74. अव्यक्त मुरली | 6 August 1970

6 August 1970 | हिंदी · “बन्धनमुक्त आत्मा की निशानी”

“बन्धनमुक्त आत्मा की निशानी”

अभी अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर व्यक्त देह का आधार लेकर देख रहे हैं, यह अनुभव कर रहे हो? जैसे कोई स्थूल स्थान में प्रवेश करते हो, वैसे ही इस स्थूल देह में प्रवेश कर यह कार्य कर रहे हैं। ऐसा अनुभव होता है? जब चाहें तब प्रवेश करें और जब चाहें तब फिर न्यारे हो जायें, ऐसा अनुभव करते हो? एक सेकेण्ड में धारण करें और एक सेकेण्ड में छोड़ें यह अभ्यास है? जैसे और स्थूल वस्तुओं को जब चाहो तब लो और जब चाहो तब छोड़ सकते हैं ना। वैसे इस देह के भान को जब चाहें तब छोड़ देही अभिमानी बन जायें – यह प्रैक्टिस इतनी सरल है, जितनी कोई स्थूल वस्तु की सहज होती है? रचयिता जब चाहे रचना का आधार ले जब चाहे तब रचना के आधार को छोड़ दे ऐसे रचयिता बने हो? जब चाहें तब न्यारे, जब चाहें तब प्यारे बन जायें। इतना बन्धनमुक्त बने हो? यह देह का भी बन्धन है। देह अपने बन्धन में बांधती है। अगर देह बन्धन से मुक्त हो तो यह देह बन्धन नहीं डालेगी। लेकिन कर्तव्य का आधार समझ आधार को जब चाहें तब ले सकते हैं ऐसी प्रैक्टिस चलती रहती है? देह के भान को छोड़ने अथवा उनसे न्यारा होने में कितना समय लगता है? एक सेकेण्ड लगता है? सदैव एक सेकेण्ड लगता है वा कभी कितना, कभी कितना। (कभी कैसी, कभी कैसी) इससे सिद्ध है कि अभी सर्व बन्धनों से मुक्त नहीं हुए हो। जितना बन्धनमुक्त उतना ही योगयुक्त होंगे और जितना योगयुक्त होंगे उतना ही जीवनमुक्त में ऊंच पद की प्राप्ति होती है। अगर बन्धनमुक्त नहीं तो योगयुक्त भी नहीं। उसको मास्टर सर्वशक्तिमान कहेंगे? देह के सम्बन्ध और देह के पदार्थों से लगाव मिटाना सरल है लेकिन देह के भान से मुक्त होना मेहनत की बात है। अभी क्या बन्धन रह गया है? यही। देह के भान से मुक्त हो जाना। जब चाहें तब व्यक्त में आयें। ऐसी प्रैक्टिस अभी जोर शोर से करनी है। ऐसे ही समझें जैसे अब बाप आधार लेकर बोल रहे हैं वैसे ही हम भी देह का आधार लेकर कर्म कर रहे हैं। इस न्यारेपन की अवस्था प्रमाण ही प्यारा बनना है। जितना इस न्यारेपन की प्रैक्टिस में आगे होंगे उतना ही विश्व को प्यारे लगने में आगे होंगे। सर्व स्नेही बनने के लिए पहले न्यारा बनना है। सर्विस करते हुए, संकल्प करते हुए भी अपने को और दूसरों को भी महसूसता ऐसी आनी चाहिए कि यह न्यारा और अति प्यारा है। जितना जो स्वयं न्यारा होगा उतना औरों को बाप का प्यारा बना सकेंगे।

सर्विस की सफलता का स्वरूप क्या है? (भिन्न-भिन्न विचार सभी के निकले) सर्विस की सफलता का स्वरूप यही है कि सर्व आत्माओं को बाप के स्नेही और बाप के कर्तव्य में सहयोगी और पुरुषार्थ में उन आत्माओं को शक्तिरूप बनाना। यह है सर्विस की सफलता का स्वरूप। जिन आत्माओं की सर्विस करो उन आत्माओं में यह तीनों ही क्वालिफिकेशन प्रत्यक्ष रूप में देखने में आनी चाहिए। अगर तीनों में से कोई भी गुण की कमी है तो सर्विस की सफलता की भी कमी है। समझा।

मुख्य एक बात ध्यान में रखने और कर्म में धारण करने वाली कौन सी है, जिससे इस सफलता के स्वरूप को प्रैक्टिकल में ला सकते हो? वह कौन सी बात है? बहुत सहज है। मुश्किल बात को ध्यान देकर धारण करते हैं और सहज बात को छोड़ देने से सहज की धारणा देरी से होती है। यह मालूम है? समझा जाता है यह तो कोई बड़ी बात नहीं है। हो जायेगी। फिर होता क्या है? हो जायेगी, हो जायेगी करते-करते ध्यान से निकल जाती है। इसलिए धारणा रूप भी नहीं होते। तो वह कौन सी एक बात है। अगर उस बात को धारण कर लें तो सफलता स्वरूप बन सकते हैं। (साक्षीपन) हाँ यह बात ठीक है। आज बापदादा भी साक्षी अवस्था की राखी बांधने के लिए आये हैं। अगर यह साक्षीपन की राखी सदैव बंधी हुई हो तो सर्विस की सफलता बहुत जल्दी निकलेगी। अभी जिस कर्तव्य में मास लगता है उस कर्तव्य में एक घंटा भी नहीं लगेगा। यह साक्षीपन की राखी बांधनी है। औरों को तो प्युरिटी की राखी बांधते हो लेकिन बापदादा आज यह साक्षीपन की राखी बांध रहे हैं। जितना साक्षी रहेंगे उतना साक्षात्कार मूर्त और साक्षात् मूर्त बनेंगे। साक्षीपन कम होने के कारण साक्षात् और साक्षात्कार मूर्त भी कम बने हैं, इसलिए यह अभ्यास करो। कौन सा अभ्यास? अभी अभी आधार लिया, अभी अभी न्यारे हो गये। यह अभ्यास बढ़ाना अर्थात् सम्पूर्णता और समय को समीप लाना है। तो अब क्या प्रयत्न करना है? समय और सम्पूर्णता को समीप लाओ। और एक बात विशेष ध्यान में यह रखनी है कि अपने रिकार्ड को ठीक रखने के लिए सर्व को रिगार्ड दो। जितना जो सर्व को रिगार्ड देता है उतना ही अपना रिकार्ड ठीक रख सकता है। दूसरे का रिगार्ड रखना अपना रिकार्ड बनाना है। अगर रिगार्ड कम देते हैं तो अपने रिकार्ड में कमी करते हैं। इसलिए इस मुख्य बात की आवश्यकता है। समझा। जैसे यज्ञ के मददगार बनना ही मदद लेना है वैसे रिगार्ड देना ही रिगार्ड लेना है। देते हैं लेने के लिए। एक बार देना अनेक बार लेने के हकदार बन जाते हैं। जैसे कहते हैं छोटों को प्यार और बड़ों को रिगार्ड। लेकिन सभी को बड़ा समझ रिगार्ड देना यही सर्व के स्नेह को प्राप्त करने का साधन है। यह बात भी विशेष ध्यान देने योग्य है। हर बात में पहले आप। यह वृत्ति, दृष्टि और वाणी तथा कर्म में लानी चाहिए। जितना पहले आप कहेंगे उतना ही विश्व के बाप समान बन सकेंगे।

विश्व के बाप समान का अर्थ क्या है? एक तो विश्व के बाप समान बनना। दूसरा जब विश्व राज़न बनेंगे तो भी विश्व का बाप ही कहलायेंगे ना। विश्व के राजन विश्व के बाप हैं ना। तो विश्व के बाप भी बनेंगे और विश्व के बाप के समान भी बनेंगे। किससे? पहले आप करने से। समझा।

निर्मान बनने से प्रत्यक्ष प्रमाण बन सकेंगे। निर्मान बनने से विश्व का निर्माण कर सकेंगे। समझा। ऐसी स्थिति को धारण करने के लिए साक्षीपन की राखी बांधनी है। जब पहले से ही साक्षीपन की राखी बांध के जायेंगे तो राखी की सर्विस सफलतापूर्वक होगी। समझा।

पार्टियों से:-

सम्मेलन कर रहे हो। सम्मेलन का अर्थ क्या है? सर्व आत्माओं का मिलन। सर्व आत्माओं का मिलन किससे करायेंगे? बाप से। आजकल समय कौन सा है? सम्पूर्णता का समय समीप आने का है तो वर्तमान समय के प्रमाण निश्चित हुई पड़ी है। जैसे कल्प पहले भी पुरुषार्थ निमित्रमात्र कराया था। ऐसे ही नहीं कि पुरुषार्थ आज और प्राप्ति कब हो जायेगी, नहीं। अभी-अभी पुरुषार्थ अभी-अभी प्राप्ति। ऐसा पुरुषार्थ है? जब स्वयं प्राप्ति स्वरूप बनेंगे तब अन्य अनेक आत्माओं को प्राप्ति करा सकेंगे। अगर स्वयं प्राप्ति स्वरूप नहीं होंगे तो अन्य को कैसे प्राप्ति करा सकेंगे? अब नहीं करायेंगे तो कब करायेंगे। सुनाया था ना कि “कब” शब्द भी खत्म। हर बात में “अब” हो। इतना परिवर्तन वाणी, कर्म और संकल्प में लाना है। संकल्प में भी यह न आये कि कब कर लेंगे या कब हो जायेगा, नहीं। अब हो ही जायेगा। ऐसा परिवर्तन करना है तब सर्विस की सफलता है। अगर स्वयं में ही कब होगा तो आप की प्रजा भी कहेगी कि अच्छा तो बहुत लगा, कब कर लेंगे या कब हो जायेगा। कब पर छोड़ने वाले पिछली प्रजा के होते हैं। तो अब नजदीक की प्रजा बनानी है। नजदीक की प्रजा बनाने के लिए नाजुकपना छोड़ना पड़ेगा। नाजों से चलना छोड़ राजों से चलना है। अलबेलापन नाजुकपन होता है। जितना-जितना राजयुक्त होंगे उतना उतना नाजुकपन छूटता जायेगा। रुहानियत का एक ही रूप सदैव रहता है? रूप बदलने के बजाये यह शरीर का भान छोड़ना है इस प्रैक्टिस में रहना है। शरीर छोड़ने का अभ्यास होगा तो रूप बदलना छूट जायेगा। पढ़ाई में भी रेगुलर होना मुख्य बात होती है। वह भी सिर्फ आने में नहीं लेकिन हर बात में रेगुलर, जितना रेगुलर उतना ही रूलर बनेंगे। तो क्या करना पड़े? सभी बातों में रेगुलर। अमृतवेले उठने से लेकर हर कर्म, हर संकल्प और हर वाणी में भी रेगुलर। एक भी बोल ऐसा न निकले जो व्यर्थ हो। इस दुनिया के जो बड़े आदमी हैं वह लोग जब स्पीच करते हैं तो उन्हों के बोलने के शब्द भी फिक्स किये जाते हैं। आप भी बड़े से बड़े आदमी हो ना। तो आपके बोल भी फिक्स होने चाहिए। माया की मिक्स न हो। ऐसे रेगुलर बनने वालों की सर्विस सफल हुई पड़ी है। सम्मेलन का हर कार्य करते भी यह कभी नहीं भूलना कि हम विश्व के आगे साक्षात्कारमूर्त हैं। साक्षात्कार मूर्त बनने से आप के द्वारा बापदादा का साक्षात्कार स्वत: ही होगा। वह तब कर सकेंगे जब स्वयं को ज्ञान, योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे। जितना स्वयं को प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे उतना बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे।


  • बापदादा ने पूछा कि क्या हम अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर व्यक्त देह का आधार लेते हैं और फिर जब चाहें तब उससे न्यारे हो जाते हैं? जैसे स्थूल वस्तुओं को अपनी इच्छा से उठाते और छोड़ते हैं, क्या वैसे ही देह के भान को छोड़कर देही-अभिमानी बन सकते हैं?
    देह भी एक बन्धन है। देह के सम्बन्धों और पदार्थों से लगाव मिटाना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन देह के भान से मुक्त होना अभ्यास माँगता है।
    मुख्य धारणाएँ:
    जब चाहें व्यक्त मेंआएँ और जब चाहें न्यारे हो जाएँ।
  • देह को कर्तव्य करने का आधार समझें, अपना स्वरूप नहीं।
  • देह के भान से मुक्त होने का अभ्यास बढ़ाएँ।
  • जितना बन्धनमुक्त होंगे, उतना योगयुक्त बनेंगे।
  • जितना योगयुक्त होंगे, उतनी ऊँची जीवनमुक्त अवस्था प्राप्त होगी।

2. न्यारे बनकर सबके प्यारे बनो

बापदादा ने समझाया कि सर्व स्नेही बनने के लिए पहले न्यारा बनना आवश्यक है। न्यारेपन की अवस्था ही दूसरों को बाप का प्यारा बनाने में सहयोग देती है।

सेवा करते हुए और संकल्प करते हुए भी अपने व्यक्तित्व में ऐसा अनुभव होना चाहिए कि यह आत्मा न्यारी और अति प्यारी है।

धारण करने योग्य बातें:

  • न्यारेपन का अभ्यास निरन्तर करें।
  • सेवा में रहते हुए भी देह के भान से मुक्त रहें।
  • अपने व्यवहार से दूसरों को बाप के स्नेह का अनुभव कराएँ।
  • स्वयं न्यारे बनें, तभी दूसरों को भी बाप का प्यारा बना सकेंगे।

3. सेवा की सफलता का वास्तविक स्वरूप

सेवा की सफलता केवल भाषण देने, सम्मेलन करने या अनेक कार्य करने में नहीं है। उसकी सफलता इस बात से पहचानी जाती है कि जिन आत्माओं की सेवा की, उनमें तीन योग्यताएँ प्रत्यक्ष दिखाई दें।

  1. वे बाप की स्नेही बनें।
  2. वे बाप के कर्तव्य में सहयोगी बनें।
  3. वे पुरुषार्थ में शक्तिरूप बनें।

यदि इन तीनों में से किसी एक गुण की भी कमी है, तो सेवा की सफलता में भी कमी है।

इसलिए सेवा का लक्ष्य केवल लोगों तक ज्ञान पहुँचाना नहीं, बल्कि उन्हें बाप के स्नेही, सहयोगी और शक्तिशाली बनाना है।

4. साक्षीपन की राखी

बापदादा ने साक्षी अवस्था की राखी बाँधने की बात कही। जैसे राखी किसी प्रतिज्ञा की याद दिलाती है, वैसे ही साक्षीपन की राखी आत्मा को हर परिस्थिति में साक्षी रहने की स्मृति दिलाती है।

साक्षीपन का अभ्यास:

  • अभी-अभी देह का आधार लें और अभी-अभी न्यारे हो जाएँ।
  • कर्म करते हुए भी स्वयं को आत्मा समझें।
  • परिस्थितियों और व्यक्तियों को साक्षी होकर देखें।
  • अपने संकल्पों और प्रतिक्रियाओं पर ध्यान रखें।

बापदादा ने समझाया कि जिस कार्य में एक महीना लगता है, साक्षीपन की शक्ति से वही कार्य एक घंटे में भी सफल हो सकता है। साक्षीपन की कमी के कारण साक्षात्कारमूर्त और साक्षात् मूर्त बनने की अवस्था भी कम होती है।

इस अभ्यास से सम्पूर्णता और समय को समीप लाना है।

5. सर्व को रिगार्ड देना ही अपना रिकॉर्ड ठीक रखना है

बापदादा ने एक विशेष बात समझाई—अपने रिकॉर्ड को ठीक रखने के लिए सर्व को रिगार्ड दो।

दूसरों को रिगार्ड देना वास्तव में अपना रिकॉर्ड बनाना है। यदि हम किसी को कम रिगार्ड देते हैं, तो अपने ही रिकॉर्ड में कमी करते हैं।

जैसे यज्ञ का मददगार बनना ही मदद लेना है, वैसे ही रिगार्ड देना ही रिगार्ड लेना है।

विशेष शिक्षा:

  • छोटों को प्यार देने के साथ-साथ सभी को रिगार्ड दें।
  • हर बात में पहले आप की वृत्ति रखें।
  • वृत्ति, दृष्टि, वाणी और कर्म में विनम्रता लाएँ।
  • सभी को सम्मान देकर सर्व के स्नेह के अधिकारी बनें।

विश्व के बाप समान बनने के लिए हर बात में पहले आप की भावना धारण करनी है।

6. निर्मान बनकर प्रत्यक्ष प्रमाण बनो

बापदादा ने कहा कि निर्मान बनने से प्रत्यक्ष प्रमाण बन सकेंगे और निर्मान बनने से विश्व का निर्माण कर सकेंगे।

जब आत्मा अहंकार और देह-अभिमान से न्यारी होकर विनम्रता धारण करती है, तब उसके व्यवहार और कर्मों से ज्ञान तथा योग का प्रभाव दिखाई देता है।

स्वयं को ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनाना ही बाप की प्रत्यक्षता में सहयोग देना है।

7. सम्मेलन का वास्तविक अर्थ

सम्मेलन का अर्थ केवल लोगों का एक स्थान पर एकत्र होना नहीं, बल्कि सर्व आत्माओं का मिलन है। इस मिलन का उद्देश्य आत्माओं को बाप से मिलाना है।

वर्तमान समय सम्पूर्णता के समीप आने का समय है। इसलिए पुरुषार्थ और प्राप्ति को भविष्य पर नहीं छोड़ना है।

बापदादा ने विशेष रूप से समझाया कि “कब” के बजाय “अब” का संकल्प होना चाहिए।

  • अब पुरुषार्थ करना है।
  • अब परिवर्तन लाना है।
  • अब स्वयं प्राप्ति स्वरूप बनना है।
  • अब दूसरों को भी प्राप्ति करानी है।

जब स्वयं प्राप्ति स्वरूप बनेंगे, तभी दूसरों को प्राप्ति करा सकेंगे।

8. नाजुकपन छोड़कर राजयुक्त बनो

नाजों से चलना अर्थात् अलबेलापन और नाजुकपन रखना, जबकि राजयुक्त बनना अर्थात् जिम्मेदारी और समझदारी से चलना।

नजदीक की प्रजा बनाने के लिए नाजुकपन छोड़ना होगा। इसके लिए हर कार्य में नियमितता और जिम्मेदारी आवश्यक है।

राजयुक्त जीवन की विशेषताएँ:

  • अमृतवेले से लेकर दिनभर नियमित रहना।
  • हर कर्म में श्रेष्ठता रखना।
  • हर संकल्प को व्यर्थ होने से बचाना।
  • वाणी में मर्यादा और स्पष्टता रखना।
  • माया की मिक्स से मुक्त रहना।

जितना नियमित बनेंगे, उतना ही रूलर अर्थात् अपने ऊपर शासन करने वाले बनेंगे।

9. हर बोल को श्रेष्ठ बनाओ

बापदादा ने समझाया कि बड़े व्यक्तियों के भाषण में शब्दों का भी ध्यान रखा जाता है। इसी प्रकार ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनने वाली आत्माओं के बोल भी श्रेष्ठ और निश्चित होने चाहिए।

एक भी बोल व्यर्थ नहीं निकलना चाहिए। वाणी में ज्ञान, मर्यादा और आत्मिकता होनी चाहिए।

सिर्फ नियमित रूप से आने में ही नहीं, बल्कि हर संकल्प, हर कर्म और हर बोल में नियमित बनना है।

10. साक्षात्कारमूर्त बनकर सेवा करो

सम्मेलन का प्रत्येक कार्य करते हुए यह स्मृति रहे कि हम विश्व के आगे साक्षात्कारमूर्त हैं।

जब आत्मा स्वयं ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनती है, तब उसके द्वारा बापदादा का साक्षात्कार स्वतः होने लगता है।

इसलिए सेवा में सफलता पाने के लिए पहले स्वयं में परिवर्तन लाना है। स्वयं प्राप्ति स्वरूप बनकर ही दूसरों को प्राप्ति कराई जा सकती है।


स्व-चेकिंग के लिए मुख्य प्रश्न

  1. क्या मैं एक सेकण्ड में देह के भान से न्यारा हो सकता हूँ?
  2. क्या मैं हर परिस्थिति में साक्षी अवस्था का अभ्यास करता हूँ?
  3. क्या मेरी सेवा से आत्माएँ बाप की स्नेही बन रही हैं?
  4. क्या मेरी सेवा दूसरों को सहयोगी और शक्तिरूप बना रही है?
  5. क्या मैं सभी को रिगार्ड देता हूँ?
  6. क्या मेरी वृत्ति, दृष्टि, वाणी और कर्म में “पहले आप” की भावना है?
  7. क्या मैं “कब होगा” के बजाय “अब करना है” का पुरुषार्थ करता हूँ?
  8. क्या मेरे संकल्प और बोल व्यर्थ से मुक्त हैं?
  9. क्या मैं हर कार्य में नियमित हूँ?
  10. क्या मेरे जीवन से ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देता है?

30 छोटे प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1. बन्धनमुक्त आत्मा की मुख्य निशानी क्या है?

उत्तर: जब चाहे देह का आधार लेना और जब चाहे उससे न्यारा हो जाना।

प्रश्न 2. देह को किस रूप में समझना है?

उत्तर: कर्तव्य करने का आधार।

प्रश्न 3. देह के भान से मुक्त होने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: निरन्तर अभ्यास।

प्रश्न 4. बन्धनमुक्त होने से क्या प्राप्त होता है?

उत्तर: योगयुक्त अवस्था।

प्रश्न 5. योगयुक्त होने से क्या प्राप्ति होती है?

उत्तर: जीवनमुक्त अवस्था में ऊँचा पद।

प्रश्न 6. सर्व स्नेही बनने के लिए पहले क्या बनना है?

उत्तर: न्यारा।

प्रश्न 7. न्यारेपन का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: वे बाप के प्यारे बनने में सहयोग प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 8. सेवा की सफलता के तीन स्वरूप क्या हैं?

उत्तर: बाप का स्नेही, कर्तव्य में सहयोगी और पुरुषार्थ में शक्तिरूप बनाना।

प्रश्न 9. सेवा की सफलता में कमी कब होती है?

उत्तर: जब तीनों योग्यताओं में से किसी एक की कमी हो।

प्रश्न 10. बापदादा किस अवस्था की राखी बाँधने आए?

उत्तर: साक्षी अवस्था की।

प्रश्न 11. साक्षीपन की राखी का अभ्यास क्या है?

उत्तर: अभी आधार लेना और अभी न्यारा हो जाना।

प्रश्न 12. साक्षीपन से क्या समीप आता है?

उत्तर: सम्पूर्णता और समय।

प्रश्न 13. अपना रिकॉर्ड ठीक रखने के लिए क्या करना है?

उत्तर: सर्व को रिगार्ड देना है।

प्रश्न 14. रिगार्ड देना क्या है?

उत्तर: अपना रिकॉर्ड बनाना।

प्रश्न 15. सर्व के स्नेह को प्राप्त करने का साधन क्या है?

उत्तर: सभी को रिगार्ड देना।

प्रश्न 16. “पहले आप” की भावना कहाँ लानी है?

उत्तर: वृत्ति, दृष्टि, वाणी और कर्म में।

प्रश्न 17. निर्मान बनने से क्या सम्भव होता है?

उत्तर: प्रत्यक्ष प्रमाण बनना और विश्व का निर्माण करना।

प्रश्न 18. सम्मेलन का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: सर्व आत्माओं का मिलन।

प्रश्न 19. सम्मेलन में आत्माओं का मिलन किससे कराना है?

उत्तर: बाप से।

प्रश्न 20. वर्तमान समय में किस शब्द को समाप्त करना है?

उत्तर: “कब” शब्द को।

प्रश्न 21. “कब” के स्थान पर कौन-सा संकल्प रखना है?

उत्तर: “अब”।

प्रश्न 22. दूसरों को प्राप्ति कराने के लिए पहले क्या बनना है?

उत्तर: स्वयं प्राप्ति स्वरूप।

प्रश्न 23. नाजुकपन छोड़कर क्या बनना है?

उत्तर: राजयुक्त।

प्रश्न 24. नियमित बनने का परिणाम क्या है?

उत्तर: रूलर बनना।

प्रश्न 25. नियमितता किन बातों में आवश्यक है?

उत्तर: कर्म, संकल्प और वाणी सहित हर बात में।

प्रश्न 26. वाणी कैसी होनी चाहिए?

उत्तर: श्रेष्ठ, मर्यादित और व्यर्थ से मुक्त।

प्रश्न 27. सम्मेलन के कार्य करते हुए क्या स्मृति रखनी है?

उत्तर: हम विश्व के आगे साक्षात्कारमूर्त हैं।

प्रश्न 28. बापदादा का साक्षात्कार कैसे हो सकता है?

उत्तर: स्वयं ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनने से।

प्रश्न 29. साक्षीपन की प्रैक्टिस से क्या लाभ होता है?

उत्तर: सेवा की सफलता शीघ्र होती है और सम्पूर्णता समीप आती है।

प्रश्न 30. इस मुरली की मुख्य धारणा क्या है?

उत्तर: बन्धनमुक्त, योगयुक्त और साक्षी बनकर सर्व को रिगार्ड देना तथा सेवा में प्रत्यक्ष प्रमाण बनना।


समापन संदेश

इस अव्यक्त मुरली की मुख्य शिक्षा है कि देह को कर्तव्य का आधार समझकर उससे न्यारे रहने का अभ्यास करें। साक्षीपन की राखी सदैव बँधी रहे, सर्व को रिगार्ड दें और “कब” के बजाय “अब” का पुरुषार्थ करें। जब स्वयं ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनेंगे, तभी हमारी सेवा से आत्माएँ बाप की स्नेही, सहयोगी और शक्तिरूप बन सकेंगी।

ओम् शान्ति।

📝 74. अव्यक्त मुरली | 6 August 1970

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