03 | अव्यक्त मुरली | 02 February 1969

2 February 1969 | हिंदी · “अव्यक्त मिलन के अनुभव की विधि”

“अव्यक्त मिलन के अनुभव की विधि”

प्रेम स्वरूप बच्चे, ज्ञान सहित प्रेम जो होता है वही यथार्थ प्रेम होता है। आप सभी का प्रेम-रस बापदादा को भी खींच लाता है। सभी बच्चों के दिल के अन्दर एक आशा दिखाई दे रही है। वह कौन सी? कई बच्चों ने सन्देश भेजा कि आप हमें भी अपने अव्यक्त वतन का अनुभव कराओ। यह सभी बच्चों की आशायें अब पूर्ण होने का समय पहुंच ही गया है। आप कहेंगे कि सभी सन्देशी बन जायेंगे। लेकिन नहीं। अव्यक्त वतन का अनुभव भी बच्चे करेंगे। लेकिन दिव्यबुद्धि के आधार पर जो अब अलौकिक अनुभव कर सकते हो वह दिव्य दृष्टि द्वारा करने से भी बहुत लाभदायक, अलौकिक और अनोखा है। इसलिए जो भी बच्चे चाहते हैं कि अव्यक्त बाप से मुलाकात करें, वह कर सकते हैं। कैसे कर सकते हैं, इसका तरीका सिर्फ यही है कि अमृतवेले याद में बैठो और यही संकल्प रखो कि अब हम अव्यक्त बापदादा से मुलाकात करें। जैसे साकार में मिलने का समय मालूम होता था तो नींद नहीं आती थी और समय से पहले ही बुद्धि द्वारा इसी अनुभव में रहते थे। वैसे अब भी अव्यक्त मिलन का अनुभव प्राप्त करना चाहते हो तो उसका बहुत सहज तरीका यह है। अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर रूह-रूहान करो। तो अनुभव करेंगे कि सचमुच बाप के साथ बातचीत कर रहे हैं। और इसी रूह-रूहान में जैसे सन्देशियों को कई दृश्य दिखाते हैं वैसे ही बहुत गुह्य, गोपनीय रहस्य बुद्धियोग से अनुभव करेंगे। लेकिन एक बात यह अनुभव करने के लिए आवश्यक है। वह कौनसी? मालूम है? अमृतवेले भी अव्यक्त स्थिति में वही स्थित हो सकेंगे जो सारा दिन अव्यक्त स्थिति में और अन्तर्मुख स्थिति में स्थित होंगे। वही अमृतवेले यह अनुभव कर सकेंगे। इसलिए अगर स्नेह है और मिलने की आशा है तो यह तरीका बहुत सहज है। करने वाले कर सकते हैं और मुलाकात का अनोखा अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

वतन में बैठे-बैठे कई बच्चों के दिलों की आवाज पहुंचती रहती है। आप सोचते होंगे – शिवबाबा बहुत कठोर है लेकिन जो होता है उसमें रहस्य और कल्याण है। इसलिए जो आवाज पहुंचती है वह सुनकर के हर्षाता रहता हूँ। क्या बापदादा निर्मोही हैं? आप सभी बच्चे निर्मोही हो? निर्मोही बने हो? तो बापदादा निर्मोही और बच्चों में शुद्ध मोह तो मिलन कैसे होगा। बापदादा में शुद्ध मोह है? (साकार बाबा का बच्चों में शुद्ध प्यार था) शिवबाबा का नहीं है? बापदादा का है? (जैसा हमारा है वैसा नहीं) शुद्ध मोह बच्चों से भी जास्ती है। लेकिन बापदादा और बच्चों में एक अन्तर है। वह शुद्ध मोह में आते हुए भी निर्मोही है और बच्चे शुद्ध मोह में आते हैं तो कुछ स्वरूप बन जाते हैं। या तो प्यारे बनते या तो न्यारे बनते। लेकिन बापदादा न्यारे और प्यारे साथ-साथ बनते हैं। यह अन्तर जो रहा हुआ है इसको जब मिटायेंगे तो क्या बनेंगे? अन्तर्मुख, अव्यक्त, अलौकिक। अभी कुछ कुछ लौकिकपन भी मिल जाता है। लेकिन जब यह अन्तर खत्म कर देंगे तो बिल्कुल अलौकिक और अन्तर्मुखी, अव्यक्त फरिश्ते नज़र आयेंगे। इस साकार वतन में रहते हुए भी फरिश्ते बन सकते हो। आप फिर कहेंगे आप वतन में जाकर फरिश्ता क्यों बनें? यहाँ ही बनते। लेकिन नहीं। जो बच्चों का काम वह बच्चों को साजे। जो बाप का कार्य है वह बाप ही करते हैं। बच्चों को अब पढ़ाई का शो दिखाना है। टीचर को पढ़ाई का शो नहीं दिखाना है? टीचर को पढ़ाई पढ़ानी होती है। स्टूडेन्ट को पढ़ाई का शो दिखाना होता है। शो केस में शक्तियों को पाण्डवों को आना है। बापदादा तो है ही गुप्त।

अभी सभी के दिल में यही संकल्प है कि अब जल्दी-जल्दी ड्रामा की सीन चलकर खत्म हो लेकिन जल्दी होगी? हो सकती है? होगी या हो सकती है? भावी जो बनी हुई है, वह तो बनी हुई बनी ही रहेगी। लेकिन बनी हुई भावी में यह इतना नज़र आता है कि अगर कल्प पहले माफिक संकल्प आता है तो संकल्प के साथ-साथ अवश्य पहले भी पुरुषार्थ तीव्र किया होगा। तो यह भी संकल्प आता है कि ड्रामा का सीन जल्दी पूरा कर सभी अव्यक्त वतनवासी बन जाएं। बनना तो है। लेकिन आप बच्चों में इतनी शक्ति है जो अव्यक्त वतन को भी व्यक्त में खींचकर ला सकते हो। अव्यक्त वतन का नक्शा व्यक्त वतन में बना सकते हो। आशायें तो हरेक की बहुत हैं। ऐसे ही पहुंचती हैं जैसे इस साकार दुनिया में बहुत बड़ी आफिस होती है टेलीफोन और टेलीग्राफ की, वैसे ही बहुत शुद्ध संकल्पों की तारें वतन में पहुंचती रहती हैं। अभी क्या करना है? कई बच्चों के कुछ लोक संग्रह प्रति प्रश्न भी हैं वह भी पहुंचते हैं। कई बच्चे मूंझते हैं कि साकार द्वारा तो यह कहा कि सूक्ष्मवतन है ही नहीं, तो बाबा कहाँ गये? कहाँ से मिलने आते है? कहाँ यह सन्देश भेजते हैं? क्यों भोग लगाते हो? इसका भी राज़ है। क्यों कहा गया था? इसका मूल कारण यही है कि जैसे आप लोगों ने देखा होगा कि कभी-कभी छोटे बच्चे जब कोई चीज़ के पीछे लग जाते हैं तो वह चीज़ भल अच्छी भी होती है लेकिन हद से ज्यादा उस अच्छी चीज के पीछे पड़ जाते हैं तो बच्चों से क्या किया जाता है? वह चीज़ उनकी आंखों से छिपाकर यह कहा जाता है कि है ही नहीं। इसलिए ही कहा जाता है कि इसकी जो एक्स्ट्रा लगन लग गई है, वह कुछ ठीक हो जाए। इसी रीति से वर्तमान समय कई बच्चे इन्हीं बातों में कुछ चटक गये थे। तो उनको छुड़ाने के लिए साकार में कहते थे कि यह सूक्ष्मवतन है ही नहीं। तो यह भी बच्चों की इस बात से बुद्धि हटाने के लिए कहा गया था। लेकिन इसका भाव यह नहीं है कि अगर बच्चों से चीज़ छिपाई जाती है तो वह चीज खत्म हो जाती है। नहीं। यह एक युक्ति है, चटकी हुई चीज़ से छुड़ाने की। तो यह भी युक्ति की। अगर सूक्ष्मवतन नहीं तो भोग कहाँ लगाते हो? इस रसम रिवाज को कायम क्यों रखा? कोई भी ऐसा कार्य होता है तो खुद भी सन्देश क्यों पुछवाते थे? तो ऐसे नहीं कि सूक्ष्मवतन नहीं है। सूक्ष्मवतन है। लेकिन अब सूक्ष्मवतन में आने जाने के बजाए स्वयं ही सूक्ष्मवतन वासी बनना है। यही बापदादा की बच्चों में आशा है। आना-जाना ज्यादा नहीं होना चाहिए। यह यथार्थ है। कमाई किसमें है? तो बाप बच्चों की कमाई को देखते हैं और कमाई के लायक बनाते हैं। इसलिए यह सभी रहस्य बोलते रहे। अभी समझा कि क्यों कहा था और अब क्या है? सूक्ष्मवतन के अव्यक्त अनुभव को अनुभव करो। सूक्ष्म स्थिति को अनुभव करो। आने जाने की आशा अल्पकाल की है। अल्पकाल के बजाए सदा अपने को सूक्ष्मवतनवासी क्यों नहीं बनाते? और सूक्ष्मवतनवासी बनने से ही बहुत वन्डरफुल अनुभव करेंगे। खुद आप लोग वर्णन करेंगे कि यह अनुभव और सन्देशियों के अनुभव में कितना फर्क है, वह कमाई नहीं। यह कमाई भी है और अनुभव भी। तो एक ही समय दो प्राप्ति हो वह अच्छा या एक ही चाहते हो?

और कई बच्चों के मन में यह भी प्रश्न है कि ना मालूम जो बापदादा कहते थे कि सभी को साथ में ले जायेंगे, अब वह तो चले गये। लेकिन वह चले गये हैं? मुक्तिधाम में जा नहीं सकते – सिवाए बारात वा बच्चों के। बारात के बिगर अकेले जा सकते हैं? बारात तैयार है? यही सुना है अब तक कि बारात के साथ ही जायेंगे। जब बारात ही सज़ रही है तो अकेले कैसे जायेंगे। अभी तो सूक्ष्मवतन में ही अव्यक्त रूप से स्थापना का कार्य चलता रहेगा। जब तक स्थापना का कार्य समाप्त नहीं हुआ है तब तक बिना कार्य सफल किये हुए घर नहीं लौटेंगे, साथ ही चलेंगे और फिर चलने के बाद क्या करेंगे? मालूम है – क्या करेंगे? साथ चलेंगे और साथ रहेंगे। और फिर साथ-साथ ही सृष्टि पर आयेंगे। आप बच्चों का जो गीत है कभी भी हाथ और साथ न छूटे, तो बच्चों का भी वायदा है तो बाप का भी वायदा है। बाप अपने वायदे से बदल नहीं सकते। और भी कोई प्रश्न है? यूं तो समय प्रति समय सब स्पष्ट होता ही जायेगा। कईयों के मन में यह भी है ना कि ना मालूम जन्म होगा वा क्या होगा? जन्म होगा? जैसे आप की मम्मा का जन्म हुआ वैसे होगा? आप बच्चों का विवेक क्या कहता है? ड्रामा की भावी को देख सकते हो? थोड़ा-थोड़ा देख सकते हो? जब आप लोग सबको कहते हो कि हम त्रिकालदर्शी बाप के बच्चे हैं तो आने वाले काल को नहीं जानते हो? आपके मन के विवेक अनुसार क्या होना चाहिए? अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर हाँ वा नाँ कहो? तो जवाब निकल आयेगा। (इस रीति से बापदादा ने दो चार से पूछा) बहुत करके सभी का यही विचार था कि नहीं होगा। आज ही उत्तर चाहते हो या बाद में! हलचल तो नहीं मच रही है। यह भी एक खेल रचा जाता है। छोटे-छोटे बच्चे तालाब में पत्थर मारकर उनकी लहरों से खेलते हैं। तो यह भी एक खेल है। बाप तुम सभी के विचार सागर में प्रश्नों के पत्थर फेंक कर तुम्हारे बुद्धि रूपी सागर में लहर उत्पन्न कर रहे हैं। उन्हीं लहरों का खेल बापदादा देख रहे हैं। अभी आप सबके साथ ही अव्यक्त रूप से स्थापना के कार्य में लगे रहेंगे। जब तक स्थापना का पार्ट है तब तक अव्यक्त रूप से आप सभी के साथ ही हैं। समझ गये?

वतन में मम्मा को भी इमर्ज किया था। पता है क्या बात चली? जैसे साकार रूप में साकार वतन में मम्मा बोलती थी कि बाबा आप बैठे रहिये हम सभी काम कर लेंगे। इसी ही रीति से वतन में भी यही कहा कि हम सभी कार्य स्थापना के जो करने हैं वह करेंगे। आप बच्चों के साथ ही बच्चों को बहलाते रहिये। ऐसे ही साकार में कहती थी। वही वतन में रूह-रूहान चली। आप सभी के मन में तो होगा ही कि हमारी मम्मा कहां गई। अभी यह राज़ इस समय स्पष्ट करने का नहीं है। कुछ समय के बाद सुनायेंगे कि वह कहां और क्या कर रही है। स्थापना के कार्य में भी मददगार है लेकिन भिन्न नाम रूप से। अच्छा – अब तो टाइम हो गया है।

आज वतन में दूर से ही सवेरे से खुशबू आ रही थी। देख रहे थे कैसे स्नेह से चीजें बना रहे हैं। आपने देखा, भण्डारे में चक्र लगाया? चीजों की खुशबू नहीं स्नेह की खुशबू आ रही थी। यह स्नेह ही अविनाशी बनता है। अविनाशी स्नेह है ना? याद हरेक की पहुंचती है, उसका रेसपान्ड लेने के लिए अवस्था चाहिए। रेसपान्ड फौरन मिलता है। जैसे साकार में बच्चे बाबा कहते थे तो बच्चों को रेसपान्ड मिलता था। तो रेसपान्ड अब भी फौरन मिलता है लेकिन बीच में व्यक्त भाव को छोड़ना पड़ेगा तब ही उस रेसपान्ड को सुन सकेंगे। अब तो और ही ज्यादा चारों ओर सर्विस करने का अनुभव कर रहे हैं। अब अव्यक्त होने के कारण एक और क्वालिटी बढ़ गई है। कौन सी? मालूम है? वह यह है – पहले तो बाहरयामी था, अभी अन्तर्यामी हो गया हूँ। अव्यक्त स्थिति में जानने की आवश्यकता नहीं रहती। स्वत: ही एक सेकेण्ड में सभी का नक्शा देखने में आ रहा है। इसलिए कहते हैं कि पहले से एक और गुण बढ़ गया है। अव्यक्त स्थिति में तो खुशबू से ही पेट भर जाता है। आप लोगों को मालूम है?

एक मुख्य शिक्षा बच्चों के प्रति दे रहे हैं। अब सर्विस तो करनी ही है, यह तो सभी बच्चों की बुद्धि में लक्ष्य है और लक्ष्य को पूर्ण भी करेंगे लेकिन इस लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए बीच में एक मुख्य विघ्न आयेगा। वह कौन सा, पता है? मुख्य विघ्न सर्विस में बाधा डालने के लिए कौन सा आयेगा? सभी के आगे नहीं मैजारटी के आगे आयेगा! वह कौन सा विघ्न है? पहले से ही बता देते हैं। सर्विस करते-करते यह ध्यान रखना कि मैंने यह किया, मैं ही यह कर सकता हूँ…। यह मैं पन आना इसको ही कहा जाता है ज्ञान का अभिमान, बुद्धि का अभिमान, सर्विस का अभिमान। इन रूपों में आगे चलकर विघ्न आयेंगे। लेकिन पहले से ही इस मुख्य विघ्न को आने नहीं देना। इसके लिए सदा एक शब्द याद रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से ही निराकारी, निरंहकारी और नम्रचित, नि:संकल्प अवस्था में रह सकते हैं।

अगर मैंने किया, मैं-मैं आया तो मालूम है क्या होगा? जैसे निमित्त बनने से निराकारी, निरंहकारी, निरसंकल्प स्थिति होती है वैसे ही मैं मैं आने से मगरूरी, मुरझाइस, मायूसी आ जायेगी। उसकी फिर रिजल्ट क्या होगी? आखरीन अन्त में उसकी रिजल्ट यही होती है कि चलते-चलते जीते हुए भी मर जाते हैं। इसलिए इस मुख्य शिक्षा को हमेशा साथ रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से कोई भी अंहकार उत्पन्न नहीं होगा। नहीं तो अगर मैं पन आ गया तो मतभेद के चक्र में आ जायेंगे। इसलिए इन अनेक व्यर्थ के चक्करों से बचने के लिए स्वदर्शन चक्र को याद रखना। क्योंकि जैसे-जैसे महारथी बनेंगे वैसे ही माया भी महारथी रूप में आयेगी। साकार रूप में अन्त तक कर्म करके दिखाया। क्या कर्म करके दिखाया? याद है? क्या शिक्षा दी यही कि निरंहकारी और निर्मान-चित होकर एक दो में प्रेम प्यार से चलना है। एक माताओं का संगठन बनाना। जैसे कुमारियों का ट्रेनिंग क्लास किया है वैसे ही माताएं जो मददगार बन सकती हैं और हैं, उन्हों का मधुबन में संगठन रखना। कुमारियों के साथ माताओं का संगठन हो। संगठन के समय फिर आना होगा। स्नेह को देखते हैं तो ड्रामा याद आ जाता है। ड्रामा जब बीच में आता है तो साइलेन्स हो जाते हैं। स्नेह में आये तो क्या हाल हो जायेगा। नदी बन जायेंगे। लेकिन नहीं, ड्रामा। जो कर्म हम करेंगे वह फिर सभी करेंगे, इसलिए साइलेन्स। अगर सभी साथ होते तो जो अन्तिम कर्मातीत अवस्था का अनुभव था वह ड्रामा प्रमाण और होता। लेकिन था ही ऐसे इसलिए थोड़े ही सामने थे। सामने होते भी जैसे सामने नहीं थे। स्नेह तो वतन में भी है और रहेगा। अविनाशी है ना। लेकिन जो सुनाया कि स्नेह को ड्रामा साइलेन्स में ले आता है। और यही साइलेन्स, शक्ति को लायेगी। फिर वहाँ साकार में मिलन होगा। अभी अव्यक्त रूप में मिलते हैं। फिर साकार रूप में सतयुग में मिलेंगे। वह सीन तो याद आती है ना। खेलेंगे, पाठशाला में आयेंगे, मिलेंगे। आप नूरे रत्न सतयुग की सीनरी वतन में देखते रहते हो। जो बाप देखते हैं वह बच्चे भी देखते रहते हैं और देखते जायेंगे।

अब तो ज्वाला रूप होना है। आपका ही ज्वाला रूप का यादगार है। पता है ज्वाला देवी भी है वह कौन है? यह सभी शक्तियों को ज्वालारूप देवी बनना है। ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित करनी है। जिस ज्वाला में यह कलियुगी संसार जलकर भस्म हो जायेगा। अच्छा।

विदाई के समय :- सभी सेन्टर्स के अव्यक्त स्थिति में स्थित हुए नूरे रत्नों को बाप व दादा का अव्यक्त यादप्यार स्वीकार हो। साथ-साथ जो ईशारा दिया है उसको जल्दी से जल्दी जीवन में लाने का तीव्र पुरुषार्थ करना है। अच्छा गुडनाईट। सभी शिव शक्तियों और पाण्डवों प्रति बाप की नमस्ते।

अव्यक्त मिलन के अनुभव की विधि

मुख्य संदेश

अव्यक्त बापदादा से मिलन का अनुभव करने के लिए अमृतवेले याद में बैठकर अव्यक्त स्थिति का संकल्प रखना, दिनभर अन्तर्मुखी और अव्यक्त स्थिति में रहने का अभ्यास करना तथा सेवा करते हुए सदा स्वयं को निमित्त समझना आवश्यक है। सच्चा पुरुषार्थ है—न्यारे और प्यारे बनना, अहंकार से मुक्त रहना और अपने ईश्वरीय चरित्र द्वारा विश्व सेवा करना।


1. अव्यक्त मिलन का सहज तरीका

बापदादा ने समझाया कि सभी बच्चों के हृदय में अव्यक्त वतन का अनुभव करने और अव्यक्त बाप से मुलाकात करने की आशा है। इस अनुभव के लिए एक सहज विधि बताई गई है।

अमृतवेले याद में बैठकर यह संकल्प रखना है कि अब अव्यक्त बापदादा से मुलाकात करनी है। जैसे साकार रूप में मिलने का समय निश्चित होने पर बुद्धि पहले से ही उसी अनुभव में रहती थी, वैसे ही अव्यक्त मिलन के लिए भी पहले से तैयारी करनी है।

मुख्य अभ्यास:

  • अमृतवेले याद में बैठें।
  • अव्यक्त बापदादा से मिलन का शुभ संकल्प रखें।
  • अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर रूह-रूहान करें।
  • दिनभर अन्तर्मुखी और अव्यक्त स्थिति बनाए रखें।

2. अमृतवेले के अनुभव का आधार

अमृतवेले अव्यक्त मिलन का अनुभव वही कर सकते हैं जो सारा दिन अव्यक्त और अन्तर्मुखी स्थिति में रहने का अभ्यास करते हैं।

केवल सुबह कुछ समय याद में बैठना पर्याप्त नहीं है। पूरे दिन की अवस्था अमृतवेले के अनुभव को प्रभावित करती है। इसलिए दिनभर अपनी स्थिति को श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करना है।

धारणा: दिनभर की अव्यक्त स्थिति ही अमृतवेले के अनुभव को गहरा करने का आधार बनती है।

3. न्यारे और प्यारे बनने की कला

बापदादा ने समझाया कि उनके अन्दर बच्चों के प्रति शुद्ध मोह होते हुए भी वे न्यारे और प्यारे दोनों हैं। बच्चे कभी केवल प्यारे बनते हैं या केवल न्यारे, लेकिन बापदादा दोनों स्थितियों को साथ रखते हैं।

जब बच्चों में भी यह अन्तर समाप्त होगा, तब वे अन्तर्मुखी, अव्यक्त और अलौकिक फरिश्ते दिखाई देंगे।

जीवन में अपनाएँ:

  • आत्मिक स्नेह रखें, लेकिन मोह में बँधें नहीं।
  • सम्बन्ध निभाते हुए भी न्यारे रहें।
  • स्नेह और वैराग्य में संतुलन रखें।
  • व्यक्त जीवन में रहते हुए फरिश्ता स्वरूप बनने का अभ्यास करें।

4. अव्यक्त वतन में जाने के बजाय सूक्ष्म स्थिति बनाना

बापदादा ने समझाया कि केवल अव्यक्त वतन में जाने या वहाँ के अनुभव प्राप्त करने की इच्छा तक सीमित नहीं रहना है। लक्ष्य यह है कि स्वयं अपनी अवस्था को सूक्ष्म और अव्यक्त बनाएँ।

संदेशियों के अनुभव सुनने की अपेक्षा स्वयं अव्यक्त स्थिति में रहकर बुद्धियोग द्वारा अनुभव करना अधिक लाभदायक बताया गया है। इसमें अनुभव के साथ-साथ पुरुषार्थ की कमाई भी है।

मुख्य शिक्षा:

  • केवल अनुभव पाने की इच्छा न रखें।
  • स्वयं सूक्ष्म स्थिति का अभ्यास करें।
  • अव्यक्त बाप से कनेक्शन बनाएँ।
  • अनुभव को अपने पुरुषार्थ में परिवर्तन का साधन बनाएँ।

5. ड्रामा की भावी और बाप का साथ

बापदादा ने समझाया कि ड्रामा की बनी हुई भावी अपने निश्चित क्रम से चलती है। बच्चों के मन में यह संकल्प आ सकता है कि सभी जल्दी अव्यक्त वतनवासी बन जाएँ, लेकिन स्थापना का कार्य पूरा होने तक अव्यक्त रूप से साथ रहकर सेवा करनी है।

बापदादा ने बच्चों के साथ रहने और साथ चलने के अपने वायदे की स्मृति भी दिलाई।

धारणा: ड्रामा की भावी को स्वीकार करते हुए वर्तमान समय में स्थापना के कार्य में सहयोगी बनना है।

6. सूक्ष्मवतन के विषय में स्पष्टता

मुरली में समझाया गया है कि कुछ बच्चों की सूक्ष्मवतन के अनुभवों में अत्यधिक लगन हो जाने के कारण साकार रूप में उन्हें यह समझाया गया था कि सूक्ष्मवतन है ही नहीं। इसका उद्देश्य उनकी बुद्धि को अत्यधिक लगन से हटाना था।

इस बात को एक युक्ति के रूप में स्पष्ट किया गया है, न कि सूक्ष्मवतन के अस्तित्व को समाप्त बताने के रूप में।

मुख्य शिक्षा यह है कि आने-जाने की इच्छा में अधिक समय लगाने के बजाय स्वयं सूक्ष्म स्थिति में स्थित होने का पुरुषार्थ करना है।

7. मम्मा और स्थापना के कार्य में सहयोग

बापदादा ने मम्मा के विषय में बताया कि वे भी स्थापना के कार्य में मददगार हैं, लेकिन भिन्न नाम और रूप से।

मुरली में यह भी कहा गया कि मम्मा कहाँ और क्या कर रही हैं, इसका रहस्य उस समय स्पष्ट नहीं किया जाएगा; इसे बाद में सुनाया जाएगा।

मुख्य बिन्दु: स्थापना का कार्य निरन्तर चल रहा है और उसमें सहयोग विभिन्न रूपों में हो सकता है।

8. स्नेह की खुशबू और शीघ्र रेसपॉन्ड

बापदादा ने बताया कि वतन में बच्चों की याद पहुँचती रहती है। भण्डारे में चीजों की खुशबू से भी अधिक स्नेह की खुशबू अनुभव हो रही थी।

बच्चों की सच्ची याद का रेसपॉन्ड शीघ्र मिलता है, लेकिन उसे सुनने के लिए व्यक्त भाव को छोड़ना आवश्यक है।

बापदादा ने अपनी अव्यक्त स्थिति की विशेषता बताते हुए कहा कि पहले वे बाहरयामी थे, अब अन्तर्यामी हो गए हैं। अव्यक्त स्थिति में सभी का नक्शा स्वतः स्पष्ट होता है।

धारणा:

  • सच्चे दिल से याद करें।
  • व्यक्त भाव और व्यर्थ संकल्पों से मुक्त रहें।
  • अव्यक्त स्थिति में रेसपॉन्ड अनुभव करने का अभ्यास करें।
  • स्नेह को अविनाशी बनाएँ।

9. सेवा में आने वाला मुख्य विघ्न — “मैं”

बापदादा ने सेवा के मार्ग में आने वाले एक विशेष विघ्न के प्रति सावधान किया। सेवा करते-करते यह संकल्प आना कि “मैंने यह किया” या “मैं ही यह कर सकता हूँ”—ज्ञान, बुद्धि और सेवा का अभिमान है।

इसका उपाय है कि हर समय स्वयं को निमित्त समझें। निमित्त बनने से निराकारी, निरहंकारी, नम्रचित और निःसंकल्प अवस्था में रह सकते हैं।

विशेष स्मृति: “मैं निमित्त हूँ।”

10. अहंकार के परिणाम और स्वदर्शन चक्र

यदि “मैं-मैं” का भाव बढ़ता है, तो मगरूरी, मुरझाहट और मायूसी आ सकती है। आगे चलकर मतभेद और व्यर्थ चक्करों में फँसने की सम्भावना रहती है।

इसलिए स्वदर्शन चक्र को याद रखना है और स्वयं को निमित्त समझकर सेवा करनी है।

जैसे-जैसे महारथी बनेंगे, माया भी महारथी रूप में आएगी। इसलिए पुरुषार्थ में अधिक सावधान और विनम्र रहना आवश्यक है।

मुख्य अभ्यास:

  • स्वयं को निमित्त समझें।
  • अहंकार से बचें।
  • स्वदर्शन चक्र की स्मृति रखें।
  • मतभेद और व्यर्थ संकल्पों से दूर रहें।

11. निरहंकारी और निर्मानचित होकर चलना

बापदादा ने शिक्षा दी कि एक-दूसरे के साथ प्रेम-प्यार से चलना है। निरहंकारी और निर्मानचित बनकर संगठन को मजबूत करना है।

मुरली में कुमारियों के साथ मददगार माताओं का संगठन बनाने और उन्हें मधुबन में एकत्र करने की बात भी कही गई है।

स्नेह के साथ ड्रामा की स्मृति रखकर साइलेन्स में स्थित होना है, क्योंकि यही साइलेन्स शक्ति लाएगी।

12. ज्वालारूप बनकर विश्व सेवा

बापदादा ने अन्त में बच्चों को ज्वालारूप बनने की प्रेरणा दी। सभी शक्तियों को ऐसा ज्वालारूप बनना है कि उनके ईश्वरीय पुरुषार्थ से कलियुगी संसार के परिवर्तन का कार्य हो सके।

बच्चों को अपने जीवन में अव्यक्त स्थिति, निरहंकारिता और शक्ति का ऐसा स्वरूप प्रत्यक्ष करना है जो विश्व सेवा में सहयोगी बने।

समापन शिक्षा: अव्यक्त मिलन का अनुभव, निमित्त भाव, निरहंकारिता और ज्वालारूप पुरुषार्थ—ये सभी श्रेष्ठ सेवा के आधार हैं।


स्व-चेकिंग के लिए प्रश्न

  1. क्या मैं अमृतवेले अव्यक्त बापदादा से मिलन का संकल्प रखता हूँ?
  2. क्या मेरी दिनभर की स्थिति अन्तर्मुखी रहती है?
  3. क्या मैं न्यारा और प्यारा दोनों बनकर चलता हूँ?
  4. क्या मैं केवल अनुभव चाहता हूँ या अपनी अवस्था भी बदलता हूँ?
  5. क्या मैं ड्रामा की भावी को स्वीकार करके सेवा करता हूँ?
  6. क्या मैं स्नेह के साथ व्यक्त भाव से न्यारा रहता हूँ?
  7. क्या मेरी सेवा में “मैं” का अभिमान आता है?
  8. क्या मैं स्वयं को निमित्त समझकर कार्य करता हूँ?
  9. क्या मैं स्वदर्शन चक्र की स्मृति से व्यर्थ चक्करों से बचता हूँ?
  10. क्या मैं निरहंकारी, निर्मानचित और ज्वालारूप बनने का पुरुषार्थ करता हूँ?

30 छोटे प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1. अव्यक्त मिलन का सहज तरीका क्या है?

उत्तर: अमृतवेले याद में बैठकर अव्यक्त बापदादा से मिलन का संकल्प रखना।

प्रश्न 2. अव्यक्त मिलन के लिए किस स्थिति में रहना है?

उत्तर: अव्यक्त और अन्तर्मुखी स्थिति में।

प्रश्न 3. अमृतवेले अव्यक्त अनुभव कौन कर सकते हैं?

उत्तर: जो दिनभर अव्यक्त और अन्तर्मुखी स्थिति में रहते हैं।

प्रश्न 4. अव्यक्त स्थिति में बैठकर क्या करना है?

उत्तर: बापदादा से रूह-रूहान करना।

प्रश्न 5. बापदादा के स्नेह में कौन-सी विशेषता है?

उत्तर: वे न्यारे और प्यारे दोनों हैं।

प्रश्न 6. फरिश्ता स्वरूप बनने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: अन्तर्मुखी, अव्यक्त और अलौकिक स्थिति में रहना।

प्रश्न 7. केवल अव्यक्त वतन में जाने की इच्छा से आगे क्या करना है?

उत्तर: स्वयं सूक्ष्म स्थिति में स्थित होने का अभ्यास करना।

प्रश्न 8. अव्यक्त स्थिति के अनुभव में क्या दो प्राप्तियाँ हैं?

उत्तर: अनुभव और पुरुषार्थ की कमाई।

प्रश्न 9. ड्रामा की भावी के विषय में क्या समझाया गया?

उत्तर: बनी हुई भावी अपने निश्चित क्रम से चलती है।

प्रश्न 10. स्थापना का कार्य पूरा होने तक बापदादा क्या करेंगे?

उत्तर: अव्यक्त रूप से बच्चों के साथ स्थापना के कार्य में सहयोग करेंगे।

प्रश्न 11. सूक्ष्मवतन के विषय में पहले क्या युक्ति अपनाई गई थी?

उत्तर: बच्चों की अत्यधिक लगन को हटाने के लिए साकार रूप में कहा गया कि सूक्ष्मवतन है ही नहीं।

प्रश्न 12. अब बच्चों को किसका अनुभव करना है?

उत्तर: सूक्ष्म स्थिति और अव्यक्त बाप से कनेक्शन का।

प्रश्न 13. मम्मा स्थापना के कार्य में किस प्रकार सहयोगी हैं?

उत्तर: भिन्न नाम और रूप से।

प्रश्न 14. वतन में किसकी खुशबू अनुभव की गई?

उत्तर: बच्चों के स्नेह की खुशबू।

प्रश्न 15. बापदादा का रेसपॉन्ड सुनने के लिए क्या छोड़ना है?

उत्तर: व्यक्त भाव को।

प्रश्न 16. अव्यक्त स्थिति में बापदादा की कौन-सी विशेषता बताई गई?

उत्तर: अन्तर्यामी होने की।

प्रश्न 17. सेवा में मुख्य विघ्न क्या है?

उत्तर: “मैंने किया” या “मैं ही कर सकता हूँ” का अभिमान।

प्रश्न 18. सेवा करते समय कौन-सा शब्द याद रखना है?

उत्तर: “मैं निमित्त हूँ।”

प्रश्न 19. निमित्त बनने से कौन-सी अवस्थाएँ बनती हैं?

उत्तर: निराकारी, निरहंकारी, नम्रचित और निःसंकल्प।

प्रश्न 20. “मैं-मैं” आने से क्या परिणाम हो सकते हैं?

उत्तर: मगरूरी, मुरझाहट और मायूसी।

प्रश्न 21. व्यर्थ चक्करों से बचने के लिए क्या याद रखना है?

उत्तर: स्वदर्शन चक्र।

प्रश्न 22. महारथी बनने के साथ माया किस रूप में आ सकती है?

उत्तर: महारथी रूप में।

प्रश्न 23. एक-दूसरे के साथ कैसे चलना है?

उत्तर: निरहंकारी, निर्मानचित और प्रेम-प्यार से।

प्रश्न 24. मुरली में किस संगठन को बनाने की बात कही गई?

उत्तर: मददगार माताओं का संगठन।

प्रश्न 25. स्नेह के बीच ड्रामा की स्मृति आने पर क्या होता है?

उत्तर: साइलेन्स की अवस्था आती है।

प्रश्न 26. साइलेन्स से क्या प्राप्त होगा?

उत्तर: शक्ति।

प्रश्न 27. सभी शक्तियों को किस स्वरूप में बनना है?

उत्तर: ज्वालारूप देवी।

प्रश्न 28. अव्यक्त स्थिति का अभ्यास कब करना है?

उत्तर: अमृतवेले के साथ-साथ पूरे दिन।

प्रश्न 29. सेवा में अहंकार से बचने का मुख्य उपाय क्या है?

उत्तर: स्वयं को निमित्त समझना।

प्रश्न 30. इस मुरली की मुख्य शिक्षा क्या है?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति में रहकर बाप से मिलन का अनुभव करना, न्यारे-प्यारे बनना और निमित्त भाव से निरहंकारी होकर विश्व सेवा करना।


समापन संदेश

अव्यक्त मिलन का अनुभव केवल कुछ समय की साधना नहीं, बल्कि पूरे दिन की श्रेष्ठ स्थिति का परिणाम है। अमृतवेले अव्यक्त बापदादा से मिलन का संकल्प रखें, न्यारे और प्यारे बनें तथा सेवा में “मैं” के अभिमान से मुक्त रहें। स्वयं को निमित्त समझकर, स्वदर्शन चक्र की स्मृति में रहकर और निरहंकारी बनकर ज्वालारूप विश्व सेवा करना ही इस मुरली की मुख्य प्रेरणा है।

📝 03 | अव्यक्त मुरली | 02 February 1969

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