20.2.1991
योग और प्रयोग का बैलेन्स रखो
आज विशेष आप सबकी याद लेकर बाबा के पास गई तो बाबा ने पूछा बच्ची, आज कैसे आई हो? हमने कहा- बाबा, आज और भी कई काम थे लेकिन और कार्य के साथ-साथ मधुबन निवासियों की याद लाई हूँ। बाबा ने कहा- वैसे तो मेरे सभी बच्चे भाग्यवान है। क्योकि भाग्यविधाता बाप के बच्चे है, इसलिए सभी भाग्यवान है। लेकिन मधुबन वाले जो हैं इन्हों का भाग्य में भी विशेष भाग्य है। मैं मुस्करा रही थी। बाबा ने कहा मधुबन निवासियों के कितने प्रकार के भाग्य हैं, वो समझते है? बाबा ने कहा- मधुबन वालों का एकस्ट्रा भाग्य क्या है? मधुबन वालों का हार्ड-वर्क है लेकिन ज़िम्मेवारी का नहीं। बाबा ने कहा वैसे आप लोग भी सेन्टर पर रहती हो लेकिन आप लोगों की ज़िम्मेवारी है। निमित्त तो बाबा है ही लेकिन फिर भी आप लोगों को ज़िम्मेवारी देखनी पड़ती है। मदोगरी आई, नहीं आई देखना पड़ता है। लेकिन मधुबन वालों को तो बना-बनाया मिलता है। दूसरा, क्लास के स्टूडेन्ट कम हुए, कोर्स वाले नहीं आए, कितनी जिम्मेवारी होती है। लेकिन मधुबन वालों को तो बने बनाये जिज्ञासु मिल जाते हैं। सबकी अपनी-अपनी ड्यूटी है। कोई ज़िम्मेवारी की ड्यूटी नहीं है, लेकिन हार्ड-वर्क है।इसी रोति बाबा ने कहा- बाहर के वायुमण्डल को परिवर्तन कर आप लोगों को वहाँ का (सेन्टर का) वायुमण्डल बनाना पड़ता है। लेकिन यहाँ मैजॉरिटी ब्राह्मण रहते हैं, योग के प्रोग्राम चलते रहते हैं। यहाँ वातावरण बनाना नहीं पड़ता है लेकिन बने हुए वातावरण में खुद को और ही सहयोग मिलता है। क्योंकि बड़ी-बड़ी महान आत्माएँ भी यहाँ ही रहती हैं, बाबा भी यहाँ ही रहता है और ब्रह्मा बाबा ने इस भूमि को तपस्या का वरदान भी दिया है। यहाँ बने बनाये वायुमण्डल का भाग्य मिलता है और वहाँ आप लोगों को ये वायुमण्डल बनाने का अटेन्शन देना पड़ता है। बाबा ने कहा- ये भाग्य में भाग्य हुआ ना। मधुबन वालों के भाग्य को देखकर बाबा बहुत हर्षित होते हैं। बच्चे भी हर्षित होते हैं लेकिन नम्बरवार।फिर बाबा ने पूछा – अभी तपस्या वर्ष में मधुबन में क्या-क्या प्रोग्राम चल रहा है? हमने सुनाया – योग का प्रोग्राम बना है, हरेक ने अपना-अपना टाइम फिक्स किया है। बाबा ने कहा- योगी तो है, योग तो प्यार से लगाते हैं, अपेन उमंग-उत्साह से बैठत हैं। लेकिन बाबा अभी भी बैलेन्स देखना चाहता है। जितना योग लगाने से प्यार है, उतना प्रयोग करने से प्यार नहीं है। बैलेन्स नहीं है। प्रयोग और योग का बैलेन्स बाबा चाहते हैं। दूसरा, बाबा ने कहा- मधुबन से प्यार है, बाबा से भी जिगरी
प्यार है। लेकिन बाबा बैलेन्स में देखना चाहता है। बाबा से प्यार है लेकिन उस प्यार के पीछे दृढ संकल्प से अपनी कमी या जो भी संस्कार है उसे न्योछावर करने में मात्रा कम है। तीसरा, बाबा ने कहा- रमणीक तो है लेकिन रमणीकता और गंभीरता इसका बैलेंस नहीं है। रमणीकता में जल्दी आ जायेंगे. लेकिन एकदम उस समय गंभीर हो जायें, ये नहीं है। रमणीकता और गंभीरता की मात्रा समान नहीं है। बाबा ये दोनों की समान मात्रा देखना चाहते हैं। बाबा ने पूछा- और क्या समाचार लाई हो? मैंने कहा – बाबा, याद और प्यार ही लाई हूँ। फिर बाबा ने कहा – मधुवन वाले खेल बहुत प्यार से करते हैं। उन्हें खेल बहुत पसन्द आता है। मैं सभी बच्चों को इमर्ज करता हूँ और एक खेल कराता हूँ।
खेल में पहले एक ऊँची पहाड़ी थी। वहाँ पहाड़ी की चोटी पर बाबा बैठे थे। वैसे तो बाबा फ़रिश्ता रूप है ही लेकिन एकदम लाइट-माइट रूप से बाबा बैठे हुए थे और बाबा की दोनों आँखो से और भृकुटि से तीन लाइट निकल रही थी और ये किरणें थोड़ा आगे आकर हाथ बन गई। उन किरणों के बीच में लिखा था- पीस, प्योरिटी और प्रॉसपर्टी। ये लाइट की तीन किरणें तीन वरदानी हाथ बन गये। पहाड़ी के नीचे सभी बच्चे थे। एक बहुत बड़े बगीचे में जैसे मेल में स्टॉल लगते हैं, ऐसे भिन्न-भिन्न स्टॉल बने हुए थे। एक स्टॉल में देखने की चीजें थीं, दूसरे स्टॉल में सुनने की चीजें थी, तीसरे स्टॉल में एक ऐसी मशीन थी उससे जो बोलो उसका उत्तर देती थी। चौथा स्टॉल घूमने-फिरने का स्थान बगीचे जैसा था। सभी का लक्ष्य वही था कि बाबा के पास पहुँचें। लेकिन जब ये चार स्टॉल देखे तो अपने लक्ष्य को भूल गये और कोई सुनने में चला गया, कोई देखने में चला गया, कोई बोलने में और कोई घूमने में चला गया। घूमते हुए वे जो सोच रहे थे, वह कम्प्युटर समान सबके मस्तक पर आ रहा था।इस प्रकार तीन-चार प्रकार के सोच चल रहे थे। किसी का सोच चल रहा था कि ऊपर तो जाना ही है, बाबा के पास पहुँचना ही है, सभी तो इकट्ठे पहुँचेंगे ही नहीं, नम्बरवार पहुँचेंगे, तो थोड़ा देख करके फिर पहुँच जायेंगे। किसी का विचार ये चला कि ये अनुभव करना चाहिए, ये भी अनुभव करेंगे, फिर वो भी अनुभव कर लेंगे, अनुभव ज़रूर करना चाहिए। किसी का ये विचार चला – बाबा से मिलना, यह तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है, अपना ही बाबा है, थोड़ी देरी से गये तो क्या हुआ। चौथे का ये विचार चला स्पीड से आगे बढ़ेंगे और पहुँच ही जायेंगे। ये विचार कम्प्युटर के समान सबके मस्तक पर आ रहे थे। इसके बाद सभी नम्बरवार ऊपर पहुँचे। बाबा ने सबके पूछा- बच्चो, क्या-क्या देखा? बच्चों ने सुनाया बाबा, देखने वाली सीन बहुत अच्छी थी। किसी ने कहा- बाबा, जो बातें सुनी वो बड़ी अच्छी थीं। हरेक ने अपना-अपना बाबा को सुनाया। बाबा मुस्करा रहे थे।फिर बाबा ने कहा- मैने ये खेल क्यों दिखाया? मैंने ये खेल इसलिए दिखाया कि तपस्या माना बेहद का वैराग। बेहद के वैराग में अभी भी किसी को सुनने की, किसी को बोलने की, किसी को देखने की, किसी को चक्कर लगाने की आदत है। ये आदत तपस्या पॉवरफुल नहीं करने देती। ये साइडसीन्स अपनी तरफ खींचती है। साइडसीन में फंसने के कारण अपने लक्ष्य तक पहुँचने में लेट हो गये। बाबा ने कहा- तपस्या माना ऐसे आकर्षण के जो भी संस्कार हों चाहे वोलने के, चाहे देखने के या घूमने के ये जो चारों आकर्षण है, संस्कार में समाए हुए, इनको खत्म करो। जब तब इनको खत्म नहीं किया है और इन किनारों को सहारा बनाया तो बाबा का सहारा सदैव नहीं ले सकेंगे। जैसे साइडसीन को सहारा बनाया तो बाबा के पास पहुँचने में लेट हो गये। बहुत कम थे जिन्होंने साइडसीन को सहारा नहीं बनाया और बाबा के पास पहुँच गये।बाबा ने कहा- बाबा ये रिज़ल्ट दिखाता है कि अभी भी इन बातों को आकर्षण समाप्त करो। जब तक यह संस्कार आपने समाप्त नहीं किया है जो लक्ष्य है ‘बाबा के समान’ बनने का, सम्पूर्ण बनने का या सम्पन्न बनने का उस लक्ष्य में आप समय पर नहीं पहुँचेंगे, नम्बरवन नहीं पहुँचेंगे, लाइन में आ जायेंगे। बाबा ने कहा कि यदि बैलेन्स होगा तो ये साइडसीन की आकर्षण या संस्कारों की आकर्षण समाप्त हो जायेगी और बाबा के तरफ पहुँच जायेंगे, बाबा द्वारा दिये गये लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। बाबा अब ये तपस्या चाहता है। अभी थोड़ा-थोड़ा संस्कार का जो किनारा पकड़ा हुआ है उस किनारे को छोड़ो। बाबा ने कहा कि मधुबन वालों की ज़िम्मेवारी है। मधुबन को तो कहते ही हैं लाइट हाउस। मधुबन विश्व का लाइट हाउस है। इसलिए आप इन सहारों से किनारा करो तो विश्व के सहारे के निमित्त बनेंगे और बबा के सहारे का भी अनुभव कर सकेंगे। फिर बाबा ने कहा कि बाकी तो सब दिल से, उमंग-उत्साह से सेवा करते हैं और सेवा का प्रभाव ही दूसरों के ऊपर पड़ता है। सेवा के उमंग-उत्साह में मधुबन नम्बरवन है। इसी रीति से सभी बातों में नम्बरवन लो।
अव्यक्त दिव्य संदेश
योग और प्रयोग का बैलेन्स रखो
दिनांक: 20 फरवरी 1991
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने तपस्या वर्ष के लिए विशेष शिक्षा दी कि केवल योग लगाने से ही सन्तुष्ट नहीं होना है, बल्कि योग और प्रयोग—दोनों में समानता रखनी है।
योग से प्राप्त शक्तियों को जीवन में प्रयोग करना, अपनी कमियों और पुराने संस्कारों को दृढ़ संकल्प से न्योछावर करना तथा रमणीकता के साथ गम्भीरता का बैलेन्स रखना आवश्यक है।
बाबा ने एक खेल के माध्यम से समझाया कि लक्ष्य की ओर बढ़ते समय देखने, सुनने, बोलने और घूमने-फिरने जैसे आकर्षण आत्मा को अपने लक्ष्य से भटका सकते हैं। तपस्या का अर्थ है इन आकर्षणों और संस्कारों को समाप्त करके बाबा द्वारा दिए गए लक्ष्य—बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने—की ओर तीव्र गति से बढ़ना।
1. मधुबन निवासियों का विशेष भाग्य
बापदादा ने मधुबन निवासियों के विशेष भाग्य की चर्चा की। बाबा ने समझाया कि सभी बच्चे भाग्यवान हैं, क्योंकि वे भाग्यविधाता बाप के बच्चे हैं। लेकिन मधुबन निवासियों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त हैं।
मधुबन में रहने वाले भाई-बहनों को पहले से बना हुआ आध्यात्मिक वातावरण, योग के कार्यक्रम और ब्राह्मण परिवार का सहयोग मिलता है। उन्हें बाहर से जिज्ञासु लाने और सेन्टर का वातावरण बनाने की उतनी जिम्मेदारी नहीं होती, जितनी सेन्टर पर रहने वालों को निभानी पड़ती है।
हालाँकि मधुबन निवासियों को भी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उन्हें बना-बनाया वातावरण प्राप्त होता है।
मुख्य शिक्षा: प्राप्त सुविधाओं और आध्यात्मिक वातावरण का लाभ लेकर अपनी उन्नति करनी है।
2. बने-बनाए वातावरण का सहयोग
बाबा ने समझाया कि सेन्टर पर रहने वाले भाई-बहनों को बाहरी वातावरण को बदलकर आध्यात्मिक वातावरण बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, मधुबन में अधिकांश ब्राह्मण आत्माएँ रहती हैं और योग के कार्यक्रम चलते रहते हैं।
यहाँ का वातावरण स्वयं को सहयोग देता है। बाबा ने यह भी बताया कि ब्रह्मा बाबा ने इस भूमि को तपस्या का वरदान दिया है।
इसलिए मधुबन निवासियों को बने-बनाए वातावरण का विशेष भाग्य मिला है।
मुख्य शिक्षा: अनुकूल वातावरण का लाभ लेकर अपनी तपस्या और स्व-उन्नति को आगे बढ़ाना है।
3. योग और प्रयोग में समानता
बापदादा ने बताया कि मधुबन के भाई-बहन प्यार और उमंग-उत्साह से योग लगाते हैं, लेकिन योग के साथ प्रयोग करने में उतना प्यार नहीं दिखाई देता।
बाबा दोनों का बैलेन्स चाहते हैं। योग से जो प्राप्तियाँ होती हैं, उन्हें अपने जीवन में उतारना और उनका परिणाम देखना भी आवश्यक है।
केवल योग की स्थिति में बैठना पर्याप्त नहीं है। योग से प्राप्त शक्ति और गुणों का प्रैक्टिकल प्रयोग करके उन्हें प्रमाणित करना है।
मुख्य शिक्षा: जितना योग लगाने में रुचि रखते हैं, उतनी ही रुचि योग की प्राप्तियों को प्रयोग में लाने में भी रखनी है।
4. बाबा से प्यार और कमियों का समर्पण
बाबा ने समझाया कि मधुबन निवासियों को मधुबन से प्यार है और बाबा से भी गहरा प्यार है। लेकिन उस प्यार के पीछे अपनी कमियों और संस्कारों को दृढ़ संकल्प से न्योछावर करने की मात्रा कम है।
सच्चे प्यार की पहचान केवल प्रेम की अनुभूति नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों को समाप्त करने की तत्परता भी है।
इसलिए तपस्या वर्ष में बाबा के प्रति प्यार को दृढ़ संकल्प और संस्कार परिवर्तन द्वारा प्रमाणित करना है।
मुख्य शिक्षा: बाबा से सच्चे प्यार का प्रमाण अपनी कमियों और पुराने संस्कारों को छोड़ना है।
5. रमणीकता और गम्भीरता का बैलेन्स
बापदादा ने तीसरी बात समझाई कि रमणीकता और गम्भीरता दोनों में समानता होनी चाहिए।
रमणीकता में जल्दी आ जाना सहज होता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त गम्भीर हो जाना भी आवश्यक है।
यदि रमणीकता अधिक और गम्भीरता कम होगी, तो तपस्या की शक्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए व्यवहार में प्रसन्नता और सहजता रखते हुए अपनी आन्तरिक स्थिति को गम्भीर, स्थिर और शक्तिशाली बनाना है।
मुख्य शिक्षा: रमणीकता और गम्भीरता—दोनों का समान बैलेन्स रखना है।
6. बाबा के तीन वरदानी हाथ
बापदादा ने एक खेल दिखाया। एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर बाबा लाइट-माइट स्वरूप में विराजमान थे। बाबा की दोनों आँखों और भृकुटि से तीन लाइट की किरणें निकल रही थीं।
आगे जाकर ये किरणें तीन वरदानी हाथों के समान दिखाई दीं। उनके बीच तीन शब्द लिखे थे—
- पीस — शान्ति
- प्योरिटी — पवित्रता
- प्रॉसपर्टी — समृद्धि
पहाड़ी के नीचे सभी बच्चे एक बड़े बगीचे में थे, जहाँ अलग-अलग प्रकार के स्टॉल बने हुए थे।
मुख्य शिक्षा: शान्ति, पवित्रता और समृद्धि के वरदानों को प्राप्त करने के लिए लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखना है।
7. चार स्टॉल और लक्ष्य से भटकना
बगीचे में चार प्रकार के स्टॉल थे—
- देखने की चीजों वाला स्टॉल।
- सुनने की चीजों वाला स्टॉल।
- बोलने पर उत्तर देने वाली मशीन वाला स्टॉल।
- घूमने-फिरने के लिए बगीचे जैसा स्थान।
सभी का लक्ष्य बाबा के पास पहुँचना था, लेकिन स्टॉल देखकर अनेक बच्चे अपने लक्ष्य को भूल गए। कोई देखने में, कोई सुनने में, कोई बोलने में और कोई घूमने-फिरने में लग गया।
इस प्रकार साइडसीन्स के आकर्षण ने उन्हें लक्ष्य तक पहुँचने में देर करा दी।
मुख्य शिक्षा: रास्ते में मिलने वाले आकर्षणों के कारण अपने मुख्य लक्ष्य को नहीं भूलना है।
8. मन के विचार और अपनी गति
बाबा ने दिखाया कि बच्चों के मन में अलग-अलग प्रकार के विचार चल रहे थे।
कोई सोचता था कि बाबा के पास तो जाना ही है, पहले थोड़ा देखकर चले जाएँगे। कोई सोचता था कि सभी अनुभव कर लेना चाहिए। कोई मानता था कि बाबा से मिलना जन्म-सिद्ध अधिकार है, इसलिए थोड़ी देर से पहुँचने में क्या हर्ज है। कुछ बच्चे तेज गति से सीधे बाबा के पास पहुँचने का संकल्प रखते थे।
इन विचारों के अनुसार सभी बच्चे नम्बरवार बाबा के पास पहुँचे।
इस खेल द्वारा बाबा ने समझाया कि लक्ष्य के प्रति संकल्प और गति का प्रभाव हमारी प्राप्ति पर पड़ता है।
मुख्य शिक्षा: लक्ष्य को महत्त्व देकर व्यर्थ आकर्षणों में समय नहीं गँवाना है।
9. तपस्या का अर्थ बेहद का वैराग
बापदादा ने खेल का रहस्य स्पष्ट करते हुए कहा कि तपस्या का अर्थ बेहद का वैराग है।
देखने, सुनने, बोलने और घूमने की आदतें यदि संस्कार बनकर आत्मा को अपनी ओर खींचती हैं, तो तपस्या की शक्ति पूरी तरह प्रभावशाली नहीं बन पाती।
इन साइडसीन्स के आकर्षणों के कारण आत्मा अपने लक्ष्य तक पहुँचने में देर कर देती है।
इसलिए तपस्या का अर्थ केवल बैठकर योग करना नहीं, बल्कि उन संस्कारों को समाप्त करना भी है जो लक्ष्य से दूर ले जाते हैं।
मुख्य शिक्षा: बेहद के वैराग द्वारा लक्ष्य से भटकाने वाले आकर्षणों और संस्कारों को समाप्त करना है।
10. सहारों को छोड़कर बाबा का सहारा लेना
बाबा ने समझाया कि जब तक आत्मा देखने, सुनने, बोलने या घूमने के आकर्षणों को सहारा बनाती रहेगी, तब तक बाबा के सहारे का पूरा अनुभव नहीं कर सकेगी।
जिन बच्चों ने साइडसीन्स को सहारा नहीं बनाया, वे जल्दी बाबा के पास पहुँच गए। इससे स्पष्ट होता है कि बाहरी आकर्षणों को प्राथमिकता देने से लक्ष्य की प्राप्ति में देर होती है।
तपस्या वर्ष में इन सहारों को छोड़कर बाबा के सहारे का अनुभव करना है।
मुख्य शिक्षा: बाहरी आकर्षणों के सहारे के बजाय बाबा के सहारे को प्राथमिकता देनी है।
11. बाबा समान और सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य
बापदादा ने कहा कि लक्ष्य बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने का है।
यदि पुराने संस्कारों और साइडसीन्स के आकर्षणों को समाप्त नहीं किया, तो इस लक्ष्य तक समय पर नहीं पहुँच सकेंगे और नम्बरवन के बजाय नम्बरवार की लाइन में आ जाएँगे।
योग और प्रयोग का बैलेन्स होने से आकर्षणों की शक्ति कम होगी और आत्मा बाबा द्वारा दिए गए लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकेगी।
मुख्य शिक्षा: अपने लक्ष्य को स्पष्ट रखकर बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने का पुरुषार्थ करना है।
12. मधुबन—विश्व का लाइटहाउस
बापदादा ने मधुबन को विश्व का लाइटहाउस बताया। मधुबन निवासियों को विशेष रूप से उन आकर्षणों और सहारों को छोड़ने की प्रेरणा दी, जो उनकी तपस्या को कमजोर करते हैं।
जब वे स्वयं इन सहारों से मुक्त होकर बाबा के सहारे का अनुभव करेंगे, तब विश्व की आत्माओं के लिए सहारा बनने के निमित्त बन सकेंगे।
बाबा ने यह भी कहा कि मधुबन के भाई-बहन सेवा में उमंग-उत्साह के कारण नम्बरवन हैं। अब इसी प्रकार अन्य सभी बातों में भी नम्बरवन बनने का पुरुषार्थ करना है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं शक्तिशाली बनकर विश्व के लिए प्रकाश और सहारे का निमित्त बनना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: मधुबन का विशेष भाग्य
प्रश्न 1. बापदादा के सभी बच्चे भाग्यवान क्यों हैं?
उत्तर: क्योंकि वे भाग्यविधाता बाप के बच्चे हैं।
प्रश्न 2. मधुबन निवासियों को कौन-सा विशेष भाग्य प्राप्त है?
उत्तर: उन्हें बना-बनाया आध्यात्मिक वातावरण मिलता है।
प्रश्न 3. सेन्टर पर रहने वालों को किस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है?
उत्तर: बाहरी वातावरण को बदलकर आध्यात्मिक वातावरण बनाने का।
प्रश्न 4. मधुबन के वातावरण को कौन-सी विशेषता प्राप्त है?
उत्तर: वहाँ ब्राह्मण परिवार, योग कार्यक्रम और तपस्या का वरदान प्राप्त वातावरण है।
प्रश्न 5. मधुबन निवासियों को अपने भाग्य का लाभ कैसे लेना है?
उत्तर: तपस्या और स्व-उन्नति में आगे बढ़कर।
भाग 2: योग और प्रयोग का बैलेन्स
प्रश्न 6. बाबा योग के साथ किस बात का बैलेन्स चाहते हैं?
उत्तर: प्रयोग का।
प्रश्न 7. योग से प्राप्तियों के साथ क्या करना है?
उत्तर: उन्हें जीवन में प्रयोग करना है।
प्रश्न 8. बाबा से प्यार का सच्चा प्रमाण क्या है?
उत्तर: अपनी कमियों और पुराने संस्कारों को दृढ़ संकल्प से छोड़ना।
प्रश्न 9. कौन-सी दो बातों का समान बैलेन्स रखना है?
उत्तर: रमणीकता और गम्भीरता का।
प्रश्न 10. तपस्या वर्ष में किस प्रकार का पुरुषार्थ करना है?
उत्तर: योग और प्रयोग दोनों में समानता लानी है।
भाग 3: तीन वरदान और चार स्टॉल
प्रश्न 11. बाबा की तीन लाइट की किरणों के बीच कौन-से शब्द लिखे थे?
उत्तर: पीस, प्योरिटी और प्रॉसपर्टी।
प्रश्न 12. पीस का अर्थ क्या है?
उत्तर: शान्ति।
प्रश्न 13. प्योरिटी का अर्थ क्या है?
उत्तर: पवित्रता।
प्रश्न 14. प्रॉसपर्टी का अर्थ क्या है?
उत्तर: समृद्धि।
प्रश्न 15. बगीचे में कितने प्रकार के स्टॉल थे?
उत्तर: चार प्रकार के।
भाग 4: लक्ष्य और आकर्षण
प्रश्न 16. सभी बच्चों का मुख्य लक्ष्य क्या था?
उत्तर: बाबा के पास पहुँचना।
प्रश्न 17. बच्चों को लक्ष्य से किसने भटकाया?
उत्तर: देखने, सुनने, बोलने और घूमने के आकर्षणों ने।
प्रश्न 18. कुछ बच्चे बाबा के पास देर से क्यों पहुँचे?
उत्तर: वे रास्ते में साइडसीन्स में उलझ गए।
प्रश्न 19. बाबा ने तपस्या का अर्थ क्या बताया?
उत्तर: बेहद का वैराग।
प्रश्न 20. लक्ष्य तक जल्दी पहुँचने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: आकर्षणों में समय गँवाए बिना लक्ष्य पर ध्यान रखना।
भाग 5: संस्कार और बाबा का सहारा
प्रश्न 21. कौन-सी आदतें तपस्या को कमजोर कर सकती हैं?
उत्तर: देखने, सुनने, बोलने और घूमने के आकर्षणों में उलझने की आदतें।
प्रश्न 22. बाहरी आकर्षणों को सहारा बनाने से क्या होता है?
उत्तर: बाबा के पास पहुँचने में देर होती है।
प्रश्न 23. बाबा के सहारे का अनुभव करने के लिए क्या करना है?
उत्तर: साइडसीन्स के आकर्षणों को छोड़ना है।
प्रश्न 24. बाबा ने आत्मा के सामने कौन-सा लक्ष्य रखा?
उत्तर: बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनना।
प्रश्न 25. योग और प्रयोग का बैलेन्स होने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: आकर्षणों से मुक्त होकर लक्ष्य की ओर बढ़ना सहज होता है।
भाग 6: विश्व सेवा और लाइटहाउस
प्रश्न 26. बाबा ने मधुबन को क्या कहा?
उत्तर: विश्व का लाइटहाउस।
प्रश्न 27. मधुबन निवासियों को किन बातों को छोड़ने की प्रेरणा दी गई?
उत्तर: तपस्या को कमजोर करने वाले आकर्षणों और सहारों को।
प्रश्न 28. मधुबन निवासी सेवा में किस कारण नम्बरवन बताए गए?
उत्तर: उनके उमंग और उत्साह के कारण।
प्रश्न 29. विश्व के लिए सहारा बनने हेतु पहले क्या करना है?
उत्तर: स्वयं शक्तिशाली बनकर बाबा के सहारे का अनुभव करना है।
प्रश्न 30. इस संदेश का मुख्य सार क्या है?
उत्तर: योग और प्रयोग का बैलेन्स रखकर आकर्षणों व पुराने संस्कारों को समाप्त करना और बाबा समान बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या मैं योग से प्राप्त शक्तियों को अपने व्यवहार और कर्मों में प्रयोग करता हूँ?
- क्या मेरी सेवा और स्व-उन्नति में समानता है?
- क्या मैं बाबा से प्यार के साथ अपनी कमियों को भी छोड़ने का दृढ़ संकल्प करता हूँ?
- क्या मेरे जीवन में रमणीकता और गम्भीरता का बैलेन्स है?
- क्या देखने, सुनने, बोलने या घूमने के आकर्षण मुझे लक्ष्य से भटकाते हैं?
- क्या मैं साइडसीन्स में उलझकर अपने पुरुषार्थ में देर करता हूँ?
- क्या मैं बाहरी सहारों से हटकर बाबा के सहारे का अनुभव करता हूँ?
- क्या मेरा लक्ष्य बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनना है?
- क्या मैं अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाकर विश्व के लिए लाइटहाउस बनने का पुरुषार्थ करता हूँ?
निष्कर्ष
20 फरवरी 1991 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि योग और प्रयोग का बैलेन्स रखो। योग से प्राप्त शक्तियों को जीवन में उतारना, बाबा से प्यार के प्रमाणस्वरूप अपनी कमियों को छोड़ना और रमणीकता के साथ गम्भीरता बनाए रखना है।
तपस्या का अर्थ बेहद का वैराग है। देखने, सुनने, बोलने और घूमने के आकर्षणों में उलझने के बजाय अपने लक्ष्य पर एकाग्र रहना है। जब आत्मा पुराने संस्कारों और बाहरी सहारों से मुक्त होकर बाबा के सहारे का अनुभव करती है, तब वह बाबा समान, सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“योग से शक्ति प्राप्त करूँ, प्रयोग से प्रमाण दूँ और लक्ष्य से कभी न भटकूँ।”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल अव्यक्त दिव्य संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 35. अव्यक्त दिव्य संदेश | 20.2.1991
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
