27 July 1970 | हिंदी · “अव्यक्त बनने के लिए मुख्य शक्तियों की धारणा”
“अव्यक्त बनने के लिए मुख्य शक्तियों की धारणा”
आज बापदादा किस रूप से देख रहे हैं? एक-एक के मुखड़े के अन्दर क्या देख रहे हैं? जान सकते हो? हरेक कहाँ तक अव्यक्त-मूर्त, आकर्षण-मूर्त, अलौकिक-मूर्त और हर्षित-मूर्त बने हैं? यह देख रहे हैं। चारों ही लक्षण इस मुखड़े से दिखाई पड़ते हैं। कौन-कौन कहाँ तक बने हैं, वह हरेक का मुखड़ा साक्षात्कार कराता है। जैसे दर्पण में स्थूल चेहरा देखते हैं वैसे दर्पण में यह लक्षण भी देखते हो? देखने से अपना साक्षात्कार क्या होता है? चारों लक्षण से विशेष कौन सा लक्षण अपने में देखते हो? अपने आप को देखने का अभ्यास हरेक को होना चाहिए। अन्तिम स्टेज ऐसी होनी है जिसमें हरेक के मुखड़े में यह सर्व लक्षण प्रसिद्ध रूप में दिखाई पडेंगे। अभी कोई गुप्त है, कोई प्रत्यक्ष है। कोई गुण विशेष है कोई उनसे कम है। लेकिन सम्पूर्ण स्टेज में यह सभी लक्षण समान रूप में और प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देंगे। जिससे सभी की नम्बरवार प्रत्यक्षता होनी है। जितना-जितना जिसमें प्रत्यक्ष रूप में गुण आते जाते हैं उतनी-उतनी प्रत्यक्षता भी होती जा रही है।
आज विशेष किस कार्य के लिए आये हैं? पाण्डव सेना प्रति। पाण्डवों की भट्ठी का आरम्भ है। अपने में क्या नवीनता लानी है, यह मालूम है? विशेष भट्ठी में आये हो तो विशेष क्या धारणा करेंगे? (हरेक ने अपना-अपना लक्ष्य सुनाया) टीचर्स आप बताओ इस पाण्डव सेना से क्या-क्या कराना है। तो यह पहले से सुनते ही अपने में सभी प्वॉइन्ट्स भरने का प्रयत्न कर लेंगे। जो फिर आपको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। आप इन्हों से क्या चाहते हो? यह एक सेकेण्ड में अपने को बदल सकते हैं। मुश्किल तो कुछ भी हो नहीं सकता। और जो निमित्त बने हुए हैं उन्हों को मदद भी बहुत अच्छी मिलती है। पाण्डव सेना तो कल्प पहले की प्रसिद्ध है ही। पाण्डवों के कर्तव्य का यादगार तो प्रसिद्ध है। जो कल्प पहले हुआ है वह सिर्फ अभी रिपीट करना है। अव्यक्त बनने के लिए वा जो भी सभी ने लक्ष्य सुनाया उसको पूर्ण करने के लिए क्या-क्या अपने में धारण करना है। वह आज सुनाते हैं। सर्व पाण्डव अपने को क्या कहलाते हो? आलमाइटी गॉड फादर के बच्चे कहलाते हो ना। तो अव्यक्त बनने के लिए मुख्य कौन सी शक्तियों को अपने में धारण करना है? तब ही जो लक्ष्य रखा है वह पूर्ण हो सकेगा। भट्ठी से मुख्य कौन सी शक्तियों को धारण करके जाना है, वह बताते हैं। हैं तो बहुत लेकिन मुख्य एक तो सहन शक्ति चाहिए, परखने की शक्ति चाहिए और विस्तार को छोटा करने की और फिर छोटे को बड़ा करने की भी शक्ति चाहिए। कहाँ विस्तार को कम करना पड़ता है और कहाँ विस्तार भी करना पड़ता है। समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति, सामना करने की शक्ति और निर्णय करने की भी शक्ति चाहिए। इन सबके साथ-साथ सर्व को स्नेह और सहयोगी बनाने की अर्थात् सर्व को मिलाने की भी शक्ति चाहिए। तो यह सभी शक्तियाँ धारण करनी पड़े। तब ही सभी लक्षण पूरे हो सकते हैं। हो सकते भी नहीं लेकिन होना ही है। करके ही जाना है। यह निश्चय बुद्धि के बोल हैं। इसके लिए एक बात विशेष है। रुहानियत भी धारण करनी है और साथ-साथ ईश्वरीय रुहाब भी हो। यह दो बातें धारण करना है और एक बात छोड़ना है। वह कौन सी? (कोई ने कहा रोब छोड़ना है, कोई ने कहा नीचपना छोड़ना है) यह ठीक है। कहाँ-कहाँ अपने में फेथ न होने के कारण कई कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं। इसलिए कहते हैं नीचपना छोड़ना है। रोब को भी छोड़ना है। दूसरा जो भिन्न-भिन्न रूप बदलते हैं, कब कैसा, कब कैसा, तो वह भिन्न-भिन्न रूप बदलना छोड़कर एक अव्यक्त और अलौकिक रूप भट्ठी से धारण करके जाना है। अच्छा। तिलक तो लगा हुआ है ना। अभी सिर्फ भट्ठी की सौगात देनी है। वह क्या सौगात देंगे? तिलक लगा हुआ है, ताजधारी भी हैं वा ताज देना है। अभी अगर छोटा ताज धारण किया है तो भविष्य में भी कमी पड़ जायेगी। भट्ठी में विश्व महाराजन बनने के लिए आये हो। सभी से बड़े से बड़ा ताज तो विश्व महाराजन का ही होता है। उनकी फिर क्या-क्या जिम्मेवारियां होती हैं, वह भी पाठ पढ़ना होगा।
यह भी एक अच्छा समागम है। आपकी टीचर (चन्द्रमणी) बड़ी हर्षित हो रही है। क्योंकि देखती है कि हमारे सभी स्टूडेण्ट्स विश्व महाराजन् बनेंगे। इस ग्रुप का नाम क्या है। मालूम? एक-एक में विशेष गुण हैं। इसलिए यह विशेष आत्माओं का ग्रुप है। अपने को विशेष आत्मा समझते हो। देखा यह कीचेन (त्रिमूर्ति की कीचेन) सौगात देते हैं। इस लक्ष्य को देख ऐसे लक्षण धारण करने हैं। एक दो के संस्कारों को मिलाना है। और साथ-साथ यह जो चाबी की निशानी दी है अर्थात् सर्व शक्तियां जो सुनाई हैं, उनकी चाबी लेकर ही जाना है। लेकिन यह दोनों बातें कायम तब रहेंगी जब रचयिता और रचना का यथार्थ ज्ञान स्मृति में होगा। इसके लिए यह याद सौगात है। अपने को सफलता-मूर्त समझते हो? सफलता अर्थात् सम्पूर्ण गुण धारण करना। अगर सर्व बातों में सफलता है तो उनका नाम ही है सम्पूर्ण-मूर्त। सफलता के सितारे हैं उसी स्मृति में रह कार्य करने से ही सफलता का अधिकार प्राप्त होता है। सफलता के सितारे बनने से सामना करने की शक्ति आती है। सफलता को सामने रखने से समस्या भी पलट जाती है और सफलता प्रैक्टिकल में हो भी जाती है। समीप सितारों के लक्षण क्या होते हैं? जिसके समीप हैं उन समान बनना है। समीप सितारों में बापदादा के गुण और कर्तव्य प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेंगे। जितनी समीपता उतनी समानता देखेंगे। उनका मुखड़ा बापदादा के साक्षात्कार कराने का दर्पण होता है। उसको बापदादा का परिचय देने का प्रयत्न कम करना पड़ता है। क्योंकि वह स्वयं ही परिचय देने की मूर्त होते हैं। उनको देखते ही बापदादा का परिचय प्राप्त हो जाता है। सर्विस में ऐसा प्रत्यक्ष सबूत देखेंगे। भल देखेंगे आप लोगों को लेकिन आकर्षण बापदादा की तरफ होगी। इसको कहा जाता है सन शोज़ फादर। स्नेह समीप लाता है। अपने स्नेह के मूर्त को जानते हो? स्नेह कभी गुप्त नहीं रह सकता। स्नेही के हर कदम से, जिससे स्नेह है उसकी छाप देखने में आती है। जितना हर्षित-मूर्त उतना आकर्षण-मूर्त बनना है। आकर्षण-मूर्त सदैव बने रहें इसके लिए आकारी रूपधारी बन साकार कर्तव्य में आना है। अन्तर्मुखी और एकान्तवासी यह लक्षण धारण करने से जो लक्ष्य रखा है उसकी सहज प्राप्ति हो सकती है। साधन से सिद्धि होती है ना।
सर्विस में सदैव सम्पूर्ण सफलता के लिए विशेष किस गुण को सामने रखना पड़ता है। साकार रूप में विशेष किस गुण के होने कारण सफलता प्राप्त हुई? (उदारचित्त) जितना उदारचित्त उतना सर्व के उद्धार करने का निमित्त बन सकते हैं। उदारचित होने से सहयोग लेने के पात्र बन जाते हैं। ऐसा समझना चाहिए कि हम सर्व आत्माओं के उद्धार करने के निमित्त हैं। इसलिए हर बात में उदारचित्त। मनसा में, वाचा में और कर्मणा में भी उदारचित बनना है। सम्पर्क में भी बनना है। बनते जा रहे हैं और बनते ही जाना है। जितना जो उदारचित होता है उतना वह आकर्षणमूर्त भी होता है। तो इसी प्रयत्न को आगे बढ़ा के प्रत्यक्षता में लाना है। मधुबन में रहते मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति को धारण करना है। यह है मधुबन का मुख्य लक्षण। इसको ही मधुबन कहा जाता है। बाहर रहते भी अगर यह लक्ष्य है तो गोया मधुबन निवासी हैं। जितना यहाँ रेस्पॉन्सिबिल्टी लेते हैं उतना वहाँ प्रजा द्वारा रेस्पेक्ट मिलेगा। सहयोग लेने के लिए स्नेही बनना है। सर्व के स्नेही, सर्व के सहयोगी। जितना जितना चक्रवर्ती बनेंगे उतना सर्व के सम्बन्ध में आ सकते हैं। इस ग्रुप को विशेष चक्रवर्ती बनना चाहिए। क्योंकि सर्व के सम्बन्ध में आने से सर्व को सहयोग दे भी सकेंगे और सर्व का सहयोग ले भी सकते हैं। हरेक आत्मा की विशेषता देखते सुनते, सम्पर्क में आते वह विशेषतायें स्वयं में आ जाती हैं। तो प्रैक्टिकल में सर्व का सहयोगी बनना है। इसके लिए पाण्डव सेना को चक्रवर्ती बनना पड़ेगा। योग की अग्नि सदैव जली रहे इसके लिए मन-वाणी-कर्म और सम्बन्ध, यह चारों बातों की रखवाली करना पड़े। फिर यह अग्नि अविनाशी रहेगी। बार-बार बुझायेंगे और जलायेंगे तो टाइम वेस्ट हो जायेगा और पद भी कम होगा। जितना स्नेह है उतनी शक्ति भी रखो। एक सेकेण्ड में आकारी और एक सेकेण्ड में साकारी बन सकते हो? यह भी आवश्यक सर्विस है। जैसे सर्विस के और अनेक साधन हैं वैसे यह प्रैक्टिस भी अनेक आत्माओं के कल्याण के लिए एक साधन है। इस सर्विस से कोई भी आत्मा को आकर्षित कर सकते हो। इसमें कुछ खर्चा भी नहीं है। कम खर्च वाला नशीन। ऐसी योजना बनाओ। अभी हरेक में कोई न कोई विशेष शक्ति है लेकिन सर्व शक्तियां आ जायेंगी तो फिर क्या बन जायेंगे? मास्टर सर्वशक्तिमान। सभी गुणों में श्रेष्ठ बनना है। इष्ट देवताओं में शर्वशक्तियां समान रूप में होती हैं। तो यह पुरुषार्थ करना है।
नीचे 27 जुलाई 1970 की मुरली को मूल विषयों और शब्दावली के आधार पर शीर्षकों में व्यवस्थित किया गया है। अंत में अभ्यास के लिए 30 छोटे प्रश्न-उत्तर दिए गए हैं।
अव्यक्त मुरली — 27 जुलाई 1970
अव्यक्त बनने के लिए मुख्य शक्तियों की धारणा
1. मुखड़े से चार लक्षणों का साक्षात्कार
बापदादा आज प्रत्येक आत्मा के मुखड़े में चार विशेष लक्षण देख रहे हैं:
- अव्यक्त-मूर्त
- आकर्षण-मूर्त
- अलौकिक-मूर्त
- हर्षित-मूर्त
जैसे दर्पण में स्थूल चेहरा दिखाई देता है, वैसे ही इन लक्षणों से अपनी आन्तरिक स्थिति का भी साक्षात्कार होता है।
सम्पूर्ण अवस्था में ये चारों लक्षण समान रूप से और प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देंगे। अभी किसी में कोई गुण विशेष रूप से दिखाई देता है, तो किसी में वह गुण कम या गुप्त है। जितने गुण प्रत्यक्ष होते जाएँगे, उतनी ही आत्मा की प्रत्यक्षता बढ़ती जाएगी।
इसलिए प्रत्येक को स्वयं से पूछना है कि इन चारों लक्षणों में मेरी स्थिति कहाँ तक पहुँची है।
2. पाण्डव सेना की भट्ठी का उद्देश्य
बापदादा पाण्डव सेना की भट्ठी के आरम्भ पर बताते हैं कि विशेष भट्ठी में आने का उद्देश्य केवल सुनना नहीं, बल्कि अपने अंदर नवीनता लाना है।
पाण्डव सेना को अपने कर्तव्य और लक्ष्य को पहचानकर विशेष शक्तियाँ धारण करनी हैं। पाण्डवों के कर्तव्य का यादगार पहले से प्रसिद्ध है; अब उसी पुरुषार्थ को व्यावहारिक जीवन में दोहराना है।
भट्ठी से लौटते समय अपने अंदर ऐसा परिवर्तन करके जाना है कि लक्ष्य केवल संकल्प में न रहे, बल्कि जीवन में दिखाई दे।
3. अव्यक्त बनने के लिए मुख्य शक्तियाँ
अव्यक्त बनने और अपने लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए मुरली में अनेक शक्तियों का वर्णन है। उनमें मुख्य शक्तियाँ हैं:
- सहन शक्ति — परिस्थितियों और व्यक्तियों के बीच धैर्य बनाए रखना।
- परखने की शक्ति — सही और गलत को पहचानना।
- विस्तार को छोटा करने की शक्ति — आवश्यकता पड़ने पर विस्तृत बात को सार में समेटना।
- छोटे को बड़ा करने की शक्ति — आवश्यकता के अनुसार किसी छोटी बात के महत्व और परिणाम को समझना।
- समेटने की शक्ति — विचारों और विस्तार को समेटकर सार में स्थित होना।
- समाने की शक्ति — बातों, परिस्थितियों और संस्कारों को आत्मसात करने की क्षमता।
- सामना करने की शक्ति — समस्याओं और चुनौतियों के सामने स्थिर रहना।
- निर्णय करने की शक्ति — उचित समय पर स्पष्ट निर्णय लेना।
- स्नेह और सहयोग की शक्ति — सभी को जोड़ना और सहयोगी बनाना।
इन शक्तियों को धारण करने से चारों मुख्य लक्षणों को प्रत्यक्ष करने में सहायता मिलती है।
4. रुहानियत और ईश्वरीय रुहाब
मुरली में दो बातें धारण करने और एक बात छोड़ने की शिक्षा दी गई है।
धारण करने वाली बातें हैं:
- रुहानियत — आत्मिकता और आत्मिक दृष्टिकोण।
- ईश्वरीय रुहाब — ईश्वरीय अधिकार और शक्ति की मर्यादापूर्ण अभिव्यक्ति।
छोड़ने वाली बातें हैं — रोब और नीचपना। अपने में विश्वास की कमी के कारण कई बार कार्य सिद्ध नहीं हो पाते। इसलिए आत्मविश्वास और ईश्वरीय निश्चय को मजबूत करना है।
इसके साथ-साथ बार-बार अलग-अलग रूप बदलने के बजाय एक अव्यक्त और अलौकिक रूप को स्थिर रखना है।
5. विश्व महाराजन बनने के लिए ताज और जिम्मेदारी
मुरली में तिलक और ताज का उदाहरण देकर भविष्य के ऊँचे पद की जिम्मेदारी समझाई गई है।
भट्ठी में आने वालों का लक्ष्य विश्व महाराजन बनना है। इसलिए केवल छोटा ताज धारण करके संतुष्ट नहीं होना है, बल्कि बड़े लक्ष्य के अनुरूप योग्यता और जिम्मेदारी भी धारण करनी है।
जितना बड़ा लक्ष्य होगा, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी निभाने की तैयारी करनी होगी।
विश्व महाराजन बनने का लक्ष्य अपने आप में यह प्रेरणा देता है कि अपने गुणों, शक्तियों और कर्तव्यों को उच्च स्तर तक विकसित करना है।
6. विशेष आत्मा बनना और संस्कारों को मिलाना
इस ग्रुप को विशेष आत्माओं का ग्रुप कहा गया है। प्रत्येक में कोई न कोई विशेष गुण है। अब उन विशेषताओं को और विकसित करना है।
एक-दूसरे के संस्कारों को मिलाने का अर्थ है कि विभिन्न स्वभावों के बीच स्नेह, सहयोग और समन्वय बनाए रखा जाए।
त्रिमूर्ति की कीचेन और चाबी की निशानी के माध्यम से सर्व शक्तियों को स्मृति में रखने की प्रेरणा दी गई है।
इन दोनों बातों को स्थिर रखने के लिए रचयिता और रचना का यथार्थ ज्ञान स्मृति में रहना आवश्यक बताया गया है।
7. सफलता-मूर्त बनने का अर्थ
मुरली में सफलता का अर्थ केवल किसी एक कार्य का पूरा हो जाना नहीं है। सफलता अर्थात सभी गुणों को धारण करने की दिशा में पूर्णता प्राप्त करना।
जो आत्मा सभी बातों में सफलता की ओर बढ़ती है, वह सफलता-मूर्त और सम्पूर्ण-मूर्त बनने का पुरुषार्थ करती है।
सफलता को सामने रखकर कार्य करने से समस्याओं को बदलने और उनका सामना करने की शक्ति आती है।
सफलता के सितारे बनने का अर्थ है कि प्रत्येक कार्य में गुणों और शक्तियों को व्यावहारिक रूप से प्रत्यक्ष करना।
8. समीप सितारों की निशानी — समानता
जो बापदादा के समीप हैं, उनके गुण और कर्तव्य भी बापदादा के समान दिखाई देने चाहिए।
जितनी समीपता होगी, उतनी समानता दिखाई देगी। ऐसे आत्माओं का मुखड़ा बापदादा का परिचय देने वाला दर्पण बन जाता है।
उनके व्यवहार और कर्म को देखकर दूसरों का आकर्षण बापदादा की ओर जाता है। इसी भाव को मुरली में “सन शोज़ फादर” कहा गया है।
सच्चा स्नेह गुप्त नहीं रह सकता। जिसके प्रति स्नेह होता है, उसके गुणों और संस्कारों की छाप स्नेही के हर कदम में दिखाई देती है।
9. आकर्षण-मूर्त बनने की विधि
आकर्षण-मूर्त बनने के लिए आकारी रूपधारी बनकर साकारी कर्तव्य करना आवश्यक बताया गया है।
इसके लिए दो विशेष लक्षण धारण करने हैं:
- अन्तर्मुखी बनना।
- एकान्तवासी बनना।
अन्तर्मुखता से अपने संकल्पों और संस्कारों को देखने का अभ्यास होता है। एकान्तवासी बनने से आत्मिक स्थिति को मजबूत करने में सहायता मिलती है।
स्नेह के साथ गुणों की समानता और हर्षित अवस्था भी आवश्यक है। जितना कोई हर्षित-मूर्त होगा, उतना ही आकर्षण-मूर्त बनने की सम्भावना बढ़ेगी।
10. उदारचित्त बनने से सर्व का उद्धार
मुरली में सेवा की सफलता के लिए उदारचित्त गुण को विशेष महत्व दिया गया है।
जितना कोई उदारचित्त होगा, उतना ही दूसरों के उद्धार का निमित्त बन सकेगा। उदारचित्त होने से दूसरों का सहयोग लेने और उन्हें सहयोग देने की पात्रता बढ़ती है।
उदारता केवल विचारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे चारों स्तरों पर धारण करना है:
- मनसा — संकल्पों में।
- वाचा — वाणी में।
- कर्मणा — कर्मों में।
- सम्पर्क — व्यवहार और सम्बन्धों में।
उदारचित्तता से आकर्षण-मूर्त बनने में भी सहायता मिलती है।
11. मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति
मुरली में मधुबन के दो मुख्य लक्षण बताए गए हैं:
- मधुरता।
- बेहद की वैराग्य वृत्ति।
इन गुणों को केवल मधुबन में रहते हुए ही नहीं, बल्कि बाहर रहते हुए भी धारण किया जा सकता है। यदि व्यक्ति का लक्ष्य मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति है, तो वह अपने व्यवहार में मधुबन के संस्कार प्रकट कर सकता है।
जितनी जिम्मेदारी निभाई जाएगी, उतना ही भविष्य में सम्मान प्राप्त होने का आधार बनेगा।
सहयोग लेने के लिए स्नेही बनना आवश्यक है। लक्ष्य है — सर्व के स्नेही और सर्व के सहयोगी बनना।
12. चक्रवर्ती बनना — सर्व से सम्बन्ध और सहयोग
मुरली में इस ग्रुप को विशेष चक्रवर्ती बनने की प्रेरणा दी गई है।
चक्रवर्ती बनने का भाव है कि सभी के सम्बन्ध में आकर सभी को सहयोग दिया जाए और सभी का सहयोग लिया जाए।
हर आत्मा की विशेषता को देखकर, सुनकर और उसके सम्पर्क में आकर अपनी विशेषताओं को भी विकसित किया जा सकता है।
इसलिए पाण्डव सेना को व्यावहारिक रूप से सर्व का सहयोगी बनना है। केवल अपने गुणों को विकसित करना ही नहीं, बल्कि दूसरों की विशेषताओं को पहचानना और उनसे सीखना भी आवश्यक है।
13. योग की अग्नि को अविनाशी रखना
योग की अग्नि को निरन्तर जलाए रखने के लिए चार बातों की रखवाली करनी है:
- मन।
- वाणी।
- कर्म।
- सम्बन्ध।
यदि बार-बार योग की अग्नि बुझती और फिर जलानी पड़ती है, तो समय व्यर्थ होता है। इसलिए अपने संकल्पों, बोल, कर्म और सम्बन्धों को श्रेष्ठ बनाकर योग की निरन्तरता बनाए रखनी है।
मुरली में यह भी प्रेरणा दी गई है कि जितना स्नेह है, उतनी शक्ति भी धारण करनी चाहिए।
14. एक सेकण्ड में आकारी और साकारी बनने का अभ्यास
मुरली में एक महत्वपूर्ण अभ्यास बताया गया है — क्या एक सेकण्ड में आकारी और एक सेकण्ड में साकारी बन सकते हैं?
इसका भाव है कि आवश्यकता के अनुसार आत्मिक स्थिति में स्थित होना और फिर साकार कर्म में आ जाना सहज हो।
यह भी एक प्रकार की सेवा है। इस अभ्यास से अनेक आत्माओं के कल्याण के लिए साधन बन सकता है।
इसके लिए विशेष खर्च या बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं; नियमित अभ्यास और स्मृति की आवश्यकता है।
15. मास्टर सर्वशक्तिमान बनने का लक्ष्य
प्रत्येक आत्मा में कोई न कोई विशेष शक्ति होती है। लेकिन लक्ष्य केवल एक या दो शक्तियों तक सीमित रहना नहीं है।
सभी शक्तियों को धारण करके मास्टर सर्वशक्तिमान बनना है। मुरली में इष्ट देवताओं की समान रूप से सर्व शक्तियों से सम्पन्न अवस्था का उदाहरण दिया गया है।
इसलिए अपने विशेष गुण को पहचानकर अन्य गुणों और शक्तियों को भी विकसित करना है।
16. आत्म-चेकिंग: मैं कितना अव्यक्त और आकर्षण-मूर्त बना हूँ?
प्रतिदिन स्वयं से पूछें:
- क्या मेरे मुखड़े से अव्यक्त, आकर्षण, अलौकिक और हर्षित अवस्था दिखाई देती है?
- क्या मैं सहन और परखने की शक्ति का प्रयोग करता हूँ?
- क्या आवश्यकता पड़ने पर विस्तार को समेट सकता हूँ?
- क्या मैं परिस्थितियों का सामना करके उचित निर्णय लेता हूँ?
- क्या मेरे व्यवहार में रुहानियत है?
- क्या मैं रोब और हीनभावना छोड़ने का पुरुषार्थ करता हूँ?
- क्या मैं दूसरों के संस्कारों के साथ समन्वय बना सकता हूँ?
- क्या मेरे कर्म बापदादा के गुणों का परिचय देते हैं?
- क्या मैं मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्पर्क में उदारचित्त हूँ?
- क्या मेरे मन, वाणी, कर्म और सम्बन्ध योग की अग्नि को स्थिर रखने में सहायक हैं?
निष्कर्ष
27 जुलाई 1970 की मुरली का मुख्य संदेश है कि अव्यक्त बनने के लिए केवल एक शक्ति पर्याप्त नहीं है। सहन, परख, समेटने, समाने, सामना करने, निर्णय करने और सर्व को स्नेह-सहयोग से जोड़ने जैसी शक्तियों को धारण करना आवश्यक है।
अव्यक्त, आकर्षण, अलौकिक और हर्षित — ये चारों लक्षण जीवन में प्रत्यक्ष होने चाहिए। रुहानियत, उदारचित्तता, मधुरता, बेहद की वैराग्य वृत्ति और सर्व के सहयोगी बनने का गुण इस लक्ष्य को सहज बनाने में सहायक हैं।
अन्तिम लक्ष्य है — सभी गुणों और शक्तियों को समान रूप से धारण करके मास्टर सर्वशक्तिमान बनना।
छोटे प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. बापदादा मुखड़े में कौन-से चार लक्षण देखते हैं?
उत्तर: अव्यक्त-मूर्त, आकर्षण-मूर्त, अलौकिक-मूर्त और हर्षित-मूर्त।
प्रश्न 2. सम्पूर्ण अवस्था में इन चार लक्षणों की क्या विशेषता होगी?
उत्तर: ये सभी लक्षण समान और प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देंगे।
प्रश्न 3. पाण्डव सेना की भट्ठी का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: विशेष शक्तियाँ धारण करके अपने लक्ष्य को व्यावहारिक रूप में पूरा करना।
प्रश्न 4. अव्यक्त बनने के लिए कौन-सी मुख्य शक्तियाँ बताई गई हैं?
उत्तर: सहन, परखने, विस्तार को छोटा करने, छोटे को बड़ा करने, समेटने, समाने, सामना करने, निर्णय करने तथा स्नेह-सहयोग की शक्तियाँ।
प्रश्न 5. रुहानियत के साथ क्या धारण करना है?
उत्तर: ईश्वरीय रुहाब।
प्रश्न 6. किन बातों को छोड़ने की शिक्षा दी गई है?
उत्तर: रोब और नीचपना।
प्रश्न 7. भट्ठी में आने वालों का ऊँचा लक्ष्य क्या है?
उत्तर: विश्व महाराजन बनना।
प्रश्न 8. एक-दूसरे के संस्कारों को मिलाने का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्नेह, सहयोग और समन्वय बनाए रखना।
प्रश्न 9. सफलता-मूर्त बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: सभी गुणों को धारण करके सफलता को व्यावहारिक रूप में प्रत्यक्ष करना।
प्रश्न 10. समीप सितारों की मुख्य निशानी क्या है?
उत्तर: बापदादा के गुण और कर्तव्य उनमें प्रत्यक्ष दिखाई देना।
प्रश्न 11. “सन शोज़ फादर” का क्या भाव है?
उत्तर: बच्चों के गुणों और कर्मों से बापदादा का परिचय मिलना।
प्रश्न 12. स्नेह की पहचान क्या है?
उत्तर: स्नेह की छाप व्यवहार और हर कदम में दिखाई देती है।
प्रश्न 13. आकर्षण-मूर्त बनने के लिए कौन-से दो लक्षण धारण करने हैं?
उत्तर: अन्तर्मुखी और एकान्तवासी बनना।
प्रश्न 14. सेवा की सफलता के लिए किस गुण को विशेष महत्व दिया गया है?
उत्तर: उदारचित्तता।
प्रश्न 15. उदारचित्तता किन चार स्तरों पर होनी चाहिए?
उत्तर: मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्पर्क में।
प्रश्न 16. मधुबन के दो मुख्य लक्षण कौन-से हैं?
उत्तर: मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति।
प्रश्न 17. सर्व का स्नेही बनने के साथ क्या बनना है?
उत्तर: सर्व का सहयोगी।
प्रश्न 18. चक्रवर्ती बनने का व्यावहारिक भाव क्या है?
उत्तर: सर्व से सम्बन्ध रखकर सहयोग देना और लेना।
प्रश्न 19. योग की अग्नि को अविनाशी रखने के लिए किन चार बातों की रखवाली करनी है?
उत्तर: मन, वाणी, कर्म और सम्बन्ध।
प्रश्न 20. स्नेह के साथ क्या आवश्यक है?
उत्तर: उतनी ही शक्ति धारण करना।
प्रश्न 21. आकारी और साकारी बनने का अभ्यास कैसा बताया गया है?
उत्तर: एक सेकण्ड में आकारी और एक सेकण्ड में साकारी बनने का।
प्रश्न 22. प्रत्येक आत्मा में क्या विशेषता होती है?
उत्तर: कोई न कोई विशेष शक्ति।
प्रश्न 23. विशेष शक्ति के बाद अगला लक्ष्य क्या है?
उत्तर: सभी शक्तियों को धारण करना।
प्रश्न 24. मास्टर सर्वशक्तिमान बनने के लिए क्या करना है?
उत्तर: सभी शक्तियों और गुणों को श्रेष्ठ रूप में धारण करना।
प्रश्न 25. विशेष आत्माओं के ग्रुप की पहचान क्या है?
उत्तर: प्रत्येक में विशेष गुण होना और उन्हें विकसित करना।
प्रश्न 26. उदारचित्त व्यक्ति किस कार्य का निमित्त बन सकता है?
उत्तर: सर्व आत्माओं के उद्धार का।
प्रश्न 27. हर्षित-मूर्त बनने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: आकर्षण-मूर्त बनने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 28. सर्व का सहयोगी बनने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: दूसरों की विशेषताओं को पहचानना और स्वयं भी गुण धारण करना।
प्रश्न 29. योग की अग्नि बार-बार बुझने से क्या हानि होती है?
उत्तर: समय व्यर्थ होता है।
प्रश्न 30. इस मुरली का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर: चारों लक्षण प्रत्यक्ष करके सभी मुख्य शक्तियों को धारण करना और मास्टर सर्वशक्तिमान बनना।
मूल मुरली के अनुसार शब्दावली मिलाएँदोहराए गए विचारों को संक्षिप्त करें
📝 72. अव्यक्त मुरली | 27 July 1970
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