14.8.1990
ब्रह्मा बाप समान दृष्टि में स्नेह और स्वमान समाया हो
आज अमृतवेले आप सभी की याद-प्यार लेते हए जैसे ही हम बाबा के पास पहुंची तो देखा-बह्या बाबा जैसे अपने कमरे में गद्दी पर तकिये के सहारे बैठते थे. वैसे ही बैठे थे। हम वहाँ ही बावा के पास पहुंची। बाबा मुस्कराते हुए बोले- बच्ची, आज किसको साथ में लाई हो? में मुस्करा ही रही थी। इतने में बावा ने कहा- आज अष्टमी है ना! मैने देखा यह कहते ही आठ-रत्न वद्या बाबा के सामने इमर्ज हो गये। सभी रत्नों को बाबा दृष्टि दे रहे थे। उस दृष्टि में बहुत स्वमान और स्नेह भरा हुआ था। बाबा एक-एक बच्चे को देखते हुए बोले- आओ मेरे डबल जन्म के साथी, कर्तव्य के साथी, देश के साथी और सदा साथ रहने वाले साथी बच्चे! ऐसे कहते हुए बाबा ने बच्चों का स्वागत किया और कहा कि – “देखो, ब्राह्मण जन्म में भी ब्रह्मा के जन्म साथी हो, कर्तव्य में भी साथी हो। चाहे संगमयुग सेवा के कर्त्तव्य में, चाहे भविष्य में राज्य-कर्ता के कर्तव्य में – दोनो में साथी हो। ब्रह्मा के जन्म-स्थान तथा राज्य-स्थान के भी साथी हो और परमधाम घर में भी साथी, साथ रहते हो”। बावा जैसे-जैसे यह कह रहे थे तो बाबा की दृष्टि में स्वमान और स्नेह- दोनों साथ-साथ समाये हुए थे। इसी रीति जो भी बच्चे इमर्ज थे उनके चेहरे पर भी यह दोनों लहरें दिखई दे रही थीं, उसी में ही सब खोये हुए थे।उसके बाद बाबा ने कहा – सभी को सदा साथ की बधाई हो! तो सभी मुस्कराते रहे। बाबा ने कहा – “शिव बाबा तो कृष्ण बनेगा नहीं, ब्रह्मा वावा ही बनते हैं। आज विशेष ब्रह्मा-सो-श्रीकृण का ही दिन है। ब्रह्मा बाबा अकेले कभी नहीं रहते, सदैव अपने बच्चों के साथ रहते हैं। जन्म-अष्टमी सिर्फ ब्रह्मा बाबा की नहीं है लेकिन बाबा के साथ विशेष बच्चों की भी है”। सभी मिलकर कहते लगे – बाबा, आपको जन्मदिन की बधाई हो। बाबा ने कहा आप सबको भी जन्म को बधाई हो। यह बोल ऐसे लग रहे थे जैसे सभी नैचुरल साज़ के रूप में गा रहे हैं। गीत के रूप में नहीं लेकिन साज़ के रूप में बोल रहे थे। उसके बाद बाबा ने कहा- आओ मेरे जन्म साथी, चलो। बाबा उठे और उठते हुए बाबा ने सभी को ऐसे बाहों में लिया तो एक नई सीन इमर्ज हो गई। बाबा वैसे भो ऊँचे हैं, तो ऐसे लग रहा था जैसे बाबा सभी के ऊपर ताज के रूप में है और सीन एक सुन्दर छत्र के रूप में दिखाई दे रही थी। बाबा ऐसे ही बाहों में लेते हुए आगे चले। बाबा जहाँ सबको लेकर बलेअव्यक्त संदेश-वहाँ बहुत अच्छा दृश्य देखा।जैसे छोटे बच्चों के लिए एक के ऊपर एक छोटे-छोटे झूले होते हैं, ऐसे झूले थे। वे झूले घूम नहीं रहे थे। उन झूलों के पास जब पहुँचे तो बाबा का स्वरूप और जो भी साथ में थे उन सबका स्वरूप भविष्य देवता का बन गया और सभी छोटे-छोटे राजकुमार और राजकुमारी के रूप में उन सजे हुए झूलों में बैठ गये। करीब ढाई-तीन साल के बच्चे लग रहे थे। झूला सिंहासन की रीति से पिकाक (मोर) की डिज़ाइन में सज़ा था, उसी पर सब बड़े आराम से बैठे थे। बड़ी सुन्दर सीन लग रही थी। फिर बाबा इमर्ज हुए और कहा देखो, आप मेरे भविष्य के जन्म-साथी भी हो। क्योंकि अकेला श्रीकृष्ण क्या करेगा। अकेले तो रहना ही नहीं। परमधाम में भल सबकी स्थिति अकेले की होगी लेकिन फिर तो साथ में ही रहना है। फिर बाबा ने कहा- अच्छा, अभी तुमको एक और दृश्य दिखाता हूँ। थोड़ा आगे चले तो वही छोटे-छोटे बच्चे जो झूले में थे, उन्हें राज्य-दरबार में बड़े रूप में देखा। लेकिन इस बार राज-दरबार की एक विशेषता देखी,, एक-एक के सिंहासन के पीछे बहुत सूक्ष्म 5 आकार दिखाई दे रहे थे। वह ऐसे खड़े थे जैसे बड़ों का रिगॉर्ड रखने के रूप में सेवाधारी खड़े हों। बाबा ने कहा बच्ची, जानती हो कि राज-दरबार में यह 5 कौन खड़े हैं? बाबा ने कहा कि यह है तुम्हारी दासियां 5 तत्व। यह 5 तत्व सेवाधारी बनकर तुम्हारे राज-दरबार में खड़े हैं। क्योंकि तुम बच्चे अभी भी प्रकृतिजीत और मायाजीत बनते हो। इसलिए यह प्रकृति तुम्हारी दास बनकर खड़ी है।फिर सतयुग का दृश्य समाप्त हो गया और संगम का दृश्य इमर्ज हुआ। उसमें सभी बच्चे इमर्ज हो गये। बाबा सभी बच्चों को देखते हुए बहुत मीठे टोन में बोल बोल रहे थे मेरे लाडले, सिकीलधे, नूरे रत्न बच्चे, सभी को नई दुनिया के नये जन्म की बधाई हो, बधाई हो बधाई हो….! ऐसे बहुत अच्छे साज़ की रीति से बाबा के यह बोल थे। बाबा ने सभी को बधाई देते हुए स्वमान तथा स्नेह की दृष्टि दी।उसके बाद बाबा ने कहा- बच्चे, संगठन बहुत अच्छा किया। बाबा के यह महावाक्य सदा याद रखते रहना कि जैसे अभी उमंग-उत्साह है, ऐसे सदा बना रहे। ऐसा नहीं हो कि यहाँ के वातावरण में उमंग-उत्साह हो और सेवा के स्थानों के वातावरण में या दुनिया के वातावरण में आने से फिर यह उमंग-उत्साह कम हो जाए और फिर आप लोग कहो कि सरकमस्टास ही ऐसे थे, इसलिए यह हो गया। तो बाबा ‘सरकमस्टांस’ शब्द नहीं सुनना चाहता है लेकिन ‘समथिंग न्यू’ देखना चाहता है। जोअव्यक्त संदेश
भी संकल्प करो, बोल बोलो उसमें ‘समथिंग न्य’ करना है। यह भी जन्म-अष्टमी मना कर जाना। श्रीकृष्ण के साथ जन्म-अष्टमी तो आप सबकी भी है। लेकिन इस समय तुम्हारे नये उमंग-उत्साह, दृढ़ संकल्प द्वारा यह नई जन्म-अष्टमी है। इस जन्म-अष्टमी को भूलना नहीं।बाबा ने कहा – आप पूछेंगे कि बाबा इसे अष्टमी क्यों कहते हैं? अष्टमी इसलिए कहते क्योंकि अष्ट राज्य जो बलने हैं, उसमें राज्य अधिकारी बनने के लिए ही नया जन्म ‘उमंग-उत्साह’ का है। इसलिए सभी के नये उमंग-उत्साह के दृढ़ संकल्प द्वारा नये जन्म की व जन्म-अष्टमी की मुबारक बाबा दे रहे हैं। फिर बाबा ने कहा – इसके लिए बच्चों को एक-दो के सहयोगी बन करके एक बात करनी ही होगी, वह क्या करेंगे? शुद्ध संकल्प की बात तो बाबा ने सुनाई ही है। शुद्ध संकल्प है बीज, लेकिन बीज के पहले धरनी तैयार होती है। जब तक धरनी तैयार नहीं होती तो बीज कितना भी शक्तिशाली डालो लेकिन उसका फल नहीं निकलता। श्रेष्ठ संकल्प का बीज तो डालना ही है, सेवा इस विधि से करनी ही है। लेकिन उसके पहले जैसे धरनी को तैयार करने के लिए हमेशा हल चलाया जाता है, ऐसे आजकल बच्चों की वृत्ति जो होनी चाहिए वह बेहद के वैराग्य की हो। यह बेहद की वैराग्य की हलचल का हल अपने अन्दर चलाओ तो और सभी हलचलें खत्म हो जायेंगी। अब बेहद के वैराग्य के हल से धरनी तैयार करो, फिर यह शुद्ध संकल्प का बीज बहुत जन्दी प्रत्यक्ष फल देगा। नहीं तो टाइम भी लगता और मेहनत भी करनी पड़ती है। फिर बाबा ने इस बेहद को वैराग्य वृत्ति के तीन तीन बातें बोली –
- स्वयं के देहभान या जो भी भान हों, उनसे बेहद का वैराग्य।
- हद के सेवाभाव से बेहद का वैराग्य।
- सेवा के साधनों से बेहद का वैराग्य।
बाबा ने ये तीन बातें कही। इन तीन बातों से अब अपने अन्दर पुरुषार्थ करके वैराग्य वृत्ति का हल चलाना है। बाबा ने कहा- इसी बेहद के वैराग्य वृत्ति की बहुत आवश्यकता है। इसका भी राज़ सुनाते हुए बाबा ने कहा कि – तुम्हारा नया राज्य भी तब तक नहीं आ सकता जब तक दुनिया में पहले बेहद के वैराग्य की वृत्ति नहीं होगी। परिवर्तन का आधार ही वैराग्य है। तुम बच्चे बेहद की वैराग्य वृत्ति से मनुष्य आत्माओं में अभी वैराग्य वृत्ति पैदा करो, तब परिवर्तन होगा। कुछ भी होअभ्यका संदेश जाता है- वैराग्य न होने के कारण एक-दो मास के बाद फिर कहते कि यह तो होता ही है। दिल का वैराग्य नहीं आता, टैम्मेरी प्रभाव पड़ता है। इसलिए अब वैराग्य वृत्ति विश्व में फैलाओ। वह तब फैला सकेंगे जब हरेक बच्चे में अपेन अन्दर बेहद की वैराग्य वृत्ति होगी। आपकी वैराग्य वृत्ति से वायवेशन फैलेगा और उसी से विश्व में मनुष्यात्माओं को वैराग्य वृत्ति बनेगी। तब ही इस सृष्टि का परिवर्तन होगा।बाबा ने कहा- बहुत अच्छा संगठन हुआ। बाबा के पास भिन्न-भिन्न उमंग-उत्साह के फूलों को भिन्न-भिन्न खुशबू वतन में पहुँची… बाबा भी बोच-बीच में चक्कर लगाते हुए देखते थे और देख रहे है। इसलिए बाबा की बच्चों के प्रति यही आश है कि अभी बेहद की वैराग्य वृत्ति बनाओ और इसी वैराग्य वृत्ति से बहुत जल्दी ‘परिवर्तन’ का प्रत्यक्ष फल देखेंगे, ऐसे कहते बाबा ने सभी को बहुत-बहुत याद दी।
अव्यक्त दिव्य संदेश–27
14 अगस्त 1990
ब्रह्मा बाप समान दृष्टि में स्नेह और स्वमान समाया हो
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बाबा बच्चों को स्नेह और स्वमान से सम्पन्न दृष्टि रखने की शिक्षा देते हैं। बाबा बच्चों को अपने डबल जन्म के साथी, कर्तव्य के साथी और भविष्य के राज्य-कर्ता के साथी बताते हैं।
बाबा भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप का दृश्य दिखाते हुए समझाते हैं कि बच्चों को प्रकृतिजीत और मायाजीत बनना है। साथ ही, उमंग-उत्साह को सदा बनाए रखना है, परिस्थितियों को कारण बनाने के बजाय कुछ नया करके दिखाना है और शुद्ध संकल्प के बीज को फलदायी बनाने के लिए अपने अन्दर बेहद के वैराग्य की वृत्ति तैयार करनी है।
इस संदेश का मुख्य आधार है—स्नेह और स्वमान, दृढ़ संकल्प तथा बेहद का वैराग्य।
1. ब्रह्मा बाप की दृष्टि में स्नेह और स्वमान
अमृतवेले बाबा के पास पहुँचने पर आठ रत्न इमर्ज हुए। बाबा प्रत्येक रत्न को दृष्टि दे रहे थे। उनकी दृष्टि में स्नेह और स्वमान दोनों समाए हुए थे।
बाबा ने बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे डबल जन्म के साथी, कर्तव्य के साथी, देश के साथी और सदा साथ रहने वाले साथी हैं।
बच्चे ब्राह्मण जन्म में भी ब्रह्मा बाबा के साथी हैं, संगमयुग की सेवा में भी साथी हैं और भविष्य में राज्य-कर्ता के कर्तव्य में भी साथी हैं।
मुख्य शिक्षा: अपनी दृष्टि और व्यवहार में स्नेह तथा स्वमान दोनों बनाए रखने हैं।
2. जन्म-अष्टमी सभी बच्चों की भी है
बाबा ने कहा कि जन्म-अष्टमी केवल ब्रह्मा बाबा की नहीं, बल्कि उनके विशेष बच्चों की भी है। ब्रह्मा बाबा अकेले नहीं रहते, सदैव अपने बच्चों के साथ रहते हैं।
बाबा ने बच्चों को भी उनके जन्म की बधाई दी। यह दृश्य बच्चों के सदा साथ रहने और भविष्य में श्रीकृष्ण के साथ जन्म-साथी होने की स्मृति दिलाता है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं को बाबा का जन्म-साथी और भविष्य का साथी समझकर चलना है।
3. भविष्य में राजकुमार और राजकुमारी बनने का दृश्य
बाबा बच्चों को एक सुन्दर दृश्य में ले गए। वहाँ सभी बच्चे भविष्य के देवता स्वरूप में छोटे-छोटे राजकुमार और राजकुमारियों के रूप में सजे हुए झूलों में बैठे थे।
इसके बाद बाबा ने वही बच्चे बड़े रूप में राज-दरबार में सिंहासन पर विराजमान दिखाए।
यह दृश्य बच्चों को अपने भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप की स्मृति दिलाता है।
मुख्य शिक्षा: अपने भविष्य के श्रेष्ठ स्वरूप को स्मृति में रखकर वर्तमान में पुरुषार्थ करना है।
4. पाँच तत्व सेवाधारी बनेंगे
राज-दरबार में प्रत्येक सिंहासन के पीछे पाँच सूक्ष्म आकार दिखाई दिए। बाबा ने बताया कि ये पाँच तत्व हैं, जो सेवाधारी बनकर खड़े हैं।
बाबा ने समझाया कि बच्चे प्रकृतिजीत और मायाजीत बन रहे हैं, इसलिए प्रकृति उनकी दासी बनकर खड़ी है।
मुख्य शिक्षा: प्रकृति और माया पर विजय प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना है।
5. उमंग-उत्साह को सदा बनाए रखो
बाबा ने संगठन की प्रशंसा की और समझाया कि जैसा उमंग-उत्साह यहाँ है, वैसा ही सदा बना रहना चाहिए।
ऐसा नहीं होना चाहिए कि यहाँ के वातावरण में उमंग-उत्साह हो, लेकिन सेवा के स्थान या दुनिया के वातावरण में जाने पर वह कम हो जाए।
बाबा ने कहा कि वे “सरकमस्टांस” शब्द नहीं सुनना चाहते, बल्कि “समथिंग न्यू” देखना चाहते हैं।
मुख्य शिक्षा: परिस्थितियों को कारण बनाने के बजाय अपने संकल्प, बोल और कर्म में कुछ नया करके दिखाना है।
6. दृढ़ संकल्प से नई जन्म-अष्टमी
बाबा ने समझाया कि बच्चों का यह नया जन्म उमंग-उत्साह और दृढ़ संकल्प का जन्म है। अष्ट राज्य का अधिकारी बनने के लिए यह नया जन्म आवश्यक है।
इसलिए नई जन्म-अष्टमी को भूलना नहीं है। अपने उमंग-उत्साह को दृढ़ संकल्प में बदलकर श्रेष्ठ भविष्य का अधिकारी बनना है।
मुख्य शिक्षा: दृढ़ संकल्प द्वारा अपने श्रेष्ठ भविष्य के अधिकारी बनने का पुरुषार्थ करना है।
7. शुद्ध संकल्प का बीज और धरनी
बाबा ने बीज और धरनी का उदाहरण दिया। शुद्ध संकल्प बीज है, लेकिन बीज बोने से पहले धरनी तैयार करना आवश्यक है।
यदि धरनी तैयार नहीं है, तो शक्तिशाली बीज डालने पर भी उसका फल प्राप्त होने में समय और मेहनत लगती है।
इसी प्रकार, शुद्ध संकल्प को फलदायी बनाने के लिए अपने अन्दर बेहद के वैराग्य की वृत्ति का हल चलाना है। जब धरनी तैयार होगी, तब शुद्ध संकल्प का बीज शीघ्र फल देगा।
मुख्य शिक्षा: श्रेष्ठ संकल्प को फलदायी बनाने के लिए पहले अपनी वृत्ति को तैयार करना है।
8. बेहद के वैराग्य की तीन बातें
बाबा ने बेहद के वैराग्य की तीन बातें बताईं:
- स्वयं के देहभान या अन्य भान से बेहद का वैराग्य।
- हद के सेवाभाव से बेहद का वैराग्य।
- सेवा के साधनों से बेहद का वैराग्य।
इन तीनों बातों पर पुरुषार्थ करके अपने अन्दर वैराग्य वृत्ति का हल चलाना है।
मुख्य शिक्षा: देहभान, सीमित सेवाभाव और सेवा के साधनों के प्रति आसक्ति से ऊपर उठना है।
9. परिवर्तन का आधार है वैराग्य
बाबा ने कहा कि नया राज्य तब तक नहीं आ सकता, जब तक दुनिया में पहले बेहद के वैराग्य की वृत्ति नहीं होगी।
कभी-कभी कोई परिस्थिति आने पर कुछ समय के लिए वैराग्य का प्रभाव पड़ता है, लेकिन एक-दो महीने बाद फिर वही विचार आने लगता है कि यह तो होता ही है। बाबा ऐसे अस्थायी प्रभाव के बजाय दिल से वैराग्य चाहते हैं।
मुख्य शिक्षा: वैराग्य को अस्थायी प्रभाव नहीं, बल्कि दिल की स्थायी वृत्ति बनाना है।
10. अपनी वैराग्य वृत्ति से विश्व में परिवर्तन लाओ
बाबा ने समझाया कि जब प्रत्येक बच्चे में बेहद के वैराग्य की वृत्ति होगी, तभी उसके वायुमण्डल से दूसरों पर भी प्रभाव पड़ेगा।
बच्चों की वैराग्य वृत्ति से विश्व की मनुष्यात्माओं में भी वैराग्य वृत्ति उत्पन्न होगी और सृष्टि-परिवर्तन का मार्ग बनेगा।
बाबा ने बच्चों के उमंग-उत्साह की प्रशंसा करते हुए आश व्यक्त की कि वे बेहद के वैराग्य की वृत्ति अपनाकर शीघ्र परिवर्तन का प्रत्यक्ष फल देखेंगे।
मुख्य शिक्षा: स्वयं में बेहद का वैराग्य धारण करके अपने वायुमण्डल द्वारा विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनना है।
भाग 2 — 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
खण्ड A — स्नेह, स्वमान और जन्म-साथी
प्रश्न 1. बाबा की दृष्टि में कौन-सी दो विशेषताएँ समाई हुई थीं?
उत्तर: स्नेह और स्वमान।
प्रश्न 2. बाबा ने बच्चों को किस प्रकार के साथी कहा?
उत्तर: डबल जन्म के साथी, कर्तव्य के साथी, देश के साथी और सदा साथ रहने वाले साथी।
प्रश्न 3. बच्चे ब्रह्मा बाबा के साथ किन कार्यों में साथी हैं?
उत्तर: ब्राह्मण जन्म, संगमयुग की सेवा और भविष्य के राज्य-कर्ता के कर्तव्य में।
प्रश्न 4. बाबा ने जन्म-अष्टमी किसकी बताई?
उत्तर: ब्रह्मा बाबा और उनके विशेष बच्चों की भी।
प्रश्न 5. बाबा ने बच्चों को किस नए जन्म की बधाई दी?
उत्तर: उमंग-उत्साह और दृढ़ संकल्प के नए जन्म की।
खण्ड B — भविष्य का स्वरूप और प्रकृतिजीत स्थिति
प्रश्न 6. भविष्य के दृश्य में बच्चे किस रूप में दिखाई दिए?
उत्तर: राजकुमार और राजकुमारी के रूप में।
प्रश्न 7. बाद के दृश्य में बच्चों को कहाँ देखा गया?
उत्तर: राज-दरबार में सिंहासन पर।
प्रश्न 8. सिंहासन के पीछे पाँच सूक्ष्म आकार किसके थे?
उत्तर: पाँच तत्वों के।
प्रश्न 9. बाबा ने पाँच तत्वों को किस रूप में बताया?
उत्तर: सेवाधारी के रूप में।
प्रश्न 10. प्रकृति बच्चों की दासी क्यों बनती है?
उत्तर: क्योंकि बच्चे प्रकृतिजीत और मायाजीत बनते हैं।
खण्ड C — उमंग-उत्साह और दृढ़ संकल्प
प्रश्न 11. बाबा ने संगठन के बारे में क्या कहा?
उत्तर: संगठन बहुत अच्छा हुआ।
प्रश्न 12. बाबा चाहते हैं कि उमंग-उत्साह कैसा रहे?
उत्तर: सदा बना रहे।
प्रश्न 13. बाबा “सरकमस्टांस” के बजाय क्या देखना चाहते हैं?
उत्तर: “समथिंग न्यू”।
प्रश्न 14. नई जन्म-अष्टमी का आधार क्या है?
उत्तर: नया उमंग-उत्साह और दृढ़ संकल्प।
प्रश्न 15. अष्ट राज्य का अधिकारी बनने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: उमंग-उत्साह को दृढ़ संकल्प में बदलना।
खण्ड D — शुद्ध संकल्प और बेहद का वैराग्य
प्रश्न 16. बाबा ने शुद्ध संकल्प की तुलना किससे की?
उत्तर: बीज से।
प्रश्न 17. शुद्ध संकल्प के बीज से पहले क्या तैयार करना है?
उत्तर: धरनी।
प्रश्न 18. धरनी तैयार करने के लिए कौन-सी वृत्ति आवश्यक है?
उत्तर: बेहद के वैराग्य की वृत्ति।
प्रश्न 19. बेहद के वैराग्य की पहली बात क्या है?
उत्तर: स्वयं के देहभान और अन्य भान से बेहद का वैराग्य।
प्रश्न 20. बेहद के वैराग्य की दूसरी बात क्या है?
उत्तर: हद के सेवाभाव से बेहद का वैराग्य।
प्रश्न 21. बेहद के वैराग्य की तीसरी बात क्या है?
उत्तर: सेवा के साधनों से बेहद का वैराग्य।
प्रश्न 22. बेहद के वैराग्य का हल कहाँ चलाना है?
उत्तर: अपने अन्दर।
खण्ड E — वैराग्य और विश्व-परिवर्तन
प्रश्न 23. नए राज्य के आने का एक आधार क्या बताया गया?
उत्तर: दुनिया में बेहद के वैराग्य की वृत्ति का आना।
प्रश्न 24. केवल थोड़े समय के लिए प्रभावित होना पर्याप्त क्यों नहीं है?
उत्तर: क्योंकि सच्चा वैराग्य दिल से होना चाहिए।
प्रश्न 25. विश्व में वैराग्य वृत्ति फैलाने के लिए पहले क्या आवश्यक है?
उत्तर: प्रत्येक बच्चे में बेहद के वैराग्य की वृत्ति होना।
प्रश्न 26. बच्चों की वैराग्य वृत्ति से क्या फैलेगा?
उत्तर: वायुमण्डल में वैराग्य वृत्ति का प्रभाव।
प्रश्न 27. विश्व-परिवर्तन के लिए बच्चों को क्या करना है?
उत्तर: स्वयं बेहद के वैराग्य की वृत्ति धारण करनी है।
प्रश्न 28. बाबा बच्चों से क्या अपेक्षा रखते हैं?
उत्तर: बेहद के वैराग्य की वृत्ति बनाकर शीघ्र परिवर्तन का निमित्त बनना।
प्रश्न 29. शुद्ध संकल्प का बीज शीघ्र फल कब देगा?
उत्तर: जब बेहद के वैराग्य से धरनी तैयार होगी।
प्रश्न 30. इस संदेश की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: स्नेह और स्वमान से सम्पन्न होकर दृढ़ संकल्प तथा बेहद के वैराग्य द्वारा विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनना।
भाग 3 — आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मेरी दृष्टि में स्नेह और स्वमान दोनों हैं?
- क्या मेरा उमंग-उत्साह परिस्थितियाँ बदलने पर भी बना रहता है?
- क्या मैं “सरकमस्टांस” को कारण बनाता हूँ या “समथिंग न्यू” करके दिखाता हूँ?
- क्या मैं शुद्ध संकल्प का बीज बोने से पहले अपनी वृत्ति की धरनी तैयार करता हूँ?
- क्या मैं देहभान और अन्य भान से बेहद का वैराग्य रखता हूँ?
- क्या मेरा सेवाभाव हद तक सीमित है या बेहद का है?
- क्या मैं सेवा के साधनों के प्रति आसक्ति से ऊपर उठ रहा हूँ?
- क्या मेरा वैराग्य स्थायी है या केवल परिस्थिति से प्रभावित है?
- क्या मेरी वैराग्य वृत्ति से दूसरों को भी प्रेरणा मिलती है?
- आज मैं कौन-सा दृढ़ संकल्प करके विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनूँगा?
निष्कर्ष
इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य आधार है—स्नेह और स्वमान से सम्पन्न दृष्टि, दृढ़ संकल्प तथा बेहद का वैराग्य।
बाबा चाहते हैं कि बच्चे केवल उमंग-उत्साह के वातावरण में श्रेष्ठ न रहें, बल्कि हर परिस्थिति में उसे बनाए रखें। शुद्ध संकल्प का बीज तभी शीघ्र फल देगा, जब बेहद के वैराग्य द्वारा अन्दर की धरनी तैयार होगी।
देहभान, हद के सेवाभाव और सेवा के साधनों की आसक्ति से ऊपर उठकर ही विश्व में वैराग्य वृत्ति का प्रभाव फैलाया जा सकता है।
आज का दृढ़ संकल्प:
मैं ब्रह्मा बाप समान स्नेह और स्वमान से सम्पन्न दृष्टि रखूँगा। अपने उमंग-उत्साह को सदा बनाए रखूँगा, बेहद के वैराग्य से अपनी वृत्ति की धरनी तैयार करूँगा और दृढ़ संकल्प द्वारा विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनूँगा।
अस्वीकरण
यह अध्याय 14 अगस्त 1990 के उपलब्ध अव्यक्त दिव्य संदेश पर आधारित अध्ययन-सामग्री है। मुख्य बिन्दु और प्रश्न-उत्तर दिए गए मूल पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में व्यवस्थित करने के लिए तैयार किए गए हैं।
📝 27. अव्यक्त दिव्य संदेश | 14.08.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
