7.2.1991
योगी तो हो, अब प्रयोगी बनो
आप सभी भाई-बहनों का और विशेष प्यारी दादी जी का याद प्यार लेकर आज अमृतवेले बाबा के पास गई तो जाते हो बाबा के नयनों ने और मुस्कराहट से स्वागत किया तथा मिलन मनाया। साथ-साथ बाबा बोले आओ मेरे प्रि-तानशीन बच्चे आओ। बाबा ने कहा- मेरे तखानशीन बच्चे सदा ही स्व-उन्नति और मेवा की उन्नति में लगे हुए है और सदा ही लगे रहेंगे। उसके बाद बाबा ने कान्फ्रेंस का समाचार पूछा। वैसे बाबा तो सब कुछ देखते ही है फिर भी पूछते हैं। हमने समाचार सुनाया तो बाबा मुस्कराये और कहा- देखो बच्ची दुनिया वाले तो हलवल में हैं। सोचते है पता नहीं क्या होगा? उन दिनों इराक ने कवेत के ऊपर कब्जा कर लिया था। इस कारण इराक तथा अमरीका के साथ युद्ध चल रहा था। यह युद्ध खाड़ी युद्ध के नाम से मशहूर था) और तुम बच्चों ने हिम्मत रखकर कार्य किया तो अच्छा तो सदा होता ही है लेकिन और हो अच्छे-ते. अच्छा हो गया।
बाबा ने कान्फ्रेंस के पहले इशारा दिया थ कि कान्फ्रेंस करो लेकिन सिम्ल और व्युटीफूल हो, एकस्ट्रा शो, एकस्ट्रा खर्या मत करो। तो ऐसा ही हुआ। इस बार सभी बहुत ही नज़दीक आये सबको घर की फॉलिंग आई। मैंने कहा- बाबा, इस बार सभी ने अपना अनुभव सुनाते यही कहा कि यह स्वर्ग है, स्वर्ग है। तो बाबा ने कहा- पहले अच्छा है, अच्छा है कहते थे, अभी स्वर्ग तक आये हैं, फिर बाद में ‘परमात्मा है, परमात्मा है’ यह कहेंगे। अभी जीवनमुक्ति तक पहुंचे है, फिर जीवनमुक्ति-दाता तक पहुँच जायेंगे। फिर बाबा ने कहा कि वो है चिंता में, कहीं ये वार वल्डं वार में बदली न हो जाए और तुम हो चिन्ता-मुक्त। तुम्हें तो युद्ध की स्मृति भी नहीं है। तुम जानते हो जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, हो होने वाला है, वह अच्छा हो होने वाला है। तुम्हारी तकदीर की लकीर में सब अच्छा लिखा हुआ है। इसी रीति बाबा ने पहले समाचार पूछा फिर कहा कि बाबा भी खुश है। सभी बच्चों ने समय, सकल्प, समर्थी अनुसार सेवा की और इसकी रिज़ल्ट में अनेक आत्माएँ समीप आईं और आगे भी समीप आती रहेंगी।
फिर हमने कहा- बाबा, अभी तो तपस्या वर्ष शुरू होने वाला है। तपस्या वर्ष में सेवा के प्रति बाबा की क्या प्रेरणा है, यह सभी पूछते हैं? तो बाबा ने कहा- बच्ची, बाबा ने तो इशारा दे दिया है कि तपस्या वर्ष में सेवा और स्व-उन्नति दोनों का बैलेन्स रखना है। अभी सेवा का तरफ ज्यादा है और स्व-उन्नति का कम है। तपस्या वर्ष माना बैलेन्स। स्व-उन्नति के प्रति बाबा ने कहा कि -सभी बच्चे जब से बाप के बने हैं तब से तपस्वी तो है ही, योगी तू आत्मा है ही लेकिन इस तपस्या वर्ष में विशेष प्रयोगी बनना है। योग तो लगाते हो, योग ही आपकी जीवन है लेकिन योग से जो भी प्राप्तियाँ है उन एक-एक प्राप्तियों को प्रयोग करना है। एक-एक प्राप्ति का, गुण का, सम्बन्ध के अनुभव का, स्वरूप का, सेवा का अनुभव करो। जैसे आनन्द-स्वरूप की स्थिति में बैठते तो हो लेकिन उस आनन्द-स्वरूप से क्या सेवा हो सकती है, उसका प्रयोग करो। वातावरण में आनन्द की अनुभूति फैल जाए। जिस भी गुण के स्वरूप में स्थित हों, उसका वैसा ही वातावरण बने। जैसे वातावरण में कोई खुशबू फैलती है तो पता पड़ता है. ऐसे एक-एक गुण का प्रयोग करो।
बाबा ने कहा- लाइट तो बने हो लेकिन अब लाइट हाउस बनकर चारों ओर लाइट फैलानी है। लाइट-हाउस लाइट द्वारा दूसरों की सेवा करता है। तपस्या वर्ष में अभी यह सेवा करो अर्थात् लाइट की किरणें फैलाओ। जैसे साइंस वाले इन्वेन्शन करते है और इस इन्वेन्शन द्वारा क्या लाभ हो रहा है, वह भी देखते हैं। साइंस की यही विशेषता है कि साइंस प्रत्यक्षफल दिखाती है। इसलिए साइंस का प्रभाव पड़ता है, ऐसे हो साइलेन्स का प्रभाव दिखाओ। तपस्या माना प्रयोगशाला। इस प्रयोगशाला में आप लोग यह अनुभव डीप (गहन) करो कि आपका प्रभाव कहाँ तक, कितने समय तक पड़ता है। प्रकृति के ऊपर भी इसका टेस्ट करो। तीसरा, बाबा ने कहा तपस्या माना अभी उन्हें बदली करो। आपके संस्कार परिवर्तन से ही पहले इस तपस्या की अग्नि में अपने रहे हुए अंश-समान संस्कार बनाना। तो इस संस्कार-परिवर्तन से तक जो भी छोटे-मोटे अंश-मात्र भी संस्कार हैं, संसार बदलना है। तो आप बाह्मणों का काम है मात्र भी पुराने संस्कार है, उन्हें खत्म करके बाप नये सस्कार और नया संसार बनेगा।
चौथा, कई ब्राह्मण सोचते हैं कि सेवा नहीं होगी तो हम फ्री हो जायेंगे। हर मास क्या करेंगे? क्या तपस्या ही तपस्या करेंगे? बाबा ने कहा- इस तपस्या वर्ष में आपस में हर सप्ताह गेट-टू-गेदर (स्नेह-मिलन) करो। जैसे वीआईपीज़ का करते हो ऐसे ब्राह्मण आपस में स्नेह-मिलन करें और किसी-न-किसी नई विधि से क्लास हो, रूह-रूहान हो। जो एक रविवार को करो वह दूसरे रविवार को चेंज कर दो। जो भी प्रयोग करने से प्रैक्टिकल अनुभव हों उस पर ही रूह-रूहान चले। कोई नई टॉपिक पर हर सपताह के लिए सभी को होम-वर्क मिले। इससे सभी में नवीनता के कारण उमंग-उत्साह बना रहेगा। फिर बाबा ने सेवा के बारे में कहा कि इस वर्ष बड़े फंक्शन नहीं करने है। जिसमें बहुत ज़्यादा बिज़ी हो जाते हो, वह नहीं करो। वर्गीकरण की रीति से भी बहुत समय सेवायें की, वह भी नहीं करो। लेकिन जो भी आपके सम्बन्ध सम्पर्क में आये हैं उन्हें समीप लाकर अनुभूति कराओ। इतना समीप लाओ जो उनको माइक बनाओ और आप माइट बनो। अभी ऐसे माइक तैयार करो। आप लोग बैकबोन बनो, वो प्रैक्टिकल स्टेज पर आयें। ऐसे सम्पर्क-सम्बन्ध में अभी तक जो भी आये हैं उनकी लिस्ट तो आपके पास है ही। अब तक टाइम न मिलने से उनको पीठ नहीं कर सकते थे। अब बडे फंक्शन न होने से टाइम बचेगा. इसमें उन्हें विशेष समीप लाकर प्रेरणा दो और उनसे सेवा कराओ। दूसरा, बाबा ने कहा कि ऐसी कई संस्थाएँ होती हैं. फंक्शन व कान्फ्रेंस होती हैं तो उन्हों की बनी बनाई स्टेज पर पार्ट बजाओ। आप अपनी स्टेज तैयार नहीं करो. सिर्फ आप अपनी स्व की स्टेज बनाओ। अपने संकल्प की शक्ति से आह्वान करो। जितना-जितना आप माइट बनेंगे उतना आपकी बद्धि एक्सटर्नल (बाह्यमुखता) में नहीं जायेगी, इण्टरनल पॉवर में रहेगी। फिर अपनी स्टेज पर स्थित होकर उन्हों की स्टेज पर जायेंगे तो उन्हें और भी ज़्यादा लाभ प्राप्त होगा। इस प्रकार बाबा ने सेवा के लिए डायरेक्शन दिये।
फिर आज दादियों ने खास याद-प्यार दिया था। कई सोचते हैं- दोनों ही दादियाँ इकट्ठे ही क्यों बीमार हुई हैं! तो बाबा ने कहा – हिसाब-किताब तो चुक्तू होना ही है। लेकिन दोनों एक साथ जो बीमार हुई हैं – इसमें भी कई राज़ हैं। दोनों ही मूर्त्तियाँ बन गई हैं। ऐसे तो टाइम नहीं मिलता है लेकिन यह भी साक्षात्कामूर्त बनने का टाइम मिला है। अभी जो वीआईपीज़ आये वे सभी साक्षात् मूर्ति के रूप में साक्षात्कार करके गये। ड्रामानुसार हिसाब-किताब तो चुक्तू हो ही रहा है लेकिन बाबा ड्रामा को देखते हर्षित होकर बता रहे थे कि यह भी एक न्यारा मिलन रहा। दादियों के एक सेकण्ड की दृष्टि की छाप भाषण वालों से भी ज़्यादा पड़ी। वैसे तो दादियाँ मौन नहीं रख सकती। यह भी मौन में रहने का चांस मिला है। बाबा ने सुनाया कि इनकी एक सेकण्ड की दृष्टि जो काम कर सकती है, वह एक घण्टे का भाषण नहीं कर सकता। हिसाब-किताब चुक्तू के साथ-साथ जो इनकी दृष्टि ने सेवा की है उसका सभी वर्णन करेंगे। तपस्या वर्ष शुरू होने के पहले ड्रामा ने इन्हों को तपस्वी-मूर्त का सैम्पल बनाया है। यह एकदम उपराम होकर सेवा भी कर रही हैं, उपराम भी हैं। सेवा की ज़िम्मेवारी होते उपराम वृत्ति है। जो सोचते हैं कि तपस्या वर्ष में इतनी सेवा होते हुए न्यारे-प्यारे कैसे रहेंगे, उनके लिए यह सैम्पल है। सेवा भी हो रही है, बैकबोन भी बनी हैं लेकिन न्यारी और प्यारी भी हैं। ऐसे ही हल्के रहकर सेवा कर सकते हो। कोई भी यह कह नहीं सकता कि इतनी सेवा होते हम उपराम व न्यारे-प्यारे कैसे रहें। फिर बाबा ने सभी दादियों को, सभी देश-विदेश के भाई-बहनों को बहुत-बहुत याद-प्यार दी। बाबा ने कहा- सभी बच्चों ने बहुत-बहुत अच्छा हीरे-तुल्य पार्ट बजाया। सभी ने दादियों को बैकबोन रखा और स्टेज पर आकर बहत-बहुत-बहुत अच्छा पर्ट बजाया। इसलिए सभी को हीरे-तुल्य मुबारक हो। जो भी निमित्त बने, फॉरेन के चाहे इण्डिया — सभी को मुबारक दी और विशेष चन्द्रमणि दादी को बाबा ने बहुत-बहुत प्यार किया।
योगी तो हो,
अब
प्रयोगी बनो
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने तपस्या वर्ष के लिए विशेष प्रेरणा दी कि अब केवल योगी बनकर नहीं रहना है, बल्कि योग से प्राप्त शक्तियों, गुणों और अनुभवों को जीवन में प्रयोग करके प्रत्यक्ष फल दिखाना है।
बाबा ने सेवा और स्व-उन्नति का बैलेन्स रखने, अपनी आन्तरिक शक्ति से वातावरण को प्रभावित करने, पुराने संस्कारों को समाप्त करने तथा सम्पर्क-सम्बन्ध में आने वाली आत्माओं को अनुभूति कराने की शिक्षा दी।
बाबा ने यह भी समझाया कि बड़े-बड़े कार्यक्रमों के बजाय ऐसी सेवा करनी है जिससे आत्माएँ समीप आएँ, स्वयं सेवा करने योग्य बनें और माइक बनें, जबकि ब्राह्मण आत्माएँ माइट अर्थात् शक्ति बनकर उन्हें सहयोग दें।
1. बाबा का बच्चों के प्रति स्नेह और खुशी
अमृतवेले बाबा के पास जाने पर बाबा ने नयनों और मुस्कराहट से स्वागत किया तथा बच्चों को तख्तनशीन कहा। बाबा ने बताया कि बच्चे सदा स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति में लगे हुए हैं।
जब सम्मेलन के समाचार सुनाए गए, तब बाबा ने बच्चों के कार्य की सराहना की। उस समय दुनिया में युद्ध के कारण चिन्ता का वातावरण था, लेकिन बच्चों ने हिम्मत रखकर सेवा की।
बाबा ने समझाया कि बच्चे चिन्तामुक्त रहते हैं और जानते हैं कि जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है तथा जो होने वाला है, वह भी अच्छा ही होगा।
मुख्य शिक्षा:परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हिम्मत और विश्वास बनाए रखकर सेवा करनी है।
2. सम्मेलन की सफलता और सरल सेवा
बाबा ने सम्मेलन से पहले संकेत दिया था कि कार्यक्रम सरल और सुन्दर होना चाहिए। अनावश्यक दिखावा और अतिरिक्त खर्च नहीं करना चाहिए।
इस निर्देश के अनुसार सम्मेलन हुआ और अनेक आत्माएँ समीप आईं। कई आत्माओं ने अपने अनुभव में कहा कि यह स्वर्ग है।
बाबा ने इसे आत्माओं की प्रगति के रूप में समझाया—पहले वे अच्छा अनुभव करती थीं, फिर स्वर्ग की अनुभूति तक पहुँचीं और आगे परमात्मा की पहचान तथा जीवनमुक्ति-दाता तक पहुँचने की सम्भावना है।
मुख्य शिक्षा: सेवा में सादगी रखते हुए आत्माओं को श्रेष्ठ अनुभव कराना है।
3. सेवा और स्व-उन्नति का बैलेन्स
बापदादा ने तपस्या वर्ष के लिए विशेष प्रेरणा दी कि सेवा और स्व-उन्नति दोनों में बैलेन्स रखनाहै।
बाबा ने बताया कि अभी सेवा की ओर अधिक ध्यान है और स्व-उन्नति की ओर अपेक्षाकृत कम। तपस्या वर्ष का अर्थ है दोनों में सन्तुलन स्थापित करना।
सेवा करते हुए अपनी आन्तरिक स्थिति को भी शक्तिशाली बनाना है। केवल बाहरी सेवा में व्यस्त रहना पर्याप्त नहीं है।
मुख्य शिक्षा: सेवा के साथ-साथ अपनी आत्मिक उन्नति पर भी पूरा ध्यान देना है।
4. योगी से प्रयोगी बनना
बाबा कहते हैं कि जब से बच्चे बाप के बने हैं, तब से योगी तो हैं ही। योग आत्मा के जीवन का आधार है, लेकिन तपस्या वर्ष में विशेष रूप से प्रयोगी बनना है।
योग से जो भी प्राप्तियाँ हुई हैं, उनका एक-एक करके प्रयोग करना है। अपने गुणों, सम्बन्धों के अनुभव, स्वरूप और सेवा की प्राप्तियों को जीवन में प्रैक्टिकल रूप देना है।
उदाहरण के लिए, आनन्द-स्वरूप बनकर बैठना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी प्रयोग करना है कि उस आनन्दमय स्थिति से वातावरण में आनन्द की अनुभूति कैसे फैले।
मुख्य शिक्षा: योग से प्राप्त हर शक्ति और गुण को प्रैक्टिकल जीवन में प्रयोग करना है।
5. गुणों द्वारा वातावरण को सुगन्धित बनाना
बापदादा समझाते हैं कि जैसे किसी वस्तु की खुशबू वातावरण में फैल जाती है और उसके होने का अनुभव कराती है, वैसे ही आत्मा के गुणों का प्रभाव भी वातावरण में दिखाई देना चाहिए।
यदि कोई आनन्द-स्वरूप में स्थित है, तो उसके आसपास आनन्द का वातावरण बने। जिस गुण में स्थित हों, उसी गुण की अनुभूति दूसरों तक पहुँचे।
इस प्रकार गुण केवल अपने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रभावित
करते हैं।
मुख्य शिक्षा: अपने गुणों को ऐसी शक्ति बनाना है जिससे वातावरण में श्रेष्ठता फैले।
6. लाइट से लाइटहाउस बनना
बाबा कहते हैं कि बच्चे लाइट तो बने हैं, लेकिन अब लाइटहाउस बनकर चारों ओरलाइट फैलानीहै।
लाइटहाउस स्वयं प्रकाशित रहने के साथ दूसरों को भी प्रकाश देता है। इसी प्रकार तपस्या वर्ष में अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा आत्माओं की सेवा करनी है।
बाबा ने साइंस का उदाहरण दिया कि विज्ञान अपनी खोजों के परिणाम प्रत्यक्ष दिखाता है, इसलिए उसका प्रभाव पड़ता है। उसी प्रकार साइलेन्स की शक्ति का प्रभाव भी प्रैक्टिकल रूप में दिखाना है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं शक्तिशाली बनने केसाथ अपनी शक्ति की किरणें चारों ओर फैलानी हैं।
7. तपस्या वर्ष एक प्रयोगशाला
बापदादा ने तपस्या वर्ष को प्रयोगशाला के समान बताया।
इस प्रयोगशाला में अपनी तपस्या और आन्तरिक शक्ति का गहन अनुभव करना है। यह देखना है कि अपनी स्थिति का प्रभाव कहाँ तक और कितने समय तक रहता है। बाबा ने प्रकृति के ऊपर भी इसके प्रभाव को जाँचने की बात कही।
इसका उद्देश्य केवल तपस्या करना नहीं, बल्कि तपस्या के प्रभाव को अनुभव करना और उसके परिणाम को पहचानना है।
मुख्य शिक्षा: तपस्या को प्रयोग बनाकर उसके प्रभाव और परिणाम का अनुभव करना है।
8. पुराने संस्कारों को
समाप्त करना
बाबा ने तपस्या की अग्नि द्वारा पुराने संस्कारों को समाप्त करने की प्रेरणा दी।
आत्मा में पुराने संस्कारों के जो अंश-मात्र भी शेष हैं, उन्हें पहचानकर परिवर्तन करना है। केवल बड़े दोषों को समाप्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि छोटे-से-छोटे पुराने संस्कार को भी बदलना है।
जब ब्राह्मण आत्माएँ अपने संस्कारों में परिवर्तन लाएँगी, तब नए संस्कारों और नए संसार की स्थापना के कार्य में सहयोगी बनेंगी।
मुख्य शिक्षा: तपस्या द्वारा पुराने संस्कारों के अंश-मात्र को भी समाप्त करके नए संस्कार धारण
करने हैं।
9. हर सप्ताह स्नेह-मिलन और नवीनता
बाबा ने समझाया कि यदि बड़े कार्यक्रम नहीं होंगे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि सेवा नहीं होगी या समय खाली चला जाएगा।
तपस्या वर्ष में हर सप्ताह आपस में स्नेह-मिलन करना है। इसमें नई विधि से क्लास, रूह-रूहान और अनुभवों का आदान-प्रदान हो।
एक रविवार को जो विधि अपनाई जाए, अगले रविवार को उसे बदलकर नवीनता लानी है। किसी नई टॉपिक पर सभी को होमवर्क देना है और अगले स्नेह-मिलन में उसके प्रैक्टिकल अनुभवों
पर चर्चा करनी है।
इससे सभी में उमंग और उत्साह बना रहेगा।
मुख्य शिक्षा: हर सप्ताह नवीन विधियों द्वारा स्नेह-मिलन, रूह-रूहान और प्रैक्टिकल अनुभवों
की चर्चा करनी है।
10. बड़े फंक्शन के बजाय अनुभूति की सेवा
बापदादा ने इस वर्ष बड़े फंक्शन और ऐसी गतिविधियों को कम करने की प्रेरणा दी, जिनमें बहुत अधिक समय और शक्ति लग जाती है।
वर्गीकरण की रीति से बहुत समय सेवा करने के बजाय, जो आत्माएँ पहले से सम्पर्क-सम्बन्ध में आई हैं, उन्हें समीप लाकर अनुभूति करानी है।
उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे स्वयं सेवा करने वाले बनें। बाबा ने इसे इस रूप में समझाया—उन्हें माइक बनाओ और आप माइट बनो।
मुख्य शिक्षा: केवल बड़ी सभाएँ करने के बजाय सम्पर्क में आई आत्माओं को अनुभवी और सेवाधारी बनाना है।
11. माइक बनाना और स्वयं माइट बनना
बाबा ने सेवा की एक विशेष विधि बताई—आत्माओं को माइक बनाना और स्वयं माइट बनना।
इसका अर्थ है कि जिन आत्माओं से सम्पर्क हुआ है, उन्हें आगे बढ़ाकर प्रैक्टिकल सेवा करने योग्य बनाना है। ब्राह्मण आत्माएँ पीछे रहकर अपनी शक्ति और सहयोग से उन्हें आधार दें।
जो आत्माएँ पहले आ चुकी हैं, उनकी सूची उपलब्ध है। अब समय मिलने पर उन्हें विशेष रूप से समीप लाना, प्रेरणा देना और उनसे सेवा कराना है।
मुख्य शिक्षा: दूसरों को आगे बढ़ाकर सेवा के योग्य बनाना और स्वयं शक्ति का आधार बनना है।
12. अपनी स्टेज बनाओ, बाहरी स्टेज पर पार्ट बजाओ
बापदादा ने बताया कि अनेक संस्थाओं में पहले से तैयार स्टेज और कार्यक्रम होते हैं। वहाँ अपनी अलग स्टेज तैयार करने के बजाय, उस बनी हुई स्टेज पर अपना पार्ट बजाना है।
लेकिन अपनी आन्तरिक स्टेज अवश्य तैयार करनी है। संकल्प की शक्ति से आह्वान करना और अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाना है।
जितना आत्मा माइट अर्थात् आन्तरिक शक्ति में स्थित होगी, उतना ही उसकी बुद्धि बाह्यमुखता से हटकर आन्तरिक शक्ति में रहेगी। फिर अपनी श्रेष्ठ स्थिति में स्थित होकर बाहरी स्टेज पर सेवा करने से दूसरों को अधिक लाभ होगा।
मुख्य शिक्षा: बाहरी मंच से अधिक अपनी आन्तरिक स्थिति को शक्तिशाली बनाना है।
13. दादियों की स्थिति से न्यारे और प्यारे रहने की शिक्षा
बापदादा ने दादियों की बीमारी के समय को भी एक विशेष अनुभव के रूप में समझाया। उन्होंने बताया कि हिसाब-किताब चुक्तू होने के साथ-साथ यह समय साक्षात्कारमूर्त बनने का अवसर भी बना।
दादियों की एक सेकण्ड की दृष्टि ने ऐसी छाप छोड़ी, जो एक घण्टे के भाषण से भी अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
दादियाँ सेवा की जिम्मेदारी होते हुए भी उपराम वृत्ति में रहीं। वे सेवा में सहयोगी और बैकबोन बनीं, लेकिन न्यारी और प्यारी भी रहीं।
बाबा ने इस उदाहरण द्वारा समझाया कि अधिक सेवा होते हुए भी हल्का और उपराम रहा जा सकता है।
मुख्य शिक्षा: सेवा की जिम्मेदारी निभाते हुए भी न्यारे-प्यारे और उपराम रहना सीखना है।
14. दृष्टि की शक्ति और मौन की सेवा
बाबा ने बताया कि दादियों को मौन में रहने का अवसर मिला और उनकी एक सेकण्ड की दृष्टि ने सेवा की विशेष छाप छोड़ी।
इससे यह प्रेरणा मिलती है कि सेवा केवल भाषण या शब्दों से नहीं होती। आत्मिक स्थिति और दृष्टि में भी सेवा की शक्ति होती है।
जब आत्मा स्वयं तपस्वी और उपराम स्थिति में रहती है, तब उसकी उपस्थिति भी दूसरों को प्रेरित कर सकती है।
मुख्य शिक्षा: अपनी आत्मिक स्थिति और दृष्टि को भी सेवा का प्रभावशाली माध्यम बनाना है।
15. हीरे-तुल्य पार्ट बजाने की मुबारक
अन्त में बाबा ने देश-विदेश के सभी भाई-बहनों को उनके श्रेष्ठ पार्ट के लिए मुबारक दी। सभी ने दादियों को बैकबोन बनकर सहयोग दिया और स्टेज पर आकर अपना पार्ट बजाया।
बाबा ने सभी को हीरे-तुल्य मुबारक दी और विशेष रूप से चन्द्रमणि दादी को बहुत प्यार दिया।
मुख्य शिक्षा: सेवा में निमित्त बनकर सहयोग देना और अपने पार्ट को श्रेष्ठ बनाना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: सेवा और स्व-उन्नति
प्रश्न 1. इस संदेश का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: योगी से प्रयोगी बनना।
प्रश्न 2. तपस्या वर्ष में किन दो बातों का बैलेन्स रखना है?
उत्तर: सेवा और स्व-उन्नति का।
प्रश्न 3. बाबा ने बच्चों को क्या कहकर सम्बोधित किया?
उत्तर: तख्तनशीन बच्चे।
प्रश्न 4. सम्मेलन की सफलता का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर: अनेक आत्माएँ समीप आईं।
प्रश्न 5. बच्चों को परिस्थितियों में कैसी स्थिति रखनी है?
उत्तर: चिन्तामुक्त और विश्वासपूर्ण।
भाग 2: योग से प्रयोग
प्रश्न 6. तपस्या वर्ष में विशेष रूप से क्या बनना है?
उत्तर: प्रयोगी।
प्रश्न 7. योग से प्राप्तियों के साथ क्या करना है?
उत्तर: उनका एक-एक करके प्रयोग करना है।
प्रश्न 8. आनन्द-स्वरूप में स्थित होकर क्या प्रयोग करना है?
उत्तर: वातावरण में आनन्द की अनुभूति फैलाना।
प्रश्न 9. गुणों के प्रयोग से वातावरण कैसा बनना चाहिए?
उत्तर: उसी गुण की अनुभूति से भरपूर।
प्रश्न 10. लाइट बनने के बाद अब क्या बनना है?
उत्तर: लाइटहाउस।
भाग 3: तपस्या की प्रयोगशाला
प्रश्न 11. बाबा ने तपस्या वर्ष को किसके समान बताया?
उत्तर: प्रयोगशाला।
प्रश्न 12. तपस्या के प्रभाव में किन बातों को देखना है?
उत्तर: प्रभाव कहाँ तक और कितने समय तक रहता है।
प्रश्न 13. तपस्या द्वारा किन संस्कारों को समाप्त करना है?
उत्तर: पुराने संस्कारों को, अंश-मात्र सहित।
प्रश्न 14. संस्कार परिवर्तन से किसकी स्थापना में सहयोग मिलता है?
उत्तर: नए संस्कारों और नए संसार की।
प्रश्न 15. साइंस के उदाहरण से बाबा ने क्या समझाया?
उत्तर: जैसे साइंस प्रत्यक्ष फल दिखाती है, वैसे साइलेन्स का प्रभाव भी दिखाना है।
भाग 4: स्नेह-मिलन और सेवा
प्रश्न 16. तपस्या वर्ष में कितने समय के अन्तराल पर स्नेह-मिलन करने की प्रेरणा दी गई?
उत्तर: हर सप्ताह।
प्रश्न 17. स्नेह-मिलन में क्या-क्या किया जा सकता है?
उत्तर: नई विधि से क्लास, रूह-रूहान और प्रैक्टिकल अनुभवों की चर्चा।
प्रश्न 18. हर सप्ताह नवीनता क्यों रखनी है?
उत्तर: उमंग और उत्साह बनाए रखने के लिए।
प्रश्न 19. इस वर्ष किस प्रकार के बड़े कार्यक्रमों को कम करने की प्रेरणा दी गई?
उत्तर: जिनमें बहुत अधिक समय और शक्ति लगती है।
प्रश्न 20. पहले से सम्पर्क में आई आत्माओं के साथ क्या करना है?
उत्तर: उन्हें समीप लाकर अनुभूति करानी है।
भाग 5: माइक और माइट
प्रश्न 21. बाबा ने सेवा के लिए कौन-सा सूत्र दिया?
उत्तर: माइक बनाओ और स्वयं माइट बनो।
प्रश्न 22. माइक बनाने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आत्माओं को आगे बढ़ाकर स्वयं सेवा करने योग्य बनाना।
प्रश्न 23. माइट बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आन्तरिक शक्ति बनकर दूसरों को सहयोग देना।
प्रश्न 24. दूसरी संस्थाओं के कार्यक्रमों में किस प्रकार सेवा करनी है?
उत्तर: उनकी बनी हुई स्टेज पर अपना पार्ट बजाना है।
प्रश्न 25. अपनी कौन-सी स्टेज तैयार करनी है?
उत्तर: अपनी आन्तरिक स्टेज।
भाग 6: उपराम स्थिति और दृष्टि की सेवा
प्रश्न 26. दादियों की एक सेकण्ड की दृष्टि ने क्या किया?
उत्तर: भाषण से भी अधिक प्रभावशाली छाप छोड़ी।
प्रश्न 27. सेवा की जिम्मेदारी होते हुए भी कैसा रहना है?
उत्तर: न्यारा-प्यारा और उपराम।
प्रश्न 28. बाबा ने तपस्या वर्ष से पहले दादियों को किस रूप में बताया?
उत्तर: तपस्वी-मूर्त के सैम्पल के रूप में।
प्रश्न 29. बाबा ने देश-विदेश के भाई-बहनों को किसलिए मुबारक दी?
उत्तर: उनके हीरे-तुल्य पार्ट और सहयोग के लिए।
प्रश्न 30. इस संदेश का मुख्य सार क्या है?
उत्तर: योग से प्राप्तियों को प्रयोग में लाना, सेवा और स्व-उन्नति में बैलेन्स रखना तथा आन्तरिक शक्ति से वातावरण और आत्माओं की उन्नति करना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
क्या मैं सेवा के साथ अपनी स्व-उन्नति का भी ध्यान रखता हूँ?
क्या मैं योग से प्राप्त गुणों और शक्तियों का प्रैक्टिकल प्रयोग करता हूँ?
क्या मेरी आनन्दमय स्थिति से वातावरण में आनन्द फैलता है?
क्या मैं लाइटहाउस बनकर दूसरों को आत्मिक शक्ति देता हूँ?
क्या मेरे संस्कारों में अभी भी पुराने संस्कारों के अंश शेष हैं?
क्या मैं हर सप्ताह नवीनता के साथ स्नेह-मिलन और अनुभवों की चर्चा करता हूँ?
क्या मैं सम्पर्क में आई आत्माओं को अनुभूति कराकर सेवा के योग्य बनाता हूँ?
क्या मैं माइक बनाने और स्वयं माइट बनने की विधि अपनाता हूँ?
क्या मैं बाहरी स्टेज पर पार्ट बजाते हुए अपनी आन्तरिक स्टेज पर स्थित रहता हूँ?
क्या मैं जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी न्यारा-प्यारा और उपराम रह सकता हूँ?
निष्कर्ष
7 फरवरी 1991 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि योगी तो हो, अब प्रयोगी बनो। तपस्या वर्ष में सेवा और स्व-उन्नति का बैलेन्स रखते हुए योग से प्राप्त गुणों, शक्तियों और अनुभवों को प्रैक्टिकल जीवन में उतारना है।
अपनी स्थिति को लाइटहाउस बनाकर चारों ओर प्रकाश फैलाना है, पुराने संस्कारों को समाप्त करना है और सम्पर्क में आई आत्माओं को समीप लाकर अनुभूति करानी है। सेवा की जिम्मेदारी निभाते हुए भी न्यारे-प्यारे और उपराम रहना है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“योग से प्राप्ति, तपस्या से शक्ति और प्रयोग से प्रत्यक्ष फल।”
📝 34. अव्यक्त दिव्य संदेश | 07.02.1991
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
