16.8.1990
मेरे-पन को मिटाने की विधि है त्याग और वैराग्य
आप सभी का शुभ संकलप और समाचार लेते हुए जैसे ही बाबा के पास मैं पहुँची तो बाबा सामने थोड़ा दूरी पर खड़े थे और बाबा के हाथ में दो मालाएँ थीं। मैं दूर ही खड़ी थी। एक माला राइट हाथ में थी, दूसरी माला लेफ्ट हाथ में थी। जो माला लेफ्ट हाथ में थी वह बहुत रंग-बिरंगी चमक रही थी और वह बहुत सुन्दर आकर्षण वाली हीरों की माला थी, लेकिन जो माला राइट हाथ में थी उसमें चमक नहीं थी। बाबा ने दूर से ही दिखाया। बाबा ने पूछा – दोनों मालाओं में से तुमको कौन-सी माला पसन्द है? मैं समझ गई कि बाबा पूछता है तो ज़रूर इसमें भी कुछ राज़ है। में मुसकरा भी रही थी और सोच भी रही थी कि इन दो मालाओं का राज़ क्या है? हमने कहा – राइट हैण्ड वाली माला अच्छी है। फिर हम थोड़ा आगे गई तो क्या देखा – राइट हैण्ड वाली माला थी रीयल रूद्राक्ष की माला। वह भल चमकती नहीं थी, लेकिन थी मूल्यवान। वह रूद्राक्ष की माला राइट हैण्ड में थी। दूसरे हाथ में चमकती हुई माला थी।बाबा ने कहा- बच्ची, आज बाबा डबल माला देख रहे थे। हमने कहा बाबा, इसमें ज़रूर कुछ रहस्य होगा! बाबा ने कहा – माला हाथ में लेकर देखो। फिर हमने जब उस माला को अच्छी रीति देखा तो रूद्राक्ष वाली माला का जो दाना था उसमें हर एक दाने पर लिखा हुआ था- मेरा बाबा, विश्व-कल्याणकारी बाबा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा। हर दाने पर मेरा शब्द पहले था। हर एक दाने पर इसी प्रकार बाबा की महिमा का शब्द था। दूसरी माला में भिन्न-भिन्न लिखत थी – मेरा मान, मेरा शान, मेरा स्थान, मेरा वीआईपी., मेरा साधन, मेरा जिज्ञासु…। इसी प्रकार ‘मेरा-मेरा’ की माला थी और बहुत वैराइटी थी। मेरा नाम, मेरा मान, मेरी बुद्धि…। फिर बाबा ने कहा -बताओ कौन-सी माला पसंद है? बाबा आज यह लिस्ट निकाल रहा था कि हर बच्चे के अन्दर मेरा-मेरा कितने प्रकार का है। इसलिए तुमको आते ही यह दृश्य दिखाया। मैं तो साक्षी हो देख रही थी।फिर बाबा ने कहा – बच्चों से अब तक मेरा-पन मिटा नहीं है। हमने पूछा- कितने परसेन्ट थी? तो बाबा ने कहा – अभी नथिग नहीं है लेकिन समथिंग है। इतना ही जवाब दिया। हमने कहा – बाबा, अभी इसके लिए ही तो भट्ठी हो रही है ना, तो ज़रूर समथिंग से नथिंग हो जायेगा। बाबा बहुत मीठा मुस्करा रहा था। जैसे एक-एक रत्न को देख मुस्करा रहा था और ऐसा लग रहा था जैसेअव्यक्त संदेश
कि बाबा वहाँ था ही नहीं। मैने कहा बाबा, आप कहीं चले गये क्या? बाबा ने कहा- हम बच्चों को इमर्ज़ कर देख रहा था।
फिर बाबा ने कहा- नथिंग तो होना है लेकिन इसके लिए बड़े वैराग्य और त्याग की दरकार है। सबसे बड़ा त्याग है- अपनापन का त्याग, बॉडी-कान्सेस का अपना-पन। मेरा-मेरा जो आता है – मैं ही कुछ करूँ, मेरी बुद्धि अच्छी है। अपने-पन का जो भान आता है, वह मेरा-मेरा उत्पन्न करता है। वह अपना-पन बिल्कुल ही त्याग हो जाए, इसमें मेहनत लगती है। पहले जब आते हैं तो पहले अपना-पन व मेरा-पन नहीं होता। पहले नशे में, निश्चय में चूर होते हैं, उसमें लवलीन रहते हैं। फिर धीरे-धीरे मेरा-मेरा-पन इमर्ज़ होता है। दूसरे को भी अपने-पन से देखें व समझें जैसे मैं हूँ, वैसे यह भी एक है। मेरा नाम हो व उनका हो लेकिन नाम तो इंस्टीट्युशन का है, नाम तो बाबा का है। ऐसी-ऐसी बातें जो पीछे आती हैं वह त्याग को खत्म कर देती हैं। इसलिए इसका वैराग्य और त्याग चाहिए। वैराग्य के बिना त्याग नहीं हो सकता और त्याग का भाग्य न मिले, यह तो होता नहीं। किसको प्रत्यक्ष मिलता, किसको थोड़ी देरी से मिलता। बाबा ने कहा नथिंग होना ही है लेकिन जब हर एक के मन में वैराग्य के त्याग की लहर उत्पन्न हो, तब ही नथिंग होगा।
हमने कहा – बाबा, हम लोगों का एक संगठन पूरा हुआ, अब दूसरा हो रहा है। हमने कहा -आपको हमारे संगठन से खुशबू तो आ रही है ना! बाबा ने कहा- हाँ, एक खुशबू आ रही है। इच्छा की खुशबू सभी में है लेकिन हमें अच्छा बनना ही है, इसमें नम्बरवार है, लेकिन होना है। हमने कहा – कब होगा? बाबा ने कहा- जब इच्छा और अच्छा का बैलेंस हो जायेगा तब फिर हो ही जायेगा। बाबा ने कहा- यह पक्का संकल्प करें कि कोई भी हद की इच्छा नहीं रखनी है। एक ही इच्छा रहे – जो बाबा की इच्छा, वह मेरी इच्छा। बाबा की इच्छा सर्विस प्रति क्या है, हमारे प्रति क्या है? जो बाबा की इच्छा, वही हमारा अच्छा हो, इसमें समानता हो। यह इच्छा ही ‘समथिंग’ को समाप्त कर ‘नथिंग’ कर देगी। तो पहले वैराग्य फिर त्याग होगा। हद की इच्छाएँ समाप्त कर जो बाबा की इच्छा, वह मेरी इच्छा रहे तो अच्छा बन ही जायेंगे।
अव्यक्त दिव्य संदेश
16 अगस्त 1990
मेरे-पन को मिटाने की विधि है — त्याग और वैराग्य
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बाबा ने दो मालाओं के माध्यम से बच्चों को मेरे-पन का रहस्य समझाया। एक माला रुद्राक्ष की थी, जिसमें बाबा की महिमा के शब्द थे—“मेरा बाबा, विश्व-कल्याणकारी बाबा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा।” दूसरी माला में “मेरा मान, मेरा शान, मेरा स्थान, मेरा वी.आई.पी., मेरा साधन, मेरा जिज्ञासु” जैसे शब्द लिखे थे।
बाबा ने समझाया कि बच्चों के अन्दर अभी भी किसी-न-किसी रूप में मेरा-पन शेष है। इसे समाप्त करने के लिए बड़े वैराग्य और त्याग की आवश्यकता है। सबसे बड़ा त्याग है—अपनेपन और देहभान के अपने-पन का त्याग।
इस संदेश की मुख्य शिक्षा है—पहले वैराग्य, फिर त्याग; हद की इच्छाओं को समाप्त करके बाबा की इच्छा को अपनी इच्छा बनाना।
1. दो मालाओं का रहस्य
बाबा के हाथों में दो मालाएँ थीं। एक माला राइट हैण्ड में थी, जो चमकती नहीं थी, लेकिन मूल्यवान थी। दूसरी माला लेफ्ट हैण्ड में थी, जो रंग-बिरंगी और आकर्षक हीरों की माला थी।
जब बाबा ने पूछा कि कौन-सी माला पसन्द है, तो पहले राइट हैण्ड वाली माला पसन्द की गई। पास जाकर देखने पर पता चला कि वह वास्तविक रुद्राक्ष की माला थी।
बाबा ने बताया कि वे बच्चों के अन्दर के मेरे-पन की स्थिति को दिखा रहे थे।
मुख्य शिक्षा: बाहरी चमक से अधिक महत्त्व आन्तरिक मूल्य और बाबा की स्मृति का है।
2. बाबा की माला और मेरे-पन की माला
रुद्राक्ष की माला के प्रत्येक दाने पर बाबा की महिमा से जुड़े शब्द लिखे थे, जैसे—
- मेरा बाबा
- विश्व-कल्याणकारी बाबा
- प्यारा बाबा
- मीठा बाबा
दूसरी माला में अनेक प्रकार के मेरे-पन को दर्शाया गया था, जैसे—
- मेरा मान
- मेरा शान
- मेरा स्थान
- मेरा वी.आई.पी.
- मेरा साधन
- मेरा जिज्ञासु
- मेरा नाम
- मेरी बुद्धि
बाबा ने इस दृश्य द्वारा बच्चों को अपने अन्दर छिपे हुए विभिन्न प्रकार के मेरे-पन की पहचान कराई।
मुख्य शिक्षा: अपने अन्दर यह जाँच करना है कि मेरा-पन किन-किन रूपों में प्रकट होता है।
3. मेरे-पन को समाप्त करने की आवश्यकता
बाबा ने कहा कि बच्चों से अभी तक मेरा-पन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। जब इसके प्रतिशत के बारे में पूछा गया, तो बाबा ने कहा—“अभी नथिंग नहीं है, लेकिन समथिंग है।”
अर्थात् अभी कुछ-न-कुछ मेरे-पन शेष है। बाबा चाहते हैं कि यह “समथिंग” समाप्त होकर “नथिंग” हो जाए।
मुख्य शिक्षा: अपने अन्दर बचे हुए मेरे-पन को पहचानकर उसे समाप्त करने का पुरुषार्थ करना है।
4. सबसे बड़ा त्याग — अपनेपन का त्याग
बाबा ने समझाया कि सबसे बड़ा त्याग अपनेपन का त्याग है। देहभान का अपने-पन ही अनेक प्रकार के मेरे-पन को जन्म देता है।
जब मन में यह भाव आता है कि “मैं ही कुछ करूँ”, “मेरी बुद्धि अच्छी है” या “मेरा नाम होना चाहिए”, तब अपनेपन का भाव बढ़ने लगता है।
मुख्य शिक्षा: अपने कर्तृत्व, बुद्धि, नाम और मान के प्रति उत्पन्न होने वाले अहंकार को पहचानना है।
5. आरम्भ का नशा और बाद में उभरता मेरा-पन
बाबा ने बताया कि जब बच्चे आरम्भ में आते हैं, तब वे नशे और निश्चय में चूर रहते हैं तथा बाबा के प्रेम में लवलीन रहते हैं। उस समय मेरा-पन नहीं होता।
लेकिन धीरे-धीरे “मेरा-मेरा” का भाव उभरने लगता है। व्यक्ति दूसरों को भी अपनेपन की दृष्टि से देखने लगता है और अपने नाम, मान या विशेषता को महत्त्व देने लगता है।
बाबा ने समझाया कि नाम तो इन्स्टीट्यूशन का है और नाम तो बाबा का है।
मुख्य शिक्षा: आरम्भ के निश्चय और समर्पण को बनाए रखते हुए बाद में उभरने वाले मेरे-पन से सावधान रहना है।
6. वैराग्य के बिना त्याग सम्भव नहीं
बाबा ने स्पष्ट कहा कि अपनेपन को समाप्त करने के लिए वैराग्य और त्याग चाहिए।
वैराग्य के बिना त्याग नहीं हो सकता। जब तक किसी वस्तु, मान, स्थान या इच्छा के प्रति आकर्षण बना रहता है, तब तक उसका सच्चा त्याग करना कठिन होता है।
बाबा ने कहा कि त्याग का भाग्य अवश्य मिलता है, किसी को प्रत्यक्ष और किसी को थोड़ी देरी से।
मुख्य शिक्षा: पहले मन में वैराग्य की लहर उत्पन्न करनी है, फिर त्याग सहज होगा।
7. इच्छा और अच्छा का बैलेंस
बाबा ने संगठन की खुशबू के विषय में कहा कि सभी में इच्छा की खुशबू है। अच्छा बनना है, यह भावना भी है, लेकिन इसमें बच्चे नम्बरवार हैं।
बाबा ने समझाया कि जब इच्छा और अच्छा का बैलेंस हो जाएगा, तब परिवर्तन हो जाएगा।
अर्थात् केवल अच्छा बनने की इच्छा पर्याप्त नहीं है; उस इच्छा को जीवन में उतारने के लिए सही पुरुषार्थ और त्याग भी आवश्यक है।
मुख्य शिक्षा: अच्छा बनने की इच्छा को व्यावहारिक परिवर्तन के साथ जोड़ना है।
8. बाबा की इच्छा ही मेरी इच्छा
बाबा ने बच्चों को पक्का संकल्प करने के लिए कहा कि कोई भी हद की इच्छा नहीं रखनी है।
एक ही इच्छा रहनी चाहिए—
“जो बाबा की इच्छा, वही मेरी इच्छा।”
बाबा की इच्छा सेवा के प्रति क्या है और हमारे प्रति क्या है, इसे समझकर अपनी इच्छा को उसके समान बनाना है।
जब बाबा की इच्छा और अपनी इच्छा में समानता होगी, तब हद की इच्छाएँ समाप्त होने लगेंगी।
मुख्य शिक्षा: अपनी व्यक्तिगत हद की इच्छाओं के स्थान पर बाबा की इच्छा को प्राथमिकता देनी है।
9. समथिंग से नथिंग बनने की विधि
बाबा ने समझाया कि बच्चों के अन्दर जो “समथिंग” अर्थात् कुछ-न-कुछ मेरे-पन और हद की इच्छाएँ शेष हैं, उन्हें समाप्त करना है।
इसके लिए पहले वैराग्य की वृत्ति बनानी है और फिर त्याग करना है। जब हद की इच्छाएँ समाप्त होकर बाबा की इच्छा ही अपनी इच्छा बन जाएगी, तब अच्छा बनना सहज होगा।
मुख्य शिक्षा: मेरे-पन को समाप्त करके बाबा की इच्छा के अनुसार चलना ही परिवर्तन की विधि है।
भाग 2 — 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
खण्ड A — दो मालाओं का रहस्य
प्रश्न 1. बाबा के हाथों में कितनी मालाएँ थीं?
उत्तर: दो मालाएँ।
प्रश्न 2. राइट हैण्ड वाली माला किसकी थी?
उत्तर: वास्तविक रुद्राक्ष की माला।
प्रश्न 3. लेफ्ट हैण्ड वाली माला कैसी थी?
उत्तर: रंग-बिरंगी, चमकदार और आकर्षक हीरों की माला।
प्रश्न 4. रुद्राक्ष की माला के दानों पर क्या लिखा था?
उत्तर: बाबा की महिमा से जुड़े शब्द।
प्रश्न 5. दूसरी माला में किस प्रकार के शब्द लिखे थे?
उत्तर: मेरे-पन को दर्शाने वाले शब्द।
प्रश्न 6. बाबा ने दो मालाओं द्वारा क्या दिखाया?
उत्तर: बच्चों के अन्दर बाबा की स्मृति और मेरे-पन का रहस्य।
खण्ड B — मेरे-पन की पहचान
प्रश्न 7. बाबा ने मेरे-पन की स्थिति के बारे में क्या कहा?
उत्तर: अभी नथिंग नहीं है, लेकिन समथिंग है।
प्रश्न 8. मेरे-पन का एक उदाहरण क्या है?
उत्तर: मेरा मान।
प्रश्न 9. मेरे-पन का दूसरा उदाहरण क्या है?
उत्तर: मेरा नाम।
प्रश्न 10. “मेरी बुद्धि अच्छी है” किस भाव को दर्शाता है?
उत्तर: अपनेपन और अहंकार के भाव को।
प्रश्न 11. बाबा के अनुसार सबसे बड़ा त्याग कौन-सा है?
उत्तर: अपनेपन का त्याग।
प्रश्न 12. देहभान का अपने-पन किसे जन्म देता है?
उत्तर: अनेक प्रकार के मेरे-पन को।
खण्ड C — त्याग और वैराग्य
प्रश्न 13. मेरे-पन को समाप्त करने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: बड़े वैराग्य और त्याग की आवश्यकता है।
प्रश्न 14. वैराग्य के बिना क्या नहीं हो सकता?
उत्तर: सच्चा त्याग।
प्रश्न 15. बाबा के अनुसार त्याग का भाग्य मिलता है या नहीं?
उत्तर: त्याग का भाग्य मिलता है।
प्रश्न 16. आरम्भ में बच्चे किसमें लवलीन रहते हैं?
उत्तर: बाबा के प्रेम, नशे और निश्चय में।
प्रश्न 17. धीरे-धीरे कौन-सा भाव उभरने लगता है?
उत्तर: मेरा-मेरा का भाव।
प्रश्न 18. बाबा ने नाम के विषय में क्या समझाया?
उत्तर: नाम तो इन्स्टीट्यूशन का है और नाम तो बाबा का है।
खण्ड D — इच्छा और अच्छा
प्रश्न 19. संगठन में किसकी खुशबू थी?
उत्तर: इच्छा की खुशबू।
प्रश्न 20. अच्छा बनने की भावना बच्चों में कैसी थी?
उत्तर: सभी में थी, लेकिन नम्बरवार।
प्रश्न 21. परिवर्तन कब होगा?
उत्तर: जब इच्छा और अच्छा का बैलेंस हो जाएगा।
प्रश्न 22. बच्चों को किस प्रकार की इच्छाएँ नहीं रखनी हैं?
उत्तर: हद की इच्छाएँ।
प्रश्न 23. बाबा ने कौन-सा पक्का संकल्प करने को कहा?
उत्तर: कोई भी हद की इच्छा नहीं रखनी है।
प्रश्न 24. बाबा की इच्छा के प्रति हमारा भाव क्या होना चाहिए?
उत्तर: जो बाबा की इच्छा, वही मेरी इच्छा।
खण्ड E — समर्पण और परिवर्तन
प्रश्न 25. बाबा की इच्छा को अपनी इच्छा बनाने के लिए क्या जानना है?
उत्तर: सेवा के प्रति और अपने प्रति बाबा की इच्छा क्या है।
प्रश्न 26. “समथिंग” को “नथिंग” कैसे करना है?
उत्तर: वैराग्य और त्याग द्वारा मेरे-पन को समाप्त करके।
प्रश्न 27. त्याग से पहले क्या आवश्यक है?
उत्तर: वैराग्य।
प्रश्न 28. हद की इच्छाएँ समाप्त होने पर क्या होगा?
उत्तर: बाबा की इच्छा ही अपनी इच्छा रहेगी और अच्छा बनना सहज होगा।
प्रश्न 29. अपनेपन के त्याग में किस बात पर ध्यान देना है?
उत्तर: देहभान, मान, नाम और अपनी विशेषता के अहंकार पर।
प्रश्न 30. इस संदेश की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: वैराग्य द्वारा हद की इच्छाओं और मेरे-पन का त्याग करके बाबा की इच्छा के समान बनना।
भाग 3 — आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मेरे अन्दर “मेरा-मेरा” का भाव किसी रूप में शेष है?
- क्या मैं अपने नाम, मान, स्थान और बुद्धि को अधिक महत्त्व देता हूँ?
- क्या मैं दूसरों को भी अपनेपन की दृष्टि से देखता हूँ?
- क्या मेरा आरम्भ का निश्चय और समर्पण आज भी कायम है?
- क्या मैं वैराग्य के बिना त्याग करने का प्रयास करता हूँ?
- क्या मेरी अच्छा बनने की इच्छा व्यावहारिक परिवर्तन में दिखाई देती है?
- क्या मैं हद की इच्छाओं को पहचानकर समाप्त कर रहा हूँ?
- क्या मैं अपनी इच्छा को बाबा की इच्छा के समान बना रहा हूँ?
- आज मैं अपने किस एक मेरे-पन का त्याग करने का संकल्प करूँगा?
- क्या मेरा लक्ष्य “समथिंग” को समाप्त करके “नथिंग” बनना है?
निष्कर्ष
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बाबा ने दो मालाओं के माध्यम से स्पष्ट किया कि बच्चों के अन्दर बाबा की स्मृति के साथ-साथ अनेक प्रकार का मेरे-पन भी रह सकता है। “मेरा मान, मेरा नाम, मेरा स्थान, मेरी बुद्धि” जैसे भाव अपनेपन को बढ़ाते हैं।
बाबा की शिक्षा है कि पहले वैराग्य की वृत्ति उत्पन्न करो, फिर त्याग करो। हद की इच्छाओं को समाप्त करके बाबा की इच्छा को अपनी इच्छा बनाना है। जब इच्छा और अच्छा का बैलेंस होगा, तब मेरे-पन का “समथिंग” समाप्त होकर “नथिंग” बनेगा।
आज का दृढ़ संकल्प:
मैं अपने अन्दर के मेरे-पन को पहचानकर उसका त्याग करूँगा। देहभान, मान, नाम और हद की इच्छाओं से वैराग्य रखूँगा। मेरी एक ही श्रेष्ठ इच्छा होगी—जो बाबा की इच्छा, वही मेरी इच्छा।
अस्वीकरण
यह अध्याय 16 अगस्त 1990 के उपलब्ध अव्यक्त दिव्य संदेश पर आधारित अध्ययन-सामग्री है। मुख्य बिन्दु और प्रश्न-उत्तर मूल पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में व्यवस्थित करने के लिए तैयार किए गए हैं।
📝 28. अव्यक्त दिव्य संदेश | 16.08.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
