6. 7 अक्टूबर 1975, 13 दिसंबर 1990, 3 अप्रैल 1996 और 19 फरवरी 2012 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
  7. पुराने संस्कारों तथा व्यर्थ संकल्पों की आत्म-जाँच।
  8. डिस्क्लेमर
    डिस्क्लेमर: यह वीडियो 16 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली में पुरानी दुनिया, रुद्र ज्ञान यज्ञ, विनाश और नई दुनिया की स्थापना का वर्णन ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक मान्यता के संदर्भ में किया गया है। इस प्रस्तुति में इन कथनों को मुरली की शिक्षाओं के रूप में समझाया गया है; इन्हें वर्तमान में होने वाली किसी प्राकृतिक आपदा या विनाश की स्वतंत्र रूप से सत्यापित भविष्यवाणी न समझें। “बेहद का वैराग्य” का अर्थ परिवार या सामाजिक जिम्मेदारियों को छोड़ना नहीं, बल्कि ममत्व, देह-अभिमान, विकारी आदतों और अनावश्यक आसक्ति को कम करने का आध्यात्मिक अभ्यास है। अन्य दिनांकित मुरलियों की तुलना और उनसे निकाले गए निष्कर्ष मूल मुरली के शब्दशः कथन से अलग हैं। उद्देश्य बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि मूल शिक्षाओं के संदर्भ में आत्मचिन्तन को प्रोत्साहित करना है।
  9. आज का संकल्प
    “मैं संसार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी व्यर्थ आसक्ति और पुराने संस्कारों से मुक्त होने का पुरुषार्थ करूँगा। अपने लक्ष्य को याद रखूँगा और बेहद के वैराग्य को अपने दैनिक जीवन में उतारने का प्रयास करूँगा।”
    अंतिम मंथन प्रश्न: आज मैं किस एक पुराने संस्कार या अनावश्यक ममत्व को कम करने का ठोस अभ्यास कर सकता हूँ?

📝 76. साकार मुरली | 16-10-2026

20 Questions × 5 Marks = 100 Marks

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