17 October 1970 | हिंदी · “दृष्टि से सृष्टि की रचना”
“दृष्टि से सृष्टि की रचना”
सभी अव्यक्त स्थिति में रहते व्यक्त में कार्य कर रहे हो? जैसे बाप अव्यक्त होते व्यक्त में प्रवेश हो कार्य करते हैं वैसे बाप समान बने हो? बाप समान बनेंगे तब ही औरों को भी बाप समान बना सकेंगे। अपने आप से पूछो कि दृष्टि बाप समान बनी है? वाणी और संकल्प बाप समान बने हैं? बाप को क्या स्मृति में रहता है? जानते हो? बाप की स्मृति में सदैव क्या रहता है और आपकी स्मृति में सदैव क्या रहता है? क्या अन्तर है? समान स्मृति होती है? कोई स्मृति रहती है कि कोई भी नहीं रहती है? स्मृति रहती है या स्मृति से भी परे हो? कोई बात में बाप के समान आपकी स्मृति रहती है? (नहीं) अन्त तक स्मृति में समानता आ जायेगी? (नम्बरवार) फर्स्ट बच्चे और बाप में फर्क रहेगा? बाप दादा में फर्क रहेगा? समानता आ जायेगी? जैसे बाप बेहद का बाप है वैसे दादा भी बेहद का बाप है। बापदादा के समीप, समानता होनी चाहिए। जितनी-जितनी समीपता उतनी समानता। अन्त में अब बच्चे भी अपनी रचना के रचयिता बनकर प्रैक्टिकल में अनुभव करेंगे। जैसे बाप को रचना को देख रचयिता के स्वरूप की स्मृति स्वत: रहती है ऐसी स्टेज नम्बरवार बच्चों की भी आनी है। दृष्टि से सृष्टि रचने आती है? आपकी रचना कैसी है? कुख की वा नैनों की? दृष्टि से रचना रचेंगे? यह जो कहावत है कि दृष्टि से सृष्टि बनेंगी। ऐसा दृष्टि जिससे सृष्टि बदल जाये। ऐसी दृष्टि में दिव्यता अनुभव करते हो? दृष्टि धोखा भी देती और दृष्टि पतितों को पावन भी करती। दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल ही जाती है। तो दृष्टि कहाँ तक बदली है? दृष्टि क्या बदलनी होती है, यह मालूम है? आत्मिक दृष्टि बनानी है। आत्मिक दृष्टि, दिव्य दृष्टि और अलौकिक दृष्टि बनी है? जहाँ देखते, जिसको देखते वह आत्मिक स्वरूप ही दिखाई दे। ऐसी दृष्टि बदली है? जिस दृष्टि में अर्थात् नैनों में खराबी होती है तो एक समय में दो चीज़ें दिखाई पड़ती हैं। ऐसे ही दृष्टि पूर्ण नहीं बदली है तो यहाँ भी दो चीजें दिखाई पड़ती हैं। देही और देह। कभी वह कभी वह। ऐसे होता है ना। कभी देह को देखते हैं कभी देही को। जब नैन ठीक होते हैं तो जो चीज़ जैसी होती है वैसी ही यथार्थ रूप में दिखाई पड़ता है। ऐसे ही यह दृष्टि भी जब बदल जाती है तो जो यथार्थ रूप है वह दिखाई पड़ता है। यथार्थ रूप है देही न कि देह। जो यथार्थ रूप है वह दिखाई दे। इससे समझो कि दृष्टि ठीक है। दृष्टि के ऊपर बहुत ध्यान रखना है। दृष्टि बदल गई तो कब धोखा नहीं देगी। साक्षात्कार दृष्टि से ही करेंगे और एक एक की दृष्टि में अपने यथार्थ रूप और यथार्थ घर तथा यथार्थ राजधानी देखेंगे। इतनी दृष्टि में पावर है, अगर यथार्थ दृष्टि है तो। तो सदैव अपने को चेक करो कि अभी कोई भी सामने आये तो मेरी दृष्टि द्वारा क्या साक्षात्कार करेंगे। जो आपकी वृत्ति में होगा वैसा अन्य आप की दृष्टि से देखेंगे। अगर वृत्ति देह अभिमान की है, चंचल है तो आपकी दृष्टि से साक्षात्कार भी ऐसे ही होगा। औरों की भी दृष्टि वृत्ति चंचल होगी। यथार्थ साक्षात्कार कर नहीं सकेंगे। यह समझते हो? इन्हों की ट्रेनिंग है ना। इस ग्रुप के लिए मुख्य विषय है अपनी वृत्ति के सुधार से अपनी दृष्टि को दिव्य बनाना। कहाँ तक बनी हैं? नहीं बनी तो क्यों नहीं बनी है? इस पर इन्हों को स्पष्ट समझाना। सृष्टि न बदलने का कारण है दृष्टि का न बदलना। दृष्टि न बदलने का कारण है वृत्ति का न बदलना। दृष्टि बदल जाये तो सृष्टि भी बदल जाये। आजकल सभी बच्चों के प्रति विशेष इशारा बापदादा का यही है कि अपनी दृष्टि को बदलो। साक्षात्कार-मूर्त बनो। देखने वाले ऐसे अनुभव करें कि यह नैन नहीं लेकिन यह एक जादू कि डिब्बियां है। जैसे जादू की डिब्बी में भिन्न-भिन्न नजारे देखते हैं वैसे आपके नैनों में दिव्य रंगत देखें। नैन साक्षात्कार के साधन बन जायें।
यह ग्रुप मालूम है कौन सा ग्रुप है? इनमें विशेषता क्या है? सारे विश्व के अन्दर विशेष आत्मायें हो। ऐसे तो नहीं समझते कि हम साधारण हैं। ऐसे कभी नहीं समझना। सारे विश्व के अन्दर विशेष आत्मायें कौन हैं? अगर आप विशेष आत्मायें न होती तो बाप ने अपना क्यों बनाया? अपने को विशेष आत्मा समझने से विशेषता आयेगी। अगर साधारण समझेंगी तो कर्तव्य भी साधारण करेंगी। एक-एक आत्मा अपने को विशेष समझ औरों में भी विशेषता लानी है। तुम विशेष आत्मायें हो, यह नशा ईश्वरीय नशा है। देह अभिमान का नशा नहीं। ईश्वरीय नशा सदैव नैनों से दिखाई दे। तो इस ग्रुप की विशेषता क्या है? आप अपने ग्रुप की विशेषता समझती हो? (कोरा कागज है, कईयों ने विभिन्न बातें सुनाई) इस ग्रुप का टाइटल तो बहुत बड़ा है। ट्रेनिंग के बाद यही गुण कायम रहे, यह भी ट्रेनिंग चाहिए। अभी तो विशेषतायें बहुत अच्छी सुन रही हो। कोरे कागज पर जो कुछ लिखा जाता है वह स्पष्ट होता है। जितना स्पष्ट उतना श्रेष्ठ। अगर स्पष्टता में कमी है तो श्रेष्ठता में भी कमी। और कुछ मिक्स नहीं करना है। कोई-कोई मिक्स बहुत करते हैं। इससे क्या होता है? यथार्थ रूप भी अयथार्थ हो जाता है। वही ज्ञान की बातें माया का रूप बन जाती हैं। इसलिए इस ग्रुप की यह विशेषता चित्र में दिखाई दे कि यह ग्रुप सदा स्पष्ट और श्रेष्ठ रहा। सदैव अपने यथार्थ रूप में रहें। जो बात जैसी है उस रूप से जानकर धारण करनी है। और चलते चलना है। यह है स्पष्टता। इस ग्रुप को बापदादा क्या टाइटल देते हैं? जैसे कहावत है छोटे सुभानअल्ला। लेकिन बापदादा कहते हैं छोटे तो समान अल्लाह। सभी बातों में, कदम-कदम में समानता रखो। लेकिन समानता कैसे आयेगी? समानता के लिए दो बातें ध्यान में रखना है। साकार रूप में क्या विशेषतायें थी? एक तो सदैव अपने को आधारमूर्त समझो। सारे विश्व के आधारमूर्त। इससे क्या होगा कि जो भी कर्म करेंगे जिम्मेवारी से करेंगे। अलबेलापन नहीं रहेगा। जैसे बापदादा सर्व के आधारमूर्त हैं वैसे हरेक बच्चा विश्व के आधारमूर्त हैं। जो कर्म आप करेंगे, वह सभी करेंगे। संगम पर जो रस्म चलती है, भक्तिमार्ग में बदलकर चलती है। सारे विश्व के आप आधारमूर्त हो। हरेक को अपने को आधारमूर्त समझना है और दूसरा उद्धारमूर्त बनना है। जितना अपना उद्धार करेंगे उतना औरों का भी उद्धार कर सकेंगे। जितना औरों का उद्धार करेंगे उतना अपना भी उद्धार करेंगे। अपना उद्धार नहीं करेंगे तो औरों का कैसे करेंगे। औरों का उद्धार तब करेंगे जब उद्धारमूर्त बनेंगे। छोटे होते भी कर्तव्य बाप के समान करना है। यह याद रखने से समानता आयेगी। फिर जो इस ग्रुप का टाइटल दिया “छोटा बाप समान” वह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगा। यह भूलना नहीं। अच्छा अब क्या करना है? (टीका लगाना है) यह टीका भी साधारण टीका नहीं है। टीका किसलिए लगाते हैं, मालूम है? टीका सौभाग्य की निशानी है। जो बातें सुनी उन बातों में टिकने की निशानी टीका है। टीका भी मस्तक में टिक जाता है। तो बुद्धि में यह बातें टिक जायें इसलिए यह टीका दिया जाता है। और किसलिए है? (कईयों ने अपना विचार सुनाया) बापदादा जो सुनायेंगे वह और है। यह टीका (इन्जेक्शन) सदा माया के रोगों से निवृत रहने का टीका है। सदा तन्दुरुस्त रहने का भी टीका है। एक टीका जो आप सभी ने सुनाया और यह भी है। दोनों टीका लगाने हैं। एक है शक्तिशाली बनने का और दूसरा है सदा सुहाग और भाग्य में स्थित रहने का। दोनों टीका बापदादा लगाते हैं। निशानी एक, राज़ दो हैं। निशानी तो स्थूल होती है लेकिन राज़ दो हैं। इसलिए ऐसे तिलक नहीं लगाना। तिलक लगाना अर्थात् सदा काल के लिए प्रतिज्ञा करना। यह टीका एक प्रतिज्ञा की निशानी है। सदैव हर बात में पास विद आनर बनेंगे। इस प्रतिज्ञा का यह तिलक है। इतनी हिम्मत है। पास नहीं बल्कि पास विद ऑनर। पास विद ऑनर और पास में क्या फर्क है? पास विद ऑनर अर्थात् मन में भी संकल्पों से सजा न खायें। धर्मराज की सजाओं की तो बात पीछे है। परन्तु अपने संकल्पों की भी उल्झन अथवा सजाओं से परे। इसको कहते हैं पास विद ऑनर। अपनी गलती से स्वयं को सजा देते हैं। उलझते हैं, पुकारते हैं, मूंझते हैं इससे भी परे। पास विद ऑनर इसको कहते हैं। ऐसी प्रतिज्ञा करने को तैयार हो? संकल्पों में भी न उलझें। वाणी कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क की बात छोड़ दो। वह तो मोटी बात है। ऐसी प्रतिज्ञा वाला ग्रुप है? हिम्मतवान है।
हिम्मत कायम रहेगी तो सर्व मददगार पत्ते रहेंगे। सहयोगी बनेंगे तो स्नेह मिलता रहेगा। जैसे वृक्ष में जो कोमल और छोटे पत्ते निकलते हैं, वह बहुत प्रिय लगते हैं। लेकिन चिड़िया भी कोमल पत्तों को ही खाती है। सिर्फ प्यारे रहना किसके? बापदादा के न कि माया रूपी चिड़ियों के। तो यह भी कोमल पत्ते हैं। कोमल पत्तों को कमाल करनी है। क्या कमाल करना है? अपने ईश्वरीय चरित्र के ऊपर सर्व को आकर्षित करना है। अपने ऊपर नहीं, चरित्र के ऊपर। इस ग्रुप के ऊपर पूरा ध्यान है। इस ग्रुप को अपने ऊपर भी इतना ही ध्यान रखना है।
अव्यक्त मुरली–75
17 अक्टूबर 1970
दृष्टि से सृष्टि की रचना
मुख्य संदेश: अपनी वृत्ति को शुद्ध बनाकर दृष्टि को आत्मिक, दिव्य और अलौकिक बनाना है। बाप समान बनने के लिए हर कर्म में जिम्मेवारी, अपने और दूसरों के उद्धार की भावना तथा संकल्पों में भी पास विद ऑनर रहने की प्रतिज्ञा धारण करनी है।
- बाप समान दृष्टि, वाणी और संकल्प
बापदादा ने बच्चों से पूछा कि क्या वे अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर व्यक्त में कार्य करते हैं? जैसे बाप अव्यक्त होते हुए व्यक्त में प्रवेश कर कार्य करते हैं, वैसे ही बच्चों को भी बाप समान बनना है।
बाप समान बनने पर ही दूसरों को बाप समान बना सकेंगे। इसके लिए स्वयं को जाँचना है कि हमारी दृष्टि, वाणी और संकल्प बाप समान बने हैं या नहीं।
जितनी बापदादा के समीपता होगी, उतनी ही समानता आएगी। अन्त में बच्चों को भी अपनी रचना के रचयिता बनकर प्रैक्टिकल अनुभव करना है।
मुख्य धारणाएँ:
अपनी दृष्टि, वाणी और संकल्प को बाप समान बनाएँ।
बापदादा की स्मृति और समीपता बढ़ाएँ।
हर कर्म में अव्यक्त स्थिति का अभ्यास करें।
स्वयं समान बनकर दूसरों को भी समान बनाएँ।
- दृष्टि से सृष्टि की रचना
बापदादा ने समझाया कि दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल जाती है। दृष्टि ऐसी होनी चाहिए जिससे दूसरों को उनके यथार्थ स्वरूप में देख सकें।
आत्मिक दृष्टि का अर्थ है—जहाँ भी देखें, जिसको भी देखें, उसमें आत्मिक स्वरूप का अनुभव हो। जब दृष्टि में देह और देही दोनों दिखाई देते हैं, तब समझना चाहिए कि दृष्टि अभी पूर्ण रूप से नहीं बदली है।
जैसे आँखों में खराबी होने पर एक वस्तु दो दिखाई दे सकती है, वैसे ही दृष्टि पूर्ण न बदलने पर कभी देह दिखाई देती है और कभी देही। जब दृष्टि ठीक हो जाती है, तब वस्तु अपने यथार्थ रूप में दिखाई देती है।
इसलिए ध्यान रखें:
आत्मिक दृष्टि का अभ्यास करें।
देह के बजाय देही को देखने का पुरुषार्थ करें।
अपनी दृष्टि को दिव्य और अलौकिक बनाएँ।
सामने आने वाली हर आत्मा को आत्मिक स्वरूप में देखने का अभ्यास करें।
- वृत्ति बदलेगी तो दृष्टि बदलेगी
बापदादा ने दृष्टि, वृत्ति और सृष्टि के बीच का सम्बन्ध स्पष्ट किया।
यदि वृत्ति देह-अभिमान की या चंचल है, तो दृष्टि भी वैसी ही बनेगी। दूसरों को भी हमारी दृष्टि से वैसा ही अनुभव होगा। इसलिए दृष्टि बदलने से पहले वृत्ति को बदलना आवश्यक है।
मुरली की मुख्य कड़ी:
वृत्ति बदलेगी तो दृष्टि बदलेगी।
दृष्टि बदलेगी तो सृष्टि बदलेगी।
दृष्टि दिव्य होगी तो दूसरों को यथार्थ साक्षात्कार का अनुभव होगा।
इसलिए हर समय स्वयं को चेक करना है कि सामने आने वाली आत्मा मेरी दृष्टि द्वारा क्या अनुभव करेगी।
- दिव्य दृष्टि से साक्षात्कारमूर्त बनो
बापदादा ने बच्चों को साक्षात्कारमूर्त बनने की प्रेरणा दी। दृष्टि में इतनी दिव्यता हो कि देखने वाले अनुभव करें कि ये साधारण नयन नहीं, बल्कि दिव्य अनुभव कराने वाले नयन हैं।
यथार्थ दृष्टि के द्वारा प्रत्येक आत्मा को अपना यथार्थ स्वरूप, यथार्थ घर और यथार्थ राजधानी याद आ सकती है।
लेकिन यह तभी सम्भव है जब अपनी वृत्ति और दृष्टि में शुद्धता हो। दृष्टि को बदलने के लिए विशेष ध्यान और अभ्यास आवश्यक है।
अभ्यास के बिन्दु:
अपनी वृत्ति को प्रतिदिन चेक करें।
देह-अभिमान और चंचलता को समाप्त करें।
आत्मिक दृष्टि से देखने का अभ्यास करें।
अपने नयनों को दिव्य अनुभव कराने का साधन बनाएँ।
- विशेष आत्मा होने का ईश्वरीय नशा
बापदादा ने बच्चों को याद दिलाया कि वे सारे विश्व के अन्दर विशेष आत्माएँ हैं। यदि वे विशेष आत्माएँ नहीं होतीं, तो बाप ने उन्हें अपना क्यों बनाया?
अपने को विशेष आत्मा समझने से विशेषता आती है। यदि स्वयं को साधारण समझेंगे, तो कर्म भी साधारण करेंगे।
यह विशेषता देह-अभिमान का नशा नहीं, बल्कि ईश्वरीय नशा है। यह नशा नयनों और व्यवहार से दिखाई देना चाहिए।
विशेष आत्मा की पहचान:
स्वयं को ईश्वरीय कार्य के निमित्त समझना।
हर कर्म में श्रेष्ठता लाना।
अपने द्वारा दूसरों में विशेषता लाना।
ईश्वरीय नशे को व्यवहार में प्रत्यक्ष करना।
- स्पष्टता और श्रेष्ठता
बापदादा ने ग्रुप की विशेषता स्पष्ट और श्रेष्ठ रहने की बताई। कोरे कागज पर जो लिखा जाता है, वह स्पष्ट दिखाई देता है। इसी प्रकार बुद्धि और जीवन भी स्पष्ट होने चाहिए।
ज्ञान में दूसरी बातें मिक्स करने से यथार्थ रूप भी अयथार्थ हो जाता है। इसलिए जो बात जैसी है, उसे उसी रूप में समझकर धारण करना है।
ट्रेनिंग के बाद भी गुण कायम रहें, इसके लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है।
मुख्य शिक्षा:
ज्ञान को स्पष्ट रूप से समझें।
उसमें मनमत या माया की मिक्स न होने दें।
जो समझें, उसे जीवन में धारण करें।
स्पष्टता को श्रेष्ठता का आधार बनाएँ।
- “छोटे तो समान अल्लाह” — बाप समान बनना
बापदादा ने बच्चों को विशेष टाइटल दिया—“छोटे तो समान अल्लाह।” इसका भाव है कि बच्चे छोटे होते हुए भी सभी बातों और कदम-कदम पर बाप समान बनें।
इसके लिए दो विशेषताओं को धारण करना है।
पहली विशेषता — आधारमूर्त: स्वयं को सारे विश्व के लिए आधारमूर्त समझें। इससे हर कर्म जिम्मेवारी से होगा और अलबेलापन समाप्त होगा।
दूसरी विशेषता — उद्धारमूर्त: अपना उद्धार करके दूसरों के उद्धार में सहयोगी बनें। जितना अपना उद्धार करेंगे, उतना दूसरों का उद्धार कर सकेंगे; और जितना दूसरों के उद्धार में सहयोग देंगे, उतना अपना भी उद्धार होगा।
छोटे होते हुए भी कर्तव्य बाप समान करना है।
- टीका अर्थात् प्रतिज्ञा
बापदादा ने टीका लगाने का अर्थ समझाया। टीका सौभाग्य की निशानी है और सुनी हुई बातों में टिकने की स्मृति भी है।
इसके दो विशेष राज बताए गए:
शक्तिशाली बनने का टीका।
सदा सुहाग और भाग्य में स्थित रहने का टीका।
यह टीका माया के रोगों से निवृत्त रहने और सदा तन्दुरुस्त रहने की स्मृति भी है। तिलक लगाना अर्थात् जीवनभर के लिए प्रतिज्ञा करना।
बच्चों को प्रतिज्ञा करनी है कि वे हर बात में पास विद ऑनर बनेंगे।
- पास और पास विद ऑनर में अन्तर
बापदादा ने समझाया कि पास विद ऑनर होने का अर्थ केवल बाहरी कर्मों में सफल होना नहीं है। इसमें संकल्पों की भी श्रेष्ठता आवश्यक है।
अपने संकल्पों में उलझना, स्वयं को सजा देना, मूँझना या पुकारना—इन सबसे परे रहना ही पास विद ऑनर की अवस्था है।
यहाँ तक कि मन के संकल्पों में भी व्यर्थता और उलझन न हो। ऐसी प्रतिज्ञा करने के लिए हिम्मत चाहिए।
धारण करने योग्य बातें:
संकल्पों को श्रेष्ठ बनाएँ।
अपनी गलतियों से उत्पन्न उलझनों से मुक्त रहें।
मन को व्यर्थ संकल्पों से बचाएँ।
पास विद ऑनर बनने की प्रतिज्ञा निभाएँ।
- हिम्मत, सहयोग और ईश्वरीय चरित्र
बापदादा ने कहा कि हिम्मत कायम रहेगी तो सर्व मददगार पत्ते रहेंगे। सहयोगी बनने से स्नेह मिलता रहेगा।
कोमल और छोटे पत्ते वृक्ष में प्रिय लगते हैं, लेकिन चिड़िया भी कोमल पत्तों को खाती है। इसी प्रकार केवल प्यारा बनना पर्याप्त नहीं है; माया से भी सुरक्षित रहना है।
बच्चों को अपने ऊपर नहीं, बल्कि अपने ईश्वरीय चरित्र पर सबको आकर्षित करना है। इस ग्रुप के ऊपर बापदादा का विशेष ध्यान है, इसलिए बच्चों को स्वयं भी अपने ऊपर पूरा ध्यान रखना है।
मुख्य धारणाएँ:
हिम्मत बनाए रखें।
सहयोगी बनकर चलें।
माया के आकर्षणों से सावधान रहें।
अपने ईश्वरीय चरित्र से दूसरों को आकर्षित करें।
स्व-चेकिंग के लिए मुख्य प्रश्न
क्या मेरी दृष्टि, वाणी और संकल्प बाप समान हैं?
क्या मैं प्रत्येक आत्मा को आत्मिक स्वरूप में देखता हूँ?
क्या मेरी वृत्ति देह-अभिमान से मुक्त है?
क्या मेरी दृष्टि दूसरों को दिव्यता का अनुभव कराती है?
क्या मैं स्वयं को विशेष आत्मा समझकर श्रेष्ठ कर्म करता हूँ?
क्या मेरे ज्ञान में कोई मिक्स तो नहीं है?
क्या मैं आधारमूर्त और उद्धारमूर्त बनकर चलता हूँ?
क्या मैं संकल्पों में भी पास विद ऑनर बनने का पुरुषार्थ करता हूँ?
क्या मेरी हिम्मत और सहयोग की भावना कायम है?
क्या मेरा ईश्वरीय चरित्र दूसरों को प्रेरित करता है?
30 छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1. बाप समान बनने के लिए किन बातों को समान बनाना है?
उत्तर: दृष्टि, वाणी और संकल्प को।
प्रश्न 2. बापदादा की समीपता का परिणाम क्या है?
उत्तर: समानता बढ़ना।
प्रश्न 3. दृष्टि से सृष्टि की रचना का क्या अर्थ है?
उत्तर: दृष्टि बदलने से अनुभव और सृष्टि बदल जाना।
प्रश्न 4. आत्मिक दृष्टि क्या है?
उत्तर: प्रत्येक आत्मा को उसके आत्मिक स्वरूप में देखना।
प्रश्न 5. दृष्टि पूर्ण रूप से न बदलने पर क्या दिखाई देता है?
उत्तर: कभी देह और कभी देही।
प्रश्न 6. दृष्टि बदलने के लिए पहले क्या बदलना है?
उत्तर: वृत्ति।
प्रश्न 7. वृत्ति न बदलने का दृष्टि पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: दृष्टि भी यथार्थ और दिव्य नहीं बनती।
प्रश्न 8. दिव्य दृष्टि से क्या अनुभव कराया जा सकता है?
उत्तर: यथार्थ स्वरूप, यथार्थ घर और यथार्थ राजधानी का।
प्रश्न 9. बापदादा ने बच्चों को क्या बनने की प्रेरणा दी?
उत्तर: साक्षात्कारमूर्त बनने की।
प्रश्न 10. विशेष आत्मा समझने से क्या आता है?
उत्तर: विशेषता।
प्रश्न 11. विशेष आत्मा का नशा कैसा होना चाहिए?
उत्तर: ईश्वरीय नशा, देह-अभिमान का नहीं।
प्रश्न 12. ग्रुप की मुख्य विशेषता क्या बताई गई?
उत्तर: स्पष्ट और श्रेष्ठ रहना।
प्रश्न 13. ज्ञान में मिक्स करने से क्या होता है?
उत्तर: यथार्थ रूप भी अयथार्थ हो जाता है।
प्रश्न 14. बापदादा ने बच्चों को कौन-सा टाइटल दिया?
उत्तर: “छोटे तो समान अल्लाह।”
प्रश्न 15. बाप समान बनने के लिए कौन-सी दो विशेषताएँ धारण करनी हैं?
उत्तर: आधारमूर्त और उद्धारमूर्त बनना।
प्रश्न 16. आधारमूर्त समझने से क्या होगा?
उत्तर: हर कर्म जिम्मेवारी से होगा।
प्रश्न 17. उद्धारमूर्त बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर: अपना उद्धार करके दूसरों के उद्धार में सहयोग देना।
प्रश्न 18. टीका किसकी निशानी है?
उत्तर: सौभाग्य और प्रतिज्ञा की।
प्रश्न 19. बापदादा ने टीके के कौन-से दो राज बताए?
उत्तर: शक्तिशाली बनना और सदा सुहाग तथा भाग्य में स्थित रहना।
प्रश्न 20. तिलक लगाने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर: सदा के लिए प्रतिज्ञा करना।
प्रश्न 21. बच्चों को किस अवस्था की प्रतिज्ञा करनी है?
उत्तर: पास विद ऑनर बनने की।
प्रश्न 22. पास विद ऑनर का विशेष अर्थ क्या है?
उत्तर: संकल्पों में भी उलझन और सजा से परे रहना।
प्रश्न 23. स्वयं को सजा देने का एक कारण क्या है?
उत्तर: अपनी गलती से उलझना और मूँझना।
प्रश्न 24. प्रतिज्ञा कायम रखने के लिए क्या चाहिए?
उत्तर: हिम्मत।
प्रश्न 25. हिम्मत कायम रहने से क्या होता है?
उत्तर: सर्व मददगार और सहयोगी बनते हैं।
प्रश्न 26. केवल प्यारा बनना पर्याप्त क्यों नहीं है?
उत्तर: माया रूपी चिड़ियों से भी सुरक्षित रहना है।
प्रश्न 27. दूसरों को किस बात पर आकर्षित करना है?
उत्तर: अपने ईश्वरीय चरित्र पर।
प्रश्न 28. अपनी दृष्टि को दिव्य बनाने के लिए किसका सुधार आवश्यक है?
उत्तर: वृत्ति का।
प्रश्न 29. छोटे होते हुए भी क्या करना है?
उत्तर: बाप समान कर्तव्य करना है।
प्रश्न 30. इस मुरली की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: वृत्ति बदलकर दृष्टि को दिव्य बनाना, बाप समान बनना और संकल्पों में भी पास विद ऑनर रहना।
समापन संदेश
इस अव्यक्त मुरली की मुख्य शिक्षा है कि दृष्टि को बदलने के लिए पहले वृत्ति को बदलना आवश्यक है। हर आत्मा को आत्मिक स्वरूप में देखें, स्वयं को विशेष आत्मा समझकर श्रेष्ठ कर्म करें और आधारमूर्त तथा उद्धारमूर्त बनें। टीका रूपी प्रतिज्ञा धारण करके संकल्पों में भी पास विद ऑनर बनने का पुरुषार्थ करें। अपने ईश्वरीय चरित्र से दूसरों को प्रेरित करें।
ओम् शान्ति।
📝 75. अव्यक्त मुरली |17 October 1970
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
