| 13-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – अब इस मृत्युलोक का अन्त है, अमरलोक की स्थापना हो रही है, इसलिए तुम्हें मृत्युलोक वालों को याद नहीं करना है” | |
| प्रश्नः- | बाप अपने गरीब बच्चों को कौन सी स्मृति दिलाते हैं? |
| उत्तर:- | बच्चे, जब तुम वाइसलेस (पवित्र) थे तो बहुत सुखी थे। तुम्हारे जैसा साहूकार दूसरा कोई नहीं था, तुम अपार सुखी थे। धरती, आसमान सब तुम्हारे हाथ में था। अब बाप तुम्हें फिर से साहूकार बनाने आये हैं। |
| गीत:- | नयन हीन को राह दिखाओ प्रभू… |
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, आत्माओं ने गीत सुना। किसने कहा? आत्माओं के रूहानी बाप ने। रूहानी बाप को रूहानी बच्चों ने कहा – बाबा। उनको ईश्वर भी कहा जाता, पिता भी कहा जाता। कौन सा पिता? परमपिता। बाप हैं दो। एक लौकिक दूसरा पारलौकिक। लौकिक बाप के बच्चे पारलौकिक बाप को पुकारते हैं। हे बाबा, बाबा का नाम? शिव। वह शिव निराकारी पूजा जाता है। उनको कहा जाता है सुप्रीम फादर। लौकिक बाप को सुप्रीम नहीं कहा जाता। ऊंच ते ऊंच सभी आत्माओं का बाप एक ही है। सभी जीव आत्मायें उस बाप को याद करती हैं। आत्मायें यह भूल गई हैं कि हमारा बाप कौन है? पुकारते हैं ओ गॉड फादर, हम नयन हीन को नयन दो तो हम अपने बाप को पहचानें। भक्ति मार्ग में हम अन्धे बन ठोकरें खाते रहते हैं, अब इन ठोकरों से छुड़ाओ। बाप ही कल्प-कल्प आकर भारत को हेविन बनाते हैं। अब कलियुग है, सतयुग आने वाला है। कलियुग और सतयुग के बीच को संगम कहा जाता है। यह है पुरुषोत्तम संगम। बेहद का बाप आकर जो भ्रष्टाचारी बन गये हैं, उन्हों को श्रेष्ठाचारी, पुरुषोत्तम बनाते हैं। लक्ष्मी-नारायण पुरुषोत्तम थे। लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी का राज्य था। यह बाप आकर स्मृति दिलाते हैं। तुम भारतवासी आज से 5 हजार वर्ष पहले स्वर्गवासी थे, अब नर्कवासी हो। आज से 5 हजार वर्ष पहले भारत हेविन था, भारत की बहुत महिमा थी। सोने हीरे के महल थे। अब कुछ नहीं है। उस समय और कोई धर्म नहीं था, सिर्फ सूर्यवंशी थे। चन्द्रवंशी पीछे आते हैं। बाप समझाते हैं तुम ही सूर्यवंशी थे। अब तक लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर बनाते रहते हैं। परन्तु लक्ष्मी-नारायण का राज्य कब था? कैसे राज्य पाया? यह किसको पता नहीं, पूजा करते हैं परन्तु जानते नहीं तो ब्लाइन्ड फेथ हुआ ना। शिव की, लक्ष्मी-नारायण की पूजा करते हैं, बायोग्राफी कोई नहीं जानते। भारतवासी खुद कहते हैं हम पतित हैं। हे पतित-पावन बाबा आओ, आकर हमको दु:खों से, रावण राज्य से लिबरेट करो। बाप आकर सबको लिबरेट करते हैं। बच्चे जानते हैं कि सतयुग में एक ही राज्य था। कांग्रेसी लोग अथवा बापू जी भी यही मांगते थे कि हमको फिर से रामराज्य चाहिए। हम स्वर्गवासी बनने चाहते हैं। अब नर्कवासियों का क्या हाल है, देख रहे हो? इनको कहा जाता है हेल, डेविल वर्ल्ड। यही भारत डीटी वर्ल्ड था। अब डेविल वर्ल्ड बन गया है।
बाबा समझाते हैं तुमने 84 जन्म लिए हैं, न कि 84 लाख। यह तो शास्त्रों में गपोड़े लगा दिये हैं। आज से 5 हजार वर्ष पहले सद्गति मार्ग था। वहाँ न भक्ति, न दु:ख का नामनिशान था, उनको सुखधाम कहा जाता है। बाप समझाते हैं तुम असुल में शान्तिधाम के रहने वाले हो। तुम यहाँ पार्ट बजाने आये हो। पुनर्जन्म 84 होते हैं, न कि 84 लाख। अब बेहद का बाप आया है, तुम बच्चों को बेहद का वर्सा देने। बाप तुम आत्माओं से बात करते हैं। और सतसंगों में मनुष्य, मनुष्य को भक्ति की बातें सुनाते हैं। आधाकल्प जब भारत स्वर्ग था, एक भी पतित नहीं था। अब एक भी पावन नहीं है। यह है पतित दुनिया। बाप समझाते हैं – गीता में श्रीकृष्ण भगवानुवाच लिख दिया है। श्रीकृष्ण भगवान नहीं है, न कि उसने गीता सुनाई है। यह लोग अपने धर्म शास्त्र को भी नहीं जानते। अपने धर्म को ही भूल गये हैं। धर्म मुख्य हैं 4, पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म सूर्यवंशी, पीछे चन्द्रवंशी, दोनों को मिलाकर कहते हैं देवी-देवता धर्म। वहाँ दु:ख का नाम नहीं था। 21 जन्म तुम सुखधाम में थे। फिर रावणराज्य, भक्तिमार्ग शुरू होता है। शिवबाबा कब आते हैं? जब रात होती है। भारतवासी घोर अन्धियारे में आ जाते हैं तब बाबा आते हैं। गुड़ियों की पूजा करते रहते हैं। एक की भी बायोग्राफी नहीं जानते। भक्ति मार्ग में अनेक धक्के खाते हैं, तीर्थो पर जाओ फेरा लगाओ। कोई प्राप्ति नहीं है। बाप कहते हैं – मैं आकर तुमको ब्रह्मा द्वारा यथार्थ ज्ञान सुनाता हूँ। पुकारते हैं कि हमको सुखधाम और शान्तिधाम की राह बताओ।
बाप कहते हैं – आज से 5 हजार वर्ष पहले हमने तुम्हें बहुत साहूकार बनाया था। इतना धन दिया फिर कहाँ गँवाया? तुम कितने साहूकार थे। भारत कौन कहलावे। भारत ही सबसे ऊंचे से ऊंचा खण्ड था। वास्तव में सबका यह तीर्थ है क्योंकि पतित-पावन बाप का बर्थ प्लेस है। जो भी धर्म वाले हैं सभी की बाप आकर सद्गति करते हैं। अब रावण का राज्य सारी सृष्टि में है सिर्फ लंका में नहीं। जब सूर्यवंशी राज्य था तब यह विकार नहीं थे। भारत वाइसलेस था, अब विशश है। सब नर्कवासी हैं। सतयुग में जो दैवी सम्प्रदाय थे, वे फिर 84 जन्म भोग आसुरी सम्प्रदाय बने हैं फिर दैवी सम्प्रदाय बनने हैं। भारत बहुत साहूकार था। अब गरीब बना है इसलिए भीख मांग रहे हैं। बाप तुम गरीब बच्चों को स्मृति दिलाते हैं बच्चे, तुम कितने सुखी थे। तुम्हारे जैसा सुख किसको मिल नहीं सकता। धरती, आसमान सब तुम्हारे हाथों में था। शास्त्रों में कल्प की आयु लम्बी बताकर सभी को कुम्भकरण की आसुरी नींद में सुला दिया है। यह भारत शिवबाबा का स्थापन किया हुआ शिवालय था। वहाँ पवित्रता थी, उस नई दुनिया में देवी-देवता राज्य करते थे। मनुष्य तो यह भी नहीं जानते कि राधे-कृष्ण का आपस में क्या सम्बन्ध है। दोनों अलग-अलग राजधानी के थे फिर स्वयंवर के बाद लक्ष्मी-नारायण बनें। यह ज्ञान कोई मनुष्य मात्र में नहीं है। स्प्रीचुअल नॉलेज सिर्फ एक बाप ही देते हैं। अब बाप कहते हैं – आत्म-अभिमानी बनो। मुझ अपने परमपिता को याद करो। याद से तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। तुम यहाँ आते हो मनुष्य से देवता अथवा पतित से पावन बनने। अब यह है रावण राज्य। भक्ति में रावण राज्य शुरू होता है। सब भक्ति करने वाले रावण के पंजे में हैं। सारी दुनिया 5 विकारों रूपी रावण की कैद में है, शोक वाटिका में है। बाप आकर सबको लिबरेट कर गाइड बन साथ ले जाते हैं। उसके लिए यह महाभारत लड़ाई है, जो 5 हजार वर्ष पहले लगी थी, अब बाप फिर से स्वर्ग बना रहे हैं। ऐसे नहीं जिनको धन बहुत है, वह स्वर्ग में हैं। अभी है ही नर्क। पतित-पावन बाप को कहा जाता है, न कि नदी को। यह सब है भक्ति मार्ग। यह बातें बाबा ही आकर समझाते हैं। अब यह तो जानते हो एक है लौकिक बाप, दूसरा है पारलौकिक, तीसरा है अलौकिक। अब पारलौकिक बाप शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म स्थापन करते हैं। ब्राह्मणों को देवता बनाने के लिए राजयोग सिखलाते हैं। आत्मा ही पुनर्जन्म लेती है। आत्मा ही कहती है मैं एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हूँ। बाप कहते हैं – अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो तो तुम पावन बनेंगे। कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। अब मृत्युलोक का अन्त है, अमरलोक की स्थापना हो रही है। बाकी सब अनेक धर्म खलास हो जायेंगे। सतयुग में एक ही देवी-देवता धर्म था फिर चन्द्रवंशी राम सीता त्रेता में थे। तुम बच्चों को सारे चक्र की याद दिलाते हैं। शान्तिधाम और सुखधाम की स्थापना बाप ही करते हैं। मनुष्य, मनुष्य को सद्गति दे नहीं सकते। वह सब है भक्ति मार्ग के गुरू।
अभी तुम हो ईश्वरीय सन्तान। बाबा से राज्य भाग्य ले रहे हो। यह राजधानी स्थापन हो रही है। प्रजा तो बहुत बननी है। कोटों में कोई राजा बनते हैं। सतयुग को कहा जाता है फूलों का बगीचा। अब है कांटों का जंगल। रावण राज्य बदल रहा है। विनाश होना है। यह ज्ञान अब तुमको मिल रहा है। लक्ष्मी-नारायण को यह ज्ञान नहीं रहता। प्राय: लोप हो जाता है। भक्ति मार्ग में बाप को कोई भी यथार्थ नहीं जानते। बाप है रचयिता। ब्रह्मा विष्णु शंकर भी रचना है। सर्वव्यापी कहने से वर्से का हक खत्म हो जाता है। बाबा आकर सबको वर्सा देते हैं। 84 जन्म वही लेते हैं जो पहले-पहले सतयुग में आते हैं। क्रिश्चियन लोग करके 40 जन्म लेते होंगे। एक भगवान को ढूँढने के लिए कितने धक्के खाते हैं। अब तुम धक्के नही खायेंगे। एक बाप को याद करो तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। यह है यात्रा। यह है गॉड फादरली युनिवर्सिटी। तुम्हारी आत्मा पढ़ती है। साधू-सन्त कह देते – आत्मा निर्लेप है। लेकिन आत्मा ही कर्मों अनुसार दूसरा जन्म लेती है। आत्मा ही अच्छा वा बुरा कर्म करती है। इस समय (कलियुग में) तुम्हारे कर्म विकर्म होते हैं, सतयुग में तुम्हारे कर्म, अकर्म होते हैं। वहाँ विकर्म होता नहीं। वह है पुण्य आत्माओं की दुनिया। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक बाप से बेहद का वर्सा लेना है। श्रेष्ठ कर्म करने हैं। जब बाप मिला है तो किसी भी प्रकार के धक्के नहीं खाने हैं।
2) बाप ने जो स्मृति दिलाई है, उसे स्मृति में रख अपार खुशी में रहना है। कोई भी देहधारी को याद नहीं करना है।
| वरदान:- | स्नेह के पीछे सर्व कमजोरियों को कुर्बान करने वाले समर्थी स्वरूप भव स्नेह की निशानी है कुर्बानी। स्नेह के पीछे कुर्बान करने में कोई मुश्किल वा असम्भव बात भी सम्भव और सहज अनुभव होती है। तो समर्थी स्वरूप के वरदान द्वारा सर्व कमजोरियों को मजबूरी से नहीं दिल से कुर्बान करो क्योंकि सत्य बाप के पास सत्य ही स्वीकार होता है। तो सिर्फ बाप के स्नेह के गीत नहीं गाओ लेकिन स्वयं बाप समान अव्यक्त स्थिति स्वरूप बनो जो सब आपके गीत गायें। |
| स्लोगन:- | संकल्प वा स्वप्न में भी एक दिलाराम की याद रहे तब कहेंगे सच्चे तपस्वी। |
मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य – मनुष्य की एम ऑबजेक्ट क्या है? उसे प्राप्त करने का यथार्थ तरीका
हरेक मनुष्य को यह सोचना जरूर है, अपनी अच्छी जीवन बनाने के लिये क्या उचित है? मनुष्य की लाइफ किसलिए है, उसमें क्या करना है? अब अपनी दिल से पूछें कि वो मेरी जीवन में पलटा (परिवर्तन) हो रहा है? मनुष्य जीवन में पहले तो नॉलेज चाहिए फिर इस जीवन की एम ऑबजेक्ट क्या है? यह तो जरूर मानेंगे कि इस जीवन को सर्वदा सुख और शान्ति चाहिए। क्या अभी वो मिल रही है? इस घोर कलियुग में तो दु:ख अशान्ति के सिवाए और कुछ है ही नहीं, अब सोचना है सुख शान्ति मिलेगी कैसे? सुख और शान्ति यह दो शब्द जो निकले हैं, वो जरूर इसी दुनिया में कब हुए होंगे, तभी तो इन चीज़ों की मांगनी करते हैं। अगर कोई मनुष्य ऐसे कहे कि हमने ऐसी दुनिया देखी ही नहीं तो फिर उस दुनिया को तुम कैसे मानते हो? इस पर समझाया जाता है कि यह दिन और रात जो दो शब्द हैं, तो जरुर रात और दिन चलता होगा। ऐसे कोई नहीं कह सकते कि हमने देखी ही रात है तो दिन को मानूं कैसे? लेकिन जब दो नाम हैं, तो उनका पार्ट भी होगा। वैसे हमने भी सुना है, कि इस कलियुग से कोई ऊंची स्टेज भी थी जिसको सतयुग कहा जाता है! अगर ऐसा ही समय चलता रहे तो फिर उस समय को सतयुग नाम क्यों दिया गया! तो यह सृष्टि अपनी स्टेज बदलती रहती है, जैसे किशोर, बाल, युवा, वृद्ध… बदलते रहते हैं, वैसे सृष्टि भी बदलती रहती है। आज की जीवन और उस जीवन में कितना फर्क है। तो उस श्रेष्ठ जीवन को बनाने का प्रयत्न करना है।
निराकारी दुनिया, आकारी दुनिया और साकारी दुनिया का विस्तार
इस पूरे ब्रह्माण्ड के अन्दर तीन दुनियायें हैं – एक है निराकारी दुनिया, दूसरी है आकारी, तीसरी है साकारी। अब यह तो जान लिया कि निराकार सृष्टि में तो आत्मायें निवास करती हैं और साकार सृष्टि में साकार मनुष्य सम्प्रदाय निवास करते हैं। बाकी है आकारी सूक्ष्म सृष्टि, अब विचार चलता है क्या यह आकारी सृष्टि सदा ही है या कुछ समय उसका पार्ट चलता है? दुनियावी मनुष्य तो समझते हैं सूक्ष्म दुनिया कोई ऊपर है, वहाँ फरिश्ते रहते हैं, उसको ही स्वर्ग कहते हैं। वहाँ जाकर सुख भोगेंगे लेकिन अब यह तो स्पष्ट है कि स्वर्ग और नर्क इस सृष्टि पर ही होता है। बाकी यह जो सूक्ष्म आकारी सृष्टि है, जहाँ शुद्ध आत्माओं का साक्षात्कार होता है, वो तो द्वापर से लेकर शुरू हुए हैं। जब भक्तिमार्ग शुरू होता है तो इससे सिद्ध है निराकार सृष्टि और साकार सृष्टि सदा है ही है। बाकी सूक्ष्म दुनिया सदा तो नहीं कहेंगे, उसमें भी खास ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का साक्षात्कार इसी समय हमको होता है क्योंकि इसी समय परमात्मा तीन कर्तव्य करने के लिए तीन रूप रचते हैं। अच्छा, ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
बापदादा सदा श्रीमत देते हैं कि मन में हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखो – अपकारी पर भी उपकार की वृत्ति रखो, संकल्प सदा सर्व के प्रति श्रेष्ठ हो, नि:स्वार्थ हो, सदा दातापन की भावना हो। सदा स्व परिवर्तन अथवा स्व के श्रेष्ठ कर्मों द्वारा औरों को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाले कर्म हों, तब कहेंगे परोपकारी।
आज की मुरली मंथन मुख्य विषय,
तुलनात्मक अध्ययन
और छोटे प्रश्न–उत्तर
- मुख्य शीर्षक
मृत्युलोक से अमरलोक की ओर — एक बाप की याद से जीवन परिवर्तन!
• देहधारियों की आसक्ति से ऊपर उठो
- आत्म-अभिमानी बनो • बेहदका वर्सा प्राप्तकरो
वीडियो का मुख्य प्रश्न
क्या मेरी याद शरीर और देहधारी सम्बन्धों तक सीमित है, या मैं आत्म-अभिमानी बन एक बाप को याद करता हूँ?
- आज की मुरली का प्रमुख मंथन
मूल मुरली का मुख्य संदेश: “अब इस मृत्युलोक का अन्त है, अमरलोक की स्थापना हो रही है, इसलिए तुम्हें मृत्युलोक वालों को याद नहीं करना है।” मुरली में बाबा बच्चों को आत्म-अभिमानी बनने, एक बाप को याद करने और उस याद से पावन बनने की शिक्षा देते हैं। साथ ही, अपनेश्रेष्ठ कर्मोंऔर अपार खुशी की स्मृति में रहने के लिए प्रेरित करते हैं।
मूल मुरली की बात
- आत्मा को अपना पारलौकिक पिता याद करना है।
- देहधारी सम्बन्धों तथा देह-अभिमान से ऊपर उठकर आत्म-अभिमानी बनना है।
- बाबा की याद से तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ करना है।
- मनुष्य से देवता अथवा पतित से पावन बनने के लक्ष्य को याद रखना है।
- बाबा से मिले ज्ञान को स्मृति में रखकर खुशी और श्रेष्ठ कर्मों में रहना है।
- स्नेह के पीछे कमजोरियों को दिल से त्यागकर बाबासमान बनने का पुरुषार्थ करना है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या
यहाँ “देहधारियों को याद नहीं करना” का आशय मुरली के आध्यात्मिक संदर्भ में देह-अभिमान और देहधारी व्यक्तियों पर आसक्ति के स्थान पर एक बाप की याद को प्राथमिकता देना है। इसे सामान्य मानवीय सम्बन्धों में आवश्यक जिम्मेदारी, सम्मान या देखभाल छोड़ने का निर्देश नहीं समझना चाहिए।
आत्म-अभिमानी स्थिति का व्यावहारिक अर्थ है कि हम अपनी पहचान केवल शरीर, पद, सम्पत्ति या सम्बन्धों से न जोड़ें; अपने संकल्प, कर्म और स्वभाव को भी श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें।
मंथन का सार: सम्बन्ध निभाते हुए भी अपनी बुद्धि को एक बाप की याद और श्रेष्ठ कर्मों में स्थिर रखने का अभ्यास करें।
- एक विषय का अन्य दिनांकित मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन
मुख्य विषय: एक बाप की याद — देह-अभिमान से आत्म-अभिमान की ओर
मुरली 1
9 मार्च 1981
अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात: बाबा एक बाप की याद में रहने और देह, देह के सम्बन्धों तथा पदार्थों की आसक्ति से मुक्त होने पर बल देते हैं। मुरली में बताया गया है कि देह की याद से उससे जुड़े अनेक सम्बन्धों और वस्तुओं की याद भी बुद्धि को अपनी ओर खींच सकती है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
13 अक्टूबर की साकार मुरली भी आत्म-अभिमानी बनकर एक बाप को याद करने की शिक्षा देती है। दोनों का साझा सूत्र है—अपनी आंतरिक पहचान को शरीर और देह-अभिमान से ऊपर उठाकर आत्मिक स्थिति में स्थिर करना।
यह शिक्षा पारिवारिक जिम्मेदारियाँ छोड़ने का निर्देश नहीं है। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी मन को आसक्ति और देह-अभिमान के अधीन न होने दें।
9 मार्च 1981 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2
3 अक्टूबर 1992 अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात: बाबा “मेरा बाबा” की स्मृति को सहज पुरुषार्थ की विधि बताते हैं। अनेक “मेरे” को एक “मेरा बाबा” में समाहित करने का संदेश दिया गया है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
आज की साकार मुरली में बाबा को याद करके पावन बनने और बेहद का वर्सा प्राप्त करने की बात है। 3 अक्टूबर 1992 की मुरली बताती है कि याद को सहज बनाने के लिए मन को अनेक प्रकार के “मेरे” से हटाकर एक बाप के सम्बन्ध की स्मृति में लगाना उपयोगी अभ्यास है।
मंथन प्रश्न:
क्या दिनभर मेरे मन में संसार की अनेक बातें अधिक रहती हैं, या “मेरा बाबा” की स्मृति भी सहज रूप से आती है?
3 अक्टूबर 1992 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3
21 नवंबर 1992 अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात: बाबा एक बाप की याद के साथ ट्रस्टी बनने की शिक्षा देते हैं। शरीर को सेवा के लिए उपयोगी आधार माना गया है; मुरली में “मेरा नहीं, बाप का है” की भावना से कर्म करने पर बल दिया
गया है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
यह मुरली आज की शिक्षा को जीवन में लागू करने का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष स्पष्ट करती है। एक बाप को याद करने का अभ्यास संसार से भागना नहीं, बल्कि शरीर, सम्बन्धों और साधनों के प्रति “मेरेपन” को कम करके उन्हें जिम्मेदारी और सेवा की
भावना से सम्भालना है।
मंथन प्रश्न: क्या मैं अपने परिवार, शरीर और साधनों को केवल अपनी सम्पत्ति मानता हूँ, या उनकी देखभाल को एक जिम्मेदारी भी समझता हूँ?
21 नवंबर 1992 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 4
12 जनवरी 1977 अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात:
बाबा कहते हैं कि स्नेह की व्यावहारिक निशानी अपनी कमजोरियों की कुर्बानी करना है। केवल बापके स्नेह के गीत गाना पर्याप्त नहीं; स्वयं बाप समान स्थिति बनाने का पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
आज की मुरली में भी याद द्वारा पावन बनने और स्नेह के पीछे कमजोरियों को त्यागने की प्रेरणा है। 12 जनवरी 1977 की मुरली इस परिवर्तन को व्यवहार से जोड़ती है—यदि बाप से स्नेह है, तो उस स्नेह को अपनी कमजोरियों में परिवर्तन के रूप में प्रकट करना चाहिए।
12 जनवरी 1977 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक निष्कर्ष
दिनांक
मुख्य शिक्षा
आजकी मुरली से सम्बन्ध
9 मार्च 1981
देह-अभिमान से ऊपर उठकर एक बाप की याद
आत्म-अभिमानी बनने का अभ्यास
3 अक्टूबर 1992
“मेरा बाबा” की सहज स्मृति
याद को दिनचर्या में सहज बनाना
21 नवंबर 1992
ट्रस्टी भाव से शरीर और साधनों का उपयोग
जिम्मेदारियों के साथ अनासक्ति
12 जनवरी 1977
स्नेह के पीछे कमजोरियों की कुर्बानी
याद को व्यवहारिक परिवर्तन में बदलना
13 अक्टूबर 2026
मृत्युलोक की याद से ऊपर उठकर एक बाप को याद करना
आत्मिक पहचान, पावनता और श्रेष्ठ कर्मों का अभ्यास
इन मुरलियों के चुने हुए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास नहीं दिखाई देता। वे एक बाप की याद, आत्मिक स्थिति, अनासक्ति और स्व-परिवर्तन को अलग-अलग पहलुओं से समझाती हैं। यह हमारा तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली का अतिरिक्त कथन नहीं।
- छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: आत्म-अभिमानी बनकर एक बाप को याद करना और पावन बनने का पुरुषार्थ करना।
प्रश्न 2: मृत्युलोक और अमरलोक का उल्लेख किस संदर्भ में है?
उत्तर: मुरली की आध्यात्मिक भाषा में पुरानी दुखमय दुनिया और नई सुखमय दुनिया के
परिवर्तन के संदर्भ में।
प्रश्न 3: आत्म-अभिमानी बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्वयं को केवल शरीर न मानकर आत्मा समझना और उसी स्मृति से कर्म करना।
प्रश्न 4: बाबा की याद से क्या प्राप्ति बताई गई है?
उत्तर: तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने और पावन बनने का पुरुषार्थ।
प्रश्न 5: “मेरा बाबा” की स्मृति का क्या लाभ समझाया गया है?
उत्तर: अनेक “मेरे” के आकर्षण से मन को हटाकर एक बाप की याद सहज बनाना।
प्रश्न 6: ट्रस्टी भाव का क्या अर्थ है?
उत्तर: शरीर और साधनों को जिम्मेदारी तथा सेवा के लिए उपयोग करना, केवल “मेरा” मानकर
आसक्त न होना।
प्रश्न 7: स्नेह की व्यावहारिक निशानी क्या है?
उत्तर: अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दिल से त्यागने का पुरुषार्थ करना।
प्रश्न 8: क्या एक बाप को याद करने का अर्थ परिवार की जिम्मेदारियाँ छोड़ना है?
उत्तर: नहीं। इस मंथन में इसका अर्थ जिम्मेदारियाँ निभाते हुए देह-अभिमान और अत्यधिक आसक्ति
से ऊपर उठना है।
प्रश्न 9: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: क्या मेरी बुद्धि बार-बार देह और पदार्थों में उलझती है, या मैं एक बाप की याद में स्थिर होने का अभ्यास करता हूँ?
मृत्युलोक से अमरलोक की ओर — एक बाप की याद से जीवन परिवर्तन!
• आत्म-अभिमानी बनो
- एक बाप को याद करो • बेहद का वर्सा प्राप्त करो
मुख्य प्रश्न
क्या मेरी याद शरीर और देहधारी सम्बन्धों तक सीमित है, या मैं आत्म-अभिमानी बन एक बाप को याद करता हूँ?
प्रमुख बिंदु
- मृत्युलोक और अमरलोक का आध्यात्मिक संदर्भ।
- देह-अभिमान और आत्म-अभिमान का अन्तर।
- एक बाप की याद और “मेरा बाबा” का सहज अभ्यास।
- अनासक्ति रखते हुए जिम्मेदारियाँ निभाना।
- स्नेह के पीछे अपनी कमजोरियों का परिवर्तन।
- 9 मार्च 1981, 3 अक्टूबर 1992, 21 नवंबर 1992 और 12 जनवरी 1977 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
डिस्क्लेमर
यह वीडियो संलग्न साकार मुरली के आध्यात्मिक अध्ययन और मंथन पर आधारित है। उपलब्ध मूल पाठ पर तारीख 13 अक्टूबर 2026 लिखी है; अन्य दिनांकित मुरलियों के उद्धरण और हमारी तुलनात्मक व्याख्या को अलग समझें। “मृत्युलोक”, “अमरलोक”, “देह-अभिमान” और “एक बाप की याद” जैसे शब्दों को उनके आध्यात्मिक संदर्भ में समझाया गया है। देहधारियों को याद न करने की शिक्षा का अर्थ सामान्य मानवीय जिम्मेदारियाँ, परिवार की आवश्यक देखभाल या दूसरों के प्रति सम्मान छोड़ना नहीं है। तुलनात्मक अध्ययन का उद्देश्य किसी मुरली में परिवर्तन करना या बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि मूल शिक्षाओं पर चिंतन को प्रोत्साहित करना है। दर्शक मूल मुरली का अध्ययन करें और अपने विवेक से इसका मंथन करें।
आज का अंतिम संकल्प
“मैं स्वयं को आत्मा समझकर एक बाप की याद का अभ्यास करूँगा, अपनी जिम्मेदारियाँ निभाऊँगा और स्नेह के साथ अपनी कमजोरियों को बदलने का पुरुषार्थ करूँगा।”
आज का मंथन:
क्या मेरी याद केवल शब्दों तक है, या वह मेरे स्वभाव, कर्म और जीवन की दिशा में भी परिवर्तन ला रही है?
📝 73. साकार मुरली | 13-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
