आज मैं आप सभी बच्चों से अव्यक्त रूप में मिलने आया हूँ। जो मेरे बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित होंगे वही इसको समझ सकेंगे। आप सभी बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित हो किसको देख रहे हो? व्यक्त रूप में या अव्यक्त रूप में? आप व्यक्त हो या अव्यक्त? अगर व्यक्त में देखेंगे तो बाप को नहीं देख सकेंगे। आज अव्यक्त वतन से मुलाकात करने आया हूँ। अव्यक्त वतन में आवाज नहीं परन्तु यहाँ आवाज में आया हूँ। आप सभी बच्चों के अन्दर में कौन-सा संकल्प चल रहा है? अभी यह अव्यक्त मुलाकात है। जैसे कल्प पहले मिसल बच्चों से रूहरूहान चल रही है। रूह-रूहान करने मीठे-मीठे बाबा ने आप सभी बच्चों से मिलने भेजा है। जो थे वह अब भी हैं। दो तीन दिन पहले मीठे-मीठे बाबा से रूह-रूहान चल रही थी। रूह-रूहान क्या है, मालूम है? बाबा ने बोला, वतन का अनुभव करने के लिए तैयार हो? क्या जवाब दिया होगा? यही कहा कि जो बाप की आज्ञा। जैसे चलायेंगे, जहाँ बिठायेंगे जिस रूप में बिठायेंगे।
“अस्थियां हैं स्थिति की स्मृति दिलाने वाली”
23 January 1969 | हिंदी · “अस्थियां हैं स्थिति की स्मृति दिलाने वाली”
बच्चों के अन्दर यही संकल्प होगा कि बापदादा ने छुट्टी क्यों नहीं ली? बाबा को भी यह कहा। बाबा ने कहा अगर सभी बच्चों को बिठाकर छुट्टी दिलाऊं तो छुट्टी देंगे? आप भी बच्चों को देख, सर्विस को देख बच्चों के स्नेह में आ जायेंगे। इसलिए जो बाप ने कराया वही ड्रामा की भावी कहेंगे। व्यक्त रूप में नहीं, तो अव्यक्त रूप से मुलाकात कर ही रहे हैं। सर्विस की वृद्धि वैसे ही है, बच्चों की याद वैसे ही है लेकिन अन्तर यह है कि वह व्यक्त में अव्यक्त था और यह अव्यक्त ही है। जो नयनों की मुलाकात जानते होंगे वह नयनों से इस थोड़ी सी मुलाकात में अपने प्रति शिक्षा डायरेक्शन ले लेंगे। आप सभी को वतन में तो आना ही है। बच्चों से मुलाकात करने के लिए हर वक्त, हर समय तैयार ही रहते हैं। अब जहाँ तक बच्चों की जितनी बुद्धि क्लीयर होगी, उसी अनुसार ही अव्यक्त मिलन का अनुभव कर सकेंगे। शक्ति स्वरूप में स्थित हैं? (दीदी से) जैसे साथ थे वैसे ही हैं। अलग नहीं। अभी शक्ति स्वरूप का पार्ट प्रत्यक्ष में दिखाना है। जो बाप की शिक्षा मिली है, वह प्रैक्टिकल में करके दिखाना है। शक्ति सेना बहुत है, अभी पूरा शक्ति स्वरूप बन जाना। अभी तक बच्चे और बाप के स्नेह में चलते रहे। अब फिर बाप से जो शक्ति मिली है उस शक्ति से औरों को ऐसा शक्तिवान् बनाना है। वही बाप के स्नेही बाप के साथ अन्त तक रहेंगे।
अभी मीठे-मीठे बाबा दृश्य दिखला रहे हैं – आप सभी बच्चों का। आप अस्थियां उठा रहे थे। अस्थियों को नहीं देखना स्थिति को देखना। यह अस्थियां स्थिति स्वरूप हैं। एक एक रग में स्थिति थी। तो बाहर से वह अस्थियों को रखा है। परन्तु इसका अर्थ भक्ति मार्ग का नहीं उठाना। इन अस्थियों में जो स्थिति भरी हुई है, हमेशा उसको देखना है। साधारण मनुष्यों को यह बातें इतना समझ में नहीं आयेंगी। बच्चों का स्नेह है और सदा रहेगा, 21 जन्म तक रहेगा। आप सभी सतयुगी दुनिया में साथ नहीं चलेंगे? राज्य साथ नहीं पायेंगे? साथ ही हैं, साथ ही रहेंगे – जन्म जन्मान्तर तक। कभी भी ऐसा नहीं समझना, बाप है दादा नहीं या दादा है तो बाप नहीं। हम दोनों एक दो से एक पल भी अलग नहीं हो सकते। ऐसे ही आप अपने को त्रिमूर्ति ही समझो। इसीलिए कहते हैं त्रिमूर्ति का बैज हमेशा साथ रखो। जब ब्रह्मा, विष्णु और शंकर तीन को देखते हो तो आपके भी त्रिमूर्ति की याद अर्थात् अपना स्वरूप और बापदादा की याद, त्रिमूर्ति की स्थिति मशहूर है। इसमें ही आप सभी बच्चों का कल्याण है। कल्याणकारी बाप जो कहते हैं, जो कराते हैं, उसमें ही कल्याण है। इसमें एक एक महावाक्य में, एक-एक नज़र में बहुत कल्याण है। लेकिन स्थूल को परखने वाले कोई कोई अनन्य और महारथी बच्चे हैं। अब आप भी इतना ही शीघ्र कर्मातीत स्थिति में स्थित रहने का पुरुषार्थ करो। जैसे यहाँ हर समय बापदादा के साथ व्यतीत करते थे वैसे ही हर कर्म में, हर समय अपने को साथ ही रखा करो। बच्चे, यही शिक्षा याद रखना, कभी नहीं भूलना। सम्बन्ध, स्नेह, स्मृति स्वरूप, साथ-साथ सरलता स्वरूप, समर्पण और एक दो के सहयोगी बन सफलता को पाते रहना। सफलता आप सभी बच्चों के मस्तक के बीच चमक रही है। अब बहुत समय हुआ है और कुछ कहना है? सूक्ष्मवतन में बैठे भी हर बच्चे की दिनचर्या, हर बच्चे का चार्ट सामने रहता है। व्यक्त रूप से अभी तो और ही स्पष्ट रूप से व्यक्त रूप की तुलना में देखते हैं। इसलिए सभी की रिजल्ट देखते रहते हैं।
जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे उतना उस अव्यक्त स्थिति से कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म ऐसा होगा जैसे श्रीमत राय दे रही है। यह अनुभव बच्चे पायेंगे। अब अपनी अव्यक्त स्थिति के आधार से ऐसा काम करना, जैसे श्रीमत के आधार से हर काम होता रहा है। जिस चीज़ के साथ बाप का स्नेह है उससे उतना स्नेह रखना ही अपने को सौभाग्यशाली बनाना है। रग-रग में किस के साथ स्नेह था? 5 तत्वों से नहीं। स्नेह गुणों से ही होता है। स्नेह था, नहीं। है और रहेगा। जब तक भविष्य नई दुनिया न बनी है तब तक यह अटूट स्नेह रहेगा। स्नेह आत्मा के साथ और कर्तव्य के साथ ही है तो फिर शरीर क्या! अन्त तक साथी रहेंगे। जिसका बाप के साथ स्नेह है वही अन्त तक स्थापना के कार्य में मददगार रहेंगे। इसलिए स्नेही होने की कोशिश करो। कैसी भी माया आवे, मायाजीत बनना। जैसे बैज लगाते हो वैसे मस्तक पर यह विजय का बैज लगाओ।
मधुबन का नक्शा सारे वर्ल्ड के सामने म्युज़ियम के रूप में होना चाहिए। अविनाशी भण्डारा है इसका और भी ज्यादा शो करना है। जैसे सभी बच्चे पत्र लिखते थे वैसे ही लिखते रहना। जैसे डायरेक्शन लेते थे वैसे ही लेना। शरीर की बात दूसरी है। सर्विस वही है। इसलिए जो भी बात हो मधुबन में लिखते रहना। अपना पूरा कनेक्शन रखना। दूसरों को भी अपनी अवस्था का सबूत देना। आपको देख और भी ऐसे करेंगे।
(विदाई के समय) बाबा बोले यह तो आप बच्चे जानते हो कि जो भी ड्रामा का पार्ट है इसमें कोई गुप्त रहस्य भरा हुआ है। क्या रहस्य भरा हुआ है वह समय प्रति समय सुनाते जायेंगे। अब तो आपका वही यादगार जो आकाश में है, दुनिया वाले इन आंखों से देखेंगे कि यह धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं। बाबा ने कहा है – ज्यादा समय वहाँ नहीं बैठना ।
अध्याय
“अस्थियां हैं स्थिति की स्मृति दिलाने वाली”
अव्यक्त मुरली — 23 जनवरी 1969
डिस्क्लेमर
यह अध्याय 23 जनवरी 1969 की अव्यक्त मुरली के दिए गए पाठ/ट्रांसक्रिप्ट पर आधारित है। इसका उद्देश्य मुरली के मुख्य भाव, शिक्षाओं और आत्म-मंथन के बिंदुओं को सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना है।
जहाँ मुरली में आध्यात्मिक शब्दों और अवधारणाओं का प्रयोग हुआ है, उन्हें उसी संदर्भ और मूल भावना में रखा गया है। यह अध्याय किसी व्यक्तिगत मत, धार्मिक विवाद या स्वतंत्र आध्यात्मिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
1. अव्यक्त स्थिति में मुलाकात
मुरली की शुरुआत एक गहरी स्थिति की ओर संकेत करती है—बाप से अव्यक्त रूप में मिलने के लिए स्वयं भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होना आवश्यक है।
प्रश्न उठता है:
“मैं व्यक्त रूप में हूँ या अव्यक्त रूप में?”
मुरली में समझाया गया है कि यदि दृष्टि केवल व्यक्त रूप पर रहेगी तो बाप को उस रूप में अनुभव करना संभव नहीं होगा। अव्यक्त वतन की मुलाकात को समझने के लिए बुद्धि को स्पष्ट और स्थिति को अव्यक्त बनाना आवश्यक है।
मंथन
- क्या मेरी बुद्धि स्थूल रूप में अधिक अटकी रहती है?
- क्या मैं बाप की शिक्षा को अपनी स्थिति में अनुभव करता हूँ?
- क्या मेरी स्मृति मुझे अव्यक्त अनुभव की ओर ले जाती है?
2. रूह-रिहान और बाप की आज्ञा
मुरली में रूह-रिहान का प्रसंग आता है। जब वतन के अनुभव के लिए तैयार होने की बात हुई, तो भाव था:
“जो बाप की आज्ञा।”
अर्थात् बाप जैसे चलाएँ, जहाँ बिठाएँ और जिस रूप में बिठाएँ—उसमें सहज स्वीकृति हो।
यह केवल शब्दों की आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि बाप की श्रीमत के प्रति समर्पण की स्थिति है।
मुख्य शिक्षा
समर्पण का अर्थ है—अपनी इच्छा से अधिक बाप की आज्ञा को महत्व देना।
3. व्यक्त रूप से अव्यक्त रूप तक
मुरली में बताया गया है कि व्यक्त रूप में मुलाकात का अनुभव एक प्रकार का था, जबकि अब अव्यक्त रूप से मिलन हो रहा है।
सेवा की वृद्धि और बच्चों की याद में कोई कमी नहीं है। अंतर केवल रूप का है।
जो बच्चे नयनों की मुलाकात को समझते हैं, वे थोड़ी-सी मुलाकात में भी अपने लिए शिक्षा और डायरेक्शन ग्रहण कर सकते हैं।
मंथन
क्या मैं केवल शब्द सुनता हूँ, या दृष्टि और संकेत से भी शिक्षा ग्रहण करता हूँ?
4. बुद्धि की स्पष्टता और अव्यक्त मिलन
मुरली में एक महत्वपूर्ण बात कही गई है:
जितनी बुद्धि क्लियर होगी, उतना ही अव्यक्त मिलन का अनुभव किया जा सकेगा।
अर्थात् अव्यक्त अनुभव केवल बाहरी परिस्थिति पर निर्भर नहीं है। उसके लिए बुद्धि की स्पष्टता और आंतरिक स्थिति भी आवश्यक है।
अभ्यास
हर दिन स्वयं से पूछें:
“आज मेरी बुद्धि कितनी स्पष्ट और हल्की है?”
5. शक्ति स्वरूप बनना
अब केवल बाप के स्नेह में चलना ही पर्याप्त नहीं है। मुरली में आगे की जिम्मेदारी बताई गई है:
बाप से मिली शक्ति द्वारा दूसरों को शक्तिवान बनाना।
अर्थात् स्वयं शक्ति स्वरूप बनकर उस शक्ति का अनुभव दूसरों को भी कराना है। शिक्षा को केवल सुनना नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल में करके दिखाना है।
मुख्य सूत्र
शिक्षा → शक्ति → प्रैक्टिकल → दूसरों को शक्तिवान बनाना
6. अस्थियों को नहीं, स्थिति को देखना
यह इस मुरली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
बाबा द्वारा दिखाए गए दृश्य में बच्चे अस्थियां उठा रहे हैं। लेकिन शिक्षा दी गई:
“अस्थियों को नहीं देखना, स्थिति को देखना।”
अर्थात् बाहरी अस्थियां केवल एक स्मृति का माध्यम हैं। वास्तविक महत्व उस स्थिति का है जो उस जीवन में थी।
इसलिए इसका अर्थ केवल भक्ति-मार्ग की किसी बाहरी प्रक्रिया के रूप में नहीं लेना है।
गहरा मंथन
अस्थियां शरीर की स्मृति करा सकती हैं, लेकिन स्थिति आत्मिक जीवन की स्मृति दिलाती है।
7. स्नेह शरीर से नहीं, गुणों और कर्तव्य से
मुरली में स्नेह के स्वरूप पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है।
स्नेह पाँच तत्वों के शरीर से नहीं, बल्कि गुणों और कर्तव्य से है।
इसलिए शरीर की स्थिति बदलने पर भी स्नेह और संबंध की भावना समाप्त नहीं होती।
मुख्य शिक्षा
सच्चा स्नेह केवल शरीर के रूप से नहीं, गुण और कर्तव्य से जुड़ा होता है।
8. बाप-दादा और त्रिमूर्ति की स्मृति
मुरली में स्पष्ट कहा गया है कि बाप और दादा को अलग-अलग करके नहीं देखना है।
इसी संदर्भ में त्रिमूर्ति के बैज को हमेशा साथ रखने की बात कही गई है।
ब्रह्मा, विष्णु और शंकर की स्मृति के साथ अपना स्वरूप और बाप-दादा की स्मृति जुड़ी हुई बताई गई है।
मंथन प्रश्न
जब मैं त्रिमूर्ति का बैज देखता हूँ, क्या मुझे केवल एक चिन्ह दिखाई देता है या अपना स्वरूप और बाप-दादा की स्मृति भी आती है?
9. कर्मातीत स्थिति की ओर पुरुषार्थ
मुरली में आगे लक्ष्य दिया गया है:
कर्मातीत स्थिति में स्थित होने का पुरुषार्थ।
जैसे बाप-दादा के साथ रहते हुए हर समय उनका साथ अनुभव किया, उसी प्रकार अब हर कर्म में और हर समय स्वयं को उनके साथ रखना है।
अभ्यास
किसी भी कर्म को शुरू करने से पहले स्वयं से पूछें:
“क्या मैं यह कर्म बाप की स्मृति में रहकर कर रहा हूँ?”
10. सम्बन्ध, स्नेह, स्मृति और सरलता
मुरली में याद रखने योग्य अनेक गुणों का सुंदर क्रम मिलता है:
- सम्बन्ध
- स्नेह
- स्मृति स्वरूप
- साथ-साथ
- सरलता स्वरूप
- समर्पण
- एक-दूसरे के सहयोगी बनना
- सफलता प्राप्त करना
यह केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में धारण करने की दिशा है।
मुख्य सूत्र
स्मृति + सरलता + समर्पण + सहयोग = सफलता की दिशा
11. अपनी दिनचर्या और चार्ट की जांच
मुरली में कहा गया है कि हर बच्चे की दिनचर्या और चार्ट सामने रहता है और सभी की रिजल्ट देखी जाती है।
यह बात आत्म-मंथन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
स्वयं से पूछें
- मेरी दिनचर्या कैसी है?
- मेरा चार्ट कैसा है?
- स्मृति कितने समय रहती है?
- मेरे कर्मों में श्रीमत का प्रभाव कितना है?
- क्या मेरी स्थिति और मेरे कर्मों में समानता है?
12. अव्यक्त स्थिति से कर्म करना
मुरली की एक विशेष शिक्षा है:
जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे, उतना कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म ऐसा अनुभव होगा जैसे श्रीमत राय दे रही है।
इसका अर्थ यह है कि अव्यक्त स्थिति केवल ध्यान की कोई अलग अवस्था नहीं, बल्कि कर्म करते समय भी स्मृति और श्रीमत के आधार पर चलने की स्थिति है।
मंथन
क्या मेरी आध्यात्मिक स्थिति मेरे व्यवहार और कर्मों में दिखाई देती है?
13. स्नेह का वास्तविक आधार
मुरली में कहा गया है कि बाप का स्नेह जिस चीज से है, उससे स्नेह रखना स्वयं को सौभाग्यशाली बनाना है।
स्नेह शरीर से नहीं, आत्मा और कर्तव्य से जुड़ा है। बाप के साथ स्नेह रखने वाले स्थापना के कार्य में अंत तक मददगार रहेंगे।
मुख्य संदेश
स्नेह केवल भावना नहीं—स्नेह को कर्तव्य और सेवा में दिखाई देना चाहिए।
14. माया को जीतना — विजय का बैज
मुरली में स्पष्ट आह्वान है:
“स्नेही होने की कोशिश करो।”
और साथ ही:
“कैसी भी माया आवे, मायाजीत बनना।”
जैसे बैज लगाया जाता है, वैसे ही मस्तक पर विजय का बैज धारण करने की बात कही गई है।
आत्म-मंथन
माया आने पर मेरी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?
- घबराहट?
- कमजोरी?
- शिकायत?
- या स्मृति और विजय?
15. मधुबन से कनेक्शन और सेवा
मुरली में मधुबन से निरंतर संपर्क बनाए रखने और डायरेक्शन लेते रहने की बात कही गई है।
शरीर की परिस्थिति अलग हो सकती है, लेकिन सेवा वही है। अपनी अवस्था का सबूत दूसरों के सामने रखना है ताकि दूसरे भी उससे प्रेरणा लें।
मुख्य शिक्षा
परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन सेवा की भावना और कनेक्शन बना रहना चाहिए।
16. ड्रामा में छिपे गुप्त रहस्य
विदाई के समय मुरली में संकेत मिलता है कि ड्रामा के पार्ट में गुप्त रहस्य समाए हुए हैं, जिन्हें समय-प्रति-समय बताया जाएगा।
इसलिए हर घटना को तुरंत अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय समय, स्थिति और श्रीमत के संदर्भ में समझने की दिशा मिलती है।
17. धरती के सितारे और श्रीमत
अंतिम भाग में बच्चों को “धरती के सितारे” कहा गया है और संकेत दिया गया है कि दुनिया देखेगी कि ये धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं।
यहाँ मुख्य बात है:
स्थिति ऐसी हो कि जीवन स्वयं शिक्षा का प्रमाण बन जाए।
मुरली का सार
23 जनवरी 1969 की इस मुरली का केंद्रीय संदेश इस प्रकार समझा जा सकता है:
अस्थियों को नहीं, स्थिति को देखो।
व्यक्त रूप से आगे बढ़कर अव्यक्त स्थिति का अनुभव करो।
बाप के स्नेह को शक्ति में बदलो।
शक्ति को प्रैक्टिकल जीवन में दिखाओ।
हर कर्म में बाप को साथ रखो।
सरलता, समर्पण और सहयोग से सफलता प्राप्त करो।
माया को जीतकर विजय स्वरूप बनो।
छोटे प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. 23 जनवरी 1969 की मुरली का मुख्य शीर्षक क्या है?
उत्तर: “अस्थियां हैं स्थिति की स्मृति दिलाने वाली।”
प्रश्न 2. बाप से अव्यक्त मिलन का अनुभव कौन कर सकता है?
उत्तर: जो स्वयं अव्यक्त स्थिति में स्थित हो।
प्रश्न 3. व्यक्त रूप में देखने की बजाय किस रूप में स्थित होने की शिक्षा है?
उत्तर: अव्यक्त रूप में।
प्रश्न 4. रूह-रिहान में बाप की आज्ञा के प्रति क्या भाव था?
उत्तर: “जैसे चलाएंगे, जहाँ बिठाएंगे, जिस रूप में बिठाएंगे।”
प्रश्न 5. अव्यक्त मिलन का अनुभव किस बात पर निर्भर बताया गया है?
उत्तर: बुद्धि की स्पष्टता और अव्यक्त स्थिति पर।
प्रश्न 6. शक्ति स्वरूप बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर: बाप से मिली शक्ति को स्वयं धारण करके दूसरों को भी शक्तिवान बनाना।
प्रश्न 7. अस्थियों को देखकर क्या देखना है?
उत्तर: अस्थियों को नहीं, उनमें स्मरण कराने वाली स्थिति को देखना है।
प्रश्न 8. स्नेह किससे होना बताया गया है?
उत्तर: आत्मा, गुणों और कर्तव्य से।
प्रश्न 9. त्रिमूर्ति का बैज किसलिए साथ रखने की बात कही गई है?
उत्तर: अपना स्वरूप और बाप-दादा की स्मृति बनाए रखने के लिए।
प्रश्न 10. कर्मातीत स्थिति के लिए क्या पुरुषार्थ करना है?
उत्तर: हर कर्म और हर समय स्वयं को बाप-दादा के साथ रखना है।
प्रश्न 11. सफलता के लिए किन गुणों को याद रखना है?
उत्तर: सम्बन्ध, स्नेह, स्मृति, सरलता, समर्पण और सहयोग।
प्रश्न 12. किसका चार्ट और दिनचर्या देखी जाती है?
उत्तर: हर बच्चे की दिनचर्या और चार्ट की रिजल्ट देखी जाती है।
प्रश्न 13. अव्यक्त स्थिति का कर्म पर क्या प्रभाव बताया गया है?
उत्तर: कर्म ऐसा होने लगता है जैसे श्रीमत के आधार पर हो रहा हो।
प्रश्न 14. माया के आने पर क्या बनना है?
उत्तर: मायाजीत और विजय स्वरूप बनना है।
प्रश्न 15. मधुबन से क्या बनाए रखना है?
उत्तर: पूरा कनेक्शन बनाए रखना और डायरेक्शन लेते रहना है।
प्रश्न 16. शरीर की परिस्थिति बदलने पर सेवा के बारे में क्या शिक्षा है?
उत्तर: शरीर की बात अलग है, लेकिन सेवा वही रहती है।
प्रश्न 17. ड्रामा के पार्ट में क्या बताया गया है?
उत्तर: उसमें गुप्त रहस्य भरे हुए हैं, जिन्हें समय-प्रति-समय बताया जाएगा।
प्रश्न 18. “धरती के सितारे” किस आधार पर चलेंगे?
उत्तर: श्रीमत के आधार पर।
🌺 अंतिम आत्म-मंथन
आज मैं स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछूँ:
“मैं अस्थियों को देख रहा हूँ या उस स्थिति को, जिसकी स्मृति अस्थियां दिलाती हैं?”
और दूसरा—
“क्या मेरी अव्यक्त स्थिति मेरे प्रत्येक कर्म में दिखाई दे रही है?”
यही इस मुरली के अध्ययन को सुनने से आगे बढ़ाकर जीवन में धारण करने का मार्ग बन सकता है।
📝 Avyakt Murli Quiz — 23-01-1969
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
BK Om Shanti - E-015.2A
Murli Type: Avyakt Murli
Master Murli Video: Watch on YouTube
Official Murli Source: Open Official Source
