| 12-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
“मीठे बच्चे – तुम बहुत ऊंच जाति के हो, तुम्हें ब्राह्मण से देवता बनना है इसलिए गन्दी विकारी आदतों को मिटा देना है”
| “मीठे बच्चे – तुम बहुत ऊंच जाति के हो, तुम्हें ब्राह्मण से देवता बनना है इसलिए गन्दी विकारी आदतों को मिटा देना है” | |
| प्रश्नः- | किस बात का कनेक्शन इस पढ़ाई से नहीं है? |
| उत्तर:- | ड्रेस आदि का कनेक्शन इस पढ़ाई से नहीं है, इसमें कोई ड्रेस बदलने की बात ही नहीं। बाप तो आत्माओं को पढ़ाते हैं। आत्मा जानती है यह पुराना पतित शरीर है, इसको कैसा भी हल्का सल्का कपड़ा पहनाओ, हर्जा नहीं। शरीर और आत्मा दोनों ही काले हैं। बाप काले (सांवरे) को ही गोरा बनाते हैं। |
ओम् शान्ति। रूहानी बाप के सामने रूहानी बच्चे बैठे हैं, रूहानी पाठशाला में। यह जिस्मानी पाठशाला नहीं है। रूहानी पाठशाला में रूहानी बाप बैठ राजयोग सिखला रहे हैं, रूहानी बच्चों को। तुम बच्चे जानते हो हम फिर से नर से नारायण अथवा देवी-देवता पद प्राप्त करने के लिए रूहानी बाप के पास बैठे हैं। यह है नई बात। यह भी तुम जानते हो लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, वे डबल सिरताज थे। लाइट का ताज और रतन जड़ित ताज दोनों थे। पहले-पहले होता है लाइट का ताज, जो होकर गये उनको सफेद लाइट दिखाते हैं। यह है पवित्रता की निशानी। अपवित्र को कभी लाइट नहीं दिखायेंगे। तुम्हारा फोटो निकालें तो लाइट नहीं दे सकते। यह पवित्रता की निशानी देते हैं। लाइट और डार्क। ब्रह्मा का दिन लाइट, ब्रह्मा की रात डार्क। डार्क अर्थात् उन पर लाइट नहीं है। तुम बच्चे जानते हो – बाप ही आकर, इतने जो पतित अर्थात् डार्क ही डार्क हैं, उनको पावन बनाते हैं। अब तो पवित्र राजधानी है नहीं। सतयुग में थे यथा राजा रानी तथा प्रजा, सब पवित्र थे। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। इस चित्र पर तुम बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाना है। यह है तुम्हारी एम आब्जेक्ट। समझाने के लिए और भी अच्छे चित्र हैं इसलिए इतने चित्र रखे जाते हैं। मनुष्य कोई फट से समझते नहीं हैं कि हम इस याद की यात्रा से तमोप्रधान से सतोप्रधान बनेंगे, फिर मुक्ति वा जीवनमुक्ति में चले जायेंगे। दुनिया में किसको पता नहीं कि जीवनमुक्ति किसको कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण का राज्य कब था – यह भी किसको पता नहीं है। अब तुम जानते हो हम बाप से पवित्रता का दैवी स्वराज्य ले रहे हैं। चित्रों पर तुम अच्छी रीति समझा सकते हो। भारत में ही डबल सिरताज वालों की पूजा करते हैं। ऐसा चित्र भी सीढ़ी में है। वह ताज है परन्तु लाइट का ताज नहीं है। पवित्र की ही पूजा होती है। लाइट है पवित्रता की निशानी। बाकी ऐसे नहीं कि कोई तख्त पर बैठने से ही लाइट निकलती है। नहीं, यह पवित्रता की निशानी है। तुम अब पुरुषार्थी हो इसलिए तुम पर लाइट नहीं दे सकते हैं। देवी-देवताओं की आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं। यहाँ तो कोई का पवित्र शरीर है नहीं इसलिए लाइट दे नहीं सकते। तुम्हारे में कोई तो पूरा पवित्र रहते हैं। कोई फिर सेमी पवित्र रहते हैं। माया के तूफान बहुत आते हैं तो उनको सेमी पवित्र कहेंगे। कोई तो एकदम पतित बन पड़ते हैं। खुद भी समझते हैं हम पतित बन गये हैं। आत्मा ही पतित बनती है, उनको लाइट दे नहीं सकते।
तुम बच्चों को यह भूलना नहीं चाहिए कि हम ऊंच ते ऊंच बाप के बच्चे हैं, तो कितनी रॉयल्टी होनी चाहिए। समझो कोई मेहतर है, वह एम.एल.ए. वा एम.पी. बन जाते हैं अथवा पढ़ाई करके कोई पोजीशन पा लेते हैं तो टिपटॉप हो जाते हैं। ऐसे बहुत हो गये हैं। जाति भल वही है – परन्तु पोजीशन मिलने से नशा चढ़ जाता है। फिर ड्रेस आदि भी ऐसी ही पहनेंगे। वैसे अब तुम भी पढ़ रहे हो, पतित से पावन बनने के लिए। वह भी पढ़ाई से डॉक्टर, बैरिस्टर आदि बनते हैं। परन्तु पतित तो हैं ना क्योंकि उन्हों की पढ़ाई कोई पावन बनने के लिए नहीं है। तुम तो जानते हो हम भविष्य में पवित्र देवी-देवता बनते हैं, तो शूद्रपने की आदतें मिटती जायेंगी। अन्दर में यह नशा रहना चाहिए कि हमको परमपिता परमात्मा डबल सिरताज बनाते हैं। हम शूद्र से ब्राह्मण बनते हैं फिर देवता बनेंगे तो फिर वह गन्दी विकारी आदतें मिट जाती हैं। आसुरी चीज़ें सब छोड़नी पड़ें। मेहतर से एम.पी. बन जाते हैं तो रहन-सहन मकान आदि सब फर्स्टक्लास बन जाते हैं। उन्हों का तो है इस समय के लिए। तुम तो जानते हो कि हम भविष्य में क्या बनने वाले हैं। अपने साथ ऐसी-ऐसी बातें करनी चाहिए। हम क्या थे, हम अभी क्या बने हैं। तुम भी शूद्र जाति के थे, अब विश्व के मालिक बनते हो। जब कोई ऊंच पद पाता है तो फिर वह फ़खुर रहता है। तो तुम भी थे कौन? (पतित) छी-छी थे। अब तुमको भगवान पढ़ाकर बेहद का मालिक बनाते हैं। यह भी तुम समझते हो परमपिता परमात्मा जरूर यहाँ ही आकर राजयोग सिखलायेंगे। मूलवतन वा सूक्ष्मवतन में तो नहीं सिखलायेंगे। दूरदेश के रहने वाली आत्मायें तुम सब हो, यहाँ आकर पार्ट बजाती हो। 84 जन्मों का पार्ट बजाना ही है। वह तो कह देते हैं 84 लाख योनियाँ। कितना घोर अन्धियारे में हैं। अभी तुम समझते हो – 5 हजार वर्ष पहले हम देवी-देवता थे। अब तो पतित बन गये हैं। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ, हमको पावन बनाओ। परन्तु समझते नहीं हैं। अभी बाप स्वयं पावन बनाने आये हैं। राजयोग सिखा रहे हैं। पढ़ाई बिगर कोई ऊंच पद पा नहीं सकते। तुम जानते हो बाबा हमको पढ़ाकर नर से नारायण बनाते हैं। एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। प्रजा पद कोई एम आब्जेक्ट नहीं है। चित्र भी लक्ष्मी-नारायण का है। ऐसे चित्र कहाँ रख पढ़ाते होंगे? तुम्हारी बुद्धि में सारी नॉलेज है। हम 84 जन्म ले पतित बने हैं। सीढ़ी का चित्र बड़ा अच्छा है। यह पतित दुनिया है ना, इसमें साधू सन्त सब आ जाते हैं। वह खुद भी गाते रहते हैं पतित-पावन आओ। पतित दुनिया को पावन दुनिया नहीं कहेंगे। नई दुनिया है पावन दुनिया। पुरानी पतित दुनिया में कोई पावन रह न सके।
अभी तुम बच्चों को कितना नशा रहना चाहिए, हम गॉड फादरली स्टूडेन्ट हैं, ईश्वर हमको पढ़ाते हैं। गरीबों को ही बाप आकर पढ़ाते हैं। गरीबों के कपड़े आदि मैले होते हैं ना। तुम्हारी आत्मा तो पढ़ती है ना। आत्मा जानती है यह पुराना शरीर है। इनको तो हल्का सल्का कोई भी कपड़ा पहनाया तो हर्जा नहीं है। इसमें कोई ड्रेस आदि बदलने की वा भभका करने की बात नहीं है। ड्रेस के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं। बाप तो आत्माओं को पढ़ाते हैं। शरीर तो पतित है, इन पर कितना भी अच्छा कपड़ा पहनो। परन्तु आत्मा और शरीर पतित है ना। श्रीकृष्ण को सांवरा दिखाते हैं ना। उनकी आत्मा और शरीर दोनों काले थे। गाँवड़े का छोरा था, तुम सब गांवड़े के छोरे थे। दुनिया में मनुष्य मात्र निधनके हैं। बाप को जानते ही नहीं। हद का बाप तो सबको है। बेहद का बाप तुम ब्राह्मणों को ही मिला है। अब बेहद का बाप तुमको राजयोग सिखला रहे हैं। भक्ति और ज्ञान। भक्ति का जब अन्त हो तब फिर बाप आकर ज्ञान दे। अभी है अन्त। सतयुग में यह कुछ भी होता नहीं। अभी पुरानी दुनिया का विनाश आकर पहुँचा है। पावन दुनिया को स्वर्ग कहा जाता है। चित्रों में कितना क्लीयर समझाया जाता है। राधे कृष्ण ही फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। यह भी किसको पता नहीं है। तुम जानते हो दोनों ही अलग-अलग राजधानी के थे। तुमने स्वर्ग का स्वयंवर भी देखा है। पाकिस्तान में तुम बच्चों को बहलाने के लिए सब साज़ थे, सब साक्षात्कार तुमको होते थे।
अभी तुम जानते हो – हम राजयोग सीख रहे हैं, यह भूलना नहीं चाहिए। भल रसोई का काम करते हैं अथवा बर्तन मांजते हैं परन्तु पढ़ती तो सबकी आत्मा है ना। यहाँ सब आकर बैठते हैं इसलिए बड़े-बड़े आदमी आते नहीं हैं – समझते हैं यहाँ तो सब गरीब ही हैं, इसलिए लज्जा आती है। बाप तो है ही गरीब निवाज़। कोई-कोई सेन्टर्स पर मेहतर भी आते हैं। कोई मुसलमान भी आते हैं। बाप कहते हैं – देह के सब धर्म छोड़ो। हम गुजराती हैं, हम फलाना हैं – यह सब देह-अभिमान है। यहाँ तो आत्माओं को परमात्मा पढ़ाते हैं। बाप कहते हैं – मैं आया भी हूँ साधारण तन में। तो साधारण के पास साधारण ही आयेंगे। यह तो समझते हैं यह तो जौहरी था। बाप खुद रिमाइन्ड कराते हैं कि कल्प पहले भी हमने कहा था कि हम साधारण बूढ़े तन में आता हूँ। बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्तिम जन्म में मैं प्रवेश करता हूँ। इनको कहते हैं कि तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। सिर्फ एक अर्जुन को तो घोड़े गाड़ी के रथ में बैठ ज्ञान नहीं दिया ना, उसे पाठशाला नहीं कहा जायेगा। न युद्ध का मैदान है, यह पढ़ाई है। बच्चों को पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना चाहिए। हमको पूरा पढ़कर डबल सिरताज बनना है। अभी तो कोई ताज नहीं है। भविष्य में डबल ताजधारी बनना है। द्वापर से लाइट चली जाती है तो फिर सिंगल ताज रहता है। सिंगल ताज वाले डबल ताज वालों को पूजते हैं। यह भी निशानी जरूर होनी चाहिए। बाबा चित्रों के लिए डायरेक्शन देते रहते हैं तो चित्र बनाने वालों को तो मुरली पर बहुत अटेन्शन देना पड़े। चित्रों पर किसी को भी समझाना बड़ा सहज होता है। जैसे कॉलेज में नक्शे पर दिखायेंगे तो बुद्धि में आ जायेगा। यूरोप उस तरफ है, आइलैण्ड है, लण्डन उस तरफ है। नक्शा ही नहीं देखा होगा तो उनको क्या पता यूरोप कहाँ है। नक्शा देखने से झट बुद्धि में आ जायेगा। अब तुम जानते हो ऊपर में हैं पूज्य डबल सिरताज देवी-देवतायें। फिर नीचे आते हैं तो पुजारी बनते हैं। सीढ़ी उतरते हैं ना। यह सीढ़ी तो बड़ी सहज है। जो कोई भी समझ सकते। परन्तु कोई-कोई की बुद्धि में कुछ बैठता ही नहीं है। तकदीर ही ऐसी है। स्कूल में पास, नापास तो होते ही हैं। तकदीर में नहीं है तो पुरुषार्थ भी नहीं होता, बीमार पड़ जाते हैं। पढ़ न सके। कोई तो पूरा पढ़ते हैं। परन्तु फिर भी वह है जिस्मानी पढ़ाई, यह है रूहानी पढ़ाई। इसके लिए सोने की बुद्धि चाहिए। बाप सोना जो एवर प्योर है, उसको याद करने से तुम्हारी आत्मा सोनी बनती जायेगी। कहा जाता है कि यह तो जैसे एकदम ठिक्कर बुद्धि हैं। वहाँ ऐसे नहीं कहेंगे। वह तो स्वर्ग था। यह भूल गये हैं कि भारत स्वर्ग था। यह भी कहाँ प्रदर्शनी में समझा सकते हो, फिर रिपीट भी करा सकते हो। प्रोजेक्टर में यह नहीं हो सकता है। पहले-पहले तो यह त्रिमूर्ति, लक्ष्मी-नारायण और सीढ़ी का चित्र बहुत जरूरी है। यह लक्ष्मी-नारायण के चित्र में सारा 84 जन्मों का नॉलेज आ जाता है। बच्चों का सारा दिन यही चिंतन चलना चाहिए। हर एक सेन्टर में मुख्य चित्र तो जरूर रखने हैं। चित्रों पर अच्छा समझ सकेंगे। ब्रह्मा द्वारा यह राजधानी स्थापन हो रही है। हम हैं प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ। आगे हम शूद्र वर्ण के थे, अभी हम ब्राह्मण वर्ण के बने हैं फिर देवता बनना है। शिव-बाबा हमको शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। हमारी एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे फिर यह सीढ़ी कैसे उतरे। क्या से क्या बन जाते हैं। एकदम जैसे बुद्धू बन जाते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण भारत में राज्य करते थे। भारतवासियों को पता होना चाहिए ना। फिर क्या हुआ, कहाँ चले गये। क्या इन्हों पर कोई ने जीत पाई? उन्होंने लड़ाई में कोई को हराया? न कोई से जीता, न हारा। यह तो सारी माया की बात है। रावण राज्य शुरू हुआ और 5 विकारों में गिर राजाई गँवाई, फिर 5 विकारों पर जीत पाने से वह बनते हैं। अभी है रावण राज्य का भभका। हम गुप्त रीति अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। तुम कितने साधारण हो। पढ़ाने वाला कितना ऊंच ते ऊंच है और निराकार बाप पतित शरीर में आकर बच्चों को ऐसा (लक्ष्मी-नारायण) बनाते हैं। दूरदेश से पतित दुनिया पतित शरीर में आते हैं। सो भी अपने को लक्ष्मी-नारायण नहीं बनाते, तुम बच्चों को बनाते हैं। परन्तु पूरा पुरुषार्थ नहीं करते हो बनने के लिए। दिन-रात पढ़ना और पढ़ाना है। बाबा दिन प्रतिदिन बड़ी सहज युक्तियाँ समझाते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण से ही शुरू करना चाहिए। उन्हों ने 84 जन्म कैसे लिये। फिर अन्तिम जन्म में पढ़ रहे हैं फिर उन्हों की डिनायस्टी बनती है। कितनी समझाने की बातें हैं। चित्रों के लिए बाबा डायरेक्शन देते हैं। कोई चित्र तैयार किया, झट बाबा के पास भाग आना चाहिए। बाबा करेक्शन कर सब डायरेक्शन दे देंगे।
बाबा कहते मैं सांवलशाह हूँ, हुण्डी भर जायेगी। कोई बात की परवाह नहीं है। इतने ढेर बच्चे बैठे हैं। बाबा जानते हैं किससे हुण्डी भरा सकते हैं। बाबा का ख्याल है जयपुर को जोर से उठाना है। वहाँ ही हठयोगियों का म्यूजियम है। तुम्हारा फिर राजयोग का म्यूजियम ऐसा अच्छा बना हुआ हो जो कोई भी आकर देखे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पवित्र ज्ञान को बुद्धि में धारण करने के लिए अपने बुद्धि रूपी बर्तन को सोने का बनाना है। याद से ही बर्तन सोने का होगा।
2) अभी ब्राह्मण बने हैं इसलिए शूद्रपने की सब आदतें मिटा देनी हैं। बहुत रॉयल्टी से रहना है। हम विश्व के मालिक बन रहे हैं – इस नशे में रहना है।
| वरदान:- | संगमयुग पर एक का सौगुणा प्रत्यक्षफल प्राप्त करने वाले पदमापदम भाग्यशाली भव संगमयुग ही एक का सौगुणा प्रत्यक्षफल देने वाला है, सिर्फ एक बार संकल्प किया कि मैं बाप का हूँ, मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् हूँ तो मायाजीत बनने का, विजयी बनने के नशे का अनुभव होता है। श्रेष्ठ संकल्प करना – यही है बीज और उसका सबसे बड़ा फल है जो स्वयं परमात्मा बाप भी साकार मनुष्य रूप में मिलने आता, इस फल में सब फल आ जाते हैं। |
| स्लोगन:- | सच्चे ब्राह्मण वह हैं जिनकी सूरत और सीरत से प्योरिटी की पर्सनैलिटी वा रॉयल्टी का अनुभव हो। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
वर्तमान समय अनेक आत्माओं में स्व-उपकार करने की इच्छा है लेकिन हिम्मत और शक्ति नहीं है। ऐसी निर्बल आत्माओं का उपकार करने वाले आप पर-उपकारी बच्चे निमित्त हो। तो उपकार सच्चे दिल से होता है। विश्व राज्य अधिकारी बनना है तो स्व-उपकारी के साथ, पर-उपकारी बनो।
12 अक्टूबर 2026 — आज की मुरली मंथन
साकार मुरली | ब्राह्मण से देवता बनने की सच्ची पढ़ाई
ड्रेस नहीं, संस्कार बदलो! — ब्राह्मण से देवता बनने की सच्ची पढ़ाई
मुख्य संदेश: बाहरी रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण है आत्मिक पवित्रता, श्रेष्ठ संस्कार और रूहानी रॉयल्टी।
1. मुख्य प्रश्न
क्या मैं बाहरी रूप पर अधिक ध्यान देता हूँ, या अपनी आत्मिक स्थिति और आदतों को बदलने पर?
आज की साकार मुरली का मुख्य संदेश है कि परमात्मा की पढ़ाई आत्मा के परिवर्तन के लिए है। केवल कपड़े, सजावट या बाहरी रहन-सहन बदलना इस पढ़ाई का लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य है—विकारी आदतों को मिटाना, पवित्र बनना और अपने संस्कारों को श्रेष्ठ बनाना।
2. आज की मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
1. रूहानी पढ़ाई का विद्यार्थी कौन है?
मूल मुरली की बात: रूहानी बाप रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। यह जिस्मानी पाठशाला नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति की पढ़ाई है।
मंथन: शरीर पढ़ाई का आधार है, लेकिन अपने ज्ञान, योग और संस्कारों में परिवर्तन आत्मा को करना है। इसलिए ध्यान केवल बाहरी पहचान पर नहीं, अपने आंतरिक विकास पर होना चाहिए।
2. ड्रेस नहीं, विकारी आदतें बदलनी हैं
मूल मुरली की बात: बाबा स्पष्ट करते हैं कि ड्रेस आदि का इस पढ़ाई से सीधा सम्बन्ध नहीं है और ड्रेस बदलना इसका उद्देश्य नहीं है। बच्चों को शूद्रपने की आदतें और विकारी प्रवृत्तियाँ मिटानी हैं।
मंथन: किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति का आकलन सिर्फ उसके कपड़ों से नहीं किया जा सकता। वास्तविक परिवर्तन उसके विचारों, आदतों, व्यवहार और पवित्रता में दिखाई देना चाहिए।
3. रूहानी रॉयल्टी क्या है?
मूल मुरली की बात: ऊँचे ते ऊँचे बाप के बच्चे होने के नाते अपनी रॉयल्टी बनाए रखनी है। यह रॉयल्टी भविष्य में पवित्र देवी-देवता बनने के लक्ष्य से जुड़ी है।
मंथन: रॉयल्टी का अर्थ केवल महँगे कपड़े या भव्य रहन-सहन नहीं है। आत्मसम्मान, शुद्धता, संयम और श्रेष्ठ व्यवहार भी आंतरिक रॉयल्टी के अंग हैं।
4. याद और पढ़ाई से परिवर्तन
मूल मुरली की बात: बाबा राजयोग और पढ़ाई के माध्यम से पतित से पावन बनने तथा ऊँचा पद प्राप्त करने की शिक्षा देते हैं। मुरली में लक्ष्मी-नारायण को एम ऑब्जेक्ट के रूप में रखा गया है।
मंथन: लक्ष्य को सामने रखने का अर्थ है कि प्रतिदिन अपने पुरुषार्थ की दिशा जाँचें। क्या हमारे विचार, आदतें और कर्म उस लक्ष्य के अनुरूप बन रहे हैं?
5. आत्मा को पवित्र बनाना ही असली श्रृंगार
मूल मुरली की बात: धारणा में बुद्धि रूपी बर्तन को याद से सोने का बनाने और शूद्रपने की आदतें मिटाकर रॉयल्टी से रहने की बात आती है।
मंथन: आध्यात्मिक श्रृंगार कोई बाहरी आभूषण नहीं, बल्कि ऐसे गुण हैं जो हमारे व्यवहार में दिखाई दें—पवित्रता, विनम्रता, धैर्य और दूसरों के प्रति कल्याण की भावना।
6. स्वयं का उपकार और परोपकार
मूल मुरली के अव्यक्त इशारे: स्वयं का उपकार करने के साथ दूसरों का उपकार करने वाला बनने की प्रेरणा दी गई है।
मंथन: अपनी कमजोरियों को बदलना स्व-उपकार है; दूसरे की उन्नति में सहयोग देना पर-उपकार है। दोनों को साथ लेकर चलना आध्यात्मिक जीवन को उपयोगी बनाता है।
3. तुलनात्मक अध्ययन — बाहरी ड्रेस और आंतरिक पवित्रता
आज की मुरली से हमने एक मुख्य बात चुनी है: वास्तविक परिवर्तन बाहरी ड्रेस में नहीं, बल्कि आत्मिक स्थिति और संस्कारों में होना चाहिए।
मुरली 1 — 9 जनवरी 1980, अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “अलौकिक ड्रेस और अलौकिक श्रृंगार”
मूल मुरली की बात: इस अव्यक्त मुरली में बाबा “ड्रेस” और “श्रृंगार” को आध्यात्मिक स्थितियों, श्रेष्ठ गुणों और अलग-अलग सेवाओं के अनुरूप धारण किए जाने वाले स्वरूपों के रूप में समझाते हैं। देह-अभिमान, देह के सम्बन्धों का लगाव और दूसरों के अवगुण ग्रहण करना खराब ड्रेस के रूपक से समझाए गए हैं।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 12 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली में बाहरी कपड़ों को पढ़ाई का मुख्य आधार नहीं बताया गया है। 9 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली में “ड्रेस” का प्रयोग आध्यात्मिक गुणों और स्थिति के रूपक के रूप में किया गया है।
इसलिए दोनों को विरोधाभासी मानना उचित नहीं। एक मुरली बाहरी पहनावे को आध्यात्मिक शिक्षा का लक्ष्य नहीं मानती; दूसरी “ड्रेस” शब्द के माध्यम से आंतरिक गुणों को धारण करने की प्रेरणा देती है।
9 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2 — 23 जनवरी 1980, अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “पवित्रता का महत्व”
मूल मुरली की बात: बाबा पवित्रता को ब्राह्मण जीवन की महानता और श्रेष्ठ धारणा बताते हैं। इस मुरली में मनसा, वाचा और कर्मणा की पवित्रता, संकल्पों की जाँच और पवित्रता में नियमित अभ्यास पर बल दिया गया है।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 12 अक्टूबर की साकार मुरली में विकारी आदतों को मिटाने की बात है; 23 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली उस परिवर्तन को पवित्रता के व्यापक अभ्यास से जोड़ती है।
केवल बाहरी वेशभूषा बदलने से आदतें नहीं बदलतीं। अपने संकल्पों, वाणी और कर्म की जाँच करना ही उस आंतरिक परिवर्तन को मजबूत करता है जिसकी ओर आज की मुरली संकेत करती है।
23 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3 — 9 मई 1983, अव्यक्त मुरली
शीर्षक: “ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार — स्मृति, वृत्ति और दृष्टि की स्वच्छता (पवित्रता)”
मूल मुरली की बात: इस मुरली का मुख्य विषय ही स्मृति, वृत्ति और दृष्टि की स्वच्छता अर्थात् पवित्रता है। यह ब्राह्मण जीवन के श्रृंगार को आंतरिक स्थिति से जोड़ती है।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: यदि आज की साकार मुरली पूछती है कि हमें क्या बदलना है, तो 9 मई 1983 की अव्यक्त मुरली परिवर्तन के तीन क्षेत्र सामने रखती है:
- स्मृति: मैं स्वयं को किस रूप में याद रखता हूँ?
- वृत्ति: मेरे मन में दूसरों के प्रति कैसी भावना रहती है?
- दृष्टि: मैं दूसरों को किस भाव से देखता हूँ?
इस दृष्टि से वास्तविक श्रृंगार वही है जो भीतर की स्मृति, भावना और देखने के तरीके को श्रेष्ठ बनाए।
9 मई 1983 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
| दिनांकित मुरली | मुख्य शिक्षा | आज की मुरली से सम्बन्ध |
|---|---|---|
| 9 जनवरी 1980 | गुणों और स्थिति की “अलौकिक ड्रेस” | बाहरी रूप के बजाय आध्यात्मिक गुण धारण करना |
| 23 जनवरी 1980 | पवित्रता और संकल्पों की जाँच | विकारी आदतों को भीतर से बदलना |
| 9 मई 1983 | स्मृति, वृत्ति और दृष्टि की स्वच्छता | आंतरिक पवित्रता को जीवन का श्रृंगार बनाना |
| 12 अक्टूबर 2026 | ड्रेस पढ़ाई का लक्ष्य नहीं; विकारी आदतों को मिटाना है | ज्ञान, योग और श्रेष्ठ संस्कारों से आत्मिक परिवर्तन |
तुलनात्मक निष्कर्ष: उपलब्ध मूल पाठों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता। “ड्रेस” शब्द का अर्थ हर मुरली में एक जैसा नहीं है। 12 अक्टूबर की साकार मुरली बाहरी पहनावे को पढ़ाई का उद्देश्य नहीं मानती, जबकि 9 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली “ड्रेस” को मुख्यतः आध्यात्मिक स्थिति और गुणों के रूपक की तरह इस्तेमाल करती है। संदर्भ को ध्यान में रखकर इन बातों को साथ समझना उचित है।
4. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: बाबा किसे पढ़ाते हैं? उत्तर: रूहानी बाप रूहानी बच्चों अर्थात् आत्माओं को पढ़ाते हैं।
प्रश्न 2: क्या इस पढ़ाई का मुख्य सम्बन्ध ड्रेस बदलने से है? उत्तर: नहीं। मुरली के अनुसार मुख्य लक्ष्य आत्मिक उन्नति और विकारी आदतों को मिटाना है।
प्रश्न 3: ब्राह्मण से देवता बनने के लिए क्या करना है? उत्तर: विकारी आदतें मिटानी हैं, पवित्रता धारण करनी है और पुरुषार्थ में नियमित रहना है।
प्रश्न 4: सच्ची रूहानी रॉयल्टी क्या है? उत्तर: श्रेष्ठ संस्कार, पवित्रता और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीना।
प्रश्न 5: पवित्रता का अभ्यास किन स्तरों पर करना है? उत्तर: मनसा, वाचा और कर्मणा—तीनों स्तरों पर।
प्रश्न 6: “अलौकिक ड्रेस” का क्या अर्थ है? उत्तर: 9 जनवरी 1980 की अव्यक्त मुरली में यह श्रेष्ठ आध्यात्मिक स्थिति और गुणों का रूपक है।
प्रश्न 7: स्मृति, वृत्ति और दृष्टि की स्वच्छता क्यों महत्त्वपूर्ण है? उत्तर: क्योंकि वे हमारी आंतरिक स्थिति, भावनाओं और दूसरों को देखने के तरीके से जुड़ी हैं।
प्रश्न 8: स्वयं का उपकार और परोपकार कैसे करें? उत्तर: पहले अपनी कमजोरियाँ बदलें, फिर दूसरों के कल्याण में सहयोग दें।
प्रश्न 9: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है? उत्तर: क्या मेरे ज्ञान और योग से मेरी आदतों तथा व्यवहार में वास्तविक परिवर्तन आ रहा है?
5. YouTube वीडियो के लिए तैयार सामग्री
मुख्य शीर्षक
ड्रेस नहीं, संस्कार बदलो! — ब्राह्मण से देवता बनने की सच्ची पढ़ाई
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उपशीर्षक
12 अक्टूबर 2026 | साकार मुरली मंथन | बाहरी रूप नहीं, आत्मिक पवित्रता • विकारी आदतों का परिवर्तन • रूहानी रॉयल्टी उपशीर्षक कॉपी करें
मुख्य प्रश्न
क्या मैं बाहरी रूप बदल रहा हूँ, या अपने संस्कार भी बदल रहा हूँ? प्रश्न कॉपी करें
वीडियो के प्रमुख बिंदु
- रूहानी पाठशाला और आत्मा की पढ़ाई का अर्थ।
- बाहरी ड्रेस और आंतरिक परिवर्तन का अन्तर।
- विकारी आदतों को मिटाना और पवित्रता धारण करना।
- रूहानी रॉयल्टी और श्रेष्ठ संस्कार।
- 9 जनवरी 1980, 23 जनवरी 1980 और 9 मई 1983 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
- स्मृति, वृत्ति और दृष्टि की स्वच्छता।
- स्वयं का उपकार करके दूसरों के उपकार में सहयोग देना।
6. डिस्क्लेमर
डिस्क्लेमर: यह वीडियो 12 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली की शिक्षाओं और अन्य दिनांकित मुरलियों के तुलनात्मक अध्ययन को अलग रखने का प्रयास किया गया है। तुलनात्मक व्याख्या मूल मुरली के शब्दशः कथन से अलग है और इसका उद्देश्य किसी मुरली में परिवर्तन करना या बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं है। “अलौकिक ड्रेस” जैसे शब्दों को उनके संबंधित मुरली-संदर्भ में समझा गया है। मुरली में प्रयुक्त “काला/गोरा” जैसे शब्दों को आध्यात्मिक रूपक के रूप में समझें, न कि त्वचा के रंग, शारीरिक सुंदरता या किसी व्यक्ति के मानवीय मूल्य का आकलन। “ब्राह्मण से देवता” और “ऊँची जाति” जैसे शब्द यहाँ मुरली के आध्यात्मिक संदर्भ में प्रयुक्त हैं, सामाजिक जाति-श्रेष्ठता के अर्थ में नहीं। दर्शक मूल मुरली का अध्ययन करें और अपने विवेक के आधार पर चिंतन करें।
अंतिम मंथन
बाहरी रूप व्यवस्थित रखना अलग बात है, लेकिन आध्यात्मिक पढ़ाई का वास्तविक लक्ष्य अपने संस्कारों और आंतरिक स्थिति को श्रेष्ठ बनाना है। आज अपने आप से पूछें—क्या मेरे संकल्प अधिक पवित्र हुए हैं, मेरी दृष्टि में सम्मान बढ़ा है और मेरे व्यवहार में दैवीगुण दिखाई देने लगे हैं?
आज का संकल्प: मैं बाहरी दिखावे से अधिक अपने आंतरिक संस्कारों को सुधारने, पवित्रता धारण करने और अपने व्यवहार से रूहानी रॉयल्टी प्रकट करने पर ध्यान दूँगा।
📝 72. साकार मुरली | 12-10-2026
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