11 February 1971 | हिंदी · “अंत:वाहक शरीर द्वारा सेवा”
“अंत:वाहक शरीर द्वारा सेवा”
एक सेकेण्ड में कितना दूर से दूर जा सकते हो, हिसाब निकाल सकते हो? जैसे मरने के बाद आत्मा एक सेकेण्ड में कहाँ पहुँच जाती है। ऐसे आप भी अन्त:वाहक शरीर द्वारा, अन्त:वाहक शरीर जो कहते हैं उसका भावार्थ क्या है? आप लोगों का जो गायन है कि अन्त:वाहक शरीर द्वारा बहुत सैर करते थे, उसका अर्थ क्या है? यह गायन सिर्फ दिव्य-दृष्टि वालों का नहीं है लेकिन तुम सभी का है। यह लोग तो अन्त:वाहक शरीर का अपना अर्थ बताते हैं। लेकिन यथार्थ अर्थ यही है कि अन्त के समय की जो आप लोगों की कर्मातीत अवस्था की स्थिति है वह जैसे वाहन होता है ना। कोई न कोई वाहन द्वारा सैर किया जाता है। कहाँ का कहाँ पहुँच जाते हैं! वैसे जब कर्मातीत अवस्था बन जाती है तो यह स्थिति होने से एक सेकेण्ड में कहाँ का कहाँ पहुँच सकते हैं। इसलिए अन्त:वाहक शरीर कहते हैं। वास्तव में यह अन्तिम स्थिति का गायन है। उस समय आप इस स्थूल स्वरूप के भान से परे रहते हो इसलिए इनको सूक्ष्म शरीर भी कह दिया है। जैसे कहावत है उड़ने वाला घोड़ा। तो इस समय के आप सभी के अनुभव की यह बातें हैं जो कहानियों के रूप में बनाई हुई हैं। एक सेकेण्ड में आर्डर किया यहाँ पहुँचो तो वहाँ पहुँच जायेगा। ऐसा अपना अनुभव करते जाते हो? जैसे आजकल साइंस भी स्पीड़ को क्विक करने में लगी हुई है। जहाँ तक हो सकता है समय कम और सफलता ज्यादा का पुरुषार्थ कर रहे हैं। ऐसे ही आप लोगों का पुरुषार्थ भी हर बात में स्पीड को बढ़ाने का चल रहा है। जितनी-जितनी जिसकी स्पीड़ बढ़ेगी उतना ही अपने फाईनल स्टेज के नज़दीक आयेंगे। स्पीड़ से स्टेज तक पहुँचेंगे। अपनी स्पीड से स्टेज को परख सकते हो।
अभी सभी महान् पर्व शिवरात्रि मनाने का प्लैन बना रहे हो, फिर नवीनता क्या सोची है? (झण्डा लहरायेंगे) अपने-अपने सेवाकेन्द्रों पर झण्डा भले लहराओ लेकिन हरेक आत्मा के दिल पर बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराओ। वह तब होगा जब शक्ति स्वरूप की प्रत्यक्षता होगी। शक्ति स्वरूप से ही सर्वशक्तिमान को प्रत्यक्ष कर सकते हो। शक्ति स्वरूप अर्थात् संहारी और अलंकारी। जिस समय स्टेज पर आते हो उस समय पहले अपनी स्थिति की स्टेज अच्छी तरह से ठीक बनाकर फिर उस स्टेज पर आओ, जिससे लोगों को आपकी आन्तरिक स्टेज का साक्षात्कार हो। जैसे और तैयारियाँ करते हो वैसे यह भी अपनी तैयारी देखो कि अलंकारी बनकर स्टेज पर आ रही हूँ। लाइट हाउस, माइट हाउस – दोनों ही स्वरूप इमर्ज रूप में हों। जब दोनों स्वरूप होंगे तब ठीक रीति से गाइड बन सकेंगे। आपके “बाप” शब्द में इतना स्नेह और शक्ति भरी हुई हो जो यह शब्द ज्ञान अंजन का काम करे, अनाथ को सनाथ बना दे। इस एक शब्द में इतनी शक्ति भरो। जिस समय स्टेज पर आते हो उस समय की स्थिति एक तो तरस की हो, दूसरी तरफ कल्याण की भावना, तीसरी तरफ अति स्नेह के शब्द, चौथी तरफ स्वरूप में शक्तिपन की झलक हो। अपनी स्मृति और स्थिति को ऐसा पावरफुल बनाकर ऐसे समझो कि अपने कई समय के पुकारते हुए भक्तों को अपने द्वारा बाप का साक्षात्कार कराने के लिए आई हूँ। इस रीति से अपने रूहानी रूप, रूहानी दृष्टि, कल्याणकारी वृत्ति द्वारा बाप को प्रत्यक्ष कर सकती हो। समझा, क्या करना है? सिर्फ भाषण की तैयारी नहीं करनी है। लेकिन भाषण की तैयारी ऐसी करो जो भाषण द्वारा भाषा से भी परे स्थिति में ले जाने का अनुभव कराओ। भाषण की तैयारी ज्यादा करते हैं लेकिन रूहानी आकर्षण स्वरूप की स्मृति में रहने की तैयारी पर अटेन्शन कम देते हैं। इसलिए इस बारी ज्यादा तैयारी इस बात की करनी है। हरेक के दिल पर बाप के सम्बन्ध के स्नेह की छाप लगाना है। अच्छा!
मधुबन वाले क्या सर्विस करेंगे? मधुबन वालों को उस दिन खास बापदादा अव्यक्त वतन में आने का निमन्त्रण दे रहे हैं। वहाँ वतन में आकर सभी तरफ की सर्विस को देख सकेंगे। शाम 7 से 9 बजे तक यह दो घण्टे खास सैर करायेंगे। जैसे सन्देशियों को ले जाते हैं – सभी स्थानों का सैर कराने, इसी रीति से मधुबन वालों को यहाँ बैठे हुए सर्व स्थानों की सर्विस का सैर करायेंगे। अगर बिना मेहनत के सारा सैर कर लो तो और क्या चाहिए। इसलिए मधुबन वाले उस दिन अपने को इस स्थूल देह से परे अव्यक्त वतन वासी समझ कर बैठेंगे तो सारे दिन में कई अनुभव करेंगे। फिर सुनाना, क्या अनुभव किया। उस दिन अगर अपना थोड़ा भी पुरुषार्थ करेंगे तो सहज ही अनोखे भिन्न-भिन्न अनुभव करने के वरदान को पा सकेंगे। समझा। 7 से 9 शाम को खास याद का प्रोग्राम रखना। यूं तो सारे दिन का ही निमन्त्रण दे रहे हैं। लेकिन विशेष यह सैर का समय है। ऐसे समय पर हरेक यथा शक्ति अनुभव कर सकेंगे। मधुबन वाले विशेष स्नेही हैं इसलिए विशेष निमन्त्रण है। सिर्फ बुद्धि द्वारा अपने इस देह के भान से अलग होकर बैठना। फिर ड्रामा में जो अनुभव होने हैं वह होते रहेंगे। सन्देशियों के लिए तो साक्षात्कार कॉमन बात है लेकिन बुद्धि द्वारा भी ऐसे अनुभव कर सकते हो। इतना स्पष्ट होगा जैसे इन आंखों से देखा हुआ अनुभव है। अच्छा!
टीचर्स के साथ :- इस ग्रुप को कौन सा ग्रुप कहें? (स्पीकर्स ग्रुप) स्पीकर्स अर्थात् स्पीच करने वाले। स्पीच के साथ स्पीड भी है? क्योंकि स्पीच के साथ-साथ अगर पुरुषार्थ की स्पीड भी है तो ऐसे स्पीच करने वाले के प्रभाव से विश्व का कल्याण हो सकता है। अगर स्पीड के बिना स्पीच है, तो विश्व का कल्याण होना मुश्किल हो जाता है। तो ऐसे कहें कि यह स्पीच और स्पीड़ में चलने वाले ग्रुप हैं। जिन्हों की स्पीच भी पॉवरफुल, स्पीड भी पॉवरफुल है उनको कहते हैं विश्व-कल्याणकारी, मास्टर दु:ख हर्ता सुख कर्ता। तो ऐसे कार्य में लगे हुए हो? जो दु:ख हर्ता सुख कर्ता होता है वह स्वयं इस दुनिया की लहर से भी परे होगा। और उन्हों की स्पीच भी दु:ख की लहर से परे ले जाने वाली होगी। ऐसी स्टेज पर ठहर कर स्पीच करते हो? स्पीच तो स्टेज पर ठहर कर की जाती है तो आप किस स्टेज पर ठहर स्पीच करते हो? जो बाहर की बनी हुई स्टेज होती है उस पर? स्पीकर को जिस समय कोई स्थूल स्टेज पर जाना होता है तो पहले अपनी स्थिति की स्टेज तैयार है वा नहीं – यह चेक करता है। ऐसे स्टेज पर ठहर कर स्पीच करने वाले को कहते हैं श्रेष्ठ स्पीकर। जैसे स्थूल स्टेज को तैयार करने के लिए भी कितना समय और परिश्रम करते हैं। ऐसे ही अपनी स्थिति की स्टेज सदैव तैयार रहे – उसके लिए भी इतना ही पुरुषार्थ करते हो? ऐसी पॉवरफुल स्टेज पर ठहर स्पीच करने वाले का यहाँ आबू में यादगार है। कौन सा? (दिलवाला), दिलवाला तो याद की यात्रा का यादगार है। गऊमुख नहीं देखा है? गऊमुख किसका यादगार है? यह मुख का यादगार है। जैसे बाप का यादगार है – गऊमुख। क्योंकि मुख द्वारा ही सारा स्पष्ट करते हैं इसलिए मुख का यादगार है। स्पीकर का भी काम मुख से है लेकिन ऐसे जो श्रेष्ठ स्टेज पर ठहर कर स्पीच करते हैं। सदैव एवररेडी स्टेज हो। ऐसे नहीं कि समय पर तैयार करनी पड़े। एवररेडी स्टेज होने से जो प्रभाव होता है, वह बहुत अच्छा पड़ता है। इसलिए पूछा कि प्रभावशाली हो? इस ग्रुप को प्रभावशाली ग्रुप कहें? सभी सर्टीफिकेट देंगे? (अच्छा ग्रुप है) अगर आप सर्टीफिकेट देती हो तो फिर यह सर्व को सेटिस्फाई करने वाले भी होंगे। सन्तुष्ट मणियां तो हो ना। इसमें ‘हाँ’ करते हो? अगर खुद सन्तुष्ट मणियां हैं तो औरों को भी सन्तुष्ट करेंगे। टीचर्स का भी पेपर होता है, कैसे? (टीचर का पेपर सूक्ष्मवतन से आता है) टीचर का पेपर कदम कदम पर होता है। जो भी कदम उठाते हो वह ऐसा ही समझ कर उठाना चाहिए कि पेपर हॉल में बैठकर कदम उठाती हूँ। क्योंकि स्पीकर अर्थात् स्टेज पर बैठे हैं। तो जो सामने स्टेज पर होता है उसके ऊपर सभी की नज़र होती है। आप लोग भी ऊंची स्टेज पर बैठे हो। अनेक आत्माओं की निगाह आप लोगों के कदम पर है। तो आपको कदम-कदम पर ऐसा अटेन्शन से कदम उठाना है। अगर एक कदम भी ढीला वा कुछ भी नीचे ऊपर उठता है तो अनेक आप लोगों को फ़ॉलो करेंगे। इसलिए टीचर्स को जो भी कदम उठाना है वह ऐसा सोचकर उठाना है। क्योंकि ताजधारी बने हो ना? ताज कौन सा मिला है? ज़िम्मेवारी का ताज। जितनी बड़ी जिम्मेवारी उतना बड़ा ताज। तो जो बड़ी जिम्मेवारी मिली हुई है, तो अपने को ऐसे निमित्त बने हुए समझ कर के फिर कदम उठाओ। अभी अलबेलापन नहीं। ताज व तख्त-धारी बनने के बाद अलबेलापन समाप्त हो जाता है। अलबेलापन अर्थात् पुरुषार्थ में अलबेलापन। इस ग्रुप को सदैव यह समझना चाहिए कि जो भी कदम वा कर्म होता है वह हर कर्म विश्व के लिए एक एक्जाम्पुल बनकर के रहे। क्योंकि आप लोगों के इन कर्मों का कहानियों के रूप में यादगार बनेगा। आप लोगों के यह चरित्र गायन योग्य बनेंगे। इतनी ज़िम्मेवारी समझ करके चलते हो? यह इस ज़िम्मेवार ग्रुप की विशेषतायें हैं। जो जितना ज़िम्मेवार उतना ही हल्का भी रहेगा।
अव्यक्त मुरली — 11 फरवरी 1971
“अन्त:वाहक शरीर द्वारा सेवा”
मुख्य विषय
कर्मातीत अवस्था और अन्त:वाहक शरीर द्वारा सेवा, पुरुषार्थ की तीव्र गति, शिवरात्रि पर बाप की प्रत्यक्षता, शक्ति स्वरूप सेवा, प्रभावशाली स्पीकर की विशेषताएँ और जिम्मेदारी के प्रति सम्पूर्ण अटेन्शन।
1. अन्त:वाहक शरीर और कर्मातीत अवस्था
प्रश्न 1. अन्त:वाहक शरीर का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: कर्मातीत अवस्था की वह अंतिम स्थिति, जिसमें आत्मा स्थूल देह के भान से परे होकर एक सेकण्ड में कहीं भी पहुँच सकती है।
प्रश्न 2. अन्त:वाहक शरीर को सूक्ष्म शरीर क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि इस अवस्था में आत्मा स्थूल शरीर के भान से परे रहती है।
प्रश्न 3. अन्त:वाहक शरीर द्वारा सैर करने का गायन किनका है?
उत्तर: यह गायन केवल दिव्य-दृष्टि वालों का नहीं, बल्कि सभी बच्चों की अंतिम कर्मातीत अवस्था का है।
प्रश्न 4. कर्मातीत अवस्था में आत्मा की गति कैसी होती है?
उत्तर: एक सेकण्ड में संकल्प द्वारा जहाँ पहुँचने का आदेश होगा, वहाँ पहुँच सकती है।
प्रश्न 5. अपनी अंतिम स्टेज के नजदीक पहुँचने का आधार क्या है?
उत्तर: पुरुषार्थ की तीव्र गति। जितनी स्पीड बढ़ेगी, उतना ही आत्मा अंतिम स्टेज के नजदीक पहुँचेगी।
प्रश्न 6. अपनी स्टेज को किससे परख सकते हैं?
उत्तर: अपने पुरुषार्थ की स्पीड से।
2. शिवरात्रि पर बाप की प्रत्यक्षता
प्रश्न 7. शिवरात्रि पर झण्डा लहराने की नवीनता क्या होनी चाहिए?
उत्तर: केवल सेवाकेन्द्रों पर झण्डा नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा के दिल पर बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराना चाहिए।
प्रश्न 8. बाप की प्रत्यक्षता किसके द्वारा होगी?
उत्तर: शक्ति स्वरूप की प्रत्यक्षता द्वारा सर्वशक्तिमान बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे।
प्रश्न 9. शक्ति स्वरूप की दो विशेषताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर: संहारी और अलंकारी स्वरूप।
प्रश्न 10. स्टेज पर जाने से पहले किस बात की तैयारी करनी चाहिए?
उत्तर: पहले अपनी आंतरिक स्थिति की स्टेज को श्रेष्ठ और शक्तिशाली बनाना चाहिए।
प्रश्न 11. स्टेज पर आने वाले सेवाधारी के कौन-से दो स्वरूप स्पष्ट होने चाहिए?
उत्तर: लाइट हाउस और माइट हाउस।
3. बाप की प्रत्यक्षता कराने वाली सेवा
प्रश्न 12. ‘बाप’ शब्द में कितनी शक्ति होनी चाहिए?
उत्तर: इतना स्नेह और शक्ति हो कि यह शब्द ज्ञान अंजन बनकर अनाथ आत्माओं को सनाथ बना दे।
प्रश्न 13. स्टेज पर आने वाले सेवाधारी की चार विशेषताएँ क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
- तरस की भावना।
- कल्याण की भावना।
- अति स्नेह भरे शब्द।
- स्वरूप में शक्ति की झलक।
प्रश्न 14. बाप का साक्षात्कार कराने के लिए किन शक्तियों की आवश्यकता है?
उत्तर: रूहानी स्वरूप, रूहानी दृष्टि और कल्याणकारी वृत्ति की।
प्रश्न 15. भाषण की तैयारी में किस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए?
उत्तर: केवल शब्दों और विषय की तैयारी नहीं, बल्कि ऐसी रूहानी स्थिति की तैयारी करनी चाहिए जो सुनने वालों को भाषा से परे स्थिति का अनुभव कराए।
प्रश्न 16. इस बार शिवरात्रि की तैयारी में विशेष अटेन्शन किस पर देना है?
उत्तर: अपने रूहानी आकर्षण स्वरूप और शक्तिशाली स्मृति की तैयारी पर।
प्रश्न 17. प्रत्येक आत्मा के दिल पर कौन-सी छाप लगानी है?
उत्तर: बाप के सम्बन्ध और ईश्वरीय स्नेह की छाप।
4. मधुबन वालों के लिए अव्यक्त वतन का अनुभव
प्रश्न 18. मधुबन वालों को बापदादा ने कौन-सा विशेष निमन्त्रण दिया?
उत्तर: अव्यक्त वतन में आकर सभी स्थानों की सेवा का सैर करने का निमन्त्रण।
प्रश्न 19. विशेष सैर का समय कौन-सा निर्धारित किया गया?
उत्तर: शाम 7 बजे से 9 बजे तक।
प्रश्न 20. मधुबन वालों को उस समय किस स्थिति में बैठना चाहिए?
उत्तर: स्वयं को स्थूल देह से परे अव्यक्त वतनवासी समझकर बैठना चाहिए।
प्रश्न 21. क्या अव्यक्त वतन का अनुभव केवल सन्देशियों को हो सकता है?
उत्तर: नहीं, बुद्धि द्वारा भी स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है, जैसे आँखों से देखा हो।
प्रश्न 22. मधुबन से कौन-सा विशेष वरदान प्राप्त हो सकता है?
उत्तर: सहज और अनोखे भिन्न-भिन्न आध्यात्मिक अनुभवों का वरदान।
5. स्पीकर ग्रुप — स्पीच और स्पीड
प्रश्न 23. टीचर्स के ग्रुप को कौन-सा ग्रुप कहा गया है?
उत्तर: स्पीकर्स ग्रुप अर्थात् स्पीच करने वालों का ग्रुप।
प्रश्न 24. प्रभावशाली स्पीकर बनने के लिए किन दो बातों का मेल आवश्यक है?
उत्तर: शक्तिशाली स्पीच और पुरुषार्थ की तीव्र स्पीड।
प्रश्न 25. केवल स्पीच हो, लेकिन पुरुषार्थ की स्पीड न हो तो क्या परिणाम होगा?
उत्तर: विश्व कल्याण का कार्य प्रभावशाली रूप से नहीं हो सकेगा।
प्रश्न 26. विश्व कल्याणकारी आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर: वह स्वयं दुनिया की अशान्ति की लहर से परे होगी और उसकी स्पीच दूसरों को भी दुःख की लहर से परे ले जाएगी।
प्रश्न 27. श्रेष्ठ स्पीकर किस स्टेज पर ठहरकर स्पीच करता है?
उत्तर: अपनी श्रेष्ठ आंतरिक और अव्यक्त स्थिति की स्टेज पर ठहरकर।
6. एवररेडी स्थिति और सन्तुष्ट मणियाँ
प्रश्न 28. स्पीकर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: सदैव एवररेडी और प्रभावशाली होनी चाहिए, जिसे समय पर अलग से तैयार न करना पड़े।
प्रश्न 29. दिलवाला और गऊमुख का आध्यात्मिक सम्बन्ध क्या बताया गया है?
उत्तर: दिलवाला याद की यात्रा का यादगार है और गऊमुख मुख द्वारा ज्ञान स्पष्ट करने का यादगार है।
प्रश्न 30. सन्तुष्ट मणि किसे कहा गया है?
उत्तर: जो स्वयं सन्तुष्ट रहता है और अपने सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को भी सन्तुष्ट करता है।
प्रश्न 31. टीचर्स का पेपर किस प्रकार होता है?
उत्तर: टीचर्स का पेपर कदम-कदम पर होता है। हर कर्म और कदम में अटेन्शन रखना आवश्यक है।
7. जिम्मेदारी का ताज और टीचर्स की विशेषताएँ
प्रश्न 32. टीचर्स को अपने हर कदम पर विशेष ध्यान क्यों देना चाहिए?
उत्तर: क्योंकि अनेक आत्माएँ उनके कदमों को देखकर फॉलो करती हैं।
प्रश्न 33. टीचर्स को कौन-सा ताज प्राप्त हुआ है?
उत्तर: जिम्मेदारी का ताज।
प्रश्न 34. जिम्मेदारी के ताज का आकार किस आधार पर होता है?
उत्तर: जितनी बड़ी जिम्मेदारी, उतना बड़ा ताज।
प्रश्न 35. ताज और तख्तधारी बनने के बाद कौन-सी कमजोरी समाप्त हो जानी चाहिए?
उत्तर: पुरुषार्थ में अलबेलापन।
प्रश्न 36. टीचर्स को अपने प्रत्येक कर्म को किस रूप में देखना चाहिए?
उत्तर: विश्व के लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण और भविष्य में गायन योग्य चरित्र के रूप में।
प्रश्न 37. जिम्मेदार आत्मा की विशेषता क्या है?
उत्तर: वह अपनी जिम्मेदारी को समझकर चलती है और साथ-साथ सदा हल्की रहती है।
8. मुरली की मुख्य शिक्षाएँ
- कर्मातीत अवस्था बनाओ: स्थूल देह के भान से परे होकर अन्त:वाहक शरीर द्वारा सेवा करने योग्य बनो।
- पुरुषार्थ की स्पीड बढ़ाओ: जितनी गति तीव्र होगी, उतनी अंतिम स्टेज समीप आएगी।
- दिल पर बाप का झण्डा लहराओ: शिवरात्रि पर शक्ति स्वरूप बनकर बाप की प्रत्यक्षता करो।
- लाइट और माइट हाउस बनो: ज्ञान की रोशनी के साथ शक्ति का अनुभव भी कराओ।
- रूहानी स्थिति की तैयारी करो: केवल भाषण नहीं, अपनी आंतरिक अवस्था को भी शक्तिशाली बनाओ।
- अव्यक्त वतन का अनुभव करो: बुद्धि द्वारा देह से परे स्थिति का अभ्यास करो।
- स्पीच के साथ स्पीड रखो: ज्ञान सुनाने के साथ स्वयं भी तीव्र पुरुषार्थ करो।
- एवररेडी बनो: अपनी आंतरिक स्टेज को सदैव तैयार रखो।
- सन्तुष्ट मणि बनो: स्वयं सन्तुष्ट रहकर दूसरों को भी सन्तुष्ट करो।
- जिम्मेदारी का ताज धारण करो: प्रत्येक कदम को विश्व के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बनाओ।
9. आत्म-जाँच के लिए प्रश्न
- क्या मेरा पुरुषार्थ अंतिम कर्मातीत अवस्था की ओर तीव्र गति से बढ़ रहा है?
- क्या मैं स्थूल देह के भान से परे रहने का अभ्यास करता हूँ?
- क्या मेरी स्थिति से बाप की प्रत्यक्षता होती है?
- क्या मैं लाइट हाउस के साथ माइट हाउस भी हूँ?
- क्या मेरी दृष्टि और वृत्ति से आत्माओं को शांति और शक्ति मिलती है?
- क्या मेरी स्पीच के साथ पुरुषार्थ की स्पीड भी है?
- क्या मेरी आंतरिक स्थिति सदैव एवररेडी रहती है?
- क्या मैं स्वयं सन्तुष्ट रहकर दूसरों को भी सन्तुष्ट करता हूँ?
- क्या मेरा हर कदम विश्व के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बन रहा है?
- क्या मैं जिम्मेदारी का ताज धारण करके अलबेलापन समाप्त कर चुका हूँ?
मुरली का सार
केवल भाषण द्वारा नहीं, बल्कि अपनी रूहानी स्थिति, दृष्टि और वृत्ति द्वारा बाप की प्रत्यक्षता करनी है।
अन्त:वाहक शरीर द्वारा सेवा करने की अंतिम स्थिति प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ की स्पीड बढ़ानी है। स्वयं को लाइट हाउस और माइट हाउस बनाकर दूसरों को ज्ञान और शक्ति का अनुभव कराना है।
विशेष संदेश:
स्पीच भी शक्तिशाली, स्पीड भी शक्तिशाली।
लाइट हाउस भी बनो, माइट हाउस भी बनो।
हर कदम ऐसा उठाओ जो विश्व के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बन जाए।
