1 March 1971 | हिंदी · “सिद्धि स्वरूप बनने की सहज विधि”
“सिद्धि स्वरूप बनने की सहज विधि”
सभी मास्टर त्रिकालदर्शी बने हो? त्रिकालदर्शी बनने से कोई भी कार्य असफल नहीं होता। कोई भी कार्य करने के पहले अपने मास्टर त्रिकालदर्शी की स्थिति में स्थित होकर कार्य के आदि-मध्य-अन्त को जानकर कर्तव्य करने से सदैव सफलता मिलेगी अर्थात् सफलता-मूर्त बन जायेंगे वा सम्पूर्ण-मूर्त बन जायेंगे। अभी जो गायन है कि योगियों को रिद्धि सिद्धि प्राप्त होती है, वह कौनसी सिद्धि? संकल्प की सिद्धि और कर्तव्य की विधि? यह दोनों ही से जन्मसिद्ध अधिकार सहज ही पा लेते हो। संकल्प की सिद्धि कैसे आयेगी, मालूम है? संकल्पों की सिद्धि न होने का कारण क्या है? क्योंकि अभी संकल्प व्यर्थ बहुत चलते हैं। व्यर्थ संकल्प मिक्स होने से समर्थ नहीं बन सकते हो। जो संकल्प रचते हो उसकी सिद्धि नहीं होती है। व्यर्थ संकल्पों की सिद्धि तो हो नहीं सकती है ना। तो संकल्पों की सिद्धि प्राप्त करने के लिए मुख्य पुरुषार्थ यह है – व्यर्थ संकल्प न रच समर्थ संकल्पों की रचना करो। समझा। रचना ज्यादा रचते हो इसलिए पूरी पालना कर उन्हों को काम में लगाना यह कर नहीं सकते हो। जैसे लौकिक रचना भी अगर अधिक रची जाती है तो उनको लायक नहीं बना सकते हैं। इसी रीति से संकल्पों की जो स्थापना करते हो वह बहुत अधिक करते हो। संकल्पों की रचना जितनी कम उतनी पॉवरफुल होगी। जितनी रचना ज्यादा उतनी ही शक्तिहीन रचना होती है। तो संकल्पों की सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़े। व्यर्थ रचना बन्द करो। नहीं तो आजकल व्यर्थ रचना कर उसकी पालना में समय बहुत वेस्ट करते हैं तो संकल्पों की सिद्धि और कर्मों की सफलता कम होती है। कर्मों में सफलता की युक्ति है – मास्टर त्रिकालदर्शी बनना। कर्म करने से पहले आदि-मध्य और अन्त को जानकर कर्म करो। ना कि कर्म करने के बाद अन्त में परिणाम को देखकर फिर सोचो। इसलिए सम्पूर्ण बनने के लिए इन दो बातों का ध्यान देना पड़े।
यह प्रवृत्ति वाला ग्रुप है तो प्रवृत्ति में रहते इन दोनों बातों का ध्यान देने से सर्विसएबुल बन सकेंगे। सर्विस सिर्फ मुख से नहीं होती लेकिन श्रेष्ठ कर्मों द्वारा भी सर्विस कर सकते हो। यह जो ग्रुप आया है अपने को सर्विसएबुल ग्रुप समझते हो? इस ग्रुप में जो अपने को सर्विसएबुल समझते हैं वह हाथ उठायें। अब जिन्होंने सर्विसएबुल में हाथ उठाया है, वह सर्विस में समय निकाल मददगार बन सकते हैं? माताओं की मदद से बहुत नाम बाला हो सकता है। जितने आये हैं उतने सभी हैंड्स सर्विस में मददगार बन जायें तो बहुत जल्दी नाम बाला कर सकते हो। क्योंकि युगलमूर्त बन चलने वाले हो इसलिए ऐसे युगल सर्विस में बहुत अपना शो कर सकते हो। ऐसे कर्तव्य करके दिखाओ जो आपके कर्तव्य हर आत्मा को आपकी तरफ आकर्षण करे। माताओं का ग्रुप, सो भी ऐसी मातायें जो कि युगल रूप में चल रही हैं उनको समय निकालना सहज हो सकता है। अभी भी समय निकाल कर आई हो ना। अभी भी आप के पीछे प्रवृत्ति चल रही होगी ना। जैसे यह बात ज़रूरी समझ कर बन्धनों को हल्का कर पहुँच गई हो, ऐसे समय प्रति समय अपनी प्रवृत्ति के बन्धनों को हल्का कर सर्विस में जितनी मददगार बनती जायेंगी उतना ही यह हिसाब-किताब जल्दी चुक्तू होगा। तो माताओं को ऐसे मददगार बनने में ही अपनी उन्नति का साधन समझना चाहिए। सुनना और सुनाना – दोनों ही अनुभव करना चाहिए। जैसे बाप मददगार बनते हैं वैसे बच्चों को भी मददगार बनना है। यही मदद लेना है। तो ऐसी इस ग्रुप में शक्ति भरकर जाना जो अपने बन्धनों को हल्का कर सर्विस में मददगार बन सको। नहीं तो इस सब्जेक्ट में अगर कमी रह गई तो फुल मार्क्स कैसे ले सकेंगे। लक्ष्य तो फुल पास होने का रखा है ना। इसलिए इस ग्रुप को खास ऐसी-ऐसी युक्तियां रचने की ट्रेनिंग लेकर जाना है। भट्ठी से क्या बनकर जाना है, समझा? सर्विसएबुल और मददगार। घर में रहते शक्ति स्वरूप की स्मृति सदैव रहने से कर्म-बन्धन विघ्न नहीं डालेंगे। घर में रहती हो लेकिन शक्तिरूप की बजाय पवित्र प्रवृत्ति का भान ज्यादा रहता है। प्रवृत्ति में रहते हुए शक्तिपन की वृत्ति कम रहती है। इसलिए अब तक जो आवाज़ निकलता है कि कर्म-बन्धन है, क्या करें, कैसे करें, कैसे कर्म बन्धन काटें। यह आवाज़ इसलिए निकलता है क्योंकि शक्तिपन का अलंकार सदैव कायम नहीं रह पाता। तो अब इस भट्ठी में अपनी स्मृति और स्वरूप को बदल कर जाना। इसलिए दो बातें सदैव याद रखना। एक तो चेन्ज होना है, दूसरा चैलेन्ज करना है। शक्ति रूप में अपनी वृत्ति और स्वरूप को भी चेन्ज करना और जितना-जितना अपने को चेन्ज करते जायेंगे उतना औरों को चैलेन्ज कर सकेंगे। इसलिए यह दो बातें याद रखना। जब सुकर्म करते हो तो बाप का स्नेही स्वरूप सामने आता है और अगर कोई विकर्म करते हो तो विकराल रूप सामने लाना चाहिए। आप लोग स्नेही तो हो ना। स्नेही सदैव सुकर्मी होते हैं। कोई भी ऐसा कर्म न हो, यह सदैव स्मृति में रखना। क्योंकि आप सभी सृष्टि के स्टेज पर हीरो एक्टर्स हो। तो हीरो एक्टर्स पर सभी की निगाह होती है। इसलिए अपने को प्रवृत्ति में रहने वाली न समझ, स्टेज पर हीरो एक्टर समझ कर हर कर्म करती चलेंगी तो कोई भी ऐसा कर्म नहीं हो सकेगा।
जैसे साइन्स की परमाणु शक्ति आज क्या से क्या दिखा रही है। वैसे ही साइलेन्स के शक्ति दल में आप प्रवृत्ति में रहने वाली प्रमाण हो। वह परमाणु शक्ति है और आप लोग सृष्टि के आगे एक प्रमाण हो। तो आप भी प्रमाण बनकर बहुत ही सर्विस कर सकती हो। माताओं की तो बहुत मांगनी है। माताओं के कारण कोने-कोने में संदेश फैलाना अभी रहा हुआ है। कई आत्माओं को सन्देश न मिलने की ज़िम्मेवारी आप लोगों के ऊपर है। इसलिए इस ग्रुप को ऐसा ही तैयार हो जाना है। यह ग्रुप समय प्रति समय सर्विस में मददगार बन सकता है। उम्मीदवार है। जैसे अधरकुमारों का ग्रुप भी बहुत उम्मीदवार ग्रुप था। ऐसे ही यह ग्रुप भी होवनहार मददगार है। लेकिन कैसे मददगार बने, उसकी युक्ति भी है। लेकिन शक्ति नहीं है। इसलिए अपने स्वरूप परिवर्तन का, अपने टीचर से सर्टिफिकेट ले जाना। जैसे एक-एक कुमारी 100 ब्राह्मणों से उत्तम गाई हुई है वैसे एक-एक माता जगत् माता है। कहाँ 100 ब्राह्मण कहाँ सारा जगत। तो किसकी ऊंची महिमा हुई? एक-एक माता जगत्माता बनकर जगत की आत्माओं के ऊपर तरस, स्नेह और कल्याण की भावना रखो। इसलिए इस ग्रुप को एक वायदा करना है। वायदा करने की हिम्मत है? कौन-सा भी वायदा हो कि सुनने के बाद हिम्मत रखेंगे? सुनने के पहले हिम्मत है वा सुनने के बाद हिम्मत रखेंगे? क्या समझती हो? जो भी वायदा होगा उसकी हिम्मत है? अगर कोई कड़ा वायदा हो तो फिर सोचेंगी ना। हरेक को यह वायदा करना है कि समय प्रति समय मैं सर्विस में मददगार और साथ-साथ शक्ति स्वरूप बन विघ्न-विनाशक बनकर ही प्रवृत्ति में रहेंगी। सहज वायदा है ना। विघ्नों के आने से चिल्लायेंगे नहीं, घबरायेंगे नहीं। लेकिन शक्ति बनकर सामना करेंगे। यह वायदा अपने आप से सदैव के लिए करके जाना है।
कोई भी प्रकार की आसक्ति है तो वहाँ ही माया आ सकती है। आसक्ति होने के कारण माया आ सकती है। अगर अनासक्त हो जाओ तो माया आ नहीं सकती। जब आसक्ति खत्म हो जाती है तब शक्ति-स्वरूप बन सकते हैं। अपनी देह में वा सम्बन्धों में, कोई भी पदार्थ में कहाँ भी अगर आसक्ति है तो माया भी आ सकती है और शक्ति नहीं बन सकते। इसलिए शक्तिरूप बनने के लिए आसक्ति को अनासक्ति में बदली करो। जैसे आप लोग औरों को कहते हो कि एक दीपक अनेकों को जगा सकता है। ऐसे ही आप एक-एक सारे विश्व के कल्याण के निमित्त बन सकते हो। तो अपने कर्तव्य को और अपने स्वरूप को दोनों को याद रखते हुए चलते चलो। ब्रह्मा की भुजायें हो ना। तो हैण्ड्स बनेंगे ना। अपने को ब्रह्मा की भुजायें समझती हो? ब्रह्मा की भुजाओं का भी कर्तव्य क्या होता है? ब्रह्मा का कर्तव्य है स्थापना तो ब्रह्मा की भुजाओं का भी कर्तव्य हुआ स्थापना के कार्य में सदैव तत्पर रहना। हद के सम्बन्धों में आने का सिर्फ इन्हों को तरीका सिखाना है। निर्बन्धन अपने को बना सकती हो, लेकिन तरीका नहीं आता है। एक तो तरीका नहीं, दूसरी ताकत नहीं। तो ताकत भी भरना और तरीका भी सीखना। बापदादा फिर भी उम्मीदवार ग्रुप समझते हैं। अब देखेंगे कि हरेक अपने को कितना बार ऑ़फर करते हैं। अपने आप को खुद ही ऑ़फर करना है। आ़फरीन उनको मिलती है जो स्वयं को खुद ऑफर करता है। अगर कहने से करते हैं तो आफरीन नहीं मिलती है। अब देखेंगे कि कौन-कौन अपने को ऑ़फर करते हैं। स्नेही तो हो लेकिन स्नेही के साथ सहयोगी भी बनो। इस ग्रुप का नाम क्या रखें? नाम संस्कार होता है ना। क्योंकि परिवर्तन भट्ठी में आये हो। आप लोग भी नाम संस्कार के उत्सव में आये हो ना। इस ग्रुप का क्या नाम? यह है सदा सहयोगी और शक्ति-स्वरूप ग्रुप। अब अपनी शक्ति कभी भी कम नहीं करना। जब अपनी शक्ति को गंवा देते तो रावण भी देखता है कि यह अपनी शक्ति को गंवा बैठे हैं तो वह खूब रूलाता है। शक्ति गंवाना अर्थात् रावण को बुलाना। इसलिए कभी भी अपनी शक्ति को कम न होने देना। जमा करना सीखो। भविष्य 21 जन्मों के लिए शक्ति को जमा करना है। अभी से जमा करेंगे तो जमा होगा। इसलिए सदैव यही सोचो कि जमा कितना किया है?
अव्यक्त मुरली — 92
1 मार्च 1971
“सिद्धि स्वरूप बनने की सहज विधि”
मुख्य विषय: मास्टर त्रिकालदर्शी बनना, समर्थ संकल्पों की रचना, कर्मों में सफलता, प्रवृत्ति में रहते शक्ति स्वरूप बनना, आसक्ति को समाप्त करना और सर्विस में मददगार बनना।
- मास्टर त्रिकालदर्शी बनने की विधि
प्रश्न 1. मास्टर त्रिकालदर्शी बनने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: प्रत्येक कार्य के आदि, मध्य और अन्त को जानकर कर्म करने से असफलता नहीं होती और आत्मा सफलता-मूर्त बन जाती है।
प्रश्न 2. कोई भी कार्य करने से पहले क्या करना चाहिए?
उत्तर: पहले मास्टर त्रिकालदर्शी की स्थिति में स्थित होकर कार्य के परिणाम को समझना चाहिए।
प्रश्न 3. सिद्धि स्वरूप बनने के लिए कौन-सी दो बातें आवश्यक हैं?
उत्तर: संकल्पों की सिद्धि और कर्म करने की सही विधि।
2. संकल्पों की सिद्धि — समर्थ संकल्पों की रचना
प्रश्न 4. संकल्पों की सिद्धि प्राप्त न होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्पों का अधिक चलना और समर्थ संकल्पों में व्यर्थ संकल्पों का मिश्रण होना।
प्रश्न 5. संकल्पों को शक्तिशाली बनाने की विधि क्या है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्पों की रचना बंद करके केवल समर्थ संकल्पों की रचना करना।
प्रश्न 6. संकल्पों की रचना कम रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: जितनी संकल्पों की रचना कम होगी, उतनी ही वह शक्तिशाली और सफल होगी।
प्रश्न 7. व्यर्थ संकल्पों की पालना में क्या नुकसान होता है?
उत्तर: समय और शक्ति व्यर्थ होती है तथा संकल्पों की सिद्धि और कर्मों की सफलता कम हो जाती है।
3. कर्मों में सफलता — आदि, मध्य और अन्त का ज्ञान
प्रश्न 8. कर्मों में सफलता प्राप्त करने की युक्ति क्या है?
उत्तर: मास्टर त्रिकालदर्शी बनकर कर्म के आदि, मध्य और अन्त को पहले ही जान लेना।
प्रश्न 9. कर्म करने के बाद परिणाम देखकर सोचने के बजाय क्या करना चाहिए?
उत्तर: कर्म करने से पहले ही उसके परिणाम को समझकर उचित निर्णय लेना चाहिए।
प्रश्न 10. सम्पूर्ण बनने के लिए किन दो बातों का ध्यान रखना है?
उत्तर: समर्थ संकल्पों की रचना और त्रिकालदर्शी बनकर कर्म करना।
4. प्रवृत्ति में रहते हुए सर्विसएबुल बनना
प्रश्न 11. क्या सर्विस केवल मुख से होती है?
उत्तर: नहीं, श्रेष्ठ कर्मों द्वारा भी सेवा की जा सकती है।
प्रश्न 12. प्रवृत्ति में रहने वाली आत्माएँ सर्विस में कैसे मददगार बन सकती हैं?
उत्तर: अपने समय का सदुपयोग करके प्रवृत्ति के बन्धनों को हल्का करें और सेवा में सहयोग दें।
प्रश्न 13. युगल रूप में रहने वाली आत्माओं को कौन-सी विशेषता दिखानी चाहिए?
उत्तर: युगल रूप में रहते हुए भी समय निकालकर सेवा में मददगार बनना चाहिए।
प्रश्न 14. सेवा में मददगार बनने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: आत्म-उन्नति होती है और कर्मों के हिसाब-किताब जल्दी चुक्तू करने में मदद मिलती है।
प्रश्न 15. सेवा में किस प्रकार की भागीदारी आवश्यक है?
उत्तर: केवल सुनना नहीं, बल्कि सुनने और सुनाने दोनों का अनुभव करना।
5. प्रवृत्ति में रहते शक्ति स्वरूप बनना
प्रश्न 16. प्रवृत्ति में रहने वाली आत्माओं की मुख्य कमी क्या बताई गई है?
उत्तर: पवित्र प्रवृत्ति का भान अधिक रहता है, लेकिन शक्तिस्वरूप की वृत्ति कम रहती है।
प्रश्न 17. कर्मबन्धन का अनुभव क्यों होता है?
उत्तर: शक्तिस्वरूप का अलंकार सदैव कायम नहीं रहने के कारण।
प्रश्न 18. इस भट्ठी से कौन-सी दो बातें स्मृति में रखकर जाना है?
उत्तर: चेन्ज होना और चैलेन्ज करना।
प्रश्न 19. चेन्ज और चैलेन्ज का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्वयं की वृत्ति और स्वरूप को शक्तिशाली बनाकर परिवर्तन करना तथा अपने श्रेष्ठ परिवर्तन द्वारा दूसरों को भी परिवर्तन की चुनौती देना।
प्रश्न 20. सुकर्म और विकर्म करते समय कौन-सी स्मृति रखनी चाहिए?
उत्तर: सुकर्म करते समय बाप का स्नेही स्वरूप और विकर्म से बचने के लिए विकराल स्वरूप की स्मृति रखनी चाहिए।
6. हीरो एक्टर की जिम्मेदारी
प्रश्न 21. ब्राह्मण आत्माओं को हीरो एक्टर क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि वे सृष्टि के स्टेज पर श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले हैं और सभी की निगाह उनके कर्मों पर रहती है।
प्रश्न 22. हीरो एक्टर बनकर कर्म करने का क्या अर्थ है?
उत्तर: हर कर्म को ऐसे करना जैसे विश्व की सभी आत्माएँ हमें देख रही हैं और हमारे कर्मों को फॉलो करेंगी।
प्रश्न 23. हीरो एक्टर को किस प्रकार के कर्म करने चाहिए?
उत्तर: ऐसे श्रेष्ठ कर्म जो दूसरों के लिए अनुकरणीय और यादगार बनें।
7. साइलेन्स की शक्ति और विश्व सेवा
प्रश्न 24. परमाणु शक्ति और साइलेन्स की शक्ति में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर: परमाणु शक्ति विज्ञान की शक्ति है, जबकि साइलेन्स की शक्ति आत्मिक और आध्यात्मिक शक्ति है।
प्रश्न 25. माताओं के ऊपर विशेष जिम्मेदारी क्या है?
उत्तर: कोने-कोने में ईश्वरीय संदेश पहुँचाना और विश्व की आत्माओं के कल्याण का निमित्त बनना।
प्रश्न 26. एक-एक माता को किस स्वरूप में देखा गया है?
उत्तर: जगत माता के रूप में, जो सम्पूर्ण विश्व की आत्माओं के प्रति तरस, स्नेह और कल्याण की भावना रखती है।
प्रश्न 27. एक दीपक का उदाहरण देकर क्या समझाया गया है?
उत्तर: जैसे एक दीपक अनेक दीपक जगा सकता है, वैसे ही एक आत्मा विश्व की अनेक आत्माओं के कल्याण का निमित्त बन सकती है।
8. सदा सहयोगी और शक्तिस्वरूप बनना
प्रश्न 28. इस ग्रुप को कौन-सा नाम दिया गया है?
उत्तर: सदा सहयोगी और शक्तिस्वरूप ग्रुप।
प्रश्न 29. प्रवृत्ति में रहते हुए विघ्नों का सामना कैसे करना चाहिए?
उत्तर: विघ्न आने पर घबराना या चिल्लाना नहीं, बल्कि शक्ति स्वरूप बनकर उनका सामना करना चाहिए।
प्रश्न 30. प्रवृत्ति के बन्धनों को हल्का करने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: उचित तरीका सीखना और शक्ति धारण करना।
प्रश्न 31. ब्रह्मा की भुजाओं का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर: स्थापना के कार्य में सदैव तत्पर रहना और बाप के कार्य में मददगार बनना।
प्रश्न 32. स्वयं को सर्विस के लिए ऑफर करने का क्या महत्त्व है?
उत्तर: जो आत्मा स्वयं आगे बढ़कर अपने को सेवा के लिए अर्पित करती है, वही सच्ची आफरीन की पात्र बनती है।
9. आसक्ति को अनासक्ति में बदलना
प्रश्न 33. माया के आने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: देह, सम्बन्धों और पदार्थों के प्रति आसक्ति।
प्रश्न 34. शक्तिस्वरूप बनने के लिए क्या करना आवश्यक है?
उत्तर: सभी प्रकार की आसक्ति समाप्त करके अनासक्त बनना।
प्रश्न 35. आसक्ति समाप्त होने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: माया के प्रभाव से मुक्त होकर आत्मा शक्तिस्वरूप बन सकती है।
प्रश्न 36. प्रवृत्ति में रहते हुए अनासक्त कैसे बन सकते हैं?
उत्तर: सम्बन्धों और जिम्मेदारियों को निभाते हुए उनमें मोह और आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
10. शक्ति जमा करना — भविष्य के 21 जन्मों के लिए
प्रश्न 37. अपनी शक्ति गंवाने का क्या परिणाम होता है?
उत्तर: शक्ति कम होने पर माया अर्थात् रावण को आने का निमन्त्रण मिलता है।
प्रश्न 38. शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: अपनी शक्ति को व्यर्थ खर्च न करके जमा करना सीखना चाहिए।
प्रश्न 39. शक्ति जमा करने का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: भविष्य के 21 जन्मों के लिए शक्ति का खजाना जमा करना।
प्रश्न 40. शक्ति जमा करने का अभ्यास कब से शुरू करना चाहिए?
उत्तर: अभी से, क्योंकि जितना अभी जमा करेंगे उतना ही भविष्य के लिए संचित होगा।
- मुरली की मुख्य शिक्षाएँ
- मास्टर त्रिकालदर्शी बनो: हर कार्य के आदि, मध्य और अन्त को जानकर कर्म करो।
- समर्थ संकल्प रचो: व्यर्थ संकल्पों की रचना बंद करके संकल्पों की सिद्धि प्राप्त करो।
- सफलता-मूर्त बनो: कर्म करने से पहले उसके परिणाम को समझो।
- सर्विसएबुल बनो: प्रवृत्ति में रहते हुए भी सेवा के लिए समय निकालो।
- शक्ति स्वरूप बनो: कर्मबन्धनों को अपनी कमजोरी नहीं, शक्ति से पार करो।
- चेन्ज और चैलेन्ज करो: पहले स्वयं बदलो, फिर दूसरों के परिवर्तन का निमित्त बनो।
- हीरो एक्टर बनो: प्रत्येक कर्म को विश्व के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बनाओ।
- साइलेन्स की शक्ति बढ़ाओ: अपनी आत्मिक शक्ति से विश्व कल्याण करो।
- अनासक्त बनो: देह, सम्बन्ध और पदार्थों की आसक्ति समाप्त करो।
- सदा सहयोगी बनो: ब्रह्मा की भुजाएँ बनकर स्थापना के कार्य में मददगार बनो।
- शक्ति जमा करो: भविष्य के 21 जन्मों के लिए अभी से आत्मिक शक्ति संचित करो।
- आत्म-जाँच के लिए प्रश्न
- क्या मेरे संकल्प समर्थ हैं या उनमें व्यर्थ संकल्पों का मिश्रण है?
- क्या मैं कोई भी कार्य करने से पहले उसके आदि, मध्य और अन्त को समझता हूँ?
- क्या मैं प्रवृत्ति में रहते हुए सेवा के लिए समय निकालता हूँ?
- क्या मेरी प्रवृत्ति में शक्तिस्वरूप की वृत्ति भी रहती है?
- क्या मैं स्वयं में परिवर्तन करके दूसरों को परिवर्तन की प्रेरणा देता हूँ?
- क्या मैं अपने प्रत्येक कर्म को विश्व के सामने उदाहरण समझकर करता हूँ?
- क्या मैं विघ्न आने पर घबराता हूँ या शक्तिस्वरूप बनकर सामना करता हूँ?
- क्या मैं देह, सम्बन्ध और पदार्थों की आसक्ति से मुक्त हूँ?
- क्या मैं स्वयं आगे बढ़कर सेवा के लिए अपने को ऑफर करता हूँ?
- क्या मैं प्रतिदिन अपनी आत्मिक शक्ति जमा कर रहा हूँ?
मुरली का सार
सिद्धि स्वरूप बनने की सहज विधि है — समर्थ संकल्प, त्रिकालदर्शी स्थिति और शक्तिस्वरूप जीवन।
प्रवृत्ति में रहते हुए भी अनासक्त, सदा सहयोगी और विघ्न-विनाशक बनना है। केवल स्वयं परिवर्तन नहीं करना, बल्कि अपने श्रेष्ठ कर्मों और साइलेन्स की शक्ति से विश्व परिवर्तन का निमित्त बनना है।
विशेष स्मृति
पहले स्वयं चेन्ज बनो, फिर दूसरों को चैलेन्ज दो।
व्यर्थ संकल्प समाप्त करो, शक्ति जमा करो और सदा सहयोगी एवं शक्तिस्वरूप बनो।
