73. अव्यक्त मुरली | 30 July 1970

30 July 1970 | हिंदी · “महारथी अर्थात् महानता”

“महारथी अर्थात् महानता”

आज पाण्डव सेना की भट्ठी का समाप्ति समारोह है या आज शुरूआत करते हो? (समीपता आरम्भ हुई है) विशेष कौन सी इप्रूवमेंन्ट की है और उसके लिए क्या विशेष संकल्प किया है? परिवर्तन शुरू हुआ है कि होगा? संकल्प रूप में लिया है वा संस्कार भर लिया है (हरेक ने अपना-अपना सुनाया) यह है पाण्डव सेना की भट्ठी का पेपर। इस एक प्रश्न से पूरा पेपर हो गया। वर्तमान समय संकल्प और कर्म साथ-साथ होना ही आवश्यक है। अभी-अभी संकल्प किया अभी-अभी कर्म में लाया। संकल्प और कर्म में महान अन्तर नहीं होना चाहिए। महारथियों का अर्थ ही है महानता। तो महानता सिर्फ संकल्प में नहीं लेकिन सर्व में महानता। यह है महारथियों की निशानी। संकल्प को प्रैक्टिकल में लाने के लिए सोच करने में समय नहीं लगता। क्योंकि महारथियों के संकल्प भी ऐसे होते हैं जो संकल्प प्रैक्टिकल में सम्भव हो सकते हैं। यह करें न करें, कैसे करें क्या होगा यह सोचने की उनको आवश्यकता नहीं है। संकल्प ही ऐसे उत्पन्न होंगे जो संकल्प उठा और सिद्ध हुआ। इससे अपनी स्टेज की परख कर सकते हो। फाइनल स्टेज है ही योग की सिद्धि प्राप्त करना। कर्म की सिद्धि प्राप्त करना। इसके लिए कौन सी मुख्य पावर धारण करना है, जो यह सभी सिद्ध हो जायें। संकल्प, वाणी, कर्म सभी सिद्ध हो जायें, इसके लिए कौन सी पावर चाहिए? सभी जो शक्तियां सुनाई थीं वह तो चाहिए ही लेकिन उनमें भी पहले कन्ट्रोलिंग पावर विशेष चाहिए। अगर कन्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो व्यर्थ मिक्स होने के कारण सिद्धि प्राप्त नहीं होती। अगर यथार्थ उत्पत्ति हो संकल्पों की वा यथार्थ वाणी निकले, यथार्थ कर्म हो तो हो नहीं सकता कि सिद्ध न हो। लेकिन व्यर्थ मिक्स होने कारण सिद्धि प्राप्त नहीं होती। यथार्थ की सिद्धि होती है। व्यर्थ की नहीं होती है। व्यर्थ को कन्ट्रोल किया जाता है, उसके लिए कन्ट्रोलिंग पावर जरूर चाहिए। किसी प्रकार की कमजोरी का कारण कन्ट्रोलिंग पावर की कमी है। कमजोरी क्यों होती है? अपने संस्कारों को मिटा नहीं सकते। समझते हुए भी यह संकल्प यथार्थ है वा व्यर्थ है, समझते हुए भी कन्ट्रोलिंग पावर नहीं है। जब कन्ट्रोल करें तब उसके बदले में और संस्कार अपने में जमा कर सकेंगे। कन्ट्रोलिंग पावर की कमी होने के कारण अपने को ही कन्ट्रोल नहीं कर पाते हैं। अपनी रचना का रचयिता बनना आता है? कौन सी रचना रचनी है? वह यथार्थ रचना रचने में कमी है। ऐसी रचना रच लेते हैं जो स्वयं ही अपनी रचना से परेशान हो जाते हैं। अब पाण्डव सेना को प्रैक्टिकल क्या सबूत देना है? जो कमजोरी के बोल, कमजोरी के कर्म करते हो उनकी समाप्ति का समाप्ति समारोह करना है। भट्ठी के समाप्ति का समारोह नहीं। कमजोरी की समाप्ति और हर संकल्प ऐसा पावरफुल उत्पन्न हो जो एक-एक संकल्प कमाल कर दिखाने वाला हो। तो कमजोरी की जगह कमाल को भरना होगा। कमजोरी शब्द ही अब शोभता नहीं। विश्व का आधार आप आत्माओं के ऊपर है। तो जो विश्व के आधारमूर्त और उद्धारमूर्त हैं ऐसी मूर्तियों के मुख से कमजोरी के शब्द शोभते नहीं हैं। अब तो हरेक की मूर्ति में सभी को क्या साक्षात्कार होगा? बापदादा का। ऐसी अलौकिक झलक सभी की मूर्त में दिखाई देनी है जो कोई भी उस झलक को देखकर फिदा हो जाये। सभी को फिदा कर सकेंगे। कोई को मुक्तिधाम, कोई को जीवनमुक्तिधाम। कोई भी ऐसा न रहे जो आप लोगों से अपना यथा पार्ट हक न ले ले। सभी आत्माओं को आप लोगों द्वारा अपना-अपना यथा पार्ट तथा बाप का वर्सा जरूर लेना है। आपकी मूर्त में ऐसी झलक होनी है कि जो कोई भी अपना वर्सा लेने से वंचित नहीं रहेंगे। ऐसे अपने को दाता के बच्चे दाता समझना है। देने वालों में फलक और झलक रहती है। अभी वह मर्ज है। उन संस्कारों को अब इमर्ज करो। किस बात में बिजी हैं जो वह झलक अब तक इमर्ज नहीं होती है? कमजोरियों को मिटाने में बिजी हैं। चुक्तू तो करना ही पड़ेगा। लेकिन एक होता है जल्दी मुक्त करना। वही हिसाब कोई 5 मिनट में कोई आधा घंटा भी लगाते हैं। कोई तो सारा दिन सोचते भी हिसाब नहीं निकाल सकते। यह सभी विशेष आत्मायें हैं तो हर संकल्प हर कर्म विशेष होना चाहिए। जिससे हर आत्मा को प्रेरणा मिले – आगे बढ़ने की। क्योंकि आप सभी आधारमूर्त हो। अगर आधार ही ऐसा होगा तो दूसरे क्या करेंगे? विशेष आत्माओं को विशेष ध्यान देना ही है। अब बीती को संकल्प में भी इमर्ज नहीं करना है। अगर भूल से पुराने संस्कारों की विष इमर्ज हो भी जाये तो उसको ऐसा समझो कि यह बहुत पिछले जन्म के संस्कार हैं। अब के नहीं। पुरानी बीती हुई बातों को बार-बार कोई वर्णन करे तो इसको कहा जाता है व्यर्थ। इस पाण्डव सेना को पहले अपने परिवार के बीच एक उदाहरण बनकर दिखाना है। जैसे साकार रूप में उदाहरण बने ना। ऐसे फालो फादर। इसलिए आज का दिन कहेंगे पुराने संस्कार और संकल्प के समाप्ति समारोह का दिवस। समझा।

इस ग्रुप का नाम क्या हुआ? जब नाम दिया जाता है तो किस आधार पर दिया जाता है? आज कौन सा दिन है? बृहस्पतिवार। बृहस्पति की दशा अर्थात् सफलता। तो यह ग्रुप है सर्व के सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन। कभी भी किसी भी प्रकार का किसको सहयोग चाहिए तो दाता के बच्चे सदैव देने वाले होते हैं। उनका हाथ कभी देने से रुकता नहीं है। सर्व के सहयोगी तब बनेंगे जब सर्व के स्नेही बनेंगे। स्नेही नहीं तो सर्व के सहयोगी भी नहीं बन सकते। इसलिए इस ग्रुप को मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्बन्ध में भी सहयोगी बनना है और सफलतामूर्त बनना है। इसलिए कहा कि सर्व सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन। समझा।

सर्व का सहयोगी बनने के लिए अपने आप को मिटाना भी पड़ता है। इस कार्य से हटेंगे नहीं। तो अपने को मिटाना अर्थात् अपने पुराने संस्कारों को मिटाना। पुराने संस्कार ही सर्व के सहयोगी बनने में विघ्न डालते हैं। तो अपने पुराने संस्कारों को मिटाना है। दूसरे का संस्कार मिटाने के लिए नहीं कह रहे हैं। अपने संस्कार मिटायेंगे तो दूसरे आपको स्वयं ही फालो करेंगे। एक हम दूसरा बाप। तीसरा देखते हुए भी न देखो। तीसरी बातें देखने में आयेंगी भी लेकिन देखते हुए भी न देखो, अपने को और बाप को देखो। स्लोगन यही याद रखना – “मिटायेंगे लेकिन सर्व के सहयोगी बनेंगे।” आपका यादगार चित्र जो कल्प पहले वाला है वह याद है? गोवर्धन पर्वत का यादगार रूप क्या बनाते हैं? कब देखा है? आजकल के भक्तिमार्ग के गोवर्धन पर्वत की पूजा जब करते हैं तो क्या बनाते हैं? (गोबर का बनाते हैं…) पहाड़ को अंगुली देना अर्थात् पुराने संस्कारों को मिटाने में अंगुली देना। पहले यह पहाड़ उठाना है। तब यह कलियुगी दुनियाँ बदल फिर नई दुनिया बनेगी। कोई भी स्लोगन स्मृति में रखो। यह भी अच्छा है। लेकिन स्लोगन का स्वरूप बनना ही है। यह तो एक साधन है लेकिन साधन से स्वरूप बनना अच्छा है। माला के मणके कौन सी विशेषता से बनते हैं? मणकों की विशेषता यही है जो एकमत होकर एक ही धागे में पिरोये जाते हैं। एक की ही लगन एकरस स्थिति और एकमत तो सब एक ही एक। एक जैसे मणके हैं तो एक धागे में पिरोये जाते हैं ना। तो एक ही मत पर चलने वाले और आपस में भी एकमत हो। संकल्प भी एक से। दो मत होती हैं तो वह दूसरी अर्थात् 16000 की माला के दाने बन जाते हैं। एक मत के लिए ऐसा वातावरण बनाना है। वातावरण तब बनेगा जब समाने की शक्ति होगी। मानो कोई बात में भिन्नता हो जाती है क्योंकि यथा-योग्य यथा शक्ति तो है ना। तो उस भिन्नता को समाओ। समाने की शक्ति चाहिए। तो ऐसी आपस में एकता से ही समीप आयेंगे। सर्व के आगे दृष्टान्त रूप बन जायेंगे। सबमें अपनी-अपनी विशेषता होती है। कोई भी हो उसकी विशेषताओं को देखो तो विशेष आत्मा बन जायेंगे। कमी को तो बिल्कुल देखना ही नहीं है। जैसे चन्द्रमा अथवा सूर्य को ग्रहण लगता है तो कहते हैं ना कि नहीं देखना चाहिए। नहीं तो ग्रहचारी बैठ जायेगी। तो किसकी कमी भी ग्रहण है। भूल से भी कोई ने देख लिया तो समझो ग्रहचारी बैठ जायेगी। तो सच्चा सोना बनना है। जरा भी खाद होगी तो वही देखने में आयेगी। विशेषताओं को दबा देगी। अपने को ऐसा चेन्ज करो जो दूसरों पर प्रभाव पड़े। धक से चेन्ज करना है। एकदम न्यारे बनो तो औरों का लगाव भी खुद ही टूटता जायेगा। 

अव्यक्त मुरली — 30 जुलाई 1970

महारथी अर्थात् महानता

1. संकल्प और कर्म में समानता

बापदादा ने पाण्डव सेना की भट्ठी के समापन पर एक विशेष प्रश्न पूछा — परिवर्तन शुरू हुआ है या केवल होगा? क्या परिवर्तन केवल संकल्प रूप में लिया है या संस्कारों में भी भर लिया है?

यही प्रश्न पूरे पेपर के समान है। वर्तमान समय में संकल्प और कर्म साथ-साथ होना आवश्यक है।

महारथी का अर्थ ही महानता है। यह महानता केवल संकल्प तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि संकल्प, वाणी, कर्म और संस्कारों में दिखाई देनी चाहिए।

महारथी का संकल्प ऐसा होता है जिसे प्रैक्टिकल में लाने के लिए बार-बार सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संकल्प उठा और उसे सिद्ध करने का पुरुषार्थ शुरू हो गया।

2. फाइनल स्टेज — योग और कर्म की सिद्धि

मुरली में फाइनल स्टेज को योग की सिद्धि और कर्म की सिद्धि प्राप्त करने की अवस्था बताया गया है।

इस अवस्था में संकल्प, वाणी और कर्म — तीनों में सिद्धि होनी चाहिए।

इसके लिए अन्य शक्तियों के साथ विशेष रूप से कन्ट्रोलिंग पावर की आवश्यकता है। यदि संकल्पों पर नियंत्रण नहीं होगा, तो यथार्थ संकल्पों में व्यर्थ संकल्प मिल जाएँगे और सिद्धि प्राप्त नहीं होगी।

यथार्थ संकल्प, यथार्थ वाणी और यथार्थ कर्म का परिणाम सिद्धि है। व्यर्थ संकल्पों को नियंत्रित करना ही इस पुरुषार्थ का महत्वपूर्ण भाग है।

3. कमजोरी का मुख्य कारण — कन्ट्रोलिंग पावर की कमी

कई बार व्यक्ति समझता है कि कौन-सा संकल्प यथार्थ है और कौन-सा व्यर्थ, फिर भी वह व्यर्थ संकल्प को रोक नहीं पाता।

मुरली के अनुसार, कमजोरी का एक मुख्य कारण कन्ट्रोलिंग पावर की कमी है।

अपने पुराने संस्कारों को मिटाने और उनके स्थान पर श्रेष्ठ संस्कार जमा करने के लिए संकल्पों पर नियंत्रण आवश्यक है।

इसलिए केवल सही और गलत को पहचानना पर्याप्त नहीं है। जो व्यर्थ है, उसे रोकने की शक्ति भी होनी चाहिए।

4. अपनी रचना का रचयिता बनना

बापदादा ने पूछा कि क्या अपनी रचना का रचयिता बनना आता है?

यहाँ रचना से आशय अपने संकल्पों, संस्कारों और उनसे उत्पन्न कर्मों से है। कभी-कभी व्यक्ति ऐसे संकल्प और कर्म उत्पन्न कर लेता है जिनसे वह स्वयं ही परेशान हो जाता है।

अब पाण्डव सेना को ऐसा परिवर्तन करके दिखाना है कि कमजोरी के बोल और कमजोरी के कर्म समाप्त हों।

भट्ठी का वास्तविक समापन तभी है जब कमजोरियों की समाप्ति हो और प्रत्येक संकल्प पावरफुल बनकर कमाल दिखाए।

5. कमजोरी की जगह कमाल

मुरली का स्पष्ट संदेश है कि अब कमजोरी के स्थान पर कमाल भरना है।

जो आत्माएँ विश्व का आधार और उद्धारमूर्त बनने का लक्ष्य रखती हैं, उनके मुख से बार-बार कमजोरी के शब्द शोभा नहीं देते।

प्रत्येक के व्यक्तित्व में ऐसी अलौकिक झलक होनी चाहिए कि दूसरों को बापदादा का परिचय प्राप्त हो।

आपकी स्थिति और कर्मों से आत्माओं को प्रेरणा मिले, वे आगे बढ़ें और अपने यथार्थ पार्ट तथा बाप के वर्से से वंचित न रहें।

6. दाता के बच्चे — देने में फलक और झलक

मुरली में दाता के बच्चों को देने वाला बनने की प्रेरणा दी गई है।

दाता के बच्चे केवल लेने की अपेक्षा नहीं रखते, बल्कि दूसरों को सहयोग, स्नेह और शक्ति देने में तत्पर रहते हैं।

ऐसे व्यक्तित्व में देने की फलक और झलक दिखाई देती है।

इसके लिए पुराने हिसाब-किताब को चुक्तू करना आवश्यक है। लेकिन पुरानी बातों में उलझे रहने के बजाय उन्हें जल्दी समाप्त करके आगे बढ़ना है।

विशेष आत्माओं का प्रत्येक संकल्प और कर्म ऐसा होना चाहिए जिससे दूसरी आत्माओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले।

7. बीती हुई बातों को बार-बार संकल्प में न लाना

पुराने संस्कारों और बीती हुई बातों को बार-बार स्मृति में लाना व्यर्थ संकल्पों को बढ़ाता है।

मुरली की प्रेरणा है कि बीती हुई बातों को बार-बार वर्णन करके वर्तमान को व्यर्थ न करें।

यदि पुराने संस्कार का प्रभाव दिखाई दे, तो उसे वर्तमान की स्थायी पहचान न मानकर पुराने संस्कार के रूप में पहचानें और परिवर्तन का पुरुषार्थ करें।

पाण्डव सेना को पहले अपने परिवार के बीच उदाहरण बनना है। जैसे साकार रूप में उदाहरण प्रस्तुत किया गया, वैसे ही फॉलो फादर बनकर चलना है।

8. पाण्डव सेना का नया नाम — सर्व सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन

मुरली में इस ग्रुप को नाम दिया गया है:

“सर्व के सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन।”

बृहस्पतिवार को बृहस्पति की दशा और सफलता के भाव से जोड़कर सफलता की प्रेरणा दी गई है।

सर्व का सहयोगी बनने के लिए सर्व का स्नेही बनना आवश्यक है। यदि स्नेह नहीं होगा, तो सभी के सहयोगी बनना भी कठिन होगा।

सहयोग केवल कर्म में नहीं, बल्कि चारों स्तरों पर होना चाहिए:

  • मनसा — संकल्पों में।
  • वाचा — वाणी में।
  • कर्मणा — कर्मों में।
  • सम्बन्ध — व्यवहार और रिश्तों में।

9. स्वयं को मिटाना — पुराने संस्कारों को मिटाना

सर्व का सहयोगी बनने के लिए अपने को मिटाना पड़ता है। इसका अर्थ अपने पुराने संस्कारों और कमजोरियों को मिटाना है, न कि अपने कर्तव्य से हट जाना।

पुराने संस्कार ही कई बार दूसरों के साथ सहयोग में विघ्न डालते हैं।

जब व्यक्ति अपने संस्कार बदलता है, तो दूसरे भी उसके परिवर्तन को देखकर प्रेरित हो सकते हैं।

इसलिए स्लोगन है:

“मिटायेंगे लेकिन सर्व के सहयोगी बनेंगे।”

10. एक हम, दूसरा बाप — तीसरी बातों से न्यारा रहना

मुरली में एक विशेष स्मृति दी गई है — “एक हम, दूसरा बाप।”

तीसरी बातें सामने आएँ, तब भी अपने और बापदादा के लक्ष्य को स्मृति में रखना है।

इसका भाव है कि दूसरों की कमियों, विवादों और अनावश्यक बातों में उलझकर अपने पुरुषार्थ को कमजोर नहीं करना है।

अपनी स्थिति को श्रेष्ठ बनाए रखने के लिए ध्यान अपने लक्ष्य, अपने संस्कारों और बापदादा की श्रीमत पर रखना है।

11. गोवर्धन पर्वत की निशानी — पुराने संस्कारों का पहाड़ उठाना

मुरली में गोवर्धन पर्वत की स्मृति के माध्यम से पुराने संस्कारों के पहाड़ को उठाने का भाव समझाया गया है।

पहाड़ को अंगुली देना अर्थात् पुराने संस्कारों को मिटाने के पुरुषार्थ में अपना योगदान देना।

जब अपने पुराने संस्कार बदलेंगे, तभी नई दुनिया के निर्माण में सहयोगी बन सकेंगे।

केवल स्लोगन को याद करना पर्याप्त नहीं है। स्लोगन का स्वयं स्वरूप बनना आवश्यक है।

12. माला के मणके — एकमत और एकरस स्थिति

माला के मणके एक ही धागे में पिरोए जाते हैं। मुरली में इसका उदाहरण देकर एकमत होने की विशेषता समझाई गई है।

संगठन में सभी की विशेषताएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन लक्ष्य और मत में एकता होनी चाहिए।

यदि अलग-अलग मत और विरोधी संकल्प बढ़ेंगे, तो संगठन की एकता कमजोर होगी।

एकमत बनने के लिए समाने की शक्ति आवश्यक है। जहाँ विचारों में भिन्नता हो, वहाँ एक-दूसरे की स्थिति और योग्यता को समझकर समन्वय करना है।

13. दूसरों की कमी नहीं, विशेषता देखना

हर आत्मा में अपनी विशेषता होती है। मुरली में दूसरों की कमी को ग्रहण के समान बताते हुए विशेषताओं को देखने की प्रेरणा दी गई है।

जब हम लगातार दूसरों की कमियाँ देखते हैं, तो उनकी विशेषताएँ हमारी दृष्टि से छिप सकती हैं।

इसलिए दूसरों की विशेषता पहचाननी है और अपनी दृष्टि को श्रेष्ठ बनाना है।

अपने को ऐसा बदलना है कि हमारा परिवर्तन दूसरों पर भी सकारात्मक प्रभाव डाले।

14. एकदम न्यारा बनकर परिवर्तन करना

मुरली के अंत में अपने परिवर्तन को शीघ्र और स्पष्ट बनाने की प्रेरणा दी गई है।

पुराने संस्कारों और अनावश्यक लगाव से न्यारा बनने पर दूसरों का अनुचित लगाव भी धीरे-धीरे कम हो सकता है।

यह परिवर्तन केवल बाहरी व्यवहार में नहीं, बल्कि संकल्पों, संस्कारों और दृष्टि में होना चाहिए।

महानता का प्रमाण है — संकल्प और कर्म की समानता, कमजोरी की समाप्ति, और सर्व के सहयोगी बनने की स्थिति।

15. आत्म-चेकिंग: क्या मैं महारथी हूँ?

प्रतिदिन स्वयं से पूछें:

  1. क्या मेरा संकल्प और कर्म साथ-साथ चलते हैं?
  2. क्या मैं व्यर्थ संकल्पों को रोक सकता हूँ?
  3. क्या मेरी वाणी और कर्म में महानता दिखाई देती है?
  4. क्या मैं अपनी कमजोरियों को समाप्त करने का पुरुषार्थ कर रहा हूँ?
  5. क्या मैं पुराने संस्कारों के स्थान पर श्रेष्ठ संस्कार जमा कर रहा हूँ?
  6. क्या मैं बीती हुई बातों को बार-बार दोहराता हूँ?
  7. क्या मैं सर्व का स्नेही और सहयोगी हूँ?
  8. क्या मैं मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्बन्ध में सहयोगी बनता हूँ?
  9. क्या मैं दूसरों की कमी के बजाय उनकी विशेषता देखता हूँ?
  10. क्या मैं केवल स्लोगन याद करता हूँ या स्वयं उसका स्वरूप भी बनता हूँ?

निष्कर्ष

30 जुलाई 1970 की मुरली का मुख्य संदेश है कि महारथी अर्थात् महानता। यह महानता केवल संकल्प में नहीं, बल्कि संकल्प, वाणी, कर्म और संस्कारों में दिखाई देनी चाहिए।

इसके लिए कन्ट्रोलिंग पावर धारण करके व्यर्थ संकल्पों को रोकना, पुरानी कमजोरियों को समाप्त करना और उनके स्थान पर कमाल भरना आवश्यक है।

सर्व का स्नेही और सहयोगी बनकर, दूसरों की विशेषताओं को देखकर तथा एकमत की स्थिति बनाए रखकर ही संगठन सफलतामूर्त बन सकता है।


छोटे प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. महारथी का अर्थ क्या है?
उत्तर: महानता।

प्रश्न 2. वर्तमान समय में किन दो बातों का साथ-साथ होना आवश्यक है?
उत्तर: संकल्प और कर्म।

प्रश्न 3. महारथियों के संकल्प कैसे होते हैं?
उत्तर: ऐसे संकल्प जिन्हें व्यावहारिक रूप में सिद्ध किया जा सके।

प्रश्न 4. फाइनल स्टेज में कौन-सी सिद्धियाँ प्राप्त करनी हैं?
उत्तर: योग की सिद्धि और कर्म की सिद्धि।

प्रश्न 5. विशेष रूप से कौन-सी शक्ति धारण करनी है?
उत्तर: कन्ट्रोलिंग पावर।

प्रश्न 6. सिद्धि प्राप्त न होने का एक कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: यथार्थ संकल्पों में व्यर्थ संकल्पों का मिल जाना।

प्रश्न 7. कमजोरी का मुख्य कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: कन्ट्रोलिंग पावर की कमी।

प्रश्न 8. अपनी रचना का रचयिता बनने का क्या भाव है?
उत्तर: अपने संकल्पों, संस्कारों और कर्मों को श्रेष्ठ बनाना।

प्रश्न 9. भट्ठी का वास्तविक समापन कब होगा?
उत्तर: जब कमजोरियाँ समाप्त हों और पावरफुल संकल्प उत्पन्न हों।

प्रश्न 10. कमजोरी की जगह क्या भरना है?
उत्तर: कमाल।

प्रश्न 11. विशेष आत्माओं के कर्म कैसे होने चाहिए?
उत्तर: ऐसे कि दूसरों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले।

प्रश्न 12. पुराने संस्कारों के साथ क्या करना है?
उत्तर: उन्हें समाप्त करके श्रेष्ठ संस्कार धारण करने हैं।

प्रश्न 13. मुरली में ग्रुप का क्या नाम दिया गया है?
उत्तर: सर्व के सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन।

प्रश्न 14. सर्व का सहयोगी बनने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: सर्व का स्नेही बनना।

प्रश्न 15. किन चार स्तरों पर सहयोगी बनना है?
उत्तर: मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्बन्ध में।

प्रश्न 16. स्वयं को मिटाने का क्या अर्थ है?
उत्तर: अपने पुराने संस्कारों और कमजोरियों को मिटाना।

प्रश्न 17. मुरली का विशेष स्लोगन क्या है?
उत्तर: “मिटायेंगे लेकिन सर्व के सहयोगी बनेंगे।”

प्रश्न 18. “एक हम, दूसरा बाप” का क्या भाव है?
उत्तर: अपने लक्ष्य और बापदादा की स्मृति में रहना।

प्रश्न 19. गोवर्धन पर्वत की निशानी से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: पुराने संस्कारों को मिटाने के पुरुषार्थ में योगदान देना।

प्रश्न 20. माला के मणकों की विशेषता क्या है?
उत्तर: एक ही धागे में पिरोए जाना।

प्रश्न 21. संगठन में एकता के लिए कौन-सी शक्ति चाहिए?
उत्तर: समाने की शक्ति।

प्रश्न 22. दूसरों में क्या देखना चाहिए?
उत्तर: उनकी विशेषताएँ।

प्रश्न 23. पुरानी बातों को बार-बार दोहराने से क्या होता है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्प बढ़ते हैं और समय व्यर्थ होता है।

प्रश्न 24. दाता के बच्चों की पहचान क्या है?
उत्तर: वे स्नेह, सहयोग और शक्ति देने वाले होते हैं।

प्रश्न 25. महानता केवल कहाँ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए?
उत्तर: केवल संकल्प तक नहीं; वाणी, कर्म और संस्कारों में भी होनी चाहिए।

प्रश्न 26. कन्ट्रोलिंग पावर का व्यावहारिक उपयोग क्या है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्पों और कमजोरियों को रोकना।

प्रश्न 27. अपने परिवार में पहले क्या बनकर दिखाना है?
उत्तर: एक उदाहरण।

प्रश्न 28. दूसरों की कमी देखने के बजाय क्या करना है?
उत्तर: उनकी विशेषताओं को पहचानना।

प्रश्न 29. पुराने संस्कार मिटाने से क्या लाभ होगा?
उत्तर: सर्व का सहयोगी बनना सहज होगा।

प्रश्न 30. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: संकल्प और कर्म में महानता लाकर, कन्ट्रोलिंग पावर से कमजोरियाँ समाप्त करना और सर्व के सहयोगी बनना।

📝 73. अव्यक्त मुरली | 30 July 1970

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