| 25-10-26 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति”अव्यक्त-बापदादा” | रिवाइज: 19-02-12 मधुबन |
घर का गेट खोलने के लिए बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा देह-अभिमान के मैं का त्याग करो, बर्थ डे पर दृढ़ता द्वारा कहना और करना एक कर सफलतामूर्त बनो
आज बापदादा चारों ओर के बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। चारों ओर से यही दिल का आवाज आ रहा है वाह बाबा वाह! और बाप की दिल से यही आवाज है वाह बच्चे वाह! आज सभी उमंग-उत्साह से दिव्य जन्म की खुशी मना रहे हैं। आज खुशी मना भी रहे हैं और साथ में बाप भी बच्चों की खुशी मना रहे हैं। आज का ही यह विचित्र जयन्ती का दिन है जो बाप और बच्चों का इकट्ठा दिव्य जन्म का दिन है। तो आप सभी मुबारक दे भी रहे हो और ले भी रहे हो क्योंकि बाप ने जन्म लिया ही है यज्ञ रचने के लिए। तो यज्ञ में ब्राह्मण बच्चे ही चाहिए। तो यह एक ही जयन्ती है जो बाप और बच्चों की इकट्ठी जयन्ती है इसीलिए इस शिव जयन्ती को हीरे तुल्य जयन्ती कहा जाता है। तो बाप देख रहे हैं कि एक-एक बच्चा कितने स्नेह से मुबारक देने आये हैं और बाप भी मुबारक देने आये हैं। यह जयन्ती अति स्नेह की जयन्ती है। स्नेही बच्चे, स्नेही बाप और स्नेही जयन्ती है।
बापदादा के पास चारों ओर के देश विदेश सब बच्चों का स्नेह पहुंच रहा है। बाप एक-एक स्नेही बच्चे को पदम-गुणा स्नेह भरी मुबारक दे रहे हैं। यह स्नेह हर बच्चे को सहज कर्मयोगी बनाने वाला है। यह स्नेह सदा सहज बनाने वाला है, शक्तिशाली बनाने वाला है। बापदादा का अकेला जन्मदिन नहीं है क्योंकि बाप सदा ही बच्चों के साथ रहने वाले हैं। साथ रहेंगे, साथ चलेंगे, साथ राज्य करेंगे। आप सबका भी यही वायदा है ना! साथ रहना है, साथ उड़ना है और साथ राज्य करना है!
बापदादा को आज आपके भक्त भी विशेष याद आ रहे हैं क्योंकि आपके भक्तों ने जो आपने किया है वह कॉपी बहुत अच्छी की है क्योंकि द्वापर में परमधाम से पहले-पहले आये हैं तो पहला जन्म सदा सतोप्रधान होता है इसलिए उन्होंने कॉपी बहुत अच्छी की है। तो आज के दिन बच्चों के साथ आपके भक्त भी याद आ रहे हैं। वतन में तो आज अमृतवेले से बहुत बच्चों की रौनक थी। हर बच्चा समझता था कि मैं बापदादा को अपनी मुबारक दूं और बापदादा ने भी हर बच्चे की मुबारक अति स्नेह से स्वीकार की। तो वतन में आज यह मेला लगा हुआ था। एक तरफ आप बच्चे थे, दूसरी तरफ एडवांस में गये हुए आपके साथी साथ में आये हुए थे। बापदादा ने देखा कि आपकी दादियां और अनन्य भाईयों की लिस्ट बहुत बड़ी थी। एक-एक दादियाँ बापदादा को भी मुबारक दे रहे थे लेकिन साथ में आप सब भाग्यवान बच्चों को भी मुबारक दे रहे थे। तो वतन में आज मुबारकों का मेला था। सभी एडवांस पार्टी के विशेष दादियाँ और भाई आप विशेष निमित्त साथ रहने वाली आत्माओं को याद करते हुए बहुत दिल से मुबारक दे रहे थे। तो आप सबको बापदादा सबकी तरफ से भी मुबारकें दे रहे हैं। स्वीकार किया?
सभी का विशेष बहिनें और भाईयों का एक ही आवाज था कि अभी घर का गेट कब खोलेंगे! तो विशेष दीदी दादी कह रही थी कि हमारी सखियों को, भाईयों को हमारे तरफ से यही कहना कि घर चलने के लिए कौन सी तारीख फिक्स की है? सब इकट्ठे चलेंगे ना! अलग-अलग तो नहीं जायेंगे? दरवाजा खोलने के लिए सभी इकट्ठे हाज़िर हो जायेंगे। तो वह डेट मांग रहे थे। बापदादा मुस्कराये क्योंकि बाप भी चाहते हैं कि अभी गेट को खोलने के लिए सभी बच्चों को बेहद की वैराग्य वृत्ति चाहिए, यही चाबी है गेट खोलने की। बापदादा तो सदा कहते रहते हैं कि बेहद के वैरागी बन वेस्ट संकल्प और वेस्ट समय दोनों को मिलकर जल्दी से जल्दी त्याग करना अर्थात् बेहद के वैरागी बनना क्योंकि बापदादा ने देखा है कि सबसे बड़ा विघ्न देह अभिमान है। इस देह-अभिमान को त्यागना चलते-फिरते देही-अभिमानी बनना, यही बेहद का वैराग्य है।
तो सभी कहते तो हैं मेरा बाबा, मीठा बाबा, प्यारा बाबा। जब दिल से कहते हैं मेरा तो यह देह अभिमान जो ‘मैं’ के रूप में आता है, बाप सदा कहते हैं कि यह ‘मैं’ का भान जो आ जाता है, मैं जो करता हूँ, मैं जो कहता हूँ, वही ठीक है। एक मैं है कामन, मैं आत्मा हूँ और यह मेरा शरीर है। दूसरा महीन मैं, जो सुनाया मैंने यह किया, मैं यह कर सकता हूँ, मैं ही ठीक हूँ…, यह महीन मैं इसको खत्म करना है। यह देह अभिमान इस रूप में आता है। तो आज के दिन यह महीन मैं, जो कभी बाप की विशेषता को भी मेरा मानकर ‘मैं’ का भान रखते हैं, इसको समाप्त करना। देखो, यादगार जो बनाते हैं उसमें भी जब बलि चढ़ाते हैं तो खुद नहीं बलि चढ़ते हैं लेकिन किसको बलि चढ़ाते हैं? बकरे को। बकरे को क्यों ढूंढा? क्योंकि बकरा मे मे ही करता है। भक्तों ने कॉपी तो बहुत अच्छी की है। तो आज के दिन यह देह अभिमान का मैं क्या पुरुषार्थ करके समाप्त कर सकते हो? बाप के बर्थ डे पर आये हो तो कोई सौगात तो देंगे ना! तो बाप को और सौगात नहीं चाहिए, यह महीन मैंपन, यही बाप कहते हैं आज के जन्मदिन पर बाप को सौगात दे दो। दे सकते हो? देना है? है हिम्मत? हिम्मत है? हाथ उठाओ। हाथ उठाके तो खुश कर दिया। हाथ उठाया, तो सौगात दे दी ना! दी हुई सौगात कोई वापस लेता है क्या? कई बच्चे कहते हैं बाबा हम चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाती है। कारण क्या? कारण अगर पूछे तो जवाब बहुत अच्छा देते हैं। कहते हैं जानते भी हैं, मानते भी हैं लेकिन क्या करें वापस आ जाता है। सोचो! दी हुई चीज़ अगर आपके पास आ जाए तो क्या दी हुई चीज़ अपने पास रखेंगे? तो अगर आपने दिल से दी, अगर वापस आ भी जाती, तो रखेंगे अपने पास? कारण क्या है? बाप से प्यार है ना तो प्यार के कारण जो बाप कहते हैं वह करने चाहते हैं, यह बाप के पास भी रिजल्ट आती है लेकिन क्या है, दृढ़ता कम है, दृढ़ता को यूज़ करो। संकल्प करते हो लेकिन एक है संकल्प करना, दूसरा है दृढ़ संकल्प करना। तो बार-बार किये हुए संकल्प में दृढ़ता लाना, यह अटेन्शन कम है। दृढ़ता सफलता की चाबी है। तो आज क्या करेंगे? संकल्प करेंगे या दृढ़ संकल्प करेंगे? अगर आपका दृढ़ संकल्प है तो उसकी निशानी है दृढ़ता सफलता की चाबी है। तो चाबी लगाने में कोई कमी रह जाती है इसीलिए सम्पूर्ण सफलता नहीं मिलती है।
तो आज बापदादा के साथ बच्चों का भी बर्थ डे है, बाप का भी बर्थ डे है। तो यह तो विशेष दिन है ना! सारे कल्प में बाप बच्चों का एक समय जन्म यह इसी बर्थ डे की विशेषता है। तो आज के दिन बाप यही चाहते हैं कि हर बच्चा आज अपने दिल में दृढ़ता को लाके यह दृढ़ संकल्प करे कि हमें व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय नहीं गंवाना है क्योंकि अगर सारे दिन को अटेन्शन से चेक करो तो बीच-बीच में समय और संकल्प व्यर्थ जाता है। बापदादा तो सबका रजिस्टर देखते हैं ना! उसको बचाना अर्थात् समाप्ति का समय समीप लाना। तैयार हो? कि अभी भी कहेंगे आ जाते हैं, क्या करें? व्यर्थ का काम है आना, आपका काम क्या है, बिठाना? तो बिठा देते हो तभी तो उसने भी घर बना दिया है। वह भी समझ गये हैं कि दृढ़ता नहीं है इसलिए आज के स्नेह के दिन सबके दिल में अभी क्या है? अमृतवेले से लेके आज दिल में बार-बार क्या आ रहा है? मेरा बाबा, मेरा बाबा, मेरा बाबा। बाप के दिल में भी है मेरे बच्चे, मेरे बच्चे, मेरे बच्चे…। तो जैसे मैजारिटी बाप की याद में रहे हैं। दिन का प्रभाव है, बापदादा ने नोट किया। स्नेह का दिन होने के कारण बार-बार सभी को मेरा बाबा, मेरा बाबा काफी समय याद रहा है। ऐसे है? इसमें हाथ उठाओ। आज के दिन की बात है। मेरा बाबा याद रहा? और कुछ याद रहा? नहीं। ऐसे ऐसे हाथ कर रहे हैं, बहुत अच्छा। तो अगर रोज़ बार-बार चेक करो, संगम का हर दिन बाप के स्नेह का दिन है। जैसे आज विशेष दिन होने के कारण ज्यादा याद रहा ना! ऐसे सदा अमृतवेले यह स्मृति में रखो कि यह संगम का एक-एक दिन कितना महान है। एक छोटे से जन्म में 21 जन्म की प्राप्ति गैरन्टी है। तो एक-एक दिन का कितना महत्व हुआ! कहाँ 21 जन्म और कहाँ यह छोटा सा एक जन्म।
तो बापदादा आज आप बच्चों से बर्थ डे की यही सौगात चाहते हैं। देंगे सौगात? देंगे? हाथ उठाओ। दृढ़ निश्चय का हाथ। देखेंगे, करेंगे नहीं। करना ही है। कुछ भी हो जाए त्याग तो त्याग। यह त्याग नहीं लेकिन भाग्य है। तो आज का दिन अगर सही हाथ उठाया तो महत्व का दिन है ना! अभी से आपके चेहरे पर व्यर्थ की समाप्ति और सदा स्मृति स्वरूप की झलक चेहरे और चलन में आनी चाहिए। यह माया के जो शब्द हैं ना! क्या, क्यों, कब, कैसे… यह समाप्त हो जाएं तब चेहरा और चलन सेवा करेंगे। अभी ज्यादा प्रभाव भाषणों का है। बापदादा खुश है भाषण बहुत अच्छे कर रहे हैं लेकिन दिन प्रतिदिन अभी जैसे यह भाषणों द्वारा, वाणी द्वारा सेवा का उमंग अच्छा रखा और सफलता भी पाई। ऐसे ही अभी समय प्रमाण आपकी ज्यादा सेवा चेहरे और चलन से होगी। उसका अभ्यास, जैसे भाषणों का अभ्यास करते-करते होशियार हो गये हो ना! ऐसे अभी चेहरे और चलन से किसी को खुशी का वरदान दो, यह अभ्यास करो क्योंकि समय कम मिलेगा इसलिए समय और संकल्प का महत्व रखते हुए आगे बढ़ते जाओ। होना सब अचानक है इसलिए बर्थ डे तो याद रहता है ना! बर्थ डे आना है, आना है कितना समय याद आया? बापदादा आना है, आना है, मिलना है यह कितने समय से याद रखा? अब यह संकल्प करो, दृढ़ता से व्यर्थ समय और संकल्प को समाप्त करना है। मेरा बाबा, मेरा बाबा दिल में समाते, कहना अलग चीज़ है लेकिन दिल में समाना, दिल की बात कभी भूलती नहीं है। मुख की बात भूल सकती है लेकिन दिल की बात अच्छी या व्यर्थ दोनों नहीं भूलती हैं। तो आज बापदादा को सौगात तो दी ना! दो-दो हाथ उठाओ। अरे वाह! यह फोटो निकालो। बापदादा सिर्फ हाथ को नहीं देखते, बापदादा आपके दिल को देख रहे हैं।
तो आज के दिन की सौगात अपने को भी दी और बाप को भी दी। अगर आपका व्यर्थ समय और संकल्प बच गया तो आपका दिन कैसे बीतेगा? सदा खुशनसीब और खुशनुमा बन जायेंगे। तो अभी अमृतवेले बापदादा से मिलन मनाने के बाद यह संकल्प रोज़ स्मृति में लाना और सारे दिन में बीच-बीच में चेक करना। बापदादा टाइम फिक्स नहीं करते लेकिन आप अपना टाइम फिक्स करो। बीच-बीच में चेक करना तो जो बापदादा के आगे बर्थ डे पर वायदा किया, वह वायदा निभा रहे हैं? यह अपने आपसे चेक करना। चाहते तो सभी हैं। बापदादा आज शक्लें देख रहे हैं कि चाहते हैं हाँ करेंगे, करेंगे, करेंगे लेकिन यह वेस्ट आ जाता है ना तो बाप से किया हुआ वायदा भी भुला देता है। तो वेस्ट खत्म। अभी भी एक मिनट पावरफुल आत्मा बन संकल्प करो वेस्ट को खत्म करना ही है। (बापदादा ने ड्रिल कराई) अच्छा।
बापदादा एक भी बच्चे को अपने समान बनाने के बिना रहने नहीं चाहता। प्यार है ना! देखो प्यार की निशानी आज का दिन है। बाप और बच्चे का सारे कल्प में ऐसा दिन नहीं होता जो बाप और बच्चे का जन्म ही एक दिन हो। बाप का एक-एक बच्चे से दिल का प्यार है कि मेरा बच्चा, परमात्मा का बच्चा, जो संकल्प करो वह संकल्प सफल हो। एक-एक संकल्प में शक्ति हो, कहना और करना एक हो। कहा अर्थात् हुआ। शुद्ध संकल्प हो। तो व्यर्थ स्वत: ही खत्म हो जायेगा क्योंकि एडवांस पार्टी डेट चाहती है। तो आपकी जो बड़ी-बड़ी दादियां हैं, बड़े-बड़े भाई हैं, उन्हों से प्यार तो है ना। कितना याद करते हैं, दादी को, दीदी को, चन्द्रमणि को। सभी के नाम लेते जाओ। सभी को याद करते हैं। तो वह जो चाहती हैं वह करके बताओ ना। तो आज का संकल्प क्या रहा? कहना और करना एक हो। ठीक है! तो आज चारों ओर के बच्चों को बापदादा बर्थ डे की सौगात यही दे रहे हैं “कहना और करना” एक करो। दृढ़ता की सौगात आज के दिन की बापदादा हर बच्चे को दे रहे हैं। शुभ कार्य दृढ़ता से सफल करो।
बाकी जो भी आज पहले बारी आये हैं, वह उठो। हाथ हिलाओ। बापदादा आने वाले बच्चों को आ गये, जान लिया मेरा बाबा, इसकी बहुत-बहुत मुबारक दे रहे हैं। बापदादा को खुशी है फिर भी हलचल जो होनी है उसके पहले पहुंच गये हो, इसकी मुबारक हो। अभी आने वाला हर बच्चा यह संकल्प करो दृढ़, साधारण संकल्प नहीं, दृढ़ संकल्प करो कि तीव्र पुरुषार्थी बनना ही है। तीव्र, साधारण नहीं। तो आने वाले अपने राज्य में आ जायेंगे इसलिए साधारण संकल्प का समय पूरा हुआ। अभी तीव्र पुरुषार्थ का समय है, चांस है, फिर भी चांस लेने वाले चांसलर तो बन गये। तो बापदादा हर बच्चे को देख खुश है और हर बच्चे को कह रहे हैं कि तीव्र पुरुषार्थ करेंगे तो साथ जायेंगे, साथ रहेंगे। तो मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।
बापदादा दिल से चाहते हैं एक बच्चा भी पीछे नहीं रह जाए। साथ में चले। पीछे-पीछे आने वाले अच्छे नहीं लगते हैं। साथ हो, हाथ हो, चलना है ना घर में। रिटर्न जरनी है। उसके लिए जैसे ब्रह्मा बाप फरिश्ता है, ऐसे फालो फादर। साकार में होते फरिश्ता, जिसको भी देखो फरिश्ता ही फरिश्ता, तब गेट खुल जायेगा। अच्छा। सभी बच्चों को सदा खुशनसीब, खुशनुमा स्वरूप की यादप्यार।
| वरदान:- | अपने एकाग्र स्वरूप द्वारा सूक्ष्म शक्ति की लीलाओं का अनुभव करने वाले अन्तर्मुखी भव एकाग्रता का आधार अन्तर्मुखता है। जो अन्तर्मुखी हैं वे अन्दर ही अन्दर सूक्ष्म शक्ति की लीलाओं का अनुभव करते हैं। आत्माओं का आह्वान करना, आत्माओं से रूहरिहान करना, आत्माओं के संस्कार स्वभाव को परिवर्तन करना, बाप से कनेक्शन जुड़वाना – ऐसे रूहों की दुनिया में रूहानी सेवा करने के लिए एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ, इससे सर्व प्रकार के विघ्न स्वत: समाप्त हो जायेंगे। |
| स्लोगन:- | सर्व प्राप्तियों को स्वयं में धारण कर विश्व की स्टेज पर प्रत्यक्ष होना ही प्रत्यक्षता का आधार है। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
कोई रोज़ आपकी ग्लानि करे, वो सदा अकल्याण करे, आप उससे किनारा करने के बजाए उसका भी कल्याण करते रहो, यही आप ज्ञानी तू आत्मा का कर्तव्य है। जैसे बाप की महिमा में विशेष रहमदिल का गुण गाया जाता है। चाहे देश में, चाहे विदेश में बाप के आगे जायेंगे तो रहमदिल, मर्सीफुल कहेंगे। तो आप सभी भी मास्टर रहमदिल हो। ऐसे रहमदिल बन सब पर उपकार करो।
दृढ़ता की चाबी से सफलता
कहना और करना एक करो!
1. आज के मंथन का मुख्य संदेश
“घर का गेट खोलने के लिए बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा देह-अभिमान के ‘मैं’ का त्याग करो;दृढ़ता द्वारा कहना और करना एक कर सफलमूर्त बनो।”
इस मुरली में बापदादा के संदेश को तीन मुख्य पुरुषार्थों में समझ सकते हैं:
– व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय का त्याग — केवल संकल्प करना नहीं, उसे दृढ़ता से निभाना।
– देह-अभिमान के सूक्ष्म ‘मैं’ का त्याग — “मैं ही ठीक हूँ”, “मैंने किया”, “मेरे कारण हुआ” जैसी भावना को पहचानना।
– कहना और करना एक करना — बाबा से किया हुआ वायदा अपने चेहरे, चलन और दैनिक कर्मों में दिखाना।
2. मुख्य बिंदु
मुरली से मंथन
बिंदु 1 — दृढ़ता सफलता की चाबी है
मुरली में स्पष्ट कहा गया है कि संकल्प करना और दृढ़ संकल्प करना अलग-अलग हैं। बार-बार संकल्प करके भी यदि हम उसे निभा नहीं पाते, तो दृढ़ता की कमी पर ध्यान देना चाहिए।
बिंदु 2 — व्यर्थ संकल्प और समय बचाओ
दिन में बीच-बीच में स्वयं को चेक करें: मेरा समय कहाँ जा रहा है? क्या मेरे संकल्प आत्मिक उन्नति में सहायक हैं या व्यर्थ चल रहे हैं?
बिंदु 3 — देह-अभिमान के सूक्ष्म ‘मैं’ को पहचानो
“मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है” की स्मृति के साथ उस सूक्ष्म अहंकार को भी पहचानना है जो अपनी राय, अपनी विशेषता या अपने किए हुए कार्य को ही सबसे श्रेष्ठ मानता है।
बिंदु 4 — फॉलो फादर
मुरली में ब्रह्मा बाप को फॉलो करने और फरिश्ता बनने की प्रेरणा दी गई है। इसका व्यावहारिक मंथन है—अपने व्यवहार में हल्कापन, आत्मिक स्मृति और श्रेष्ठ संस्कार लान
बिंदु 5 — अपकारी पर भी उपकार
मुरली के अव्यक्त इशारे में कहा गया है कि कोई ग्लानि करे या अकल्याण करे, फिर भी ज्ञानी आत्मा का कर्तव्य कल्याण की भावना रखना है। इसका अर्थ अनुचित व्यवहार को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अपनी शुभभावना और मर्यादा बनाए रखना है।
3. अन्य मुरलियों में इसी विषय पर क्या कहा गया है?
नीचे की तुलना ब्रह्माकुमारीज़ के मुरली पोर्टल पर उपलब्ध अन्य दिनांकित अव्यक्त मुरलियों से की गई है। ये आज के पाठ से संबंधित अध्ययन-बिंदु हैं, आज की मुरली के अतिरिक्त मूल वचन नहीं।
1.
18 जनवरी 1996 — दृढ़ता ही सफलता की चाबी
इस मुरली में दृढ़ता को “गोल्डन चाबी” कहा गया है।
आज की मुरली से संबंध: 25 अक्टूबर के अध्ययन-पाठ में भी केवल संकल्प करने के बजाय उसे दृढ़ता से निभाने पर बल है।
स्रोत: 18 जनवरी 1996 की मुरली पढ़ें
2.
7 मार्च 1993 — व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करने की विधि
इस मुरली में मन को मन्सा, वाचा और कर्मणा सेवा में व्यस्त रखने को व्यर्थ संकल्प घटाने की एक विधि बताया गया है।
हिंदी Avyakt Murli
आज की मुरली से संबंध: केवल व्यर्थ विचारों को रोकने की कोशिश नहीं, बल्कि मन को श्रेष्ठ और उपयोगी कार्य में लगाना भी आवश्यक है।
स्रोत: 7 मार्च 1993 की मुरली पढ़ें
3.
15 दिसंबर 2006
सोचा और किया, दोनों एक हों
इस मुरली में केवल सोचने तक सीमित न रहने, बल्कि समर्थ स्मृति को स्वरूप में लाने तथा व्यर्थ संकल्प, बोल, कर्म और समय को समाप्त करने की प्रेरणा है।
आज की मुरली से संबंध: बाबा से किया हुआ वायदा दैनिक जीवन में दिखाई देना चाहिए। विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता का अभ्यास करना है।
स्रोत: 15 दिसंबर 2006 की मुरली पढ़ें
4.
2 नवंबर 2004 — अपकारी पर भी उपकार
इस मुरली का शीर्षक है: “स्व-उपकारी बन अपकारी पर भी उपकार करो।”
आज की मुरली से संबंध: किसी के नकारात्मक व्यवहार के कारण स्वयं की शुभभावना समाप्त न होने देना। उपकार का अर्थ अनुचित व्यवहार सहते रहना नहीं, बल्कि विवेक और मर्यादा बनाए रखते हुए कल्याण की भावना रखना है।
स्रोत: 2 नवंबर 2004 की मुरली पढ़ें
तुलनात्मक निष्कर्ष
इन मुरलियों के आधार पर चार अभ्यास उभरते हैं: दृढ़ संकल्प, व्यर्थ की बचत, विचार-वाणी-कर्म में एकरूपता और दूसरों के प्रति शुभभावना। यह आज के पाठ का तुलनात्मक मंथन है, न कि अलग-अलग मुरलियों को एक ही मूल पाठ मानना।
4. छोटे प्रश्न–उत्तर (Short Q&A)
प्रश्न 1. घर का गेट खोलने की चाबी क्या बताई गई है?
उत्तर: बेहद की वैराग्य वृत्ति और देह-अभिमान के सूक्ष्म ‘मैं’ का त्याग।
प्रश्न 2. दृढ़ता को सफलता की चाबी क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि केवल संकल्प करना पर्याप्त नहीं; संकल्प को निभाना भी आवश्यक है।
प्रश्न 3. व्यर्थ समय और संकल्प को समाप्त करने का उपाय क्या है?
उत्तर: दिन में बीच-बीच में स्वयं को चेक करना और मन को श्रेष्ठ कार्य में लगाना।
प्रश्न 4. देह-अभिमान का सूक्ष्म ‘मैं’ किस रूप में दिखाई देता है?
उत्तर: “मैं ही ठीक हूँ”, “मैंने ही किया” या अपनी विशेषता को केवल अपना मानने की भावना में।
प्रश्न 5. ‘कहना और करना एक’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: जो संकल्प और वायदा किया है, उसे अपने व्यवहार और कर्म में उतारना।
प्रश्न 6. ‘फॉलो फादर’ से क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: ब्रह्मा बाप के समान बनने का पुरुषार्थ करना और अपने चेहरे तथा चलन से श्रेष्ठता दिखाना।
प्रश्न 7. मुरली के अनुसार सेवा केवल भाषण से होती है?
उत्तर: नहीं। पाठ में चेहरे और चलन द्वारा खुशी देने तथा सेवा करने के अभ्यास पर भी बल है।
प्रश्न 8. अपकारी पर उपकार कैसे करें?
उत्तर: अपनी शुभभावना बनाए रखें और यथासंभव कल्याणकरें, साथ ही उचित सीमाएँ और मर्यादा भी रखें।
प्रश्न 9. क्या एक बार संकल्प कर लेना पर्याप्त है?
उत्तर: पाठ के अनुसार संकल्प में दृढ़ता और निरंतरता आवश्यक है।
प्रश्न 10. आज का व्यावहारिक पुरुषार्थ क्या हो?
उत्तर: एक व्यर्थ आदत पह–चानकर उसे कम करना और किसी एक श्रेष्ठ संकल्प को दिनभर निभाना।
डिस्क्लेमर – मुरली मंथन
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं के अध्ययन, मनन और व्यक्तिगत आत्मिक उन्नति के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, ग्रंथ, व्यक्ति या परंपरा की आलोचना करना नहीं है। इस वीडियो में दिए गए मंथन, उदाहरण और प्रश्न–उत्तर मूल मुरली के संदेश को सरलता से समझने के लिए तैयार किए गए हैं। अन्य दिनांकित मुरलियों से की गई तुलना अध्ययन की सुविधा के लिए है; इसे मूल मुरली के अतिरिक्त आधिकारिकमहावाक्य न माना जाए।आध्यात्मिक शब्दों और मान्यताओं को आध्यात्मिक संदर्भ में समझें। दर्शक अपने विवेक के अनुसार इन विचारों पर मनन करें और इन्हें दैनिक जीवन में सकारात्मक व्यवहार, आत्म-अनुशासन तथा दूसरों के प्रति सम्मान के साथ अपनाएँ।
आत्मचिंतन
आज स्वयं से पूछें:
1. क्या मैं जो संकल्प करता हूँ, उसे दृढ़ता से पूरा करता हूँ?
2. मेरे दिन का कितना समय व्यर्थ विचारों में चला जाता है?
3. क्या मेरे व्यवहार में “मैं ही ठीक हूँ” की भावना आती है?
4. आज मैं कौन-सा एक वायदा अपने कर्मों से सिद्ध करूँगा?
समापन संकल्प: “मैं दृढ़ता की शक्ति से व्यर्थ संकल्प और समय को बचाऊँगा। जो श्रेष्ठ संकल्प करूँगा, उसे अपने व्यवहार में उतारूँगा। अपने चेहरे, चलन और कर्मों से शांति, खुशी और शुभभावना का अनुभव कराऊँगा।”
📝 1002. अव्यक्त मुरली |25-10-26 रिवाइज़ 19-02-2012
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
