“पुराने संस्कारों के पत्ते हटाकर बीज-रूप अवस्था में स्थित बनो”
Murli Manthan
अध्याय 2
18 जनवरी 1969 — द्वितीय अव्यक्त दिव्य संदेश
1. संदेश का मुख्य सार
18 जनवरी 1969 से 21 जनवरी 1969 के बीच, ब्रह्मा बाबा के साकार शरीर छोड़ने के पश्चात् दादी गुलजार के माध्यम से अव्यक्त वतन से दिव्य संदेश प्राप्त हुए। प्रस्तुत दूसरा संदेश विशेष रूप से पुराने संस्कारों को समाप्त करके बीज-रूप अवस्था प्राप्त करने की शिक्षा देता है।
इस संदेश का मुख्य सूत्र है:
“पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त कर बीज-रूप अवस्था बनाओ।”
यह केवल पुराने संस्कारों को पहचानने की बात नहीं है, बल्कि उन्हें इस प्रकार समाप्त करने की बात है कि समय आने पर कोई संस्कार आत्मा को रोक न सके।
2. अव्यक्त वतन में बच्चों का स्वागत
जब दादी गुलजार अव्यक्त वतन में गईं, तो उन्होंने अनुभव किया कि बाप-दादा सभी बच्चों का स्वागत करने के लिए सामने उपस्थित हैं।
साकार में जिस प्रकार ब्रह्मा बाबा बच्चों को दृष्टि देते थे, याद करते थे और प्रेम से मिलते थे, उसी प्रकार का अनुभव अव्यक्त वतन में भी हुआ।
लेकिन इस बार विशेष रूप से ब्रह्मा बाबा का प्रेम-सागर स्वरूप उभरकर सामने आया।
3. बाबा की आँखों में हर बच्चे की याद
दादी ने अनुभव किया कि बाबा की आँखों में एक-एक बच्चे की याद समाई हुई थी।
हर बच्चे की—
- याद,
- आवाज,
- प्रेम,
मानो बाबा की दृष्टि में समाया हुआ था।
बाबा ने कहा:
“याद तो सभी बच्चों ने भेजी है।”
इससे यह भाव सामने आता है कि बच्चों का प्रेम और याद बाबा से अलग नहीं है।
4. दो प्रकार की याद — अव्यक्त और व्यक्त
इसके बाद बाबा ने बच्चों की याद की दो अवस्थाएँ समझाईं।
पहली — अव्यक्त याद
कुछ बच्चों की याद पूर्णतः अव्यक्त थी।
अव्यक्त अवस्था का अर्थ बताया गया:
न्यारे और प्यारे।
अर्थात् शरीर से न्यारे और बाबा के प्यारे।
दूसरी — व्यक्त मिली हुई याद
कुछ बच्चों की याद में अव्यक्त भाव के साथ व्यक्त भाव भी मिला हुआ था।
अर्थात् कभी वे न्यारे-प्यारे बन जाते हैं और फिर बीच-बीच में देह में आ जाते हैं।
5. व्यक्त और अव्यक्त का सरल अर्थ
संदेश में बहुत सरल भाषा में समझाया गया:
व्यक्त = शरीर का भान
जब आत्मा शरीर की चेतना में होती है, तब याद भी व्यक्त अर्थात् शरीर-संबंधी हो जाती है।
अव्यक्त = अशरीरी स्थिति
जब आत्मा अशरीरी अवस्था में स्थित होती है, तब उसकी याद भी अशरीरी होती है।
इसलिए अव्यक्त स्थिति केवल एक विचार नहीं है।
यह चेतना की वास्तविक स्थिति है।
6. 75% और 25% की याद
संदेश में बच्चों की याद की स्थिति का एक अनुपात भी बताया गया:
- 75% बच्चों की याद अव्यक्त है।
- 25% बच्चों की याद व्यक्त है।
इसका उद्देश्य आत्म-परीक्षण की दिशा देना है—
“मेरी याद किस स्थिति में है?”
क्या मैं अधिक समय आत्मिक, न्यारे-प्यारे भाव में रहता हूँ?
या बार-बार देह और व्यक्त भाव में लौट आता हूँ?
7. बाबा की दृष्टि, शक्ति और टोली
इसके बाद बाबा ने बच्चों को प्रेम और शक्ति से भरी दृष्टि दी तथा हाथ से टोली खिलाने का अनुभव कराया।
यह दृश्य केवल प्रेम का नहीं, बल्कि शक्ति और संस्कार-परिवर्तन का संकेत बनता है।
बाबा बच्चों को प्रेम भी देते हैं और शक्ति भी।
8. फूलों की वर्षा का अद्भुत दृश्य
इसके बाद एक विशेष दृश्य सामने आया।
दादी गुलजार ने देखा कि—
सभी बच्चों का संगठन खड़ा है।
और ऊपर से बहुत-सी फूलों की वर्षा हो रही है।
चारों ओर फूल ही फूल दिखाई दे रहे थे।
बाबा ने इस दृश्य का रहस्य समझाया।
9. फूल किसके प्रतीक हैं?
बाबा ने कहा:
“बाप-दादा ने स्नेह और शक्ति तो बच्चों को दी है, लेकिन साथ-साथ दिव्य गुण रूपी फूल भी दिए हैं।”
अर्थात् बाबा ने केवल प्रेम और शक्ति नहीं दी।
साथ में—
- दिव्य गुण,
- श्रेष्ठ संस्कार,
- गुणों की शिक्षा,
भी दी।
फूलों की वर्षा इन दिव्य गुणों की शिक्षा का प्रतीक है।
10. दिव्य गुणों को धारण करना
बाबा ने बताया कि दिव्य गुणों की शिक्षा हर बच्चे ने यथाशक्ति धारण की है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी है:
सिर्फ दिव्य गुणों की शिक्षा मिलना पर्याप्त नहीं है।
शिक्षा → धारण → संस्कार → सिद्धि
यह परिवर्तन आवश्यक है।
बाबा ने गुणों के बीज तो दिए, लेकिन उन्हें जीवन में स्थायी संस्कार बनाना बच्चों के पुरुषार्थ पर निर्भर है।
11. तीन प्रकार के गुलाब — संस्कारों का दर्पण
इसके बाद बाबा ने तीन प्रकार के गुलाब दिखाए:
- लोहे का गुलाब
- पीतल का गुलाब
- वास्तविक गुलाब
इन तीनों के माध्यम से बच्चों के संस्कारों की स्थिति समझाई गई।
यह दृश्य इस संदेश का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
12. पहला गुलाब — लोहे का फूल
लोहे का फूल उन बच्चों के संस्कारों का प्रतीक है जिनके संस्कार बहुत कठोर हैं।
जैसे लोहे को मोड़ने के लिए—
- गर्म करना पड़ता है,
- हथौड़ा लगाना पड़ता है,
- बार-बार मेहनत करनी पड़ती है।
वैसे ही कुछ संस्कार इतने कठोर होते हैं कि बहुत प्रयास के बाद भी जल्दी नहीं बदलते।
आध्यात्मिक संकेत
ऐसे संस्कारों को बदलने के लिए निरंतर पुरुषार्थ चाहिए।
13. दूसरा गुलाब — पीतल का फूल
दूसरा फूल पीतल का था।
पीतल लोहे से अपेक्षाकृत नरम होता है और अपेक्षाकृत आसानी से मोड़ा जा सकता है।
यह उन संस्कारों का प्रतीक है जो—
- प्रयास से बदल सकते हैं,
- थोड़ी मेहनत से सुधर सकते हैं,
- और आत्म-जागरूकता से परिवर्तन स्वीकार कर लेते हैं।
आध्यात्मिक संकेत
इन संस्कारों को बदलना कठिन नहीं है, लेकिन पुरुषार्थ फिर भी आवश्यक है।
14. तीसरा गुलाब — वास्तविक गुलाब
तीसरा था:
रियल गुलाब।
यह उन बच्चों का प्रतीक है जो स्वाभाविक रूप से दिव्य गुणों को धारण करने में सहज हैं।
उन्हें परिवर्तन के लिए बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती।
वे बाबा की शिक्षा को सहजता से स्वीकार करके अपने जीवन में उतार लेते हैं।
15. तीन गुलाब — तीन प्रकार के संस्कार
इन तीनों को इस प्रकार समझ सकते हैं:
| गुलाब | संस्कार | परिवर्तन |
|---|---|---|
| लोहे का | बहुत कठोर संस्कार | बहुत पुरुषार्थ आवश्यक |
| पीतल का | अपेक्षाकृत नरम संस्कार | प्रयास से परिवर्तन |
| वास्तविक गुलाब | सहज दिव्य संस्कार | सहज और शीघ्र परिवर्तन |
इस तुलना का उद्देश्य किसी को ऊँचा या नीचा बताना नहीं है।
उद्देश्य है — स्वयं को पहचानना।
मैं किस प्रकार का गुलाब हूँ?
16. वास्तविक गुलाब के पत्तों का गिरना
सबसे गहरा दृश्य इसके बाद आया।
बाबा ने वास्तविक गुलाब को हाथ में उठाया।
फिर उसे थोड़ा-सा घुमाया।
घुमाते ही—
उसके सारे पत्ते गिर गए।
और बीच में केवल बीज रह गया।
बाबा ने इसी दृश्य से बच्चों को एक महान शिक्षा दी।
17. पुराने संस्कार रूपी पत्ते
बाबा ने कहा कि बच्चों को ऐसा पुरुषार्थ करना है कि—
पुराने संस्कार रूपी पत्ते
पुराने देह के संबंध रूपी पत्ते
जल्दी और सहज रूप से अलग हो जाएँ।
यहाँ “पत्ते” उन सभी चीजों के प्रतीक हैं जो आत्मा को अपनी वास्तविक बीज-रूप स्थिति से बाहर खींचते हैं।
जैसे—
- पुराने संस्कार,
- देह-अभिमान,
- पुराने संबंधों की आसक्ति,
- कर्मबंधन,
- और ऐसी कमजोरियाँ जो आत्मा को रोकती हैं।
18. बीज-रूप अवस्था क्या है?
जब सारे पत्ते गिर जाते हैं और बीज रह जाता है, तब गुलाब की बाहरी पहचान समाप्त होकर उसका मूल तत्व बचता है।
इसी प्रकार आत्मा को भी बाहरी पहचान और पुराने संस्कारों से ऊपर उठकर अपनी मूल स्थिति में स्थित होना है।
बीज-रूप अवस्था का संकेत:
“मैं आत्मा हूँ।”
मैं—
- शरीर नहीं,
- पुराने संस्कार नहीं,
- संबंधों का बंधन नहीं,
- परिस्थितियों का गुलाम नहीं।
मैं अपनी मूल आत्मिक पहचान में स्थित हूँ।
19. समय आने पर कौन-सा पत्ता अटक सकता है?
बाबा ने बच्चों को विशेष आत्म-परीक्षण करने को कहा:
“अगर समय आ जाए तो कोई भी संस्कार रूपी पत्ता अटक तो नहीं जाता?”
यह बहुत गहरी परीक्षा है।
आज हमें लगता है कि हम आसक्ति से मुक्त हैं।
लेकिन वास्तविक परीक्षा उस समय होगी जब—
- कोई कठिन परिस्थिति आए,
- कोई पुराना संबंध सामने आए,
- कोई पुराना संस्कार जागे,
- शरीर की स्थिति बदलने लगे,
- या अंतिम समय की स्थिति आए।
तब क्या आत्मा सहज रूप से बीज-रूप में स्थित हो पाएगी?
20. कर्मातीत अवस्था की परीक्षा
बाबा ने पूछा कि समय आने पर—
क्या कर्मातीत अवस्था सहज बनेगी?
या—
कोई कर्मबंधन आत्मा को रोक देगा?
इसलिए अभी से अपनी कमियों को पहचानना आवश्यक है।
21. आत्म-चेकिंग क्यों आवश्यक है?
बाबा की स्पष्ट शिक्षा है:
“अगर कोई कमी है तो चेक करो और भरने की कोशिश करो।”
जब तक हम अपनी कमी को पहचानेंगे नहीं, तब तक परिवर्तन नहीं कर सकते।
इसलिए आत्म-चेकिंग राजयोग का महत्वपूर्ण अभ्यास है।
हर दिन स्वयं से पूछें:
- मेरे अंदर कौन-सा पुराना संस्कार अभी भी मजबूत है?
- कौन-सी बात मुझे तुरंत प्रभावित करती है?
- किस संबंध में मेरी आसक्ति सबसे अधिक है?
- कौन-सी परिस्थिति में मैं देह-अभिमान में आ जाता हूँ?
- क्या मैं आवश्यकता पड़ने पर तुरंत न्यारा हो सकता हूँ?
22. ब्रह्मा बाबा के शरीर के सामने भी संदेश की स्थिरता
इस संदेश की पृष्ठभूमि को फिर याद करना बहुत महत्वपूर्ण है।
सामने ब्रह्मा बाबा का नश्वर शरीर रखा हुआ था, लेकिन संदेश में कोई अनावश्यक शोक या भावनात्मक चर्चा नहीं थी।
इसके बजाय शिक्षा थी:
संस्कार बदलो।
देह-अभिमान से ऊपर उठो।
बीज-रूप बनो।
कर्मातीत स्थिति प्राप्त करो।
यह संदेश की गंभीरता को और बढ़ा देता है।
23. आज के जीवन में इस संदेश का प्रयोग
हर दिन अपने संस्कारों का एक छोटा परीक्षण करें।
चरण 1 — पहचान
आज कौन-सा पुराना संस्कार सामने आया?
चरण 2 — स्वीकार
मैंने उस संस्कार को देखा और पहचाना।
चरण 3 — परिवर्तन
उसके स्थान पर कौन-सा दिव्य गुण धारण करना है?
चरण 4 — अभ्यास
अगली बार वही परिस्थिति आने पर नया संस्कार प्रयोग करना है।
चरण 5 — बीज-रूप
अंत में आत्म-स्मृति:
“मैं आत्मा हूँ। मैं न्यारी और प्यारी हूँ। मैं अपने मूल संस्कारों में स्थित हूँ।”
24. तीन गुलाबों से आत्म-परीक्षण
अपने आप से पूछें:
क्या मैं लोहे के गुलाब जैसा हूँ?
मेरे संस्कार बहुत कठोर हैं और बार-बार प्रयास के बाद भी बदलते नहीं?
क्या मैं पीतल के गुलाब जैसा हूँ?
मैं प्रयास से अपने संस्कार बदल लेता हूँ?
या मैं वास्तविक गुलाब जैसा हूँ?
मैं बाबा की शिक्षा को सहजता से स्वीकार करके परिवर्तन कर लेता हूँ?
इस प्रश्न का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं, बल्कि अपने पुरुषार्थ की दिशा पहचानना है।
25. इस संदेश का सबसे गहरा वैज्ञानिक-सदृश सूत्र
इस संदेश को एक सरल प्रक्रिया में समझें:
संस्कार → व्यवहार → पुनरावृत्ति → आदत → व्यक्तित्व
यदि संस्कार नहीं बदला तो वही व्यवहार बार-बार होगा।
इसलिए केवल व्यवहार बदलने का प्रयास पर्याप्त नहीं।
मूल संस्कार पर कार्य करना आवश्यक है।
यही बीज-रूप अवस्था का संकेत है।
26. पूरे संदेश का सार
दूसरे अव्यक्त संदेश में बाबा ने बच्चों को प्रेम और शक्ति देने के साथ-साथ दिव्य गुणों के फूल भी दिए।
फिर तीन गुलाबों के माध्यम से संस्कारों की स्थिति समझाई।
अंत में वास्तविक गुलाब के पत्ते गिराकर दिखाया कि—
पुराने संस्कारों और देह-संबंधी आसक्तियों के पत्ते सहज रूप से छूटने चाहिए।
और जब ये पत्ते हट जाएँ तो आत्मा—
बीज-रूप अवस्था में स्थित हो जाए।
इस अवस्था में कोई पुराना संस्कार अंतिम समय में आत्मा को रोकने वाला न बने।
27. अंतिम स्मृति-वाक्य
“अपने संस्कारों को चेक करो—समय आने पर कोई पत्ता तुम्हें रोक न दे।”
और इस पूरे संदेश का मुख्य सूत्र:
“पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त कर बीज-रूप अवस्था बनाओ।”
Short Question & Answers of the Murli
लघु प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. 18 जनवरी 1969 के दूसरे अव्यक्त संदेश का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त करके बीज-रूप अवस्था में स्थित होना।
प्रश्न 2. अव्यक्त वतन में दादी गुलजार ने बाप-दादा को किस रूप में अनुभव किया?
उत्तर: सभी बच्चों का स्वागत करने के लिए सामने उपस्थित और प्रेम-सागर स्वरूप में।
प्रश्न 3. बाबा की आँखों में क्या समाया हुआ था?
उत्तर: एक-एक बच्चे की याद और उनकी आवाज का अनुभव।
प्रश्न 4. बाबा ने बच्चों की याद के कितने प्रकार बताए?
उत्तर: मुख्य रूप से अव्यक्त और व्यक्त मिली हुई याद के रूप में।
प्रश्न 5. अव्यक्त याद किसे कहा गया?
उत्तर: जब आत्मा न्यारे-प्यारे अर्थात् शरीर से न्यारी और बाबा की प्यारी अवस्था में रहती है।
प्रश्न 6. व्यक्त याद किसे कहा गया?
उत्तर: जब आत्मा देह की चेतना में होती है और उसकी याद भी शरीर-संबंधी हो जाती है।
प्रश्न 7. संदेश के अनुसार कितने प्रतिशत बच्चों की याद अव्यक्त बताई गई?
उत्तर: 75 प्रतिशत।
प्रश्न 8. कितने प्रतिशत बच्चों की याद व्यक्त बताई गई?
उत्तर: 25 प्रतिशत।
प्रश्न 9. बाबा ने बच्चों को क्या दिया?
उत्तर: स्नेह, शक्ति और दिव्य गुणों की शिक्षा।
प्रश्न 10. फूलों की वर्षा किसका प्रतीक थी?
उत्तर: दिव्य गुण रूपी फूलों और उनकी शिक्षा का।
प्रश्न 11. बाबा ने कितने प्रकार के गुलाब दिखाए?
उत्तर: तीन—लोहे का, पीतल का और वास्तविक गुलाब।
प्रश्न 12. लोहे का गुलाब किसका प्रतीक था?
उत्तर: बहुत कठोर संस्कारों का।
प्रश्न 13. लोहे जैसे संस्कारों की विशेषता क्या है?
उत्तर: वे कठिन होते हैं और बदलने के लिए बहुत पुरुषार्थ चाहिए।
प्रश्न 14. पीतल का गुलाब किसका प्रतीक था?
उत्तर: ऐसे संस्कारों का जो प्रयास और मेहनत से बदल सकते हैं।
प्रश्न 15. वास्तविक गुलाब किसका प्रतीक था?
उत्तर: सहज रूप से दिव्य गुणों को धारण करने वाले संस्कारों का।
प्रश्न 16. वास्तविक गुलाब को बाबा ने क्या किया?
उत्तर: उसे हाथ में लेकर थोड़ा घुमाया।
प्रश्न 17. गुलाब को घुमाने पर क्या हुआ?
उत्तर: उसके सारे पत्ते गिर गए और बीच में बीज रह गया।
प्रश्न 18. गुलाब के पत्ते किसके प्रतीक थे?
उत्तर: पुराने संस्कारों और पुराने देह-संबंधों की आसक्ति के।
प्रश्न 19. बीज किसका प्रतीक था?
उत्तर: बीज-रूप आत्मिक अवस्था का।
प्रश्न 20. बीज-रूप अवस्था का मुख्य अर्थ क्या है?
उत्तर: पुराने संस्कारों और देह-अभिमान से ऊपर उठकर अपनी मूल आत्मिक स्थिति में स्थित होना।
प्रश्न 21. बाबा ने बच्चों को क्या चेक करने को कहा?
उत्तर: यह कि समय आने पर कोई संस्कार रूपी पत्ता उन्हें रोक तो नहीं देगा।
प्रश्न 22. कर्मातीत अवस्था के मार्ग में क्या बाधा बन सकती है?
उत्तर: पुराने संस्कार और कर्मबंधन।
प्रश्न 23. यदि कोई कमी दिखाई दे तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: उसे पहचानकर भरने और बदलने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
प्रश्न 24. आत्म-चेकिंग क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्योंकि जब तक अपनी कमी पहचानेंगे नहीं, तब तक वास्तविक परिवर्तन नहीं कर सकते।
प्रश्न 25. इस पूरे संदेश का एक वाक्य में सार क्या है?
उत्तर: “पुराने संस्कार और देह-संबंध रूपी पत्तों को सहज रूप से हटाकर बीज-रूप अवस्था में स्थित हो जाओ, ताकि समय आने पर कोई कर्मबंधन तुम्हें रोक न सके।”
BK Om Shanti - E-015.2A
Murli Type: Avyakt Murli
Official Murli Source: Open Official Source
Titles
स्नेह और संगठन के लिए एक दो की राय को रिगार्ड दो
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