अध्याय 4
साकार का श्रृंगार, अव्यक्त सिद्धि का आधार
18 जनवरी 1969 — चौथा अव्यक्त दिव्य संदेश
1. आज के संदेश का मुख्य सूत्र
18 जनवरी 1969 से 21 जनवरी 1969 के बीच प्राप्त चौथे अव्यक्त संदेश का निचोड़ है:
“साकार के श्रृंगार को प्रैक्टिकल स्वरूप में अव्यक्त सिद्धि बनाकर दिखाओ।”
ब्रह्मा बाबा ने साकार रूप में बच्चों का जो आध्यात्मिक श्रृंगार किया—ज्ञान, योग, गुण, शक्तियाँ और संस्कार—अब उसी श्रृंगार को अव्यक्त स्थिति की सिद्धि के रूप में जीवन में प्रकट करना है।
अर्थात् केवल बाबा से प्राप्त शिक्षाओं को जानना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी स्थिति और व्यवहार में सिद्ध करके दिखाना है।
2. अव्यक्त वतन में बाबा का दर्शन
जब दादी गुलजार अव्यक्त वतन में पहुँचीं, तो सामने शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा दोनों उपस्थित थे।
सबसे पहले उनकी दृष्टि ब्रह्मा बाबा के गले पर गई।
ब्रह्मा बाबा के गले में बहुत-सी मालाएँ थीं।
कुछ मालाएँ बड़ी थीं और कुछ छोटी।
दादी ने पूछा:
“बाबा, इन मालाओं का क्या रहस्य है?”
बाबा ने बताया कि ये साधारण मालाएँ नहीं हैं।
ये बच्चों के उलहनों की मालाएँ हैं।
3. बच्चों के उलहनों की माला
बाबा ने समझाया कि बच्चे जब एकांत में बैठते हैं तो प्रेम के कारण बाबा को अपने मन की बातें और उलहने सुनाते हैं।
बच्चों को ज्ञान भी है और बाबा से प्रेम भी है।
इसलिए वे जानते हुए भी कभी-कभी कहते हैं—
- बाबा, ऐसा क्यों हुआ?
- बाबा, आपने ऐसा क्यों नहीं किया?
- बाबा, मेरी यह इच्छा पूरी क्यों नहीं हुई?
- बाबा, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?
- बाबा, मुझे यह परिस्थिति क्यों मिली?
इस प्रकार प्रेम से दिए गए इन उलहनों को बाबा ने उलहनों की माला के रूप में दिखाया।
गहरी शिक्षा
बाबा बच्चों के उलहनों को दोष के रूप में नहीं देखते।
क्योंकि उन उलहनों के पीछे भी ज्ञान के साथ प्रेम और स्नेह छिपा हुआ है।
4. “जैसा बच्चा, वैसा रिस्पांस”
जब दादी ने पूछा कि बाबा बच्चों के इन उलहनों का क्या उत्तर देते हैं, तो बाबा ने कहा:
“जैसा बच्चा, वैसा रिस्पांस।”
बाबा ने प्रतिक्रिया के रूप में क्रोध या शिकायत नहीं की।
उन्होंने भी बच्चों को एक प्रकार की उलहनों की माला पहनाई।
इसका अर्थ है कि बाबा बच्चों को उनकी ही स्थिति का दर्पण दिखाते हैं।
बच्चों ने साकार रूप में बाबा से जो आशाएँ रखीं, जो प्रेम रखा और जो कुछ बाबा से प्राप्त करना चाहा, अब उसे अव्यक्त रूप में अपने जीवन में प्रकट करना है।
5. साकार में जो श्रृंगार मिला, अब अव्यक्त में सिद्धि बनाओ
ब्रह्मा बाबा ने साकार रूप में बच्चों का जो श्रृंगार किया, अब वही श्रृंगार अव्यक्त वतन में देखा जाएगा।
साकार में बाबा ने—
- ज्ञान दिया,
- योग सिखाया,
- गुणों का विकास कराया,
- शक्तियों को जगाया,
- संस्कारों को श्रेष्ठ बनाया,
- सेवा का मार्ग दिखाया।
अब प्रश्न यह है:
क्या वह श्रृंगार हमारे जीवन में दिखाई देता है?
यही इस संदेश की मुख्य परीक्षा है।
साकार बाबा ने जो बनाया, उसे अव्यक्त बाबा के सामने सिद्ध करके दिखाना है।
6. बाबा का अव्यक्त म्यूजियम
इसके बाद दादी ने बाबा से पूछा:
“बाबा, आप सारा दिन अव्यक्त वतन में क्या करते हैं?”
बाबा ने कहा:
“चलो, मैं तुम्हें वतन का म्यूजियम दिखाऊँ।”
दादी ने कहा कि हम तो म्यूजियम बनाने के लिए पहले योजना बनाते हैं।
बाबा ने बताया कि बाबा का म्यूजियम तो एक सेकंड में तैयार हो सकता है।
फिर एक बहुत बड़ा हॉल दिखाई दिया।
7. म्यूजियम में बच्चे ही मॉडल थे
उस विशाल हॉल में बहुत-से बच्चे मॉडल के रूप में खड़े थे।
दादी ने कहा:
“बाबा, यह तो हम ही म्यूजियम में खड़े हैं!”
बाबा ने उत्तर दिया:
“बाबा का म्यूजियम यही है।”
यह बहुत गहरा आध्यात्मिक संकेत है।
बाबा का वास्तविक म्यूजियम पत्थर की मूर्तियाँ नहीं, बल्कि बच्चों का परिवर्तित जीवन है।
हर बच्चा स्वयं एक जीवंत मॉडल है।
8. बाबा बच्चों का श्रृंगार कैसे कर रहे हैं?
बाबा ने कहा कि बच्चों को जाकर एक-एक मॉडल को देखना चाहिए कि बाप-दादा ने उसे कैसे सजाया है।
जैसे कोई कलाकार मूर्ति को सजाता है, वैसे ही बाबा ने बच्चों का श्रृंगार किया है।
साकार रूप में जो मुख्य श्रृंगार करना था, वह बाबा ने कर दिया।
अब अव्यक्त रूप में एक और विशेष कार्य चल रहा है।
उस श्रृंगार में “नग” लगाए जा रहे हैं।
जैसे आभूषणों में बीच का नग उसे और सुंदर तथा मूल्यवान बनाता है, वैसे ही बच्चों के जीवन में विशेष सिद्धियों और श्रेष्ठ गुणों को और अधिक निखारा जा रहा है।
9. सबसे मुख्य “नग” — अव्यक्त स्थिति
बाबा ने बच्चों के लिए मुख्य शिक्षा बताई:
“अव्यक्त स्थिति में स्थित रहकर व्यक्त भाव में आओ।”
यह इस पूरे संदेश की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं में से एक है।
इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति शरीर छोड़कर अलग हो जाए।
बल्कि—
शरीर में रहते हुए शरीर से न्यारा रहना।
व्यक्त जीवन में रहते हुए अव्यक्त भाव में स्थित रहना।
10. अव्यक्त स्थिति क्या है?
अव्यक्त स्थिति का अर्थ है:
“मैं देश से न्यारी आत्मा हूँ।”
जब व्यक्ति स्वयं को आत्मा समझकर प्रत्येक कार्य करता है, तब उसकी चेतना अव्यक्त स्थिति के निकट होती है।
अर्थात्—
- मैं आत्मा हूँ।
- यह शरीर मेरा साधन है।
- मैं शरीर के माध्यम से कर्म कर रहा हूँ।
- मैं परिस्थितियों का साक्षी हूँ।
- मैं कर्म करते हुए भी आत्मिक स्थिति नहीं छोड़ूँगा।
11. व्यक्त में रहकर अव्यक्त बनना
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है:
क्या अव्यक्त स्थिति के लिए संसार छोड़ना पड़ेगा?
बाबा की शिक्षा है—नहीं।
व्यक्त में रहना है।
शरीर में रहना है।
परंतु ऐसी स्थिति में रहना है जैसे—
“मैं इस शरीर से न्यारा हूँ।”
अर्थात् शरीर कर्म करे, लेकिन चेतना आत्मा में स्थित रहे।
यही है—
व्यक्त में अव्यक्त।
12. कर्मातीत सिद्धि का “नग”
बाबा ने बताया कि प्रत्येक बच्चे में अलग-अलग विशेषताओं के अनुसार श्रृंगार किया जा रहा है।
जहाँ किसी बच्चे में कमी दिखाई देती है, वहाँ बाबा उस कमी को पूरा करने के लिए कार्य करते हैं।
विशेष रूप से कर्मातीत सिद्धि का नग अभी सभी में समान रूप से विकसित नहीं हुआ है।
इसलिए बाबा बच्चों को उस अंतिम स्थिति की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म करते हुए भी कर्म का बंधन न रहे।
कर्म करते हुए कर्म से न्यारा।
कर्म में रहते हुए आत्मिक स्थिति में स्थिर।
यही कर्मातीत सिद्धि की दिशा है।
13. बाबा अभी भी बच्चों को सजा रहे हैं
साकार रूप में बाबा जिस प्रकार बच्चों का श्रृंगार करते थे, उसी प्रकार अव्यक्त रूप में भी बच्चों के जीवन को सजाने का कार्य जारी है।
अंतर केवल इतना है कि—
साकार में बाबा दिखाई देते थे,
अव्यक्त में बाबा की प्रेरणा और टचिंग अनुभव होती है।
जो बच्चे योगयुक्त और जागरूक रहते हैं, वे इस टचिंग को अनुभव कर सकते हैं।
14. योगयुक्त आत्माओं को टचिंग कैसे मिलती है?
बाबा ने संकेत दिया कि जब वे किसी विशेष समय पर बच्चों को विशेष रूप से याद करते हैं, तब योगयुक्त और जागरूक बच्चों को अंदर से कोई विशेष टचिंग अनुभव हो सकती है।
यह टचिंग हो सकती है—
- किसी विशेष कमी का अचानक एहसास,
- किसी गुण को धारण करने की प्रेरणा,
- किसी गलत संस्कार को छोड़ने की स्पष्ट भावना,
- किसी सेवा के लिए प्रेरणा,
- अचानक आत्मिक शांति,
- या बाबा की याद का गहरा अनुभव।
इसलिए योग और जागरूकता आवश्यक है।
15. बाबा विशेष समय पर विशेष बच्चों को याद करते हैं
बाबा ने कहा कि वे अव्यक्त वतन में भी विशेष समय पर विशेष बच्चों को याद करते हैं।
इसका अर्थ है कि अव्यक्त संबंध समाप्त नहीं हुआ।
बच्चे यदि अपनी चेतना को योगयुक्त रखते हैं तो वे उस संबंध की अनुभूति कर सकते हैं।
इसलिए केवल बाबा को याद करना ही नहीं—
ऐसी स्थिति बनानी है कि बाबा की टचिंग को ग्रहण करने योग्य बनें।
16. “बाबा हमें वतन में क्यों नहीं बुला लेते?”
दादी ने प्रेम से पूछा:
“बाबा, आप सभी को अव्यक्त वतन में क्यों नहीं बुला लेते? नीचे क्यों रखा है? यहीं बड़ा सेंटर खोल दो।”
यह प्रश्न बच्चों की बाबा के प्रति गहरी तड़प और प्रेम को दर्शाता है।
लेकिन बाबा ने समझाया कि बच्चों का अभी इस धरती पर रहना आवश्यक है।
क्योंकि—
अब हमें रचना है।
ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद बच्चों को अपनी जिम्मेदारी समझनी है।
17. उपराम अवस्था — हमेशा तैयार
बाबा ने कहा कि बच्चों की उपराम अवस्था होनी ही चाहिए।
उपराम का अर्थ है—
- संसार से भाग जाना नहीं,
- जिम्मेदारियों को छोड़ देना नहीं,
- भावनाहीन बन जाना नहीं,
बल्कि—
हर समय तैयार रहना।
यदि बाबा कभी भी बुलाएँ तो आत्मा तैयार हो।
यही उपराम अवस्था याद की यात्रा को बल देती है।
18. उपराम अवस्था सहज याद का साधन है
यदि आत्मा किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति या शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्त है, तो अचानक परिवर्तन कठिन लगता है।
लेकिन उपराम आत्मा—
- संबंध निभाती है,
- सेवा करती है,
- कर्म करती है,
- जिम्मेदारी निभाती है,
फिर भी अंदर से स्वतंत्र रहती है।
इसलिए उपराम अवस्था को कहा गया:
सहज याद का तरीका।
19. “समय बहुत कम है”
बाबा ने बच्चों को चेतावनी भी दी:
“ज्यादा समय नहीं है।”
इसलिए पुरुषार्थ को भविष्य पर नहीं छोड़ना चाहिए।
“बाद में देही-अभिमानी बनूँगा।”
“बाद में आसक्ति छोड़ूँगा।”
“बाद में मन को स्थिर करूँगा।”
ऐसा नहीं।
अभी से तैयारी करनी है।
क्योंकि बाबा कभी भी किसी को बुला सकते हैं।
20. पूरे संदेश का आध्यात्मिक सार
18 जनवरी 1969 के इस चौथे अव्यक्त संदेश में बाबा ने बच्चों को चार महान दिशाएँ दीं:
1. साकार के श्रृंगार को सिद्धि बनाओ
बाबा ने जो ज्ञान, योग, गुण और शक्तियाँ दी हैं, उन्हें जीवन में प्रमाणित करो।
2. व्यक्त में अव्यक्त बनो
शरीर में रहते हुए आत्मिक चेतना में स्थित रहो।
3. कर्मातीत सिद्धि का नग धारण करो
कर्म करो, लेकिन कर्म के बंधन में मत फँसो।
4. उपराम और सदा तैयार रहो
संबंध और जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी अंदर से न्यारे और स्वतंत्र रहो।
21. आज के जीवन में इस संदेश का प्रयोग
अपने जीवन को बाबा के म्यूजियम का एक मॉडल समझें।
हर दिन स्वयं से पूछें:
मेरा सबसे सुंदर श्रृंगार कौन-सा है?
क्या मेरे जीवन में—
- शांति दिखाई देती है?
- प्रेम दिखाई देता है?
- सहनशीलता दिखाई देती है?
- निर्मानता दिखाई देती है?
- आत्मिक नशा दिखाई देता है?
- कर्मातीत बनने का अभ्यास दिखाई देता है?
- उपराम अवस्था दिखाई देती है?
यदि कोई कमी दिखाई देती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं।
वही कमी बाबा के द्वारा लगाए जाने वाले अगले “नग” का संकेत हो सकती है।
22. एक मिनट का दैनिक अभ्यास
शांत होकर स्वयं से कहें:
“मैं आत्मा हूँ।
यह शरीर मेरा साधन है।
मैं व्यक्त कर्म में हूँ, लेकिन मेरी स्थिति अव्यक्त है।
मैं हर कर्म आत्मिक चेतना से करूँगा।
मैं किसी परिस्थिति में अपनी स्थिति नहीं खोऊँगा।
मैं उपराम हूँ।
मैं सदा तैयार हूँ।
मुझे साकार बाबा के श्रृंगार को अव्यक्त सिद्धि बनाकर दिखाना है।”
23. अंतिम संदेश
इस चौथे अव्यक्त संदेश की सबसे बड़ी प्रेरणा यह है कि अब बाबा को केवल बाहर खोजने का समय नहीं है।
बाबा ने जो हमें बनाया है, उसे अपने जीवन में दिखाना है।
साकार बाबा ने हमारा श्रृंगार किया।
अव्यक्त बाबा उस श्रृंगार में सिद्धि के नग लगा रहे हैं।
अब हमारा कार्य है—
“साकार के श्रृंगार को प्रैक्टिकल स्वरूप में अव्यक्त सिद्धि बनाकर दिखाना।”
और इसके लिए—
**व्यक्त में रहो, अव्यक्त भाव में स्थित रहो।
कर्म करो, कर्मातीत बनो।
संबंध निभाओ, उपराम रहो।
सेवा करो, सदा तैयार रहो।**
लघु प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. 18 जनवरी 1969 के चौथे अव्यक्त संदेश का मुख्य निचोड़ क्या है?
उत्तर: साकार के श्रृंगार को प्रैक्टिकल स्वरूप में अव्यक्त सिद्धि बनाकर दिखाना।
प्रश्न 2. अव्यक्त वतन में ब्रह्मा बाबा के गले में क्या दिखाई दिया?
उत्तर: बहुत-सी बड़ी और छोटी मालाएँ।
प्रश्न 3. उन मालाओं का क्या रहस्य बताया गया?
उत्तर: वे बच्चों के प्रेमपूर्ण उलहनों की मालाएँ थीं।
प्रश्न 4. बच्चे बाबा को उलहने क्यों देते हैं?
उत्तर: ज्ञान के साथ बाबा के प्रति गहरा प्रेम और स्नेह होने के कारण।
प्रश्न 5. बाबा ने बच्चों के उलहनों को गलत क्यों नहीं माना?
उत्तर: क्योंकि उनमें प्रेम और स्नेह भी समाया हुआ है।
प्रश्न 6. “जैसा बच्चा, वैसा रिस्पांस” का क्या अर्थ है?
उत्तर: बाबा बच्चों की भावनाओं और स्थिति के अनुसार उन्हें उसी के अनुरूप उत्तर और मार्गदर्शन देते हैं।
प्रश्न 7. बाबा ने साकार रूप में बच्चों को क्या दिया?
उत्तर: ज्ञान, योग, गुण, शक्तियाँ, श्रेष्ठ संस्कार और सेवा की प्रेरणा—अर्थात् आध्यात्मिक श्रृंगार।
प्रश्न 8. अब उस साकार श्रृंगार को क्या बनाना है?
उत्तर: अव्यक्त सिद्धि का प्रैक्टिकल स्वरूप।
प्रश्न 9. बाबा का “म्यूजियम” क्या था?
उत्तर: बच्चों के ही जीवंत मॉडल—अर्थात् बच्चों का परिवर्तित जीवन।
प्रश्न 10. म्यूजियम के मॉडल किसके प्रतीक थे?
उत्तर: उन बच्चों के, जिन्हें बाप-दादा ने ज्ञान, गुण, योग और शक्तियों से सजाया है।
प्रश्न 11. अव्यक्त रूप में बाबा बच्चों को किस प्रकार सजा रहे हैं?
उत्तर: उनके जीवन की कमियों को दूर करके उनमें विशेष गुण और सिद्धियों के “नग” लगा रहे हैं।
प्रश्न 12. बच्चों के लिए मुख्य “नग” कौन-सा बताया गया?
उत्तर: अव्यक्त स्थिति में स्थित रहना और व्यक्त भाव में आना।
प्रश्न 13. अव्यक्त स्थिति का सरल अर्थ क्या है?
उत्तर: स्वयं को आत्मा समझकर प्रत्येक कर्म करना।
प्रश्न 14. क्या अव्यक्त स्थिति में रहने के लिए शरीर या संसार छोड़ना है?
उत्तर: नहीं। शरीर और संसार में रहते हुए उनसे न्यारे होकर रहना है।
प्रश्न 15. “व्यक्त में रहकर अव्यक्त भाव” का क्या अर्थ है?
उत्तर: शरीर में रहते हुए आत्मिक चेतना में स्थित रहना।
प्रश्न 16. कर्मातीत सिद्धि क्या है?
उत्तर: कर्म करते हुए भी कर्म के बंधन और प्रभाव से न्यारे रहने की श्रेष्ठ अवस्था।
प्रश्न 17. बाबा बच्चों को अव्यक्त वतन से किस प्रकार सजाते हैं?
उत्तर: विशेष समय पर विशेष बच्चों को याद करके उन्हें टचिंग और प्रेरणा देते हैं।
प्रश्न 18. किन बच्चों को बाबा की टचिंग अधिक अनुभव हो सकती है?
उत्तर: योगयुक्त और जागरूक बच्चों को।
प्रश्न 19. दादी ने बाबा से क्या पूछा?
उत्तर: बाबा सभी बच्चों को अव्यक्त वतन में क्यों नहीं बुला लेते?
प्रश्न 20. बाबा ने बच्चों को नीचे क्यों रखा है?
उत्तर: क्योंकि अभी बच्चों को धरती पर रहकर रचना और सेवा का कार्य करना है।
प्रश्न 21. उपराम अवस्था क्या है?
उत्तर: जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी अंदर से आसक्ति और बंधन से न्यारे रहना तथा सदा तैयार रहना।
प्रश्न 22. उपराम अवस्था से क्या लाभ होता है?
उत्तर: याद की यात्रा को बल मिलता है और सहज याद का अभ्यास होता है।
प्रश्न 23. बाबा ने बच्चों को किस बात के लिए तैयार रहने को कहा?
उत्तर: हर समय तैयार रहने के लिए, क्योंकि बाबा कभी भी किसी को बुला सकते हैं।
प्रश्न 24. इस संदेश में “समय कम है” का क्या संकेत है?
उत्तर: पुरुषार्थ को भविष्य पर न छोड़कर अभी से अव्यक्त स्थिति, उपरामता और सिद्धि का अभ्यास करना चाहिए।
प्रश्न 25. इस पूरे संदेश की सबसे बड़ी शिक्षा क्या है?
उत्तर: साकार बाबा ने जो श्रृंगार किया है, उसे अपने जीवन में अव्यक्त सिद्धि के रूप में प्रैक्टिकल करके दिखाना।
