78. अव्यक्त मुरली | 29 October 1970

29 October 1970 | हिंदी · “दीपमाला का सच्चा रहस्य”

“दीपमाला का सच्चा रहस्य”

आज बापदादा दीपमाला देख रहे हैं। यह दीपों की माला है ना। लोग दीपमाला मनाते हैं, बापदादा दीपमाला देख रहे हैं। दीपक कौन से अच्छे लगते हैं? जो दीप अखण्ड और अटल होता है, जिसका घृत कभी खुटता नहीं, वही अखण्ड जलता है। अपने को ऐसा दीपक समझते हो? ऐसे दीपकों की यादगार माला है। अपने को माला के बीच चमकता हुआ दीपक समझते हो? ऐसे समझते हो कि हमारा यादगार आज मना रहे हैं। दीपमाला के दिन दो बातें विशेष ध्यान पर रखनी होती है। दीपमाला पर किन बातों का ध्यान रखते हैं? (सफाई रखते हैं, नया चोपड़ा बनाते हैं) परन्तु लक्ष्य क्या रखते हैं? कमाई का। उस लक्ष्य को लेकर सफाई भी करते हैं। तो सफाई भी सभी प्रकार से करना है और कमाई का लक्ष्य भी बुद्धि में रखना है। यह सफाई और कमाई का दोनों कार्य आप सभी ने किया है? अपने आप से सन्तुष्ट हो? जब कमाई है तो सफाई तो जरूर होगी ना। इन दोनों बातों में सन्तुष्टता होना आवश्यक है। लेकिन यह सन्तुष्टता आयेगी उनको जो सदैव दिव्यगुणों का आह्वान करते रहेंगे। जितना जो आह्वान करेंगे उतना इन दोनों बातों में सदा सन्तुष्ट रहेंगे। जितना-जितना दिव्यगुणों का आह्वान करते जायेंगे उतना अवगुण आहुति रूप में खत्म होते जायेंगे। फिर क्या होगा? नये संस्कारों के नये वस्त्र धारण करेंगे। अभी आत्मा ने नये संस्कारों रूपी नये वस्त्र धारण किये हैं कि कभी-कभी पुराने वस्त्रों से प्रीत होने के कारण वह भी धारण करते हैं। जब मरजीवा बने, नया जन्म, नये संस्कारों को भी धारण किया फिर पुराने संस्कार रूपी वस्त्रों को कभी क्यों धारण कर लेंते? क्या पुराने वस्त्र अति प्रिय लगते हैं? जो चीज बाप को प्रिय नहीं वह बच्चों को प्रिय क्यों? आज तक जो कमजोरी, कमियां, निर्बलता, कोमलता रही हुई है वह सभी पुराने खाते आज से समाप्त करना, यही दीपमाला मनाना है। अल्पकाल के लिये नहीं, लेकिन सदा काल के लिये और सर्व रूपों से समाप्त करना, यह है दीपावली मनाना। दीपावली को ताजपोशी का दिवस कहते हैं। आज आप सभी ने कौन सी ताजपोशी मनाई है? ताजपोशी के दिन क्या किया जाता है? राज सिंहासन का समारोह कब देखा है? स्मृति आती है, कितनी बार देखा होगा? अनेक बार। दिन प्रतिदिन ऐसे अनुभव करेंगे जैसे इस जन्म में प्रत्यक्ष देखी हुई बातें स्पष्ट रूप में इमर्ज रहती है। वैसे भविष्य राजाई के संस्कार जो आत्मा में समाए हुए हैं वह जैसे कल की देखी बात है। ऐसा अनुभव करते रहेंगे। ऐसे प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करेंगे। इससे समझना अब हम अपने सम्पूर्ण स्थिति और अपने राज्य के समीप पहुँच गये हैं। सतयुगी संस्कार सोचने वा स्मृति में लाने से नहीं, लेकिन स्वत: ही और स्पष्ट रीति जीवन में आते रहेंगे। इस दुनिया में रहते हुये भी नयनों में सतयुगी नज़ारे दिखाई देंगे न सिर्फ इतना लेकिन अपना भविष्य स्वरूप जो धारण करना है वह भी आंखों के आगे बार-बार स्पष्ट दिखाई देगा। बस अभी-अभी यह छोड़, वह सजा-सजाया चोला धारण करना है ऐसे अनुभव करते रहेंगे। इस संगमयुग पर ही सतयुगी स्वरूप का अनुभव करेंगे। पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनों रूपों से हरेक को प्रत्यक्ष देखेंगे। तो आज दीपावली के दिन दिव्य गुणों का आह्वान करना है। अभी फिर भी मुख से निकलता है कि हाँ कल्प पहले यह किया होगा। लेकिन पीछे यह शब्द बदल जायेंगे। इस कल्प की बात हो जायेगी। 5000 वर्ष की बात इतनी स्पष्ट स्मृति में आयेगी जैसे कल की। जैसे साईस के साधन से दूर की चीज भी समीप और स्पष्ट दिखाई पड़ती है, जिसको दूरबीन कहते हैं। तो आप का तीसरा नेत्र कल्प पहले की बातें समीप और स्पष्ट देखेगा वा अनुभव करेगा। तो पुराने संस्कारों की चौपडियों को फिर से भूल से भी नहीं देखना। पुराने संस्कारों का चोला फिर-फिर धारण नहीं करना, नवीनता को धारण करना। यही आज के दिन का मंत्र है। रत्नजड़ित चोला छोड़ जड़ जड़ीभूत चोले से प्रीत नहीं लगाना। सदैव बुद्धि में बापदादा की स्मृति व निशाना और आने वाले राज्य के नज़ारे, नयनों में और मुख में सदैव बापदादा का नाम हो। इसको कहते हैं बापदादा के अति स्नेही और समीप रत्न। सभी ने श्रेष्ठ और समीप रत्न बनने का दॉव लगाया है या जो भी मिले वह अच्छा? अगर इस बात में सन्तुष्ट रहे तो सम्पूर्ण नहीं बन सकेंगे। इसलिये सदैव यह दांव लगाओ कि हम विजयी और सम्पूर्ण बनकर ही दिखायेंगे। कमजोरी के शब्द समाप्त। करेंगे, हो ही जायेगा, पुरुषार्थ कर रहे हैं, यह शब्द भी न निकले। करके ही दिखायेंगे, बनकर ही दिखायेंगे। यह है निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों के बोल। और वह है कमानधारी बच्चों का बोल। बनना है स्वदर्शन चक्रधारी लेकिन बन जाते हैं कमानधारी। कई सोचते हैं कोई तो वह भी बनेंगे ना। इस बात में दयालू न बनो। कोई तो बनेंगे इसलिये हम ही बन जाएं। ऐसे बनने वाले बहुत हैं। 

दीपमाला का सच्चा रहस्य

मुख्य संदेश:
दीपमाला का सच्चा रहस्य है—आत्मा रूपी दीपक को अखण्ड और अटल जलाना, दिव्य गुणों का आह्वान करना, पुराने संस्कारों और अवगुणों को समाप्त करना तथा नवीन संस्कार धारण करके सम्पूर्ण और विजयी रत्न बनना।

  1. आत्मा रूपी अखण्ड
    दीपक बनो
    बापदादा दीपमाला के दिन बच्चों को आत्मा रूपी दीपक की स्मृति दिलाते हैं। जैसे अखण्ड दीपक का घृत समाप्त नहीं होता और वह निरन्तर जलता रहता है, वैसे ही आत्मा को भी अपनी ज्योति अखण्ड और अटल रखनी है।

हमें स्वयं को दीपमाला की माला के बीच चमकता हुआ दीपक समझना है। दीपमाला केवल बाहरी दीप जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि अपनी आत्मिक ज्योति को निरन्तर जागृत रखने की प्रेरणा है।

मुख्य शिक्षा: अपनी आत्मिक ज्योति को अखण्ड और अटल बनाए रखें।
2. सफाई और कमाई
का लक्ष्य
दीपमाला के दिन लोग घर की सफाई करते हैं और नया चोपड़ा बनाते हैं। बापदादा इन कार्यों के पीछे छिपे लक्ष्य की ओर ध्यान दिलाते हैं—सफाई और कमाई।

आत्मिक जीवन में भी सभी प्रकार की सफाई करनी है और श्रेष्ठ कमाई का लक्ष्य रखना है। जब आत्मा दिव्य गुणों का आह्वान करती है, तब अवगुण आहुति रूप में समाप्त होते जाते हैं।

धारणा:
अपने संकल्पों और संस्कारों की सफाई करें।

दिव्य गुणों का आह्वान करें।
श्रेष्ठ पुरुषार्थ की कमाई करें।
दोनों बातों में सन्तुष्टता का अनुभव करें।

  1. पुराने संस्कारों के
    वस्त्र छोड़ो
    बापदादा समझाते हैं कि मरजीवा बनने अर्थात् नया जीवन प्राप्त करने के बाद नवीन संस्कार धारण करने हैं। पुराने संस्कार रूपी वस्त्रों से दोबारा प्रीत नहीं लगानी है।
    जो कमजोरी, कमी, निर्बलता और कोमलता पुराने खाते के रूप में रह गई है, उसे समाप्त करना ही सच्ची दीपावली मनाना है।

यह परिवर्तन थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि सदा के लिए और सभी रूपों में होना चाहिए।

मुख्य शिक्षा: पुराने संस्कारों को छोड़कर नवीन संस्कारों को जीवन में धारण करें।

  1. दिव्य गुणों का आह्वान और अवगुणों की आहुति
    दीपावली के दिन विशेष रूप से दिव्य गुणों का आह्वान करना है। जितना दिव्य गुणों को जीवन में धारण करेंगे, उतने ही अवगुण समाप्त होते जाएँगे।

जब आत्मा के संस्कार बदलते हैं, तब जीवन में नवीनता आती है। सच्ची दीपावली तभी है जब पुरानी कमजोरियाँ और कमियाँ स्थायी रूप से समाप्त हो जाएँ।

स्वयं से पूछें: क्या मैं केवल दीपावली मना रहा हूँ या अपने पुराने संस्कारों को भी समाप्त कर रहा हूँ?

  1. ताजपोशी और भविष्य के राज्य का अनुभव
    बापदादा दीपावली को ताजपोशी का दिवस बताते हैं। ताजपोशी का अर्थ है अपने भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप और राज्यभाग्य के समीप पहुँचने का अनुभव करना।

जैसे इस जन्म में देखी हुई बातें स्पष्ट स्मृति में रहती हैं, वैसे ही भविष्य की राजाई के संस्कार आत्मा में स्पष्ट रूप से अनुभव होने लगेंगे।

संगमयुग में पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनों के रूपों से अपनी श्रेष्ठ स्थिति का अनुभव करना है।
मुख्य शिक्षा: अपने भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप और राज्यभाग्य को लक्ष्य बनाकर पुरुषार्थ करें।

  1. तीसरे नेत्र से कल्प पहले की बातें स्पष्ट अनुभव करना
    बापदादा समझाते हैं कि जैसे विज्ञान के साधनों से दूर की वस्तुएँ भी स्पष्ट दिखाई देती हैं, वैसे ही आत्मा का तीसरा नेत्र कल्प पहले की बातों को समीप और स्पष्ट अनुभव करेगा।
    यह अनुभव केवल सोचने या कल्पना करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आत्मा की स्थिति में स्पष्टता आती जाएगी।

इसलिए पुराने संस्कारों की चौपड़ियों को दोबारा नहीं खोलना और पुराने संस्कारों के वस्त्र फिर से धारण नहीं करने हैं।

  1. नवीनता धारण करो और बापदादा की स्मृति में रहो
    बापदादा बच्चों को नवीनता धारण करने की शिक्षा देते हैं। बुद्धि में बापदादा की स्मृति और लक्ष्य रहे, नयनों में भविष्य के राज्य के नज़ारे हों और मुख से सदैव बापदादा का नाम
    निकले।
    ऐसे बच्चे बापदादा के अति स्नेही और समीप रत्न बनते हैं।
    धारणा:
    बुद्धि में बापदादा की स्मृति रखें।

भविष्य के श्रेष्ठ राज्यभाग्य को लक्ष्य बनाएँ।

पुराने संस्कारों से प्रीत समाप्त करें।

नवीन संस्कारों को जीवन में उतारें।

  1. विजयी और सम्पूर्ण बनने का दृढ़ निश्चय
    बापदादा बच्चों को समझाते हैं कि केवल इस बात से सन्तुष्ट नहीं होना है कि जो मिला वह अच्छा है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम विजयी और सम्पूर्ण बनकर ही दिखाएँगे।
    कमजोरी व्यक्त करने वाले शब्दों के स्थान पर दृढ़ निश्चय के बोल होने चाहिए। केवल “करेंगे”, “हो जाएगा” या “पुरुषार्थ कर रहे हैं”कहने केबजाय करके और बनकरदिखाने का संकल्प रखना है।
    मुख्य शिक्षा:
    दृढ़ निश्चय,श्रेष्ठ पुरुषार्थ और विजयी स्थिति को जीवन का आधार बनाएँ।
  2. स्वदर्शन चक्रधारी बनो

बापदादा बताते हैं कि बच्चों को स्वदर्शन चक्रधारी बनना है, लेकिन कभी-कभी वे कमानधारी बन जाते हैं। अर्थात् अपने ऊपर ध्यान देने के बजाय दूसरों की ओर ध्यान लगाने लगते हैं।

“कोई तो बनेगा” सोचकर स्वयं अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटना है। सम्पूर्ण बनने का दृढ़ संकल्प स्वयं करना है।

धारणा: अपने पुरुषार्थ पर ध्यान दें और स्वदर्शन चक्रधारी बनने का लक्ष्य रखें।
स्व-चेकिंग के लिए प्रश्न
क्या मेरी आत्मिक ज्योति अखण्ड और अटल है?
क्या मैं अपने संकल्पों और संस्कारों की सफाई करता हूँ?

क्या मैं दिव्य गुणों का आह्वान करता हूँ?

क्या पुराने संस्कारों के वस्त्र दोबारा धारण करता हूँ?

क्या मेरी कमजोरियाँ स्थायी रूप से समाप्त हो रही हैं?

क्या मैं भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप और राज्यभाग्य को लक्ष्य बनाता हूँ?

क्या मैं बापदादा की स्मृति में रहता हूँ?

क्या मेरे बोल दृढ़ निश्चय को व्यक्त करते हैं?

क्या मैं स्वदर्शन चक्रधारी बनने का पुरुषार्थ करता हूँ?

क्या मैं विजयी और सम्पूर्ण बनने का दृढ़ संकल्प रखता हूँ?

30 छोटे प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1. बापदादा दीपमाला में क्या देख रहे थे?

उत्तर: दीपों की माला।

प्रश्न 2. कौन-सा दीपक अच्छा लगता है?

उत्तर: जो अखण्ड और अटल जलता है।

प्रश्न 3. दीपमाला की माला में स्वयं को क्या समझना है?

उत्तर: चमकता हुआ आत्मा रूपी दीपक।

प्रश्न 4. दीपमाला के दिन कौन-सी दो बातें विशेष ध्यान में रखनी हैं?
उत्तर: सफाई और कमाई।

प्रश्न 5. आत्मिक जीवन में किस प्रकार की सफाई करनी है?

उत्तर: संकल्पों, संस्कारों और अवगुणों की।

प्रश्न 6. कमाई का लक्ष्य रखने से क्या लाभ है?

उत्तर: श्रेष्ठ पुरुषार्थ और आत्मिक उन्नति होती है।

प्रश्न 7. अवगुण किस प्रकार समाप्त होते हैं?

उत्तर: दिव्य गुणों का आह्वान करने से।

प्रश्न 8. मरजीवा बनने के बाद क्या धारण करना है?

उत्तर: नवीन संस्कार रूपी नए वस्त्र।

प्रश्न 9. पुराने संस्कारों के साथ क्या नहीं करना है?

उत्तर: उनसे दोबारा प्रीत नहीं लगानी है।

प्रश्न 10. सच्ची दीपावली किसे कहा गया है?

उत्तर: पुरानी कमजोरियों और कमियों को सदा के लिए समाप्त करना।

प्रश्न 11. दीपावली को किसका दिवस कहा गया है?

उत्तर: ताजपोशी का दिवस।

प्रश्न 12. ताजपोशी के दिन किस बात का अनुभव करना है?

उत्तर: भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप और राज्यभाग्य के समीप पहुँचने का।

प्रश्न 13. सतयुगी संस्कार कैसे स्पष्ट होंगे?

उत्तर: वे स्वतः जीवन में स्पष्ट रूप से अनुभव होने लगेंगे।

प्रश्न 14. संगमयुग में किन दोनों रूपों से अनुभव करना है?

उत्तर: पुरुषार्थ और प्रारब्ध के रूपों से।

प्रश्न 15. तीसरा नेत्र किस प्रकार अनुभव करेगा?

उत्तर: कल्प पहले की बातों को समीप और स्पष्ट रूप से।

प्रश्न 16. पुराने संस्कारों की चौपड़ियों के विषय में क्या शिक्षा है?

उत्तर: उन्हें दोबारा नहीं खोलना है।

प्रश्न 17. नवीनता धारण करने का क्या अर्थ है?

उत्तर: पुराने संस्कार छोड़कर नए श्रेष्ठ संस्कार अपनाना।

प्रश्न 18. बुद्धि में किसकी स्मृति रखनी है?

उत्तर: बापदादा की।

प्रश्न 19. नयनों में क्या लक्ष्य रखना है?

उत्तर: आने वाले राज्य के नज़ारे।

प्रश्न 20. मुख से सदैव किसका नाम निकलना चाहिए?

उत्तर: बापदादा का।

प्रश्न 21. बापदादा के अति स्नेही और समीप रत्न कौन बनते हैं?

उत्तर: जो बापदादा की स्मृति और श्रेष्ठ लक्ष्य में रहते हैं।

प्रश्न 22. सम्पूर्ण बनने के लिए कैसा निश्चय चाहिए?

उत्तर: दृढ़ निश्चय कि विजयी और सम्पूर्ण बनकर ही दिखाएँगे।

प्रश्न 23. कमजोरी के स्थान पर किस प्रकार के बोल होने चाहिए?

उत्तर: दृढ़ निश्चय वाले बोल।

प्रश्न 24. “करेंगे” और “हो जाएगा” के स्थान पर क्या संकल्प रखना है?
उत्तर: करके और बनकर ही दिखाएँगे।

प्रश्न 25. बच्चों को किसका लक्ष्य रखना है?

उत्तर: स्वदर्शन चक्रधारी बनने का।

प्रश्न 26. कमानधारी बनने का आशय यहाँ क्या है?

उत्तर: अपने पुरुषार्थ के बजाय दूसरों की ओर ध्यान लगाना।

प्रश्न 27. क्या दूसरों के पीछे रहने से सन्तुष्ट होना चाहिए?

उत्तर: नहीं, स्वयं विजयी और सम्पूर्ण बनने का संकल्प रखना चाहिए।
प्रश्न 28. पुराने संस्कारों के स्थान पर क्या धारण करना है?

उत्तर: नवीन और श्रेष्ठ संस्कार।

प्रश्न 29. दीपावली मनाने का स्थायी लक्ष्य क्या है?

उत्तर: आत्मिक ज्योति को अखण्ड रखना और सम्पूर्ण बनना।

प्रश्न 30. इस मुरली की मुख्य शिक्षा क्या है?

उत्तर: दिव्य गुणों का आह्वान करके अवगुणों और पुराने संस्कारों को समाप्त करना, नवीन संस्कार धारण करना और दृढ़ निश्चय से विजयी व सम्पूर्ण बनना।

समापन संदेश
दीपमाला का सच्चा रहस्य केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि आत्मा रूपी दीपक को अखण्ड और अटल बनाना है। दिव्य गुणों का आह्वान करें, पुराने संस्कारों को समाप्त करें और नवीन संस्कार धारण करें। बापदादा की स्मृति में रहकर दृढ़ निश्चय करें—“करके ही दिखाएँगे, बनकर ही दिखाएँगे।”

📝 78. अव्यक्त मुरली | 29 October 1970

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