14.10.1983
निर्विघ्न बनने का साधन सेवा
आज सर्व ब्राह्मण आत्माओं की याद-प्यार लेते हुए बापदादा के पास पहुँची तो बापदादा ने नयनों द्वारा वरदानी दृष्टि देते, मधुर मुस्कराहट से मिलन मनाते सर्व का याद-प्याद स्वीकार किया और मधुर बोल बोले – बच्ची, क्या संदेश लाई हो? मैं बोली- बाबा, आजकल तो सब बच्चे साकार मिलन के दिन गिन रहे हैं और साथ-साथ सेवा भी देश-विदेश में चारों ओर जोर-शोर से चल रही है। क्योंकि विदेश में हमारे विशेष भाई-बहन गये हुए हैं और भारत में इस समय ही बहुत उत्सव है, इसलिए सब विशेष चाँस ले रहे हैं। याद और सेवा दोनों लहरें चारों ओर है।
बापदादा बोले – बच्ची, बापदादा बच्चों की सेवा देख सदा हर्षित होते कि कैसे तन, मन, धन और समय लगा कर विश्व-सेवा में उमंग-उत्साह से चल रहे हैं। यह सेवा का साधन ही निर्विघ्न बनाने का सहज साधन है। लेकिन सेवा की हलचल में रहते याद की अचल स्थिति में स्थित रहते होता है। बापदादा तो बच्चों को सदैव हैं तो स्वयं तथा सेवा में और ज़्यादा सफलता का अनुभव सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने के लिए इशारा देते ही रहते हैं। अभी भी सदैव सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने के लिए इशारा देते ही रहते हैं। अभी भी सेवा में रूहानियत की अलौकिकता, धारणा रूप की चमक और न्यारे तथा प्यारेपन के निमित्त भाव की झलक का चमत्कार और बढ़ाना है। इस रूहानी चमत्कार से ही जय-जयकार होनी है। अब तक सेवा द्वारा तीर तो लगता है लेकिन वह दिमाग तक ही जाता है, दिल पर नहीं लगता है। इसलिए घायल होते हैं लेकिन मरजीवा बन बाप के नहीं बनते हैं। अब ऐसा बल भरो जो बलि चढ़ जाएँ। फिर भी कई बच्चे अच्छे-अच्छे भी हैं और सभी बच्चे मोहब्बत से मेहनत करते हैं। इसलिए बापदादा मुबारक देते हैं।
ऐसे कहते हुए बहुत स्नेह रूप से बाबा देख रहे थे। तो इतने में क्या देखा कि ब्राह्मणों की बहुत बड़ी सभा बाबा के सामने इमर्ज हो गई और बाबा देश-विदेश के सभी बच्चों से सम्मुख मिलन मना रहे हैं। बापदादा की दृष्टि जब फॉरेन के बच्चों पर पड़ी तो बहुत मीठी-मीठा मुस्कराये और बोले-बच्चों के अति स्नेह और दिल के समाचार बाबा के पास पहुँचते रहते हैं। रूह-रूहान में भी बहुत मीठी-मीठी सच्ची दिल की बातें बाप से करते हैं। सेवा में भी दिल व जान, सिक व प्रेम से चलते रहते हैं। अब तो भारत से गये हुए महावीरों ने और ही सोने में सुहागा भर दिया है। बहुत अच्छी, अथक, स्नेह तथा लगन से सेवा कर रहे हैं और करा रहे हैं।
अव्यक्त संदेश-
बापदादा मन से, मुख से ऐसे दिलरूबा बच्चों को, हर एक को नाम सहित ‘निर्विघ्न भव’, ‘फरिश्ता भव’, ‘सहज योगी, स्वतः योगी भव’ के वरदान दे रहे हैं। ‘जीते रहो, उड़ते रहो’ – ऐसे कहते हुए बाबा विशेष अपनी जानकी दादी, जगदीश भाई, निर्वैर भाई तथा मनोहर बहन को दिल से वरदानों भरी मुबारक दे रहे थे और साथ में अपनी चन्द्रमणि दादी, रमेश भाई और ऊषा बहन को भी बहुत ही प्यार दे रहे थे। ऐसे मिलन मनाते हुए भारतवासी बच्चों की ओर देखा और हरेक को मीठी-मीठी दृष्टि देते मिलन मनाते बोले- भारत के बच्चों का भाग्य कितना बड़ा है जो भाग्यविधाता को भी साकार में भारत में बुला लिया! बापदादा तो बच्चों के भाग्य को देख-देख हर्षा रहे हैं। भारत में भी सेवा की लगन बहुत अच्छी है और भारत के वारिस बच्चों ने अनेकों को वर्सा दिलाया है और दिलाते रहेंगे। बाप तो हर बच्चे के गुण गाते रहते हैं। अब देश-विदेश के सभी बच्चों प्रति एक और आश बाप की है कि विश्व में बेहद बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने की सेरीमनी की डेट बच्चे कब निश्चित करते हैं? क्योंकि बाप को बच्चों की दुःखमय, दर्दमय हालत देख रहम आता है कि कब तक यह सहन करते रहेंगे। क्या आप बच्चों की दिल में रहम की लहर नहीं उठती है? बेहद के परिवर्तन का उमंग नहीं उठता? हे देवी और देव, आपको देव-पुजारियों की पुकार नहीं सुनाई देती? झूठ के राज्य में सच्ची भक्त आत्माएँ कितनी दुःखी हो रही हैं, वह दुःख की आवाज़ नहीं आती है? इसलिए बच्चे, अब सुख के राज्य-तिलक की सेरीमनी मनाओ। प्रत्यक्षता का झण्डा लहरना और बाप का बच्चों को विश्व का राज्य तिलक देना और साक्षी हो देखना। बोलो, राज्य-तिलक का दिन कब लायेंगे? सर्व को सुखी बनाने वाला वरदानी, विश्व-कल्याणी रूप कब प्रत्यक्ष करेंगे?
ऐसे बहुत मीठे-मीठे बोले, दिल को आकर्षित करने वाले बोल बोलते हुए बापदादा सम्मुख एक-एक को सर्व शक्तियों की लाइट और माइट दे रहे थे। बाद में बापदादा ने विशेष अपनी प्यारी दादी जी को सामने बुलाए, अपनी बाहों की माला पहनाए, गोदी के झूले में झुलाए मस्तक पर होली
हस्त घुमाते हुए बोला – बच्ची, बाप समान साकार सैम्पल स्वरूप है। बाबा की चाबी से चलने वाली चैतन्य महान मूर्ति है इसलिए सदा फ्रेश फ़रिश्ता है। उसके साथ अन्य अनन्य बहनों को भी बापदादा ने विशेष स्नेह से पास बुलाया और बहुत-बहुत स्नेह के सागर में समा लिया। बस, आज तो सम्मुख मिलन मेला ही वतन में था। बाबा बोले- किस-किस को बुलाऊँ, किस-किस को खास याद करूँ ! एक-एक बच्चा एक-दो से प्रिय है। इसलिए सभी से विशेष स्नेह और प्यार है। इस प्रकार सभी बच्चों को याद-प्यार देते और लेते मैं साकार वतन में पहुँच गई।
अव्यक्त दिव्य संदेश–17
14 अक्टूबर 1983
निर्विघ्न बनने का साधन सेवा
- बापदादा का मधुर मिलन और वरदानी दृष्टि
आज बापदादा ने सर्व ब्राह्मण आत्माओं की याद-प्यार स्वीकार करते हुए नयनों से वरदानी दृष्टि दी और मधुर मुस्कराहट के साथ मिलन मनाया।
बापदादा ने पूछा — “बच्ची, क्या संदेश लाई हो?”
उत्तर में बताया गया कि सभी बच्चे साकार मिलन के दिन गिन रहे हैं और साथ-साथ देश-विदेश में सेवा भी उमंग-उत्साह से चल रही है। विदेश में विशेष भाई-बहन सेवा कर रहे हैं और भारत में भी उत्सवों के अवसर पर विशेष सेवा की जा रही है।
इस प्रकार चारों ओर याद और सेवा की दोनों लहरें चल रही हैं।
- निर्विघ्न बनने का सहज साधन — सेवा
बापदादा बच्चों की सेवा देखकर हर्षित होते हैं कि वे तन, मन, धन और समय लगाकर विश्व-सेवा में उमंग-उत्साह से आगे बढ़ रहे हैं।
मुरली का विशेष संदेश है:
सेवा का साधन ही निर्विघ्न बनाने का सहज साधन है।
लेकिन सेवा की हलचल में रहते हुए भी याद की अचल स्थिति में स्थित रहना आवश्यक है।
सेवा करते समय केवल बाहरी गतिविधियों में व्यस्त नहीं होना है, बल्कि अपनी आत्मिक स्थिति को स्थिर और शक्तिशाली बनाए रखना है।
- सेवा में रूहानियत और अलौकिकता बढ़ाना
बापदादा बच्चों को सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने के लिए विशेष इशारा देते हैं कि सेवा में तीन बातों को और बढ़ाना है:
रूहानियत की अलौकिकता — सेवा में आत्मिकता का अनुभव हो।
धारणा की चमक — जो ज्ञान सुनाया जाता है, वह जीवन में दिखाई दे।
न्यारे और प्यारेपन की झलक — व्यवहार में स्नेह हो, लेकिन आसक्ति से न्यारे रहें।
इन गुणों के माध्यम से सेवा में रूहानी चमत्कार दिखाई देगा।
केवल अच्छी बातें सुनाना पर्याप्त नहीं है। सेवा करने वाले की स्थिति और धारणा भी सामने वाले के दिल को प्रभावित करे।
- दिमाग तक नहीं, दिल तक पहुँचे सेवा
बापदादा बताते हैं कि अभी सेवा का तीर कई बार दिमाग तक पहुँचता है, लेकिन दिल पर प्रभाव नहीं डालता।
इस कारण व्यक्ति बातें समझ तो लेता है, लेकिन उसके जीवन में गहरा परिवर्तन नहीं आता।
अब सेवा में ऐसा बल भरना है कि आत्मा केवल ज्ञान को समझे ही नहीं, बल्कि परिवर्तन के लिए स्वयं को समर्पित भी करे।
सेवा का उद्देश्य केवल सुनाना नहीं, बल्कि आत्मा को बाप का बनने और जीवन में श्रेष्ठ परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करना है।
- देश-विदेश के बच्चों की अथक सेवा
बापदादा ने विदेश में सेवा कर रहे बच्चों के प्रति विशेष स्नेह व्यक्त किया।
बच्चे सच्चे दिल से बाप के साथ रूह-रूहान करते हैं और सेवा में दिल, जान, लगन तथा प्रेम से आगे बढ़ते हैं।
भारत से विदेश गए महावीरों ने सेवा में और भी उमंग-उत्साह भरा है। वे स्वयं सेवा कर रहे हैं और दूसरों से भी सेवा करा रहे हैं।
बापदादा ऐसे सभी बच्चों को उनकी अथक मेहनत, स्नेह और लगन के लिए मुबारक देते हैं।
- बापदादा के तीन विशेष वरदान
बापदादा बच्चों को विशेष रूप से तीन वरदान देते हैं:
निर्विघ्न भव।
फरिश्ता भव।
सहज योगी, स्वतः योगी भव।
साथ ही मधुर आशीर्वाद देते हैं — “जीते रहो, उड़ते रहो।”
इन वरदानों का भाव है कि बच्चे विघ्नों से ऊपर उठें, फरिश्ते समान न्यारे-प्यारे बनें और योग का अभ्यास सहज तथा स्वाभाविक हो जाए।
- भारत के बच्चों का भाग्य और सेवा
बापदादा भारत के बच्चों को देखकर हर्षित होते हैं कि उनका भाग्य कितना बड़ा है, जो उन्होंने भाग्यविधाता को भी साकार में भारत में बुला लिया।
भारत के बच्चों ने अनेक आत्माओं को वर्सा दिलाया है और आगे भी दिलाते रहेंगे।
इस संदेश में सेवा के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारी को पहचानने की प्रेरणा दी गई है। प्राप्त भाग्य को केवल अपने तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि दूसरों को भी सुख और वर्से का अनुभव कराना है।
- विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा कब लहराएँगे?
बापदादा देश-विदेश के सभी बच्चों के सामने एक विशेष आश रखते हैं — विश्व में बेहद बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने की तिथि बच्चे कब निश्चित करेंगे?
बापदादा संसार की दुःखमय और दर्दमय स्थिति को देखकर बच्चों को याद दिलाते हैं कि अब विश्व-परिवर्तन के लिए उमंग और रहम की लहर उठनी चाहिए।
क्या दुःखी आत्माओं की पुकार सुनाई नहीं देती? क्या सभी को सुखी बनाने की भावना जागृत नहीं होती?
इसलिए बच्चों को विश्व-कल्याणी और वरदानी स्वरूप में प्रत्यक्ष होना है।
- सुख के राज्य-तिलक की तैयारी
बापदादा बच्चों को प्रेरणा देते हैं कि अब सुख के राज्य-तिलक की सेरेमनी मनाने की तैयारी करें।
इसमें तीन भाव विशेष हैं:
प्रत्यक्षता का झण्डा लहराना।
बाप द्वारा बच्चों को विश्व के राज्य का तिलक देना।
साक्षी होकर इस परिवर्तन को देखना।
बापदादा चाहते हैं कि बच्चे अपनी स्थिति और सेवा से विश्व को सुख देने वाले स्वरूप में प्रत्यक्ष हों।
यह केवल भविष्य की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि वर्तमान में विश्व-कल्याणकारी बनने की जिम्मेदारी भी है।
- सर्व शक्तियों की लाइट और माइट
बापदादा मिलन के समय प्रत्येक बच्चे को सर्व शक्तियों की लाइट और माइट दे रहे थे।
लाइट का भाव प्रकाश और स्पष्टता से तथा माइट का भाव शक्ति और सामर्थ्य से जुड़ा है।
सेवा में सफलता के लिए आत्मा में ज्ञान का प्रकाश भी हो और परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति भी।
जब सेवा करने वाला स्वयं शक्तिशाली होगा, तब उसकी सेवा दूसरों को भी शक्ति देने वाली बनेगी।
- बाप समान साकार सैम्पल बनना
बापदादा ने विशेष स्नेह से दादी जी को पास बुलाकर स्नेह दिया और उन्हें बाप समान साकार सैम्पल स्वरूप बताया।
सैम्पल स्वरूप बनने का अर्थ है कि जीवन में बाप के गुण और शिक्षाएँ स्पष्ट दिखाई दें।
ऐसा व्यक्ति केवल ज्ञान सुनाने वाला नहीं होता, बल्कि अपने व्यवहार और स्थिति से भी शिक्षा देता है।
मुरली में चैतन्य महान मूर्ति और फ्रेश फरिश्ते के स्वरूप की प्रशंसा की गई है।
- स्नेह के सागर में समाना
बापदादा ने अनेक बहनों और भाइयों को विशेष स्नेह से पास बुलाया और अपने स्नेह में समा लिया।
बापदादा का भाव था कि प्रत्येक बच्चा प्रिय है। किस-किस को विशेष रूप से बुलाएँ और किस-किस को अलग से याद करें, क्योंकि एक-एक बच्चा दूसरे से प्रिय है।
इस मिलन में सर्व बच्चों के प्रति समान स्नेह और अपनत्व की भावना व्यक्त की गई है।
- आत्म-चेकिंग: क्या मेरी सेवा मुझे निर्विघ्न बना रही है?
प्रतिदिन स्वयं से पूछें:
क्या मैं तन, मन, धन और समय से सेवा करता हूँ?
क्या सेवा की हलचल में भी मेरी याद की स्थिति अचल रहती है?
क्या मेरी सेवा में रूहानियत और अलौकिकता दिखाई देती है?
क्या मेरी धारणा मेरे व्यवहार में झलकती है?
क्या मेरी सेवा केवल दिमाग तक पहुँचती है या दिल को भी परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है?
क्या मैं सहज योगी और स्वतः योगी बनने का अभ्यास कर रहा हूँ?
क्या मेरे कर्म बाप समान सैम्पल स्वरूप का परिचय देते हैं?
क्या मेरे अंदर विश्व-कल्याण की भावना है?
क्या मैं स्वयं शक्तिशाली बनकर दूसरों को भी शक्ति देता हूँ?
क्या मैं निर्विघ्न भव, फरिश्ता भव और सहज योगी भव के वरदानों को जीवन में धारण कर रहा हूँ?
निष्कर्ष
14 अक्टूबर 1983 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य विषय है — निर्विघ्न बनने का साधन सेवा।
तन, मन, धन और समय से सेवा करते हुए याद की अचल स्थिति में रहना है। सेवा में रूहानियत, धारणा की चमक और न्यारे-प्यारेपन की झलक बढ़ानी है, ताकि सेवा केवल दिमाग तक सीमित न रहे, बल्कि दिल को छूकर जीवन में परिवर्तन लाए।
बापदादा का आह्वान है कि सभी बच्चे निर्विघ्न, फरिश्ता और सहज योगी बनकर विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराएँ तथा विश्व को सुख देने वाले विश्व-कल्याणी स्वरूप में प्रत्यक्ष हों।
छोटे प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. इस दिव्य संदेश का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: निर्विघ्न बनने का साधन सेवा।
प्रश्न 2. बापदादा बच्चों की सेवा देखकर क्यों हर्षित होते हैं?
उत्तर: क्योंकि बच्चे तन, मन, धन और समय लगाकर विश्व-सेवा करते हैं।
प्रश्न 3. सेवा का सहज साधन क्या बताया गया है?
उत्तर: सेवा ही निर्विघ्न बनाने का सहज साधन है।
प्रश्न 4. सेवा की हलचल में क्या बनाए रखना है?
उत्तर: याद की अचल स्थिति।
प्रश्न 5. सेवा में कौन-सी तीन विशेषताएँ बढ़ानी हैं?
उत्तर: रूहानियत की अलौकिकता, धारणा की चमक और न्यारे-प्यारेपन की झलक।
प्रश्न 6. सेवा का तीर अभी कहाँ तक पहुँचता है?
उत्तर: कई बार दिमाग तक, दिल तक नहीं।
प्रश्न 7. सेवा का प्रभाव कैसा होना चाहिए?
उत्तर: ऐसा कि आत्मा दिल से परिवर्तन के लिए प्रेरित हो।
प्रश्न 8. बापदादा ने किन बच्चों को मुबारक दी?
उत्तर: देश-विदेश में स्नेह और लगन से अथक सेवा करने वाले बच्चों को।
प्रश्न 9. बापदादा के तीन विशेष वरदान कौन-से हैं?
उत्तर: निर्विघ्न भव, फरिश्ता भव और सहज योगी, स्वतः योगी भव।
प्रश्न 10. बापदादा का एक मधुर आशीर्वाद क्या है?
उत्तर: “जीते रहो, उड़ते रहो।”
प्रश्न 11. भारत के बच्चों के प्रति बापदादा की भावना क्या थी?
उत्तर: उनके बड़े भाग्य और सेवा को देखकर हर्षित होना।
प्रश्न 12. भारत के वारिस बच्चों ने क्या किया है?
उत्तर: अनेक आत्माओं को वर्सा दिलाया है।
प्रश्न 13. बापदादा बच्चों से कौन-सी विशेष तिथि निश्चित करने की आश रखते हैं?
उत्तर: विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने की तिथि।
प्रश्न 14. बापदादा संसार की स्थिति देखकर क्या अनुभव करते हैं?
उत्तर: दुःखी और दर्दमय आत्माओं के लिए रहम आता है।
प्रश्न 15. बच्चों को किस स्वरूप में प्रत्यक्ष होना है?
उत्तर: वरदानी और विश्व-कल्याणकारी स्वरूप में।
प्रश्न 16. सुख के राज्य-तिलक की तैयारी में कौन-से भाव हैं?
उत्तर: प्रत्यक्षता का झण्डा, राज्य-तिलक और साक्षी होकर देखना।
प्रश्न 17. बापदादा बच्चों को क्या दे रहे थे?
उत्तर: सर्व शक्तियों की लाइट और माइट।
प्रश्न 18. बाप समान साकार सैम्पल बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर: जीवन में बाप के गुणों और शिक्षाओं को प्रत्यक्ष करना।
प्रश्न 19. सैम्पल स्वरूप दूसरों को कैसे शिक्षा देता है?
उत्तर: अपने व्यवहार और स्थिति से।
प्रश्न 20. बापदादा का प्रत्येक बच्चे के प्रति क्या भाव है?
उत्तर: प्रत्येक बच्चा प्रिय है और सभी के प्रति विशेष स्नेह है।
प्रश्न 21. सेवा में केवल मेहनत करना पर्याप्त क्यों नहीं है?
उत्तर: सेवा में रूहानियत और आत्मिक परिवर्तन लाने वाला प्रभाव भी आवश्यक है।
प्रश्न 22. सहज योगी बनने का क्या भाव है?
उत्तर: योग का अभ्यास सहज और स्वाभाविक बनाना।
प्रश्न 23. विश्व-कल्याणी बनने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: विश्व की दुःखी आत्माओं के प्रति रहम और सेवा का उमंग।
प्रश्न 24. सेवा करने वाले को स्वयं कैसा होना चाहिए?
उत्तर: शक्तिशाली, अचल और रूहानी।
प्रश्न 25. इस संदेश में सेवा के कौन-से साधन बताए गए हैं?
उत्तर: तन, मन, धन और समय।
प्रश्न 26. सेवा की धारणा की चमक कहाँ दिखाई देनी चाहिए?
उत्तर: जीवन और व्यवहार में।
प्रश्न 27. फरिश्ता भव के साथ कौन-सा वरदान दिया गया है?
उत्तर: निर्विघ्न भव और सहज योगी, स्वतः योगी भव।
प्रश्न 28. बापदादा बच्चों से विश्व में क्या प्रत्यक्ष कराना चाहते हैं?
उत्तर: बेहद बाप की प्रत्यक्षता।
प्रश्न 29. सेवा से निर्विघ्न बनने के लिए किस स्थिति की आवश्यकता है?
उत्तर: सेवा करते हुए याद की अचल स्थिति।
प्रश्न 30. इस दिव्य संदेश की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: रूहानी स्थिति में रहकर सेवा करना, स्वयं निर्विघ्न बनना और दूसरों के जीवन में भी परिवर्तन लाना।
📝 17. अव्यक्त दिव्य संदेश | 14 अक्टूबर 1983
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