| 15-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
“मीठे बच्चे – आत्मा और शरीर जो पतित और काले बन गये हैं, बाप की याद से इन्हें पावन बनाओ क्योंकि अब पावन दुनिया में चलना है”
| प्रश्नः- | भगवान किन बच्चों को मिलता है, बाप ने कौन सा हिसाब बतलाया है? |
| उत्तर:- | जिन्होंने शुरू से भक्ति की है उन्हें ही भगवान मिलता है। बाबा ने यह हिसाब बतलाया है कि सबसे पहले तुम भक्ति करते हो इसलिए तुम्हें ही पहले-पहले भगवान द्वारा ज्ञान मिलता है, जिससे फिर तुम नई दुनिया में राज्य करते हो। बाप कहते हैं तुमने आधाकल्प मुझे याद किया है अब मैं आया हूँ, तुम्हें भक्ति का फल देने। |
| गीत:- | मरना तेरी गली में…. |
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। जब कोई मरते हैं तो बाप के पास जन्म लेते हैं। जानते हो हम आत्मायें हैं। वह हो गई शरीर की बात। एक शरीर छोड़ फिर दूसरे बाप के पास जाते हैं। तुमने कितने साकारी बाप किये हैं। असुल में हो निराकारी बाप के बच्चे। तुम आत्मा परमपिता परमात्मा के बच्चे हो, रहने वाले भी वहाँ के हो, जिसको निर्वाणधाम वा शान्तिधाम कहा जाता है। बाप भी वहाँ रहते हैं। यहाँ तुम आकर लौकिक बाप के बच्चे बनते हो, तो फिर उस बाप को भूल जाते हो। सतयुग में तुम सुखी बन जाते हो, तो उस पारलौकिक बाप को भूल जाते हो। सुख में उस बाप का सिमरण नहीं करते हो। दु:ख में याद करते हो और आत्मा याद करती है। जब लौकिक बाप को याद करती है तो बुद्धि शरीर तरफ रहती है। उस बाबा को याद करेंगे तो कहेंगे ओ बाबा, हैं दोनों बाबा। राइट अक्षर बाप ही है। वह भी फादर, यह भी फादर। आत्मा रूहानी बाप को याद करती है तो बुद्धि वहाँ चली जाती है। यह बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। अभी तुम जानते हो बाबा आया हुआ है, हमको अपना बनाया है। बाप कहते हैं – पहले-पहले हमने तुमको स्वर्ग में भेजा। तुम बहुत साहूकार थे फिर 84 जन्म ले ड्रामा प्लैन अनुसार अभी तुम दु:खी हो पड़े हो। ड्रामानुसार यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। तुम्हारी आत्मा और यह शरीर रूपी वस्त्र सतोप्रधान थे फिर गोल्डन एज से आत्मा सिलवर एज में आई तो शरीर भी सिलवर में आया फिर कॉपर एज में आये। अभी तो तुम्हारी आत्मा बिल्कुल ही पतित हो गई है, तो शरीर भी पतित है। जैसे 14 कैरेट का सोना कोई पसन्द नहीं करते हैं, काला पड़ जाता है। तुम भी अभी काले आइरन एजेड बन गये हो। अब आत्मा और शरीर जो ऐसे काले बन गये हैं तो फिर पवित्र कैसे बनें। आत्मा पवित्र बनें तो शरीर भी पवित्र मिले। वह कैसे होगा? क्या गंगा स्नान करने से? नहीं, पुकारते ही हैं – हे पतित-पावन आओ। यह आत्मा कहती है तो बुद्धि पारलौकिक बाप तरफ चली जाती है। हे बाबा, देखो बाबा अक्षर ही कितना मीठा है। भारत में ही बाबा-बाबा कहते हैं। अभी तुम आत्म-अभिमानी बन बाबा के बने हो। बाबा कहते हैं मैंने तुमको स्वर्ग में भेजा था, नया शरीर धारण किया था। अब तुम क्या बन गये हो। यह बातें हमेशा अन्दर रहनी चाहिए। बाबा को ही याद करना चाहिए। याद सब करते हैं ना – हे बाबा, हम आत्मायें पतित बन गई हैं, अब आओ, आकर पावन बनाओ। ड्रामा में यह भी पार्ट है, तब तो बुलाते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार आयेंगे भी तब जब पुरानी दुनिया से नई बनती है। तो जरूर संगम पर ही आयेंगे। तुम बच्चों को निश्चय है – बील्वेड मोस्ट बाबा है। कहते भी हैं स्वीट, स्वीटेस्ट… अब स्वीट कौन है? लौकिक सम्बन्ध में पहले फादर है, जो जन्म देते हैं। फिर है टीचर। टीचर से पढ़कर तुम मर्तबा पाते हो। नॉलेज इज सोर्स ऑफ इनकम कहा जाता है। ज्ञान है नॉलेज, योग है याद। तो बेहद का किसको पता नहीं है। चित्रों में क्लीयर दिखाया भी है, ब्रह्मा द्वारा स्थापना शिव-बाबा कराते हैं। श्रीकृष्ण कैसे राजयोग सिखायेगा। राजयोग सिखलाते ही हैं सतयुग के लिए। तो जरूर संगम पर बाप ने सिखाया होगा। सतयुग की स्थापना करने वाला है बाबा। ब्रह्मा द्वारा कराते हैं, करनकरावनहार है ना। वो लोग तो त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं। परन्तु ऊंच ते ऊंच शिव है ना। वह साकार है, वह निराकार है। सृष्टि भी यही है। इस सृष्टि का ही चक्र फिरता है, रिपीट होता रहता है। सूक्ष्मवतन की सृष्टि का चक्र नहीं गाया जाता है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। गाते भी हैं सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। बीच में जरूर संगमयुग चाहिए। नहीं तो कलियुग को सतयुग कौन बनाये! नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाने बाप संगम पर ही आते हैं। जितनी पुरानी दुनिया उतना दु:ख जास्ती। आत्मा जितना तमोप्रधान बनती जाती है, उतना दु:खी होती है। देवतायें हैं सतोप्रधान। यह तो हाइएस्ट अथॉरिटी गॉड फादरली गवर्मेंन्ट है। साथ में धर्मराज़ भी है। बाप कहते हैं – तुम शिवालय में रहने वाले थे, अब है वेश्यालय। तुम पावन थे अब पतित बने हो तो कहते हो हम तो पापी हैं। आत्मा कहती है मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। कोई भी देवता के मन्दिर में जायेंगे तो उनके आगे ऐसे कहेंगे। कहना चाहिए बाप के आगे। उसको छोड़ ब्रदर्स को कहने लगते हैं, यह देवतायें ब्रदर्स ठहरे ना। ब्रदर्स से तो कुछ मिलना नहीं है। भाइयों की पूजा करते-करते नीचे गिरते आये हैं। अब तुम बच्चे जानते हो – बाप आया हुआ है, उससे हमको वर्सा मिलता है। बाकी मनुष्य तो बाप को जानते ही नहीं। सर्वव्यापी कह देते हैं। कोई फिर कहते अखण्ड ज्योति तत्व है। कोई कहते वह नामरूप से न्यारा है। अरे तुम कहते हो अखण्ड ज्योति स्वरूप है, फिर नाम रूप से न्यारा कैसे कहते हो। बाप को न जानने के कारण ही पतित बन पड़े हैं। तमोप्रधान भी बनना ही है। फिर जब बाप आये तब सबको पावन बनाये। आत्मायें निराकारी दुनिया में सब बाप के साथ रहती हैं। फिर यहाँ आकर सतो रजो तमो का पार्ट बजाती हैं। आत्मा ही बाप को याद करती है। बाप आते भी हैं, कहते हैं ब्रह्मा तन का आधार लेता हूँ, यह है भाग्यशाली रथ। बिगर आत्मा रथ थोड़ेही होता है। कहते हैं भागीरथ ने गंगा लाई। अब यह बात तो हो नहीं सकती। परन्तु कुछ भी समझते नहीं कि हम कहते क्या हैं!
अभी तुम बच्चों को समझाया है – यह है ज्ञान वर्षा। इससे क्या होता है? पतित से पावन बनते हैं। गंगा जमुना तो सतयुग में भी होती हैं। कहते हैं श्रीकृष्ण जमुना के कण्ठे पर खेलपाल करते हैं। ऐसी कोई बातें हैं नहीं। वह तो सतयुग का प्रिन्स है, उसकी बहुत सम्भाल से पालना होती है क्योंकि फूल है ना। फूल कितने अच्छे सुन्दर होते हैं। फूल से सभी आकर खुशबू लेते हैं। काँटों से थोड़ेही खुशबू लेंगे। अभी तो है ही काँटों की दुनिया। जंगल को बाप आकर गार्डन ऑफ फ्लावर्स बनाते हैं इसलिए उनका नाम बबुलनाथ भी रख दिया है। काँटों से फूल बनाते हैं इसलिए महिमा गाते हैं काँटों को फूल बनाने वाला बाबा। अब तुम बच्चों का बाप के साथ कितना लव होना चाहिए। अभी तुम जानते हो हम बेहद के बाप के बने हैं। अभी तुम्हारा सम्बन्ध उनसे भी है तो लौकिक से भी है। पारलौकिक बाप को याद करने से तुम पावन बनेंगे। आत्मा जानती है, वह हमारा लौकिक बाप और यह पारलौकिक बाप है। भक्ति मार्ग में भी आत्मा जानती है, वह हमारा लौकिक बाप और यह गॉड फादर। अविनाशी बाप को याद करते हैं। वह बाप कब आकर हेविन स्थापन करते हैं, यह किसको पता नहीं है। बाप आते ही हैं पतितों को पावन बनाने। तो जरूर संगम पर आयेंगे। शास्त्रों में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष लिखकर मनुष्यों को बिल्कुल घोर अन्धियारे में डाल दिया है। कहते हैं जो बहुत भक्ति करते हैं उन्हें भगवान मिलता है। तो सबसे जास्ती भक्ति करने वाले को जरूर पहले मिलना चाहिए। बाप ने हिसाब भी बतलाया है। सबसे पहले भक्ति तुम करते हो तुमको ही पहले-पहले भगवान द्वारा ज्ञान मिलना चाहिए, जो फिर तुम ही नई दुनिया में राज्य करो। बेहद का बाप तुम बच्चों को ज्ञान दे रहे हैं, इसमें तकलीफ की कोई बात नहीं है। बाप कहते हैं तुमने आधाकल्प याद किया है। सुख में तो कोई याद करते ही नहीं। अन्त में जब दु:खी हो जाते हैं तब हम आकर सुखी बनाते हैं। अभी तुम बहुत बड़े आदमी बनते हो। चीफ मिनिस्टर, प्राइम मिनिस्टर आदि के बंगले कितने फर्स्टक्लास होते हैं। सारा फर्नीचर ऐसा फर्स्ट-क्लास होगा। तुम तो कितने बड़े आदमी (देवता) बनते हो। दैवी गुण वाले देवता स्वर्ग के मालिक बनते हो। वहाँ तुम्हारे लिए महल भी हीरों जवाहरों के होते हैं। वहाँ तुम्हारा फर्नीचर सोने जड़ित का फर्स्टक्लास होगा।
यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। शिव को रूद भी कहते हैं। जब भक्ति पूरी होती है तो भगवान रूद यज्ञ रचते हैं। सतयुग में यज्ञ अथवा भक्ति की बात ही नहीं। इस समय ही बाप यह अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ रचते हैं, जिसका फिर बाद में गायन चलता है। भक्ति तो सदैव नहीं चलती रहेगी। भक्ति और ज्ञान, भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। बाप आकर दिन बनाते हैं, तो बच्चों का भी बाप के साथ कितना लव होना चाहिए। बाप हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। मोस्ट बील्वेड बाबा है ना। उनसे ज्यादा प्यारी वस्तु कोई हो न सके। आधाकल्प से याद करते आये हैं। बाबा आकर हमारे दु:ख हरो। अब बाप आये हैं, समझाते हैं बच्चे, तुम्हें अपने गृहस्थ व्यवहार में रहना ही है। यहाँ बाबा के पास कहाँ तक बैठेंगे। साथ में तो परमधाम में ही रह सकते। यहाँ तो नहीं रह सकते। यहाँ तो नॉलेज पढ़ने की है। नॉलेज पढ़ने वाले थोड़े होते हैं। लाउड स्पीकर पर कभी पढ़ाई होती है क्या? टीचर सवाल कैसे पूछेंगे? लाउड स्पीकर पर रेसपान्ड कैसे दे सकेंगे? इसलिए थोड़े-थोड़े स्टूडेन्ट को पढ़ाते हैं। कॉलेज तो बहुत होते हैं फिर सबके इम्तहान होते हैं। रिजल्ट निकलती है। यहाँ तो एक बाप ही पढ़ाते हैं। यह भी समझाना चाहिए कि दो बाप हैं – लौकिक और पारलौकिक। दु:ख में सिमरण उस पारलौकिक बाप का करते हैं। अब वह बाप आया हुआ है। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। वह समझते हैं महाभारत लड़ाई में श्रीकृष्ण आया, यह तो हो न सके। परन्तु वह है निराकार, वह है साकार। निराकार बाप सभी आत्माओं का बाप है। हैं दोनों मोस्ट बील्वेड। श्रीकृष्ण भी विश्व का मालिक है ना। अभी तुम जज कर सकते हो कि जास्ती प्यारा कौन? शिवबाबा ही ऐसा लायक बनाते हैं ना। श्रीकृष्ण क्या करते हैं? बाप ही तो उनको ऐसा बनाते हैं ना। तो गायन भी जास्ती उस बाप का होना चाहिए ना। बाप ने समझाया है – तुम सब पार्वतियाँ हो। यह शिव अमरनाथ तुमको कथा सुना रहे हैं। तुम ही सब अर्जुन हो, तुम ही सब द्रोपदियाँ हो। इस विशश दुनिया को रावण राज्य कहा जाता है। वह है वाइसलेस वर्ल्ड। विकार की बात नहीं। निराकार बाप विकारी दुनिया रचेंगे क्या? विकार में ही दु:ख है। संन्यासियों का है ही हठयोग, निवृति मार्ग। कर्म संन्यास तो कभी होता ही नहीं। वह तब हो जब आत्मा शरीर से अलग हो जाए। गर्भ जेल में फिर कर्मों का हिसाब शुरू हो जाता है। बाकी कर्म संन्यास कहना रांग है, हठयोग आदि बहुत सीखते हैं, गुफाओं में जाकर बैठते हैं। आग से भी चले जाते हैं। रिद्धि सिद्धि भी बहुत है। जादूगरी से बहुत चीज़ें भी निकालते हैं। भगवान को भी जादूगर, रत्नागर, सौदागर कहते हैं। लेकिन उनसे कोई को गति सद्गति तो नहीं मिल सकती। वह तो एक ही सच्चा सतगुरू आकर सबकी गति सद्गति करते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कांटों से फूल बनाने वाला मोस्ट बील्वेड एक बाप है, उसे बहुत लव से याद करना है। खुशबूदार पावन फूल बन सबको सुख देना है।
2) यह नॉलेज (पढ़ाई) सोर्स ऑफ इनकम है, इससे 21 जन्म के लिए तुम बहुत बड़े आदमी बनते हो इसलिए इसे अच्छी रीति पढ़ना और पढ़ाना है। आत्म-अभिमानी बनना है।
| वरदान:- | जिम्मेवारी सम्भालते हुए आकारी और निराकारी स्थिति के अभ्यास द्वारा साक्षात्कारमूर्त भव जैसे साकार रूप में इतनी बड़ी जिम्मेवारी होते हुए भी आकारी और निराकारी स्थिति का अनुभव कराते रहे ऐसे फालो फादर करो। साकार रूप में फरिश्ते पन की अनुभूति कराओ। कोई कितना भी अशान्त वा बेचैन घबराया हुआ आपके सामने आये लेकिन आपकी एक दृष्टि, वृत्ति और स्मृति की शक्ति उनको बिल्कुल शान्त कर दे। व्यक्त भाव में आये और अव्यक्त स्थिति का अनुभव करे तब कहेंगे साक्षात्कारमूर्त। |
| स्लोगन:- | जो सच्चे रहमदिल हैं उन्हें देह वा देह-अभिमान की आकर्षण नहीं हो सकती। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
ज्ञानी तू आत्मा सदैव हर एक के प्रति मास्टर स्नेह का सागर होते हैं। बिना स्नेह के उसके पास और कुछ है ही नहीं। कोई भी आयेगा तो उसे स्नेह ही देंगे। आजकल सम्पत्ति से भी ज्यादा स्नेह की आवश्यकता है। स्नेह की शक्ति से दुश्मन को भी मित्र बना सकते हो। अपकारियों पर भी उपकार कर सकते हो।
15 अक्टूबर 2026 — आज की मुरली मंथन
साकार मुरली मधुबन
बाप की याद से पावन बनो — काँटों से फूल बनने का पुरुषार्थ!
मुख्य विषय: आत्मा की पवित्रता • याद की शक्ति • दैवी गुण • श्रेष्ठ कर्म
उपशीर्षक: शरीर नहीं, पहले आत्मा की स्थिति बदलो • याद में रहो • पावन दुनिया के योग्य बनो
आज की मुरली का मुख्य संदेश है कि आत्मा और शरीर पतित अवस्था में आ गए हैं, इसलिए बाप की याद से आत्मा को पावन बनाने का पुरुषार्थ करना है। बाबा ज्ञान और योग की शिक्षा देते हुए बच्चों को काँटों से फूल बनने, पवित्रता धारण करने और दूसरों को सुख देने की प्रेरणा देते हैं। Pasted text.txt
- मुख्य प्रश्न
क्या मैं केवल पावन बनने की बात करता हूँ, या बाबा की याद और श्रीमत से अपने संकल्प, संस्कार और कर्म भी बदल रहा हूँ? - आज की मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
- आत्मा की पवित्रता ही परिवर्तन का आधार
मूल मुरली की बात: बाबा कहते हैं कि आत्मा पतित होने के कारण दुःख का अनुभव करती है। बाबा की याद से आत्मा को पावन बनाने का पुरुषार्थ करना है। Pasted text.txt
हमारा मंथन: बाहरी साधनों की अपेक्षा अपनी आंतरिक स्थिति, विचारों और संस्कारों पर ध्यान देना चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से पावन बनने का अभ्यास तभी जीवन में दिखाई देगा, जब हमारे व्यवहार में भी श्रेष्ठता आएगी।
2. याद को केवल दुःख के समय तक सीमित न रखें
मूल मुरली की बात: मनुष्य दुःख में परमात्मा को याद करते हैं, लेकिन बाबा बच्चों को सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में अपने पारलौकिक पिता का स्मरण रखने की शिक्षा देते हैं।
हमारा मंथन: यदि हम केवल परेशानी आने पर ही याद करते हैं, तो याद एक सहारा तो बनती है, लेकिन दैनिक जीवन का सहज संस्कार नहीं बन पाती। नियमित याद का अभ्यास हमें अपने संकल्पों और कर्मों पर ध्यान देने में भी मदद कर सकता है।
3. ज्ञान और योग दोनों आवश्यक हैं
मूल मुरली की बात: मुरली में ज्ञान को पढ़ाई और योग को याद कहा गया है। बाबा बच्चों को ज्ञान अच्छी तरह पढ़ने, पढ़ाने और आत्म-अभिमानी बनने की प्रेरणा देते हैं। Pasted text.txt
हमारा मंथन: ज्ञान से सही दिशा समझ में आती है और याद उस दिशा पर चलने का अभ्यास बनती है। केवल जानकारी जमा करना पर्याप्त नहीं; उसे जीवन में उतारना भी आवश्यक है।
4. काँटों से फूल बनना
मूल मुरली की बात: बाबा काँटों को फूल बनाने वाले के रूप में महिमामंडित किए गए हैं। बच्चों को भी पावन, सुखदायी और दैवी गुणों वाला बनने की प्रेरणा दी गई है।
हमारा मंथन: आज स्वयं से पूछें—क्या मेरे व्यवहार से दूसरों को शान्ति और सहयोग मिलता है? क्या मैं कटुता के स्थान पर मधुरता, स्वार्थ के स्थान पर शुभ भावना और क्रोध के स्थान पर संयम का अभ्यास कर रहा हूँ?
5. सच्चा पुरुषार्थ और लक्ष्य
मूल मुरली की बात: बाबा बच्चों को स्वर्ग का वर्सा प्राप्त करने, दैवी गुण धारण करने और राजयोग की पढ़ाई को अच्छी रीति पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। Pasted text.txt
हमारा मंथन: ऊँचे लक्ष्य को सामने रखने का अर्थ है कि प्रतिदिन अपने पुरुषार्थ की जाँच करें। मेरे कौन-से संस्कार लक्ष्य के अनुकूल हैं और किन आदतों को बदलने की आवश्यकता है?
6. परोपकार की भावना
मूल मुरली का अव्यक्त इशारा: हर आत्मा के प्रति रहम, सहयोग और हिम्मत बढ़ाने की भावना रखने तथा अपकारी पर भी उपकार करने की प्रेरणा दी गई है। Pasted text.txt
हमारा मंथन: आत्मिक पवित्रता का एक व्यावहारिक परिणाम यह हो सकता है कि हम दूसरों की कमियों पर केवल प्रतिक्रिया न दें, बल्कि विवेक और उचित सीमाओं के साथ उनके कल्याण की भावना रखें।
- तुलनात्मक अध्ययन — पवित्रता का आधार क्या है?
आज की मुरली से चुना गया मुख्य विषय है:
बाप की याद, पवित्रता और श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से आत्मिक परिवर्तन।
मुरली 1 — 20 फरवरी 1987 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “याद, पवित्रता और सच्चे सेवाधारी की तीन रेखाएं”
मूल मुरली की बात: बाबा योगी जीवन, पवित्रता और सच्ची सेवा को तीन महत्त्वपूर्ण विशेषताओं के रूप में समझाते हैं। इस मुरली में पवित्रता को याद और सेवा की सफलता का आधार बताया गया है। पवित्रता का अर्थ केवल ब्रह्मचर्य तक सीमित नहीं, बल्कि बाप को साथी बनाना और उनके बताए श्रेष्ठ आचरण पर चलना भी है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 15 अक्टूबर की मुरली में बाबा की याद से पावन बनने पर बल है। 20 फरवरी 1987 की अव्यक्त मुरली यह स्पष्ट करती है कि पवित्रता का अभ्यास केवल व्यक्तिगत स्थिति तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण और सेवा में भी दिखाई देना चाहिए।
आज का प्रश्न: क्या मेरी याद और मेरे व्यवहार में समानता है?
20 फरवरी 1987 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2 — 24 मार्च 1982 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “ब्राह्मण जीवन की विशेषता है — पवित्रता”
मूल मुरली की बात: बाबा पवित्रता को ब्राह्मण जीवन की विशेषता बताते हैं। साथ ही, केवल “पवित्र बनो” का संदेश दोहराने के बजाय यह जाँचने पर बल देते हैं कि उस शिक्षा को श्रीमत के अनुसार जीवन में कितना उतारा है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: आज की साकार मुरली में आत्मा को पावन बनाने का लक्ष्य है। 24 मार्च 1982 की अव्यक्त मुरली हमें यह जाँचने का तरीका देती है कि लक्ष्य की दिशा में वास्तविक प्रगति हो भी रही है या नहीं।
सिर्फ पवित्रता की महिमा सुनना या सुनाना पर्याप्त नहीं; अपने विचारों, बोल और कर्मों में उसकी झलक लाना आवश्यक है।
आज का प्रश्न: पवित्रता का कौन-सा गुण मेरे व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है?
24 मार्च 1982 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3 — 25 मार्च 1990 | अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “सर्व अनुभूतियों की प्राप्ति का आधार — पवित्रता”
मूल मुरली की बात: बाबा बताते हैं कि पवित्रता का आधार संकल्प, बोल और कर्म में पवित्रता धारण करना है। जितनी पवित्रता जीवन में आती है, उतनी ही रूहानियत की झलक चलन और चेहरे में दिखाई देती है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 15 अक्टूबर की मुरली में पतित से पावन बनने के लिए बाबा की याद पर बल है। 25 मार्च 1990 की मुरली उस पवित्रता के व्यावहारिक लक्षण सामने रखती है—हम कैसे सोचते हैं, कैसे बोलते हैं और कैसे कर्म करते हैं।
इससे एक उपयोगी आत्म-जाँच निकलती है: क्या मेरी आध्यात्मिक साधना से मेरे व्यवहार में संयम, विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान बढ़ा है?
आज का प्रश्न: क्या मेरी पवित्रता केवल विचारों में है, या वाणी और कर्मों में भी दिखाई देती है?
25 मार्च 1990 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
दिनांकित मुरली मुख्य शिक्षा आज की मुरली से सम्बन्ध
20 फरवरी 1987 याद, पवित्रता और सेवा का सम्बन्ध याद को आचरण और सेवा से जोड़ना
24 मार्च 1982 ब्राह्मण जीवन का आधार पवित्रता शिक्षा को व्यवहार में कितना उतारा, इसकी जाँच
25 मार्च 1990 संकल्प, बोल और कर्म की पवित्रता आंतरिक परिवर्तन के व्यावहारिक लक्षण
15 अक्टूबर 2026 बाप की याद से आत्मा को पावन बनाना याद को श्रेष्ठ संस्कारों और सुखदायी व्यवहार में उतारना
तुलनात्मक निष्कर्ष: इन मुरलियों के चुने हुए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास नहीं है। वे पवित्रता के एक ही आध्यात्मिक लक्ष्य को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाती हैं—याद उसका आधार है, आत्म-जाँच उसके अभ्यास को मजबूत करती है और संकल्प, वाणी, कर्म तथा सेवा में परिवर्तन उसके व्यावहारिक लक्षण हैं।
- छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: बाप की याद से आत्मा को पावन बनाने का पुरुषार्थ करना।
प्रश्न 2: आत्मा को पावन बनाने का अभ्यास किससे जुड़ा है?
उत्तर: बाबा की याद, ज्ञान की धारणा और श्रीमत पर चलने से।
प्रश्न 3: ज्ञान और योग में क्या अन्तर बताया गया है?
उत्तर: ज्ञान पढ़ाई है और योग याद है।
प्रश्न 4: काँटों से फूल बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: अपने संस्कारों और व्यवहार को श्रेष्ठ, पवित्र और सुखदायी बनाना।
प्रश्न 5: 20 फरवरी 1987 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: याद, पवित्रता और सच्ची सेवा एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
प्रश्न 6: 24 मार्च 1982 की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: पवित्रता की शिक्षा को केवल सुनना नहीं, जीवन में उतारना भी है।
प्रश्न 7: 25 मार्च 1990 की मुरली के अनुसार पवित्रता कहाँ दिखाई देती है?
उत्तर: संकल्प, वाणी, कर्म, चलन और चेहरे में।
प्रश्न 8: परोपकार की भावना कैसे प्रकट होती है?
उत्तर: दूसरों के प्रति रहम, सहयोग और शुभ भावना रखकर।
प्रश्न 9: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: क्या बाबा की याद से मेरे संस्कार और व्यवहार बदल रहे हैं?
बाप की याद से पावन बनो — काँटों से फूल बनने का पुरुषार्थ!
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15 अक्टूबर 2026 | साकार मुरली मंथन | आत्मा की पवित्रता • याद की शक्ति • दैवी गुण • श्रेष्ठ कर्म
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मुख्य प्रश्न
क्या मैं केवल पावन बनने की बात करता हूँ, या बाबा की याद से अपने संस्कार और कर्म भी बदल रहा हूँ?
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वीडियो के प्रमुख बिंदु
- बाप की याद से आत्मा को पावन बनाने का अर्थ।
- ज्ञान और योग की भूमिका।
- काँटों से फूल बनने का व्यावहारिक पुरुषार्थ।
- पवित्रता की पहचान संकल्प, वाणी और कर्म में।
- 20 फरवरी 1987, 24 मार्च 1982 और 25 मार्च 1990 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
- अपने संस्कारों की जाँच और परोपकार की भावना।
- डिस्क्लेमर
डिस्क्लेमर: यह वीडियो 15 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली की शिक्षा और अन्य दिनांकित मुरलियों की तुलनात्मक व्याख्या को अलग-अलग प्रस्तुत किया गया है। “आत्मा और शरीर को पावन बनाना” तथा “पतित से पावन” जैसे शब्द मुरली के आध्यात्मिक दृष्टिकोण में समझाए गए हैं; इन्हें शारीरिक स्वास्थ्य, शरीर के रंग या किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया के बारे में प्रमाणित दावा न समझें। अन्य मुरलियों के संदर्भ और उद्देश्य अलग हो सकते हैं। इस तुलना का उद्देश्य मूल शिक्षाओं को बदलना या बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि आत्मचिन्तन को प्रोत्साहित करना है। कृपया मूल मुरली का अध्ययन करें और अपने विवेक से मंथन करें। - आज का संकल्प
“मैं बाबा की याद का नियमित अभ्यास करूँगा, अपने संकल्पों और कर्मों की जाँच करूँगा और अपने व्यवहार से पवित्रता, शुभ भावना तथा सुख देने वाले संस्कार प्रकट करने का पुरुषार्थ करूँगा।”
अंतिम मंथन प्रश्न: यदि मेरी याद सच्चे अर्थों में मुझे पावन बना रही है, तो आज मेरे व्यवहार में कौन-सा परिवर्तन दिखाई देना चाहिए?
📝 75. साकार मुरली | 15-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
