अध्याय 3
“राय को रिगार्ड दो, प्रतिक्रिया नहीं—स्नेह और संगठन बनाए रखो”
18 जनवरी 1969 — तृतीय अव्यक्त दिव्य संदेश
1. तृतीय अव्यक्त संदेश का मुख्य सूत्र
ब्रह्मा बाबा के साकार शरीर छोड़ने के बाद 18 से 21 जनवरी के बीच दादी गुलजार के माध्यम से अव्यक्त वतन से दिव्य संदेश प्राप्त हुए। प्रस्तुत संदेश में बाबा ने विशेष रूप से स्नेह, संगठन और एक-दूसरे की राय का सम्मान करने की शिक्षा दी।
इस संदेश का केंद्रीय सूत्र है:
“स्नेह और संगठन के लिए एक-दूसरे की राय को रिगार्ड दो।”
अर्थात् यदि किसी भाई या बहन की राय हमारी राय से अलग भी हो, तो उसे तुरंत अस्वीकार या गलत नहीं कहना चाहिए। पहले उसकी राय को सम्मानपूर्वक सुनना चाहिए, फिर प्रेम से अपनी बात समझानी चाहिए।
2. ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के समय की विशेष परिस्थिति
इस संदेश की पृष्ठभूमि अत्यंत भावपूर्ण है।
ब्रह्मा बाबा का नश्वर शरीर सामने रखा हुआ था। उसी समय दादी गुलजार को बाबा से संदेश लेने के लिए भेजा गया। ऐसी गंभीर परिस्थिति में भी अव्यक्त वतन से जो शिक्षा मिली, वह थी:
“स्नेह और संगठन के लिए एक-दो की राय को रिगार्ड दो।”
यह बताता है कि परिस्थिति कितनी भी भावनात्मक या कठिन क्यों न हो, संगठन को बनाए रखने के लिए आपसी सम्मान और स्नेह आवश्यक है।
3. बाबा को मधुबन आने का निमंत्रण
दादी गुलजार को बाबा को मधुबन आने का निमंत्रण देने के लिए भेजा गया।
उन्होंने बाबा से कहा कि—
“बाबा, आप आओ।”
ब्रह्मा बाबा साकार शरीर छोड़ चुके थे, फिर भी बच्चों के मन में बाबा को फिर से अपने बीच देखने की गहरी इच्छा थी।
बाबा के संकेतों से पहले ऐसा अनुभव हुआ कि बाबा आने के लिए तैयार नहीं हैं।
लेकिन थोड़ी देर बाद बाबा ने कहा:
“सभी बच्चों ने बुलाया है तो बाप-दादा बच्चों का सेवाधारी है।”
4. बाबा ने “ना” के बाद “हाँ” क्यों कहा?
दादी गुलजार के मन में यह संकल्प आया कि बाबा ने अभी-अभी तो आने से मना किया था, फिर अचानक हाँ क्यों कर दी?
बाबा ने इस प्रश्न का उत्तर एक गहरी शिक्षा के रूप में दिया।
उन्होंने जानबूझकर अपने कर्म के द्वारा बच्चों को सिखाया कि—
एक-दूसरे के विचारों को रिगार्ड देना है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी राय देता है तो उसे तुरंत “नहीं” नहीं कहना चाहिए। पहले उसके विचार को सम्मान देना चाहिए।
5. राय को तुरंत ठुकराना क्यों नहीं चाहिए?
मान लीजिए कोई व्यक्ति हमें कोई सुझाव देता है और हमें वह उचित नहीं लगता।
हमारे सामने दो रास्ते हैं:
पहला रास्ता:
तुरंत कह देना—
“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।”
दूसरा रास्ता:
पहले कहना—
“हाँ, ठीक है, आपकी बात समझते हैं।”
फिर उस विचार पर विचार करके अपनी बात समझाना।
बाबा दूसरे मार्ग की शिक्षा देते हैं।
पहले रिगार्ड, फिर समझाना।
इससे सामने वाले की मानसिक प्रतिरोध की शक्ति कम होती है और वह हमारी बात को अधिक सहजता से समझ सकता है।
6. रिगार्ड देने का अर्थ राय को स्वीकार करना नहीं है
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
रिगार्ड देना ≠ राय से सहमत होना
किसी की राय का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि हमें वही राय माननी ही पड़ेगी।
अर्थ है:
- पहले उसकी बात सुनना,
- उसकी भावना को समझना,
- तुरंत विरोध न करना,
- फिर अपनी बात शांति से रखना,
- और आवश्यकता हो तो उसे समझाकर स्वीकार कराना।
यही सच्चा संगठनात्मक व्यवहार है।
7. सीधे विरोध करने से क्या होता है?
बाबा ने स्पष्ट किया कि यदि हम किसी की राय को तुरंत काट देते हैं तो—
दोनों फोर्स टक्कर खाएँगे।
एक व्यक्ति अपनी बात पर जोर देगा और दूसरा भी अपनी बात पर अड़ जाएगा।
परिणाम:
- संवाद बंद हो सकता है,
- मनमुटाव हो सकता है,
- स्नेह कम हो सकता है,
- संगठन कमजोर हो सकता है,
- और सफलता नहीं मिलती।
इसलिए पहले रिगार्ड देना आवश्यक है।
8. “राय” और “रिगार्ड” का आध्यात्मिक संबंध
राय व्यक्ति की बुद्धि से निकलती है।
हर व्यक्ति का अनुभव, परिस्थिति और सोच अलग हो सकती है।
इसलिए संगठन में सभी की राय बिल्कुल समान हो—यह आवश्यक नहीं।
लेकिन—
राय अलग हो सकती है,
रिगार्ड कम नहीं होना चाहिए।
यही स्नेह और संगठन की सुरक्षा है।
बाबा की शिक्षा है कि विचारों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन दिलों में दूरी नहीं होनी चाहिए।
9. प्रतिक्रिया और रिस्पांस में अंतर
इस संदेश की चर्चा में एक और महत्वपूर्ण शब्द सामने आता है:
प्रतिक्रिया (Reaction)
और
Response (रिस्पांस)
दोनों में बहुत अंतर है।
प्रतिक्रिया क्या है?
किसी की बात सुनते ही बिना सोचे तुरंत उत्तर दे देना।
उदाहरण:
किसी ने कुछ कहा और हमने तुरंत कह दिया—
“नहीं!”
या—
“आप गलत हैं।”
यह प्रतिक्रिया है।
10. रिस्पांस क्या है?
रिस्पांस का अर्थ है—
पहले सुनो, फिर सोचो, फिर उत्तर दो।
किसी ने कुछ कहा तो पहले:
“हाँ जी, ठीक है।”
फिर उसके विचार को समझें।
उसके बाद विचार करके उत्तर दें।
यही Response है।
11. राजयोग में Response का महत्व
राजयोग का अभ्यास केवल ध्यान में बैठने तक सीमित नहीं है।
राजयोग का वास्तविक प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति कुछ कहता है और हम तुरंत क्रोधित हो जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि मन ने प्रतिक्रिया को चुन लिया।
लेकिन यदि हम—
रुकते हैं → सुनते हैं → सोचते हैं → समझते हैं → फिर उत्तर देते हैं,
तो यह आत्मिक नियंत्रण का संकेत है।
इसलिए:
Reaction = मन की तत्काल प्रतिक्रिया
Response = आत्मिक समझ से दिया गया उत्तर
12. बाबा का अपना व्यवहार ही शिक्षा बन गया
इस संदेश की विशेषता यह है कि बाबा ने केवल उपदेश नहीं दिया।
उन्होंने स्वयं अपने व्यवहार से शिक्षा दी।
पहले आने का संकेत नहीं था।
फिर जब बच्चों ने बुलाया तो बाबा ने कहा:
“बच्चों ने बुलाया है तो बाप-दादा बच्चों का सेवाधारी है।”
इस प्रकार बाबा ने अपने कर्म से दिखाया कि दूसरे की भावना और राय को रिगार्ड देना चाहिए।
13. पहले स्वीकार करो, फिर समझाओ
बाबा की शिक्षा का व्यावहारिक तरीका है:
चरण 1 — सुनो
सामने वाला क्या कह रहा है, ध्यान से सुनो।
चरण 2 — रिगार्ड दो
तुरंत उसकी बात को गलत मत कहो।
चरण 3 — विचार करो
क्या उसकी बात में कोई उपयोगी पहलू है?
चरण 4 — अपनी बात समझाओ
यदि अलग विचार है तो शांति और प्रेम से समझाओ।
चरण 5 — स्वीकार कराओ
उद्देश्य सामने वाले को हराना नहीं, बल्कि समझ और सफलता तक पहुँचना है।
14. संगठन की सफलता किस पर निर्भर है?
बाबा के अनुसार आपसी राय को रिगार्ड देना ही संगठन में स्नेह को बनाए रखता है।
यदि हर व्यक्ति केवल अपनी राय को सही मानने लगे तो संगठन में टकराव बढ़ेगा।
लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की राय को सम्मान देगा तो—
- स्नेह बना रहेगा,
- सहयोग बढ़ेगा,
- संवाद अच्छा रहेगा,
- निर्णय सहज होंगे,
- और संगठन मजबूत रहेगा।
बाबा ने स्पष्ट कहा कि इसी से आपस में स्नेह और संगठन चलता रहेगा।
15. यह शिक्षा परिवार में भी लागू होती है
यह संदेश केवल सेवा संगठन के लिए नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।
परिवार में—
- पति-पत्नी,
- माता-पिता और बच्चे,
- भाई-बहन,
सभी की राय अलग हो सकती है।
यदि हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जाए तो छोटी बात भी विवाद बन सकती है।
लेकिन यदि पहले रिगार्ड दिया जाए और फिर बात समझाई जाए तो संबंधों में स्नेह बना रहता है।
16. सेवा में इस शिक्षा का प्रयोग
सेवा के क्षेत्र में अनेक लोगों की राय सामने आती है।
किसी को कोई कार्यक्रम अच्छा लगता है।
किसी को दूसरा तरीका अच्छा लगता है।
किसी की योजना अलग हो सकती है।
ऐसे समय में—
“मेरी राय ही सही है”
यह भाव संगठन को कमजोर कर सकता है।
इसके स्थान पर:
“पहले आपकी बात समझते हैं।”
यह भाव संगठन में प्रेम और सहयोग बढ़ाता है।
17. मतभेद और मनभेद में अंतर
मतभेद
विचार अलग होना।
मनभेद
विचार अलग होने के कारण दिल में दूरी आ जाना।
बाबा की शिक्षा है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए।
राय अलग हो सकती है, लेकिन सम्मान बना रहना चाहिए।
18. सच्चा रिगार्ड कैसा हो?
सच्चा रिगार्ड केवल शब्दों में नहीं होना चाहिए।
यह हमारे व्यवहार में दिखाई दे:
- सामने वाले की बात बीच में न काटना,
- उसकी बात पूरी सुनना,
- तुरंत निर्णय न देना,
- अपमानजनक शब्दों से बचना,
- शांत भाव से समझाना,
- असहमति में भी सम्मान बनाए रखना।
यही व्यावहारिक रिगार्ड है।
19. इस संदेश का राजयोग सिद्धांत
इस पूरे संदेश को राजयोग की दृष्टि से देखें तो मुख्य अभ्यास है:
“Reaction से पहले Pause.”
जब कोई बात मन को प्रभावित करे:
रुको।
फिर आत्म-स्मृति में आओ:
“मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ।”
फिर सोचो:
“इस परिस्थिति में मेरा श्रेष्ठ Response क्या होना चाहिए?”
इसके बाद उत्तर दो।
यही राजयोग को व्यवहार में लाने का एक सुंदर अभ्यास है।
20. दैनिक जीवन का अभ्यास
दिन में जब भी कोई आपकी राय से अलग बात कहे, तीन चरण याद रखें:
STOP → RESPECT → RESPOND
STOP — तुरंत प्रतिक्रिया मत दो।
RESPECT — पहले उसकी राय को रिगार्ड दो।
RESPOND — सोच-समझकर उत्तर दो।
यह छोटा-सा अभ्यास स्नेह और संगठन दोनों को मजबूत कर सकता है।
21. पूरे संदेश का सार
18 जनवरी 1969 के इस तृतीय अव्यक्त संदेश में बाबा ने बच्चों को कोई कठिन साधना नहीं दी।
उन्होंने संगठन और संबंधों को मजबूत करने का एक अत्यंत सरल लेकिन गहरा नियम दिया:
“एक-दूसरे की राय को पहले रिगार्ड दो।”
रिगार्ड देने से सामने वाले का विरोध कम होता है।
विरोध कम होने से संवाद खुलता है।
संवाद खुलने से समझ बढ़ती है।
समझ बढ़ने से स्नेह बना रहता है।
और स्नेह से संगठन मजबूत होता है।
इसलिए—
**प्रतिक्रिया नहीं, रिस्पांस।
अस्वीकार नहीं, पहले रिगार्ड।
टकराव नहीं, स्नेह।
व्यक्तिगत आग्रह नहीं, संगठन।**
22. अंतिम स्मृति-वाक्य
“पहले उनकी राय को रिगार्ड दो, फिर अपनी बात समझाओ—इसी से स्नेह और संगठन चलता रहेगा।”
और राजयोग की भाषा में:
“तुरंत Reaction नहीं—आत्मिक स्थिति में आकर श्रेष्ठ Response।”
लघु प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. 18 जनवरी 1969 के तृतीय अव्यक्त संदेश का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: स्नेह और संगठन के लिए एक-दूसरे की राय को रिगार्ड देना।
प्रश्न 2. यह संदेश किस माध्यम से प्राप्त हुआ?
उत्तर: दादी गुलजार के माध्यम से अव्यक्त वतन से।
प्रश्न 3. बाबा ने मुख्य रूप से किस बात का सम्मान करने को कहा?
उत्तर: एक-दूसरे की राय और विचारों का।
प्रश्न 4. किसी की राय पसंद न आए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: उसे तुरंत ठुकराना नहीं चाहिए; पहले उसकी राय को रिगार्ड देना चाहिए।
प्रश्न 5. रिगार्ड देने का क्या अर्थ है?
उत्तर: सामने वाले की बात को सम्मानपूर्वक सुनना और तुरंत अस्वीकार न करना।
प्रश्न 6. क्या रिगार्ड देने का अर्थ उसकी राय से सहमत होना है?
उत्तर: नहीं। रिगार्ड का अर्थ सम्मान देना है; आवश्यकता होने पर बाद में अपनी बात समझाई जा सकती है।
प्रश्न 7. बाबा ने बच्चों को किस प्रकार शिक्षा दी?
उत्तर: अपने व्यवहार और कर्म के द्वारा।
प्रश्न 8. बाबा ने “बच्चों का सेवाधारी” होने की बात क्यों कही?
उत्तर: यह दिखाने के लिए कि बच्चों की भावना और राय को रिगार्ड देना चाहिए।
प्रश्न 9. राय को तुरंत ठुकराने से क्या होता है?
उत्तर: दोनों पक्षों की शक्तियाँ टकराती हैं और सफलता में बाधा आती है।
प्रश्न 10. पहले रिगार्ड देने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: सामने वाले का विरोध कम होता है और वह हमारी बात को सहजता से समझ सकता है।
प्रश्न 11. Reaction क्या है?
उत्तर: किसी बात पर बिना सोचे तुरंत प्रतिक्रिया देना।
प्रश्न 12. Response क्या है?
उत्तर: पहले सुनना, सोचना और समझना, फिर उचित उत्तर देना।
प्रश्न 13. Reaction और Response में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: Reaction तत्काल और भावनात्मक हो सकती है, जबकि Response सोच-समझकर दिया गया उत्तर है।
प्रश्न 14. राजयोग में Response कैसे विकसित किया जा सकता है?
उत्तर: प्रतिक्रिया देने से पहले रुककर आत्म-स्मृति में स्थित होकर उत्तर देने से।
प्रश्न 15. बाबा के अनुसार संगठन कैसे चलता रहेगा?
उत्तर: एक-दूसरे की राय को रिगार्ड देने से स्नेह और संगठन बना रहेगा।
प्रश्न 16. क्या संगठन में सभी की राय समान होना आवश्यक है?
उत्तर: नहीं। राय अलग हो सकती है, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहना चाहिए।
प्रश्न 17. मतभेद और मनभेद में क्या अंतर है?
उत्तर: मतभेद विचारों का अंतर है, जबकि मनभेद दिलों में दूरी का होना है।
प्रश्न 18. बाबा की शिक्षा के अनुसार मतभेद होने पर क्या बनाए रखना है?
उत्तर: स्नेह और सम्मान।
प्रश्न 19. परिवार में इस शिक्षा का प्रयोग कैसे कर सकते हैं?
उत्तर: किसी की बात तुरंत काटने के बजाय पहले उसे सुनकर सम्मान देना और फिर अपनी बात समझाना।
प्रश्न 20. सेवा में इस शिक्षा का क्या महत्व है?
उत्तर: अलग-अलग विचारों के बीच टकराव कम करके सहयोग और संगठन को मजबूत करना।
प्रश्न 21. “पहले रिगार्ड, फिर समझाना” क्यों आवश्यक है?
उत्तर: इससे सामने वाला स्वयं को सम्मानित महसूस करता है और हमारी बात सुनने के लिए अधिक तैयार होता है।
प्रश्न 22. इस संदेश में बाबा ने कौन-सा व्यवहारिक उदाहरण दिया?
उत्तर: पहले आने का विचार न होने के बावजूद बच्चों ने बुलाया तो बाबा ने बच्चों की भावना को रिगार्ड दिया।
प्रश्न 23. जब कोई हमारी बात से असहमत हो तो हमारी पहली प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए?
उत्तर: शांत रहकर उसकी बात को सुनना और रिगार्ड देना।
. इस पूरे अव्यक्त संदेश का एक वाक्य में सार क्या है?
उत्तर: “प्रतिक्रिया नहीं, रिस्पांस दो; एक-दूसरे की राय को रिगार्ड देकर स्नेह और संगठन को मजबूत बनाओ।”
