“समर्पण की ऊंची स्टेज – श्वांसों-श्वांस स्मृति”
अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर अव्यक्त को व्यक्त में देखो। आज एक प्रश्न पूछ रहे हैं। सर्व समर्पण बने हो? (सर्व समर्पण हैं ही) यह सभी का विचार है या और कोई का कोई और विचार है? सर्व समर्पण किसको कहा जाता है? सर्व में यह देह का भान भी आता है। देह ले लेंगे तो देनी भी पड़ेगी। लेकिन देह का भान तोड़कर समर्पण बनना है। आप क्या समझते हो? देह के अभिमान से भी सम्पूर्ण समर्पण बने हो? मर गये हो वा मरते रहते हो? देह के सम्बन्ध और मन के संकल्पों से भी तुम देही हो। यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए तब कहा जाए सर्व समर्पणमय जीवन। जो सर्व त्यागी, सर्व समर्पण जीवन वाला होगा उनकी ही सम्पूर्ण अवस्था गाई जायेगी। और जब सम्पूर्ण बन जायेंगे तो साथ जायेंगे। आपने शुरू में संकल्प किया था ना कि बाबा जायेंगे तो हम भी साथ जायेंगे। फिर ऐसा क्यों नहीं किया? यह भी एक स्नेह है। और संग तोड़ एक संग जोड़ने की यह चैन है जो अन्त समय की निशानी है। जब कहा था तो क्यों नहीं शरीर छोड़ा? छोड़ सकते हो? अभी छूट भी नहीं सकता। क्योंकि जब तक हिसाब-किताब है, अपने शरीर से तब तक छूट नहीं सकता। योग से या भोग से हिसाब-किताब चुक्तू जरूर करना पड़ता है। कोई भी कड़ा हिसाब-किताब रहा हुआ है तो यह शरीर रहेगा। छूट नहीं सकता। वैसे तो समर्पण हो ही लेकिन अब समर्पण की स्टेज ऊंची हो गई है। समर्पण उसको कहा जाता है जो श्वांसों श्वाँस स्मृति में रहे। एक भी श्वाँस विस्मृति का न हो। हर श्वाँस में स्मृति रहे और ऐसे जो होंगे उनकी निशानी क्या है? उनके चेहरे पर क्या नज़र आयेगा? क्या उनके मुख पर होगा, मालूम है? (हर्षितमुख) हर्षितमुखता के सिवाए और भी कुछ होगा? जो जितना सहनशील होगा उनमें उतनी शक्ति बढ़ेगी। जो श्वांसों श्वाँस स्मृति में रहता होगा उसमें सहनशीलता का गुण जरूर होगा और सहनशील होने के कारण एक तो हर्षित और शक्ति दिखाई देगी। उनके चेहरे पर निर्बलता नहीं। यह जो कभी-कभी मुख से निकलता है, कैसे करें, क्या होगा…। यह शब्द निर्बलता के हैं, जो नहीं निकलनें चाहिए। जब मन में आता है तो मुख पर आता है। परन्तु मन में नहीं आना चाहिए। मनमनाभव मध्याजी भव। मनमनाभव का अर्थ बहुत गुह्य है। जैसे ड्रामा का सेकेण्ड बाई सेकेण्ड जिस रीति से, जैसा चलता है, उसी के साथ-साथ मन की स्थिति ऐसे ही ड्रामा की पटरी पर सीधी चलती रहे। जरा भी हिले नहीं। चाहे संकल्प से, चाहे वाणी से। ऐसी अवस्था हो, ड्रामा की पटरी पर चल रहे हो। परन्तु कभी-कभी रुक जाते हो। मुख कभी हिल जाता है। मन की स्थिति हिलती है, फिर आप पकड़ते हो। यह भी जैसे एक दाग हो जाता है। अच्छा।
फिर भी एक बात अब तक भी कुछ वाणी तक आई है, प्रैक्टिकल में नहीं आई है। कौन सी बात वाणी तक आई है प्रैक्टिकल नहीं? यही ड्रामा की ढाल जो सुनाई। लेकिन और बात भी बता रहे थे। वह यह है जैसे अब समय नजदीक है, वैसे समय के अनुसार जो अन्तर्मुखता की अवस्था, वाणी से परे, अन्तर्मुख होकर, कर्मणा में अव्यक्त स्थिति में रहकर धारण करने की अवस्था दिखाई देनी चाहिए, वह कुछ अभी भी कम है। कारोबार भी चले और यह स्थिति भी रहे। यह दोनों ही इकट्ठा एक समान रहे। अभी इसमें कमी है। अब साकार तो अव्यक्त स्थिति स्वरूप में स्थित है। लेकिन आप बच्चे भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे तो अव्यक्त मुलाकात का अलौकिक अनुभव कर सकते हो। एक मुख्य बात और भी है, वर्तमान समय ध्यान पर देते हैं, जो तुम्हारे में होनी चाहिए। वह कौन सी? कोई को आता है? जो मुख्य साकार रूप में भी कहते थे, अमृतवेले उठना। अमृतवेले का वायुमण्डल ऐसा ही रहेगा। साकार में अमृतवेले बच्चों से दूर होते भी मुलाकात करते थे। लेकिन अभी जब अमृतवेले चक्र लगाने बाबा आते हैं तो वह वायुमण्डल देखा नहीं हैं। क्यों थक गये? इस अमृतवेले के अलौकिक अनुभव में थकावट दूर हो जाती है। परन्तु यह कमी देखने में आती है। यह बापदादा की शुभ इच्छा है कि जल्दी से जल्दी इस अव्यक्त स्थिति का हर एक बच्चा अनुभव करे। वैसे तो आप जब साकार से साकार रीति से मिलते थे तो आप की आकारी स्थिति बन जाती थी। अब जितना-जितना अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होंगे उतना ही अलौकिक अनुभव करेंगे।
आन्तरिक स्थिति को बदलने का अभ्यास है।
2. सर्व समर्पण किसे कहा जाए?
प्रश्न किया गया—
“सर्व समर्पण बने हो?”
उत्तर आता है कि सर्व समर्पण केवल यह नहीं कि हमने बाहरी चीजें छोड़ दीं।
सर्व में देह का भान भी आता है।
इसलिए स्वयं से प्रश्न करना है—
क्या देह के अभिमान से भी सम्पूर्ण समर्पण बने हैं?
देह को लेना है तो देनी भी पड़ेगी, लेकिन लक्ष्य है—
देह का भान तोड़कर समर्पण बनना।
3. देह-अभिमान से सम्पूर्ण समर्पण
सम्पूर्ण समर्पण की अवस्था तब कही जाएगी जब—
- देह का अभिमान टूट जाए।
- देह के सम्बन्धों से ऊपर उठें।
- मन के संकल्पों से भी देही रहें।
- जीवन सर्व समर्पणमय बन जाए।
मुरली में स्पष्ट कहा गया है—
“यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए तब कहा जाए सर्व समर्पणमय जीवन।”
4. सर्व त्यागी और सर्व समर्पण जीवन
जो आत्मा—
सर्व त्यागी
और
सर्व समर्पण जीवन वाली
होगी, उसी की सम्पूर्ण अवस्था गाई जाएगी।
सम्पूर्ण बन जाने पर साथ जाने की बात भी इसी संदर्भ में आती है।
आरम्भ में संकल्प किया था—
“बाबा जायेंगे तो हम भी साथ जायेंगे।”
लेकिन शरीर छोड़ना केवल संकल्प से सम्भव नहीं।
5. शरीर क्यों नहीं छूटता?
जब तक हिसाब-किताब बाकी है, तब तक शरीर से छुटकारा नहीं हो सकता।
मुरली में कहा गया है—
योग से या भोग से हिसाब-किताब चुक्तू जरूर करना पड़ता है।
जब तक कोई कड़ा हिसाब-किताब बाकी है, तब तक शरीर रहेगा।
इसलिए समर्पण के साथ कर्मों के हिसाब-किताब को भी चुक्तू करना आवश्यक है।
6. समर्पण की ऊँची स्टेज
समर्पण तो होना ही है, लेकिन अब—
समर्पण की स्टेज ऊँची हो गई है।
ऊँची स्टेज की मुख्य पहचान है—
श्वाँसों-श्वाँस स्मृति।
अर्थात्—
एक भी श्वाँस विस्मृति की न हो।
हर श्वाँस में स्मृति रहे।
7. श्वाँसों-श्वाँस स्मृति की निशानी
प्रश्न है—
जो श्वाँसों-श्वाँस स्मृति में रहेगा उसकी निशानी क्या होगी?
उसके चेहरे पर क्या दिखाई देगा?
मुरली में उत्तर आता है—
हर्षितमुखता।
लेकिन केवल हर्षितमुखता ही नहीं।
उसमें—
सहनशीलता और शक्ति भी दिखाई देगी।
8. सहनशीलता से शक्ति
एक महत्वपूर्ण सूत्र है—
जो जितना सहनशील होगा, उसमें उतनी शक्ति बढ़ेगी।
जो श्वाँसों-श्वाँस स्मृति में रहेगा, उसमें सहनशीलता का गुण अवश्य होगा।
इसलिए उसकी स्थिति में दिखाई देगा—
- हर्षितमुखता
- सहनशीलता
- शक्ति
और चेहरे पर निर्बलता नहीं होगी।
9. निर्बलता के शब्दों से सावधान
कभी-कभी मुख से ऐसे शब्द निकलते हैं—
“कैसे करें?”
“क्या होगा?”
मुरली के अनुसार ये शब्द—
निर्बलता के शब्द हैं।
ये शब्द मुख से नहीं निकलने चाहिए।
क्योंकि—
जो मन में आता है, वही मुख पर आता है।
इसलिए केवल वाणी को रोकना पर्याप्त नहीं।
मन में भी निर्बलता के संकल्प नहीं आने चाहिए।
10. मनमनाभव का गहरा अर्थ
मुरली में कहा गया—
“मनमनाभव, मध्याजी भव।”
लेकिन मनमनाभव का अर्थ बहुत गुह्य है।
यह केवल मन को एक जगह लगाने की बात नहीं है।
मन की स्थिति ऐसी हो कि—
ड्रामा का सेकेण्ड बाई सेकेण्ड जैसा चलता है, उसी के साथ मन की स्थिति भी ड्रामा की पटरी पर सीधी चलती रहे।
11. ड्रामा की पटरी पर सीधी स्थिति
ड्रामा की पटरी पर चलते हुए मन की स्थिति में—
जरा भी हलचल न हो।
चाहे—
- संकल्प से,
- वाणी से,
- परिस्थिति से,
स्थिति को हिलना नहीं है।
ऐसी अवस्था हो जैसे आत्मा ड्रामा की पटरी पर लगातार सीधी चल रही है।
12. स्थिति का हिलना भी एक दाग
कभी-कभी मन रुक जाता है।
मुख हिल जाता है।
मन की स्थिति भी हिलती है।
बाद में हम उसे पकड़ते हैं और फिर अपनी स्थिति को ठीक करते हैं।
लेकिन मुरली संकेत देती है कि—
यह भी जैसे एक दाग हो जाता है।
इसलिए लक्ष्य है कि स्थिति पहले से ही स्थिर रहे।
13. वाणी से आगे — प्रैक्टिकल अवस्था
एक बात अभी तक कुछ हद तक वाणी तक आई है, लेकिन प्रैक्टिकल में पूरी तरह नहीं आई।
वह क्या है?
ड्रामा की ढाल।
ड्रामा का ज्ञान सुनाया गया है, लेकिन उस ज्ञान के अनुसार स्थिति को हर परिस्थिति में स्थिर रखना अभी और अभ्यास मांगता है।
14. समय नजदीक — अन्तर्मुखता आवश्यक
जैसे-जैसे समय नजदीक है, वैसे-वैसे एक विशेष अवस्था दिखाई देनी चाहिए—
अन्तर्मुखता की अवस्था।
अर्थात्—
- वाणी से परे,
- अन्तर्मुख होकर,
- कर्मणा में रहते हुए,
- अव्यक्त स्थिति धारण करना।
यही वर्तमान समय की विशेष आवश्यकता बताई गई है।
15. कारोबार भी चले और अव्यक्त स्थिति भी
अन्तर्मुख और अव्यक्त रहने का अर्थ कारोबार छोड़ना नहीं है।
मुरली में स्पष्ट है—
कारोबार भी चले और अव्यक्त स्थिति भी रहे।
दोनों एक साथ और एक समान रहें।
अभी इस अवस्था में कुछ कमी बताई गई है।
इसलिए लक्ष्य है—
कार्य करते हुए भी अव्यक्त स्थिति में रहना।
16. साकार से अव्यक्त स्थिति
बापदादा स्वयं अव्यक्त स्थिति स्वरूप में स्थित हैं।
अब बच्चों को भी—
अव्यक्त स्थिति में स्थित होना है।
जब बच्चे अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे तब—
अव्यक्त मुलाकात का अलौकिक अनुभव कर सकेंगे।
यह अव्यक्त स्थिति ही उस अलौकिक अनुभव का आधार बनती है।
17. अमृतवेला — विशेष समय
मुरली में अमृतवेले पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है।
मुख्य रूप से—
अमृतवेले उठना।
अमृतवेले का वातावरण विशेष होता है।
साकार रूप में भी अमृतवेले बच्चों से दूर होते हुए मुलाकात होती थी।
अब अव्यक्त रूप में अमृतवेले चक्र लगाने का विशेष अनुभव प्राप्त करना है।
18. अमृतवेले का अलौकिक अनुभव
एक प्रश्न उठता है—
अमृतवेले की मुलाकात का अनुभव क्यों नहीं हो रहा?
क्या थक गये?
मुरली कहती है—
अमृतवेले के अलौकिक अनुभव में थकावट दूर हो जाती है।
इसलिए थकावट को कारण बनाकर अमृतवेले के अभ्यास को छोड़ना नहीं है।
अमृतवेला स्वयं एक अलौकिक अनुभव का माध्यम है।
19. बापदादा की शुभ इच्छा
बापदादा की शुभ इच्छा है कि—
जल्दी से जल्दी हर बच्चा अव्यक्त स्थिति का अनुभव करे।
यह अनुभव केवल किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं होना चाहिए।
अव्यक्त स्थिति जीवन में अनुभव होनी चाहिए।
20. साकार से साकार और अव्यक्त से अव्यक्त मुलाकात
जब साकार रूप में साकार रीति से मिलते थे तो—
आकारी स्थिति बन जाती थी।
अब लक्ष्य है—
अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होना।
जितना-जितना अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होंगे—
उतना ही अलौकिक अनुभव करेंगे।
21. सम्पूर्ण समर्पण की पहचान
इस पूरी मुरली को एक साथ देखें तो सम्पूर्ण समर्पण की पहचान है:
देह-अभिमान समाप्त
↓
देह और मन के सम्बन्धों से ऊपर
↓
श्वाँसों-श्वाँस स्मृति
↓
हर्षितमुखता
↓
सहनशीलता
↓
शक्ति
↓
निर्बलता के संकल्प समाप्त
↓
ड्रामा की पटरी पर स्थिर स्थिति
↓
अन्तर्मुखता
↓
कारोबार के साथ अव्यक्त स्थिति
↓
अमृतवेले का अलौकिक अनुभव
↓
अव्यक्त आकारी स्थिति
आत्म-चेकिंग
प्रतिदिन स्वयं से पूछें:
- क्या मैं स्वयं को सर्व समर्पण समझता हूँ?
- क्या मेरे अंदर देह का अभिमान अभी भी है?
- क्या मैं देह के सम्बन्धों से ऊपर देही स्थिति में रहता हूँ?
- क्या मेरे मन के संकल्प भी समर्पित हैं?
- क्या मेरी स्मृति श्वाँसों-श्वाँस रहती है?
- क्या मेरे चेहरे पर हर्षितमुखता दिखाई देती है?
- क्या मुझमें सहनशीलता बढ़ रही है?
- क्या मेरी सहनशीलता के साथ शक्ति भी बढ़ रही है?
- क्या मेरे मुख से “कैसे करें?” या “क्या होगा?” जैसे निर्बलता के शब्द निकलते हैं?
- क्या मन में भी ऐसे निर्बल संकल्प आते हैं?
- क्या मेरी मन की स्थिति ड्रामा की पटरी पर सीधी चल रही है?
- क्या छोटी-सी परिस्थिति में मेरी स्थिति हिल जाती है?
- क्या मैं कारोबार करते हुए अव्यक्त स्थिति में रह सकता हूँ?
- क्या मेरी अन्तर्मुखता बढ़ रही है?
- क्या मैं अमृतवेले उठकर अलौकिक अनुभव करता हूँ?
- क्या अमृतवेले की स्थिति मेरी थकावट दूर करती है?
- क्या मैं अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होने का अभ्यास कर रहा हूँ?
- क्या मैं वाणी से आगे प्रैक्टिकल अवस्था में जा रहा हूँ?
Short Questions & Answers
1. सर्व समर्पण किसे कहा जाता है?
उत्तर: जब देह का अभिमान भी टूट जाए और जीवन सर्व समर्पणमय हो जाए।
2. सर्व में क्या भी आता है?
उत्तर: देह का भान भी आता है।
3. देह के अभिमान के साथ क्या करना है?
उत्तर: देह का भान तोड़कर समर्पण बनना है।
4. शरीर कब तक नहीं छूट सकता?
उत्तर: जब तक हिसाब-किताब बाकी है।
5. हिसाब-किताब कैसे चुक्तू करना पड़ता है?
उत्तर: योग से या भोग से।
6. समर्पण की ऊँची स्टेज किसे कहा गया है?
उत्तर: श्वाँसों-श्वाँस स्मृति में रहने को।
7. श्वाँसों-श्वाँस स्मृति का अर्थ क्या है?
उत्तर: एक भी श्वाँस विस्मृति की न हो और हर श्वाँस में स्मृति रहे।
8. श्वाँसों-श्वाँस स्मृति वाले की मुख्य निशानी क्या है?
उत्तर: हर्षितमुखता।
9. सहनशीलता का शक्ति से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: जो जितना सहनशील होगा, उसमें उतनी शक्ति बढ़ेगी।
10. “कैसे करें, क्या होगा” जैसे शब्द किसकी निशानी हैं?
उत्तर: निर्बलता की।
11. निर्बलता के शब्द कहाँ से आते हैं?
उत्तर: जो मन में आता है वही मुख पर आता है।
12. मनमनाभव का गुह्य अर्थ क्या बताया गया है?
उत्तर: मन की स्थिति को ड्रामा की पटरी पर सेकेण्ड-बाई-सेकेण्ड सीधा चलाते रहना।
13. स्थिति को कैसी रहना है?
उत्तर: ड्रामा की पटरी पर जरा भी हिले बिना।
14. स्थिति का हिलना किसके समान बताया गया है?
उत्तर: जैसे एक दाग हो जाना।
15. वर्तमान समय किस अवस्था की आवश्यकता है?
उत्तर: अन्तर्मुखता और वाणी से परे अव्यक्त स्थिति की।
16. अव्यक्त स्थिति में रहते हुए क्या करना है?
उत्तर: कारोबार भी चलाना है और अव्यक्त स्थिति भी रखनी है।
17. अमृतवेले के बारे में क्या मुख्य बात कही गई है?
उत्तर: अमृतवेले उठकर अलौकिक वातावरण और अनुभव करना है।
18. अमृतवेले के अलौकिक अनुभव से क्या होता है?
उत्तर: थकावट दूर हो जाती है।
19. बापदादा की शुभ इच्छा क्या है?
उत्तर: जल्दी से जल्दी हर बच्चा अव्यक्त स्थिति का अनुभव करे।
20. साकार से साकार मिलने पर क्या स्थिति बनती थी?
उत्तर: आकारी स्थिति बन जाती थी।
21. अब किस स्थिति में स्थित होना है?
उत्तर: अव्यक्त आकारी स्थिति में।
22. अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होने से क्या होगा?
उत्तर: अलौकिक अनुभव होगा।
23. सम्पूर्ण समर्पण की एक मुख्य पहचान क्या है?
उत्तर: श्वाँसों-श्वाँस स्मृति।
24. सम्पूर्ण समर्पण में चेहरे पर क्या दिखाई देगा?
उत्तर: हर्षितमुखता, सहनशीलता और शक्ति।
25. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: देह-अभिमान से ऊपर उठकर श्वाँसों-श्वाँस स्मृति में रहना, ड्रामा की पटरी पर स्थिति को स्थिर रखना और कारोबार करते हुए भी अव्यक्त आकारी स्थिति का अनुभव करना।
निष्कर्ष
25 जनवरी 1969 की इस मुरली में समर्पण की ऊँची स्टेज को केवल बाहरी त्याग के रूप में नहीं, बल्कि श्वाँसों-श्वाँस स्मृति के रूप में समझाया गया है।
सच्चा सर्व समर्पण तब है जब—
देह का अभिमान टूटे,
मन के संकल्प समर्पित हों,
हर श्वाँस में स्मृति हो,
चेहरे पर हर्षितमुखता हो,
सहनशीलता से शक्ति बढ़े,
निर्बलता के संकल्प समाप्त हों,
और स्थिति ड्रामा की पटरी पर सीधी चले।
इसके साथ वर्तमान समय का विशेष पुरुषार्थ है—
“कारोबार भी चले और अव्यक्त स्थिति भी रहे।”
अमृतवेला, अन्तर्मुखता और अव्यक्त आकारी स्थिति के अभ्यास से वह अलौकिक अनुभव प्राप्त करना है जिसकी बापदादा शुभ इच्छा करते हैं।
समर्पण की ऊँची स्टेज — श्वाँसों-श्वाँस स्मृति।
📝 02 | अव्यक्त मुरली | 25-01-1969
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