1000. अव्यक्त मुरली | 11-10-2026 | रिवा: 18-01-2012

11-10-26 प्रात:मुरलीओम् शान्ति”अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 18-01-12 मधुबन


सेवाओं के साथ-साथ एक दो के सहयोगी बन वायुमण्डल में तीव्र पुरुषार्थ की लहर फैलाओ, मनजीत बन आत्माओं की मन्सा सेवा करो

आज विशेष स्नेह का दिन है। चारों ओर के बच्चे स्नेह स्वरूप से मिलन मना रहे हैं। आप सभी भी स्नेह स्वरूप में मगन हैं। आज अमृतवेले से चारों तरफ के बच्चे अमृतवेले से भी पहले स्नेह रूप से दिल के स्नेह के मोतियों की मालायें लेकर पहुंच गये थे। अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न मन के भावों को बाप के आगे वर्णन कर रहे थे। आप जानते हो कि बच्चों का स्नेह कितना प्यारा है। भिन्न-भिन्न भाषायें, भिन्न-भिन्न भाव से बापदादा के आगे अपने दिल की बात बोल भी रहे थे और नयनों से, मुख से अपने भाव भी स्पष्ट कर रहे थे। बापदादा चारों ओर के बच्चों के स्नेह के भाव देख सभी के स्नेह में समा गये और दिल से यही बोल निकले वाह बच्चे वाह! और बच्चों के मुख से वाह बाबा वाह! के गीत सुनाई दे रहे थे। बापदादा हर बच्चे को देख बच्चों के लव में लीन थे और बच्चे बाप के लव में लीन थे।

आज का दिन बाप बच्चों को बालक सो मालिक बनाने की दृष्टि से देख रहे थे। आज का दिन बच्चों के राज तिलक का दिन है। आज के दिन बापदादा स्वयं फरिश्ते रूप में रहकर बच्चों को विश्व सेवा अर्थ निमित्त बनाया। स्वयं बैकबोन बनें, बच्चों को विश्व की स्टेज पर प्रत्यक्ष किया और बापदादा अभी बच्चों की सेवा को देख, जो जिम्मेवारी दी उसकी रिजल्ट को देख बच्चों पर बहुत-बहुत खुश है और दिल से मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो।

बापदादा ने देखा अभी भी बाप द्वारा दिये हुए विश्व सेवाधारी के वरदान प्रमाण हर बच्चे ने अति स्नेह और दिल से सेवा की है और कर भी रहे हैं। रिजल्ट भी बापदादा ने देखी, हर एक बच्चे के दिल में लगन है मेरा बाबा और बाप के दिल में स्नेह है वाह मेरे बच्चे। वर्तमान समय मैजारिटी छोटे बड़े सेन्टर्स निवासी बच्चों में उमंग है कि अभी जल्दी से जल्दी चारों ओर बाप को प्रत्यक्ष करना ही है। यह उमंग, यह उत्साह बापदादा ने चक्र लगाके देखा, छोटे बड़े सेवाकेन्द्र के बच्चों को सेवा का उमंग बहुत-बहुत-बहुत अच्छा है और आगे भी अच्छा रहेगा। तो बापदादा आज स्नेह के दिन चारों ओर के चाहे देश, चाहे विदेश सभी बच्चों को अपने दृष्टि से, दिल से स्नेह और सेवा का रिटर्न दिल का स्नेह यादप्यार पदमगुणा दे रहे हैं।

अभी समय अनुसार जो उमंग है कि बाप को प्रत्यक्ष करना है, वह धीरे-धीरे आत्माओं के दिल में भी आने लगा है। समझते हैं कि ब्रह्माकुमारियों ने कुछ पाया है, परिवर्तन हो रहा है। पहले जो समझते थे पता नहीं क्या करते हैं, अभी यहाँ तक आये हैं कि अच्छा कार्य कर रहे हैं। जो हम नहीं कर सकते वह इन्होंने अपने संगठन में सफलता पाई है इसलिए आज बापदादा सामने बैठे हुए बच्चों को वा चारों ओर जो भी बच्चे सुन रहे हैं, देख रहे हैं सभी बच्चों को दिल का स्नेह, दिल का प्यार विशेष दे रहे हैं। अभी आगे क्या करना है? सेवा की मुबारक तो बापदादा ने दे दी, अब बापदादा यही चाहते हैं कि अभी हर एक बच्चे को यह उमंग-उत्साह, दृढ़ निश्चय, तीव्र पुरुषार्थ करना है कि अब बाप समान फरिश्ता बनना ही है क्योंकि अभी सभी को बाप के साथ रिटर्न जरनी करनी है। समान फरिश्ता बनना ही है क्योंकि सभी का वायदा है साथ चलेंगे, साथ राज्य करेंगे। तो ब्रह्मा बाप भी फरिश्ता बन गया, तो साथ कैसे चलेंगे? ब्रह्मा बाप ने जीवन में ही फरिश्तापन का स्वरूप दिखाया। कितनी जिम्मेवारी रही! सभी को योगी बनाना ही है लेकिन इतनी जिम्मेवारी होते भी आप सबने देखा न्यारा और प्यारा रहा। सदा बेफिक्र बादशाह रहा, फिकर नहीं बेफिक्र बादशाह। ऐसे ही आप बच्चों को भी अभी बाप समान बेफिक्र बादशाह फरिश्ता बनना ही है। यह दृढ़ संकल्प है, बनना ही है! कि यह सोचते हो बन ही जायेंगे!

अभी बापदादा ने देखा कि अभी समय अनुसार जितना सेवा का उमंग-उत्साह प्रैक्टिकल में है इतना ही अभी तीव्र पुरुषार्थी बनना और बनाना, सम्पन्न बनना और बनाना, इस प्वाइंट के ऊपर भी अभी स्वयं भी उमंग-उत्साह में रहना और वायुमण्डल में भी उमंग-उत्साह दिलाना। एक दो के सहयोगी बन अब वायुमण्डल में तीव्र पुरुषार्थ की लहर फैलाओ। जैसे एक दो में सेवा का उमंग वायुमण्डल में फैलाया है ऐसे अभी बापदादा बच्चों में यही शुभ आशा रखते हैं कि यह लहर वायुमण्डल में फैले। बापदादा खुश है लेकिन अभी भी पुरुषार्थ है, तीव्र पुरुषार्थ करना है। अभी हर बच्चे में बापदादा की यही आश है कि हर बच्चा बाप के आशाओं का सितारा हो। ऐसे सितारा हो? जो समझते हैं हम बाप की आशाओं के सितारे बन यह उमंग-उत्साह वायुमण्डल में फैलायेंगे वह हाथ उठाओ। अच्छा। हाथ तो बहुत अच्छा उठाते हैं। बापदादा हाथों को देखके खुश हो जाते हैं। मैजारिटी ने हाथ उठाया है, पीछे वालों का दिखाई नहीं देता लेकिन आगे वालों का दिखाई दिया। अभी पीछे वाले भी उठा रहे हैं, मुबारक हो, मुबारक हो। अच्छा।

बापदादा ने देखा कि विशेष मन में कोई भी बात का उमंग-उत्साह आता है तो वह कार्य साकार रूप में अच्छा हो जाता है इसलिए बापदादा इस बारी स्नेह के दिन में यह होमवर्क दे रहा है कि हर एक बच्चा मन के कारण जो संकल्प और समय व्यर्थ जाता है, अगर कभी भी कोई व्यर्थ संकल्प आ जाता है तो सभी को अनुभव होगा कि उसमें टाइम कितना वेस्ट जाता है। इनर्जी कितनी वेस्ट जाती है। तो बापदादा यह होमवर्क देने चाहता है कि यह दो मास हर एक बच्चा मन के व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय के बचत की अपने प्रति विधि बनावे। इन दो मास में हर एक अपना चार्ट रखे कि व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प के ऊपर कितना कन्ट्रोल किया? क्योंकि अभी समय के प्रमाण आप सभी को मन्सा शक्ति द्वारा आत्माओं की मन्सा सेवा करने का समय होगा। इसके लिए सदा मन के ऊपर अटेन्शन रखना जरूरी है। कहा हुआ भी है मनजीत जगतजीत। तो मनमनाभव के वायुमण्डल में मन के व्यर्थ को समाप्त करना है। कर सकते हैं? करेंगे? वह हाथ उठाओ। बापदादा इनाम देगा। अपनी रिजल्ट आप देखना। मन खुश तो मन की खुशी बांटेंगे। यह पुरुषार्थ में नम्बर सभी आगे से आगे लेने का अटेन्शन रखो। संकल्प, समय दोनों से व्यर्थ समाप्त और समर्थ संकल्प, समर्थ समय आने वाले समय में वायुमण्डल में फैलेगा।

बापदादा एक बात पर बच्चों को देख खुश है। कौन सी बात पर? कि हर बच्चे ने सेवा तो की है लेकिन साथ में जो बापदादा का इशारा है कि डबल राजा बनो। जानते हो ना! एक स्वराज्य अधिकारी और दूसरा भविष्य राज्य अधिकारी। स्वराज्य अधिकारी और बाप को नशा है कि ऐसा और कोई बाप नहीं जिसका हर बच्चा स्वराज्य अधिकारी हो। आप सभी स्वराज्य अधिकारी हो ना! स्व पर आत्मा राज्य करने वाली है। कर्मेन्द्रियों के वश नहीं, राज्य अधिकारी। तो बाप यही चाहते हैं कि हर एक बच्चा स्वराज्य अधिकारी सदा रहे, कभी कभी नहीं। बन सकते हैं? यह दो मास जो दिया है, इसमें नोट करना स्वराज्य अधिकारी रहे? या कर्मेन्द्रियों के वश बन गये? अभी कर्मातीत बनना है, समय समीप आ रहा है। तो क्या करना है? चलते-फिरते स्वराज्य अधिकारी बनना ही है। यह संस्कार आप ब्राह्मण बच्चों के ही हैं। डबल राज्य, स्वराज्य और फिर भविष्य में विश्व राज्य। बापदादा चक्र लगाते बच्चों का रिजल्ट नोट करते हैं तो सदा स्वराज्य अधिकारी इसमें अभी अटेन्शन चाहिए। तो दो कार्य बापदादा ने दिया एक यह दो मास स्वराज्य अधिकारी कहाँ तक रहते? वह अपनी रिजल्ट देखनी है और साथ-साथ मन की कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर द्वारा व्यर्थ समाप्त करना है। इसमें जो नम्बर लेंगे उसको बापदादा इनाम देगा। पसन्द है? करना है ना! करेंगे? करेंगे ना! कांध हिलाओ। अच्छा।

बापदादा ने आज सभी का जो स्नेह है वह स्वीकार किया। अमृतवेले तो वतन में भी बहुत बच्चों की रिमझिम थी। एडवांस पार्टी भी वतन में आज अपने दिल का स्नेह देने लिए, लेने लिए आये थे। अब वह बाप से पूछते हैं कि आखिर हमारा यह पार्ट कब तक? क्या जवाब दें? पहली लाइन वाले बताओ क्या जवाब दें? क्या कहा? (दादी जानकी ने कहा हम रेडी हैं) आप अकेले जायेंगी? (सभी जायेंगे) आपका प्यार है ना, ऐसे छोड़कर राज्य कैसे करेंगे। (एडवांस पार्टी वाले हमको क्यों छोड़कर चले गये) उन्हों का पार्ट था ना। उन्हों को जाना ही था। अभी आप यह कोशिश करो कि जल्दी जल्दी संगठन तैयार करो। जो दो मास काम दिया है ना, अगर यह काम आप सभी को करा देंगी, रिजल्ट निकालेंगी तो जल्दी हो जायेगा। (बाबा के स्नेह में कर लेंगे) स्नेह तो है, स्नेह में सभी पास हैं। बापदादा भी देखते हैं कि स्नेह सबका है लेकिन स्नेह के साथ शक्ति भी चाहिए। इसके लिए अमृतवेले को पावरफुल बनाओ, बैठते हैं बापदादा बैठने की मुबारक देते हैं लेकिन जो बैठने का वायुमण्डल शक्तिशाली चाहिए, कोई कैसे बैठता है, कोई कैसे बैठता है। अगर आप फोटो निकालो ना, तो आपको खुद लगेगा कि और कुछ होना चाहिए। जो बापदादा ने ज्वालामुखी योग कहा, उसके ऊपर अभी और गहरा अटेन्शन देना। पुरुषार्थ करते हैं सभी लेकिन पुरुषार्थ के आगे तीव्र शब्द जोड़ो। अभी बापदादा ने हर बच्चे को यह दो मास दिये हैं, इसमें जितना अटेन्शन देंगे तो अटेन्शन के साथ बापदादा भी एकस्ट्रा आपको सहयोग देगा। मन के मालिक, मन को ऐसे चलाओ जैसे पांव और बांह को चलाते हो। जो चाहते हो वह करते हैं ना। अभी आप चाहो यहाँ नहीं यहाँ रखूं तो रख सकते हो ना! ऐसे माइन्ड कन्ट्रोल, जो चाहे वही मन संकल्प करे। रोज़ रात को रिजल्ट देखो आज मन की रूलिंग पावर, कन्ट्रोलिंग पावर कहाँ तक रही? अभी व्यर्थ को समाप्त जल्दी-जल्दी करना चाहिए, अब समर्थ बन वायुमण्डल में समर्थपन की शक्ति फैलाओ। बापदादा तो बच्चों का दु:ख दर्द, पुकार सुन करके बच्चों द्वारा अभी जल्दी समाप्ति कराने चाहते हैं। सुनाया ना, पुरुषार्थ सब कर रहे हैं लेकिन अभी एड करो तीव्र। करना ही है, करेंगे, देखेंगे… यह गे-गे नहीं चलेगा।

स्नेह का नज़ारा भी आज देखा, हर एक के दिल में कितना प्यार है लेकिन जितना प्यार है ना, साथ में उतना शक्ति भी चाहिए। अभी शक्ति को भरो। कभी भी कोई भी बहनें अपने को सिर्फ शक्ति नहीं, शिवशक्ति समझो। शिवशक्ति, बाप साथ है। पाण्डवों से पाण्डवपति साथ है। तो अभी क्या करेंगे? जो बापदादा ने कहा है पुरुषार्थ के आगे तीव्र शब्द लगाओ। वायुमण्डल बनाओ। एक दो के सहयोगी बन हर एक अपने-अपने जिस स्थान पर रहते हो, उस स्थान को शक्तिशाली बनाओ, साथियों को शक्तिशाली बनाओ। तो क्या करेंगे अभी? नवीनता करेंगे ना! जब मेरा बाबा कहते हैं, तो ‘मेरे’ जैसा बनना तो पड़ेगा ना। हर एक अपने दिल में दृढ़ संकल्प करो, संकल्प अच्छे-अच्छे करते हो, अमृतवेले बापदादा देखते हैं कि संकल्प अच्छे करते हो यह करेंगे, यह करेंगे, यह करेंगे लेकिन जब कर्मयोगी बनते हो, सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो तो उसमें फर्क हो जाता है। कर्मयोगी की स्थिति उसमें अटेन्शन ज्यादा चाहिए। अच्छा।

सभी खुश तो हैं ना! खुश हैं? देखो नये-नये भी कितने आते हैं। जो नये पहली बार आये हैं वह हाथ उठाओ। देखो कितने हैं? आधा क्लास नये आये हैं। बापदादा आये हुए नये बच्चों को देख खुश है क्योंकि लास्ट समाप्ति के समय से तो पहले आ गये हैं। लेकिन जितना लेट आये हो इतना ही तीव्र पुरुषार्थ करना पड़ेगा क्योंकि इस थोड़े टाइम में आपको पूरे 21 जन्मों का भविष्य बनाना है। इतना अटेन्शन रखना पड़ेगा। समय को बचाना, सेकण्ड भी व्यर्थ नहीं गंवाना। तीव्र पुरुषार्थी रहना, साधारण पुरुषार्थ से पहुंचना मुश्किल है। फिर भी बापदादा आये हुए बच्चों को दिल से मुबारक दे रहे हैं। अच्छा।

टीचर्स बहिनें बहुत आई हैं:- टीचर्स को देखकर तो बापदादा बहुत खुश होते हैं क्योंकि जो निमित्त टीचर्स बनी हैं, वह बापदादा को प्रत्यक्ष करने के निमित्त बनी हुई हैं। कोई भी टीचर को देखते खुश होते हैं क्योंकि टीचर्स माना ही जिसके फीचर्स से फ्युचर दिखाई दे। फ्युचर आपका क्या है? फ्युचर है सदा दिलखुश, सदा अधिकारी, अधीन होने वाले नहीं। तो टीचर्स के फीचर्स यह साक्षात्कार कराते हैं। हर एक टीचर सदा यही समझे कहाँ बोला, कहाँ नहीं बोला भले, लेकिन वर्तमान समय की प्राप्ति और भविष्य की प्राप्ति आपके फीचर्स, आपकी शक्ल दिखाती है। सदा यह अटेन्शन रखो कि हमारा चेहरा ऐसा साक्षात्कार कराने वाला हो। कोई भी टीचर के सामने आये, टीचर को देख एक तो खुशमिजाज हो जाए, खुशी उसके जीवन में दिखाई दे। ऐसे खुशनुमा और खुशकिस्मत हो। बाप-दादा ने देखा है हर एक टीचर का लक्ष्य अच्छा है। करना ही है। बनना ही है। ऐसे है ना? लक्ष्य क्या है? यही लक्ष्य है ना! तो यह लक्ष्य लक्षण में दिखाई देता भी है और ज्यादा दिखाई देना चाहिए। जो भी आवे खुशी जरूर ले जाये क्योंकि खुशी हर मनुष्य को आवश्यक है। चाहते हैं लेकिन बन नहीं पाते हैं तो टीचर्स माना फीचर्स द्वारा भी सेवा करे। अनुभव करें कि यह क्या बन गई है! अभी आगे चल करके आपका चेहरा और चलन यह सेवा ज्यादा करेगा क्योंकि जैसे समय नाजुक आयेगा तो समय कम मिलेगा लेकिन चाहना बढ़ेगी, कुछ मिले, कुछ मिले। इसके लिए टीचर्स को सदा ऐसे एवररेडी रहना चाहिए, जो कोई आवे वह कम से कम कुछ लेके ही जावे। चेहरे और चलन द्वारा भी कुछ न कुछ लेके जाये। दाता के बच्चे हो ना! बापदादा तो टीचर्स को देखकर बहुत खुश होते हैं। दिल ही दिल में गुण गाते हैं वाह टीचर्स वाह! क्योंकि हर एक टीचर सेवा तो करते ही हैं और अपनी रिजल्ट रात को भी देखते होंगे कि आज की सेवा क्या हुई! अपना चार्ट तो आपेही देखते हैं। जो लक्ष्य रखा सेवा का वह हुआ? अगर कारणे अकारणे नहीं हुआ, तो दूसरे दिन डबल करो। खाली नहीं छोड़ो क्योंकि टीचर्स माना निमित्त दाता के बच्चे दाता। तो बापदादा तो खुश होते हैं चाहे छोटे सेन्टर की हैं चाहे बड़े सेन्टर की हैं लेकिन त्याग करके सेवा-स्थान पर आना, यह भी हिम्मत है ना। तो बापदादा आपकी हिम्मत पर तो खुश है। अब और साथी बनाओ। और भी टीचर्स निकालो क्योंकि सेवा बढ़नी ही है। अभी थोड़ा हंगामा होगा और सब उत्कण्ठा से आपके आगे आयेंगे। सर्विस बढ़ने वाली है, कम होने वाली नहीं है। अच्छा।

वरदान:- स्वमान की सीट पर स्थित रह माया को सरेण्डर कराने वाले श्रेष्ठ स्वमानधारी भव
संगमयुग का सबसे श्रेष्ठ स्वमान है मास्टर सर्वशक्तिमान की स्मृति में रहना। जैसे कोई बड़ा आफीसर वा राजा जब स्वमान की सीट पर स्थित होता है तो दूसरे भी उसे सम्मान देते हैं, अगर स्वयं सीट पर नहीं तो उसका आर्डर कोई नहीं मानेंगे, ऐसे आप भी स्वमानधारी बन अपने श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट रहो तो माया आपके आगे सरेण्डर हो जायेगी।
स्लोगन:- साक्षीपन की स्थि ति में रह दिलाराम के साथ का अनुभव करने वाले ही लवलीन आत्मा हैं।

ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

अपकारी पर भी उपकार करना, यही ज्ञानी तू आत्मा का कर्तव्य है। जैसे बाप ने ग्लानि को भी कल्याणकारी दृष्टि से देखा। उपकारी पर उपकार तो दुनिया वाले भी करते हैं, भक्त आत्मायें भी करते हैं लेकिन ज्ञानी तू आत्मा का अर्थ है सर्व के प्रति कल्याण की भावना, अकल्याण संकल्प मात्र भी नहीं हो। अपकारियों पर भी उपकार करे तब कहेंगे विश्व कल्याणकारी।

11 अक्टूबर 2026 — आज की मुरली मंथन

अव्यक्त मुरली | रिवाइज: 18 जनवरी 2012, मधुबन

आज की मुरली का मुख्य संदेश है: “सेवाओं के साथ-साथ एक-दो के सहयोगी बन वायुमण्डल में तीव्र पुरुषार्थ की लहर फैलाओ, मनजीत बन आत्माओं की मन्सा सेवा करो।”

इस मुरली में बाबा केवल सेवा बढ़ाने की बात नहीं करते, बल्कि यह भी समझाते हैं कि सेवा के साथ अपना पुरुषार्थ तीव्र करना, मन के व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करना और स्वराज्य अधिकारी बनना आवश्यक है। संकल्प करना पहला कदम है; उसे अपने कर्म और स्वभाव में उतारना वास्तविक पुरुषार्थ है।

ध्यान दें: आपके दिए स्रोत में मुरली की तारीख 11-10-2026 है, जबकि मूल अव्यक्त मुरली का उल्लेख 18-01-2012 के रूप में है। इसलिए नीचे दोनों तारीखों को अलग-अलग रखा गया है।

1. आज की मुरली का मुख्य शीर्षक

सेवा तो बहुत की… अब तीव्र पुरुषार्थ की लहर फैलाओ!

11 अक्टूबर 2026 | अव्यक्त मुरली मंथन

उपशीर्षक: व्यर्थ संकल्प समाप्त करो • मन के मालिक बनो • स्वराज्य अधिकारी रहो

यह शीर्षक इसलिए उपयुक्त है क्योंकि मूल मुरली में बाबा सेवा के उमंग-उत्साह की सराहना करने के बाद बच्चों को आगे की दिशा देते हैं—अब केवल सेवा ही नहीं, बल्कि तीव्र पुरुषार्थ, समर्थ संकल्प और स्वराज्य अधिकारी स्थिति पर भी ध्यान देना है।

मुख्य प्रश्न

क्या मेरी सेवा के साथ मेरा अपना परिवर्तन भी उतनी ही तीव्र गति से हो रहा है?

यह प्रश्न वीडियो का केंद्रीय सूत्र बन सकता है। सेवा करते हुए हम दूसरों को ज्ञान सुनाते हैं, लेकिन क्या हम अपने व्यर्थ संकल्पों, पुराने संस्कारों और कर्मेन्द्रियों पर भी उतना ही ध्यान देते हैं?

2. मूल मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु

बिंदु 1 — सेवा के साथ स्वयं का परिवर्तन

मूल मुरली की बात: बाबा बच्चों की सेवा और उमंग-उत्साह की प्रशंसा करते हैं, लेकिन आगे कहते हैं कि अब स्वयं तीव्र पुरुषार्थी बनना और दूसरों को भी प्रेरित करना है।

हमारा मंथन: सेवा की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाए कि कितने लोगों तक संदेश पहुँचा। यह भी देखें कि हमारी अपनी स्थिति, व्यवहार और संस्कारों में कितना परिवर्तन आया।

बिंदु 2 — व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय पर नियंत्रण

मूल मुरली की बात: बाबा दो मास तक व्यर्थ संकल्पों और व्यर्थ समय की बचत का चार्ट रखने का होमवर्क देते हैं। साथ ही, मन की कंट्रोलिंग और रूलिंग पावर बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं।

हमारा मंथन: मुरली का यह निर्देश मूल रूप से उस समय के श्रोताओं को दिया गया था। आज इसे आत्मचिन्तन के अभ्यास के रूप में अपनाया जा सकता है—दिन के अंत में देखें कि कितना समय उपयोगी कार्यों में लगा और कितना अनावश्यक विचारों में चला गया।

बिंदु 3 — स्वराज्य अधिकारी बनना

मूल मुरली की बात: बाबा स्वराज्य अधिकारी और भविष्य के राज्य अधिकारी—इन दोनों बातों को जोड़ते हैं। स्वराज्य अधिकारी का अर्थ है आत्मा का अपनी कर्मेन्द्रियों पर अधिकार होना, उनके वश में न होना।

हमारा मंथन: यदि छोटी-सी परिस्थिति हमारा मन, वाणी या व्यवहार बदल देती है, तो हमें अपनी आंतरिक सत्ता पर फिर से ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वराज्य का अभ्यास केवल योग में बैठते समय नहीं, बल्कि चलते-फिरते और सम्बन्ध-सम्पर्क में भी होना चाहिए।

बिंदु 4 — संकल्प और कर्म में समानता

मूल मुरली की बात: बाबा ध्यान दिलाते हैं कि अमृतवेले अच्छे संकल्प किए जाते हैं, लेकिन कर्मयोगी बनने और सम्बन्ध-सम्पर्क में आने पर उनमें अन्तर दिखाई दे सकता है।

हमारा मंथन: सुबह का संकल्प तभी सार्थक है, जब दिन के व्यवहार में उसकी झलक आए। इसलिए रात को स्वयं से पूछें—आज मैंने जो बनने का संकल्प किया था, क्या वह मेरे कर्मों में दिखाई दिया?

बिंदु 5 — प्यार के साथ शक्ति और सहयोग

मूल मुरली की बात: बाबा कहते हैं कि स्नेह के साथ शक्ति भी चाहिए। एक-दूसरे के सहयोगी बनकर अपने स्थान और साथियों को शक्तिशाली बनाना है।

हमारा मंथन: सच्चा सहयोग केवल किसी के काम में हाथ बँटाना नहीं है। अपने उदाहरण, उत्साह, शुभ संकल्प और स्थिरता से दूसरों को भी पुरुषार्थ में आगे बढ़ने की प्रेरणा देना सहयोग का एक रूप है।

बिंदु 6 — संकल्प को परिणाम में बदलना

मूल मुरली की बात: बाबा केवल “करेंगे” या “देखेंगे” तक सीमित रहने के बजाय दृढ़ निश्चय और तीव्र पुरुषार्थ पर बल देते हैं।

हमारा मंथन: संकल्प को एक छोटे, स्पष्ट और नियमित अभ्यास में बदलें। उदाहरण के लिए, व्यर्थ विचार आते ही उन्हें बढ़ाने के बजाय बाबा की श्रीमत के अनुसार अपनी बुद्धि को सही दिशा देना।

3. एक प्रमुख बात का तुलनात्मक अध्ययन

चुना गया विषय: व्यर्थ संकल्प समाप्त कर तीव्र पुरुषार्थ करना

आज की मुरली में यह विषय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बाबा सेवा की वृद्धि के साथ-साथ मन की शक्ति, संकल्पों पर नियंत्रण और स्वराज्य अधिकारी बनने पर ध्यान दिलाते हैं।

मुरली 1 — 26 जनवरी 1970

विषय: याद की यात्रा की सम्पूर्ण स्थिति

मूल मुरली की बात: बाबा तीव्र पुरुषार्थी की पहचान बताते हैं कि उसके मन में संकल्पों के स्तर पर भी माया से हार नहीं होनी चाहिए। मन को शुद्ध संकल्पों में व्यस्त रखने पर व्यर्थ संकल्पों के लिए स्थान कम होता जाता है।

हिंदी Avyakt Murli

हमारी तुलनात्मक व्याख्या: आज की मुरली में बाबा व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करने और समर्थ संकल्पों को बढ़ाने का अभ्यास देते हैं। 26 जनवरी 1970 की मुरली बताती है कि इसका एक उपाय है—मन को श्रेष्ठ संकल्पों में व्यस्त रखना।

अर्थात केवल व्यर्थ विचार रोकने का प्रयास न करें; मन को किसी श्रेष्ठ लक्ष्य, बाबा की याद या उपयोगी सेवा में लगाएँ।

मूल मुरली पढ़ें — 26 जनवरी 1970

मुरली 2 — 15 दिसंबर 2007

विषय: समय का महत्त्व, व्यर्थ संकल्प और तीव्र पुरुषार्थ

मूल मुरली की बात: बाबा तीव्र पुरुषार्थ के दो लक्षण बताते हैं—नष्टोमोहा और एवररेडी। साथ ही, व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय को पहचानने के लिए हर संकल्प, हर कर्म और हर क्षण की जाँच करने की प्रेरणा देते हैं। मन्सा सेवा के लिए मन को शक्तिशाली दिशा में लगाने पर भी बल दिया गया है।

हिंदी Avyakt Murli

हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 11 अक्टूबर 2026 के मंथन में भी सेवा और स्व-पुरुषार्थ के बीच संतुलन महत्त्वपूर्ण है। 15 दिसंबर 2007 की मुरली हमें आत्म-जाँच का व्यावहारिक तरीका देती है—दिन के दौरान समय और संकल्प कहाँ खर्च हुए, यह देखें।

इस तुलना से एक बात स्पष्ट होती है: तीव्र पुरुषार्थ केवल अधिक कार्य करना नहीं, बल्कि समय और संकल्प का अधिक सार्थक उपयोग करना भी है।

मूल मुरली पढ़ें — 15 दिसंबर 2007

मुरली 3 — 15 दिसंबर 2025

विषय: सेकण्ड में परिवर्तन और व्यर्थ की समाप्ति

मूल मुरली की बात: बाबा व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ समय को समाप्त करने तथा केवल सोचते रहने के बजाय समर्थ स्मृति से समर्थ स्वरूप बनने पर बल देते हैं।

हिंदी Avyakt Murli

हमारी तुलनात्मक व्याख्या: आज की मुरली में भी अच्छे संकल्प करने और सम्बन्ध-सम्पर्क में आने पर व्यवहार में अन्तर रह जाने की बात कही गई है। 15 दिसंबर 2025 की मुरली इसी अन्तर को कम करने की दिशा दिखाती है—संकल्प को शीघ्र ही वास्तविक परिवर्तन में लाना।

उदाहरण के लिए, यदि हम संकल्प करते हैं कि आज व्यर्थ विचारों में समय नहीं गँवाएँगे, तो दिन के अंत में केवल संकल्प याद करना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना होगा कि जहाँ व्यर्थ विचार आए, वहाँ हमने अपनी दिशा कैसे बदली।

मूल मुरली पढ़ें — 15 दिसंबर 2025

तुलनात्मक निष्कर्ष

मुरलीविशेष बलआज के लिए सीख
26 जनवरी 1970मन को शुद्ध संकल्पों में व्यस्त रखनाव्यर्थ विचारों के स्थान पर श्रेष्ठ संकल्प लाएँ
15 दिसंबर 2007समय और संकल्प की जाँचनियमित आत्म-जाँच करें
15 दिसंबर 2025शीघ्र परिवर्तन और समर्थ स्मृतिसंकल्प को व्यवहार में उतारें
11 अक्टूबर 2026सेवा के साथ तीव्र पुरुषार्थ और स्वराज्यसेवा तथा स्व-परिवर्तन दोनों में प्रगति करें

इन मुरलियों के उपलब्ध अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास नहीं दिखाई देता। वे एक ही व्यापक लक्ष्य—श्रेष्ठ स्थिति और तीव्र पुरुषार्थ—को अलग-अलग पहलुओं से समझाती हैं। यह तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली का अतिरिक्त उद्धरण नहीं।

4. आज का विशेष मंथन: सेवा बनाम स्व-परिवर्तन नहीं, दोनों का संतुलन

आज की मुरली को एक वाक्य में समझें:

दूसरों को आगे बढ़ाने के साथ स्वयं भी आगे बढ़ो।

यदि हम ज्ञान सुनाते हैं, वीडियो बनाते हैं, सेवा करते हैं या दूसरों को प्रेरित करते हैं, तो साथ-साथ यह भी जाँचें:

  • क्या मेरा मन पहले से अधिक स्थिर हुआ है?
  • क्या व्यर्थ संकल्पों में मेरा समय कम हो रहा है?
  • क्या परिस्थितियों में भी मैं अपने स्वभाव पर अधिकार रखता हूँ?
  • क्या मेरे संकल्प और कर्म में समानता बढ़ रही है?
  • क्या मेरे सम्पर्क में आने वाले लोगों को मेरे व्यवहार से सहयोग और प्रेरणा मिलती है?

आज का आत्मचिन्तन प्रश्न

मैं दूसरों को तीव्र पुरुषार्थ की प्रेरणा देता हूँ—क्या मेरे अपने जीवन में भी तीव्र परिवर्तन दिखाई दे रहा है?

5. YouTube वीडियो के लिए तैयार सामग्री

मुख्य शीर्षक

सेवा तो बहुत की… अब तीव्र पुरुषार्थ की लहर फैलाओ!

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उपशीर्षक

11 अक्टूबर 2026 | अव्यक्त मुरली मंथन | व्यर्थ संकल्प समाप्त करो • मन के मालिक बनो • स्वराज्य अधिकारी रहो उपशीर्षक कॉपी करें

वीडियो का मुख्य प्रश्न

क्या मेरी सेवा के साथ मेरा अपना परिवर्तन भी उतनी ही तीव्र गति से हो रहा है? प्रश्न कॉपी करें

वीडियो में शामिल करने के प्रमुख बिंदु

  1. सेवा की सफलता के साथ स्व-परिवर्तन क्यों आवश्यक है?
  2. व्यर्थ संकल्पों और व्यर्थ समय की बचत कैसे करें?
  3. स्वराज्य अधिकारी बनने का व्यावहारिक अर्थ।
  4. अमृतवेले के संकल्प और दिन के कर्म में समानता।
  5. 26 जनवरी 1970, 15 दिसंबर 2007 और 15 दिसंबर 2025 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
  6. मनसा सेवा और एक-दूसरे का सहयोगी बनने का महत्त्व।
  7. रोज़ रात को आत्म-जाँच: आज मेरा पुरुषार्थ कितना तीव्र रहा?

6. डिस्क्लेमर

डिस्क्लेमर: यह वीडियो 11 अक्टूबर 2026 के लिए प्रस्तुत अव्यक्त मुरली (मूल मुरली: 18 जनवरी 2012, मधुबन) पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली की शिक्षाओं और अन्य दिनांकित मुरलियों के तुलनात्मक अध्ययन को स्पष्ट रूप से अलग रखने का प्रयास किया गया है। अन्य मुरलियों से प्रस्तुत निष्कर्ष मंथनात्मक व्याख्या हैं; उन्हें बाबा के मूल शब्दों के रूप में न माना जाए। मूल मुरली में दिया गया “दो मास” का होमवर्क उस समय के श्रोताओं के संदर्भ में था; यहाँ उसे वर्तमान आत्म-जाँच के लिए एक उपयोगी अभ्यास के रूप में समझाया गया है। इस प्रस्तुति का उद्देश्य किसी मुरली में परिवर्तन करना या बिना पर्याप्त आधार के विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि मूल शिक्षाओं के अध्ययन, आत्मचिन्तन और स्व-परिवर्तन को प्रोत्साहित करना है। कृपया मूल मुरली का अध्ययन भी करें।

अंतिम संदेश

आज बाबा की प्रेरणा है कि सेवा में आगे बढ़ते हुए अपने पुरुषार्थ को पीछे न रहने दें। मन को व्यर्थ संकल्पों से बचाएँ, श्रेष्ठ संकल्पों में लगाएँ और अपने संकल्प को कर्म में उतारें।

आज का संकल्प: मैं केवल सेवा बढ़ाने पर नहीं, अपने स्वभाव, संकल्प और कर्म में तीव्र परिवर्तन लाने पर भी ध्यान दूँगा।

📝 अव्यक्त मुरली | 11-10-2026 | रिवा: 18-01-2012

20 Questions × 5 Marks = 100 Marks

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