17.8.1990
नुमाः शाम के समय भक्तों की पुकार सुनो
सभी की याद-प्यार लेते हुए आज जैसे ही में बाबा के पास वतन में पहुंची तो बाबा बड़े स्नेह के नयनों से मुलाकात कर रहे थे। आज हमने देखा कि बाबा के नयनों में जैसे नयनों में बीच में बिन्दी है. उसकी जगह पर नयनों के बीच में भिन्न-भिन्न रत्न चमक रहे थे और एक रत्न के बाद दूसरा, फिर तीसरा रत्न दिखाई दे रहा था। बाबा ने कहा- देखो बच्ची, बच्चों के नयनों में बाबा है और बाबा के नयनों में आप नरे-रत्न हो। आज मैं बच्चों को नरे-रत्न के रूप में याद कर रहा है। आज मैं नमाः शाम के समय गई थी। बाबा ने कहा- यह नुमाः शाम का जो समय है, इसमें आष इष्ट बच्चों की व पूज्य बच्चों की विशेष मैजॉरिटी भक्त लोग, जो भावना वाले है, वो खास आरती करते हैं और बहुत बड़ा आरती का रूप होता है। तो यह नुमाः शाम का जो समय है यह आप इष्ट देव व देवियों के भक्तों की स्मृति का समय है। फिर बाबा ने पूछा कि -आप बच्चों को कभी यह महसूसता होती है कि हमारे पूज्य रूप को, हमारे ही भक्त या बाबा के भक्त इतना प्यार से याद कर रहे है? जो भक्त हैं वे और सब सहारे देख करके अभी उन सहारों से किनारा कर रहे हैं और आप इष्ट देवों को ही अपना सहारा समझने लगे हैं। आप लोगों को भक्तों का वायब्रेशन पहुँचता है? जैसे कोई बुलाता है या याद करता है तो उसकी याद दिल में पहुँचती है ना। ऐसे नुमा:शाम के समय आप बच्चों को यह फील होता है? तो मैं मुस्करा रही थी। बाबा ने कहा – आप सभी बिज़ी रहते हो ना, इसलिए कम फीलिंग आती है। लेकिन जैसे-जैसे आपकी मन-बुद्धि फ्री होगी तो आपका यह अनुभव बहुत बढ़ेगा और ऐसे महसूस करेंगे जैसे भक्त आत्माएँ बाबा के साथ-साथ हम इष्ट देवताओं का भी आह्वान कर रही हैं। फिर बाबा ने कहा -अच्छा, समाचार सुनाओ, कैसे आई हो? मैने कहा बाबा, समाचार तो आपके पास पहले ही पहुँच जाता है, मैं क्या सुनाऊँ !बाबा ने सभी बच्चों को एक टाइटिल देते हुए कहा कि आप सभी हो ‘विधि-विधाता रचता बच्चे’ । बाबा आज ऐसे विधि-विधान रचता बच्चों को देख रहे हैं। विधि भी बहुत अच्छी बनाई है और विधान भी बहुत अच्छे बनाये हैं। लेकिन विधि-विधान रचता तो बने, अभी क्या करना है? रचता बनना तो सहज है लेकिन पालना करना, उसमें थोड़ा नैचुरल अटेन्शन देना पड़ता है। विधिविधान रचता तो बने, लेकिन जो रचना रची है उसकी पालना करने से ही विश्व के पालनहार बनेंगे। यहाँ से ही पालना करने के संस्कार जो जितना भरता है उतना ही वहाँ विश्व की पालनाअव्यक्त संदेशकरने के निमित्त बनता है। तो बाबा ने कहा- रचता बने हो, बाबा को बहुत खुशी है लेकिन अभी यह अण्डरलाइन करना कि रचता के साथ-साथ पालनहार भी बनना है। आप विधान की पालना करना तो आपको देख करके दूसरों में नियमों को पालन करने की हिम्मत आयेगी। यह कहते हुए फिर बाबा ने कहा – चलो, तुमको एक बहुत अच्छो सीन दिखाता हूँ।मैं बाबा के साथ-साथ गई तो देखा कि जैसे यहाँ हम सब राउण्ड में बैठे हैं, वैसे वहाँ भी राउण्ड में बहुत सुन्दर सभा लगी थी। मैने सोचा बाबा ने वही सभा इमर्ज की है। बाबा बोले बच्ची, क्या सोच रही हो? मैंने कहा बाबा, आपने यहाँ तो वही सभा इमर्ज की है। बाबा ने कहा – इस सभा की विशेषता देखो। इतने में मैंने देखा हर एक जैसे यहाँ साकार रूप में बैठे हैं ऐसे ही बैठे थे लेकिन हर एक के सामने उनका आकारी रूप चमकता हुआ दिखाई दे रहा था और हर हर एक के पीछे सम्पूर्ण ब्रह्मा बाबा जैसे कि सबके सिर पर हाथ फिरा रहे थे। बाबा ने कहा- बच्ची, इसका रहस्य समझा? अभी आप सबका जो सम्पूर्ण स्वरूप है, वह आपका आह्वान कर रहा है। जैसे साकार ब्रह्मा बाबा को देखा, बाबा को यह फीलिंग आती थी कि बस, अभी मैं सम्पूर्ण बना कि बना, फिर सम्पूर्ण बनने के बाद मैं जाकर किशोर बनूँगा। फरिश्ते-स्वरूप की और राज्य की दोनों फीलिंग बाबा के सामने जाने से ही होती थी। जैसे साकार बाबा को अपना अव्यक्त फ़रिश्ता स्वरूप, जो सम्पूर्ण कर्मातीत है, वह आह्वान कर रहा था, खींच रहा था और बाबा को यह फीलिंग आती थी। इसी रीति से आप बच्चों को भी यह फीलिंग अपनी चाहिए कि हमारा ही सम्पूर्ण स्टेज का स्वरूप आह्वान कर रहा है। बाबा ने आगे कहा- देखो, कितना मीठा, प्यारा लगता है यह कर्मातीत स्वरूप। यह आपका स्वरूप ही आपका आह्वान कर रहा है कि कब मैं और आप समाचार एक हो जाएँ, इसलिए यह सीन दिखाई!बाबा को लाख गुणा बच्चों पर खुशी है। क्योंकि जब तक अपने आप रुचि नहीं होती है तो बाबा प्रोग्राम भी देता तो कहते बाबा, एक साल कैसे सर्विस बन्द करेंगे। लेकिन अभी मिलकर आपस में बनाया है, इसलिए आप लोगों को फील नहीं होगा। फिर बाबा ने कहा- हमेशा यही समझना कि मेरा बैकबोन सम्पूर्ण अव्यक्त ब्रह्मा बाबा है और मुझे सदैव बाबा को ही देखना है। बाबा को ही देखकर चलेंगे तो ला-मेकर रहेंगे। अगर दूसरे को देखा तो लॉ-ब्रेकर बन जायेंगे। इसलिए सदैव यह समझना कि मुझे ब्रह्मा बाबा को ही फालो करना है बाबा ने क्या किया। बस, बाबा, बाबा… ही कहते रहेंगे तो कभी भी यह एक साल तपस्या का बड़ा नहीं लगेगा। संकल्प भी नहीं आयेगा कि यह क्या, कोई फंक्शन ही नहीं करना है, कोई सेवा ही नहीं करनी है।देखो, ब्रह्मा बावा ने भी एक साल से भी ज्यादा समय आप लोगों को बेहद की सेवा के वैराग्य वृत्ति का साक्षात्कार कराया। आप खुद भी कहते थे कि बाबा सब कुछ सुनते हए भी और कही है। तो यह क्या है? सेवा तो की लेकिन सेवा में भी न्यारा-प्यारा रहा। यह बेहद की वैराग्य वृत्ति और सम्पूर्ण स्वरूप के आह्वान की आकर्षण खींचती रही। इसी रीति से आप लोग भी ब्रह्मा बाबा को सदैव सामने देखना और किसको नहीं देखना तो लॉ मेकर बनेंगे बेकर नहीं बनेंगे। उसके बाद बाबा ने कहा- जो भी सभी बैठे हैं उनको आज मैं. उनके अपने ही सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात दे रहा हूँ, यह सौगात सदा याद रखना। इससे आपको बल मिलता रहेगा।
अव्यक्त दिव्य संदेश–29
17 अगस्त 1990 | हिंदी
नुमाः शाम के समय भक्तों की पुकार सुनो
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने बच्चों को उनके पूज्य स्वरूप, भक्तों की भावना, सम्पूर्ण स्थिति के आह्वान और तपस्या की महत्ता का अनुभव कराया। बापदादा बच्चों को ‘विधि-विधान रचता बच्चे’ का टाइटिल देते हुए समझाते हैं कि केवल श्रेष्ठ विधि-विधान बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी पालना करना भी आवश्यक है।
इस संदेश की मुख्य शिक्षाएँ हैं—भक्त आत्माओं की पुकार को अनुभव करने के लिए मन-बुद्धि को फ्री बनाना, अपने सम्पूर्ण स्वरूप को सामने रखना, अव्यक्त ब्रह्मा बाबा को बैकबोन समझकर फॉलो करना और नियमों की पालना करते हुए लॉ-मेकर बनना।
1. नुमाः शाम का समय और भक्तों की पुकार
बापदादा के पास पहुँचने पर बाबा स्नेह भरे नयनों से बच्चों का मिलन करते हैं। बाबा के नयनों में विभिन्न रत्न चमकते दिखाई देते हैं। बाबा समझाते हैं कि बच्चों के नयनों में बाबा हैं और बाबा के नयनों में बच्चे नरे-रत्न हैं।
बापदादा बताते हैं कि नुमाः शाम के समय भक्त आत्माएँ अपने इष्ट देव और देवियों की विशेष रूप से आरती करती हैं। यह समय भक्तों की स्मृति और आह्वान का विशेष समय है।
बाबा बच्चों से पूछते हैं कि क्या उन्हें कभी अनुभव होता है कि भक्त उन्हें प्यार से याद कर रहे हैं? जैसे किसी के बुलाने या याद करने की भावना दिल तक पहुँचती है, वैसे ही भक्तों की पुकार का अनुभव भी हो सकता है।
मुख्य शिक्षा: भक्तों की भावना को अनुभव करने के लिए मन और बुद्धि को फ्री रखना है।
2. मन-बुद्धि को फ्री रखने का अभ्यास
बापदादा समझाते हैं कि बच्चे अपनी सेवा और अन्य कार्यों में व्यस्त रहते हैं, इसलिए भक्तों की पुकार का अनुभव कम होता है।
जैसे-जैसे मन और बुद्धि फ्री होंगे, वैसे-वैसे यह अनुभव बढ़ेगा। तब ऐसा महसूस होगा कि भक्त आत्माएँ बाबा के साथ-साथ इष्ट देवताओं का भी आह्वान कर रही हैं।
इसलिए मन-बुद्धि को व्यर्थ संकल्पों और अनावश्यक व्यस्तता से मुक्त रखकर आत्मिक स्थिति में रहने का अभ्यास करना है।
मुख्य शिक्षा: मन-बुद्धि जितनी फ्री होगी, सूक्ष्म अनुभव उतना ही बढ़ेगा।
3. विधि-विधान रचता बच्चे
बापदादा बच्चों को एक विशेष टाइटिल देते हैं—‘विधि-विधान रचता बच्चे।’
बाबा कहते हैं कि बच्चों ने विधि भी अच्छी बनाई है और विधान भी अच्छे बनाए हैं। लेकिन केवल विधि-विधान रच लेना पर्याप्त नहीं है। उसके बाद उसकी पालना करने पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
रचना करना सहज हो सकता है, लेकिन उस रचना की नियमित पालना के लिए स्वाभाविक अटेंशन चाहिए।
जो बच्चे यहाँ से पालना करने के संस्कार भरते हैं, वे आगे चलकर विश्व की पालना करने के निमित्त बनते हैं।
मुख्य शिक्षा: विधि-विधान बनाने के साथ उनकी पालना भी करनी है।
4. रचता के साथ पालनहार बनना
बापदादा बच्चों को विशेष रूप से अंडरलाइन कराते हैं कि रचता के साथ-साथ पालनहार भी बनना है।
अपने बनाए हुए नियमों और विधानों की स्वयं पालना करनी है। जब बच्चे स्वयं नियमों का पालन करेंगे, तब उन्हें देखकर दूसरों में भी नियमों का पालन करने की हिम्मत आएगी।
केवल दूसरों को नियम बताना पर्याप्त नहीं है। स्वयं उन नियमों को जीवन में अपनाना आवश्यक है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं नियमों की पालना करके दूसरों के लिए उदाहरण बनना है।
5. सम्पूर्ण स्वरूप का आह्वान
बापदादा बच्चों को एक सुन्दर सभा का दृश्य दिखाते हैं। सभा में प्रत्येक बच्चे के सामने उसका आकारी स्वरूप चमकता हुआ दिखाई देता है और प्रत्येक के पीछे सम्पूर्ण ब्रह्मा बाबा मानो उसके सिर पर हाथ फिरा रहे हैं।
बाबा इस दृश्य का रहस्य समझाते हैं कि अभी प्रत्येक बच्चे का सम्पूर्ण स्वरूप स्वयं उसका आह्वान कर रहा है।
जैसे साकार ब्रह्मा बाबा को अपना अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप और सम्पूर्ण कर्मातीत अवस्था आकर्षित करती थी, वैसे ही प्रत्येक बच्चे को अपने सम्पूर्ण स्वरूप का आह्वान अनुभव करना है।
मुख्य शिक्षा: अपने सम्पूर्ण, कर्मातीत स्वरूप को सामने रखकर पुरुषार्थ करना है।
6. सम्पूर्ण स्थिति की आकर्षण
बापदादा बताते हैं कि सम्पूर्ण कर्मातीत स्वरूप बहुत मीठा और प्यारा है। यह स्वरूप आत्मा को अपनी ओर खींचता है और प्रेरणा देता है कि कब वर्तमान स्थिति और सम्पूर्ण स्थिति एक हो जाएँ।
बाबा बच्चों पर बहुत खुशी व्यक्त करते हैं, क्योंकि बच्चों ने मिलकर तपस्या और सेवा के कार्यक्रम को स्वीकार किया है।
सम्पूर्ण स्वरूप की आकर्षण से पुरुषार्थ सहज बनता है। जब लक्ष्य स्पष्ट रहता है, तब तपस्या का समय भी बड़ा नहीं लगता।
मुख्य शिक्षा: सम्पूर्ण स्वरूप को लक्ष्य बनाकर निरन्तर पुरुषार्थ करना है।
7. ब्रह्मा बाबा को बैकबोन समझना
बापदादा बच्चों को विशेष स्मृति देते हैं कि “मेरा बैकबोन सम्पूर्ण अव्यक्त ब्रह्मा बाबा है।”
सदैव बाबा को सामने रखकर चलना है। बाबा ने क्या किया, कैसे किया और किन परिस्थितियों में अपनी स्थिति बनाए रखी—इन बातों को स्मृति में रखना है।
जब ब्रह्मा बाबा को फॉलो करेंगे, तब लॉ-मेकर बनेंगे। यदि दूसरों को देखकर अपनी दिशा बदलेंगे, तो लॉ-ब्रेकर बन सकते हैं।
इसलिए अपने पुरुषार्थ का आधार ब्रह्मा बाबा की श्रेष्ठ जीवन-रीति को बनाना है।
मुख्य शिक्षा: ब्रह्मा बाबा को फॉलो करके लॉ-मेकर बनना है।
8. तपस्या में वैराग्य वृत्ति
बापदादा याद दिलाते हैं कि ब्रह्मा बाबा ने एक वर्ष से भी अधिक समय तक बच्चों को बेहद की सेवा के प्रति वैराग्य वृत्ति का साक्षात्कार कराया।
सेवा करते हुए भी न्यारे और प्यारे रहना सम्भव है। सेवा का अर्थ यह नहीं कि आत्मा अपनी श्रेष्ठ स्थिति से दूर हो जाए।
ब्रह्मा बाबा का उदाहरण बच्चों को यह प्रेरणा देता है कि सेवा में रहते हुए भी वैराग्य वृत्ति और सम्पूर्ण स्वरूप की आकर्षण बनी रहे।
मुख्य शिक्षा: सेवा करते हुए न्यारे-प्यारे और वैराग्य वृत्ति में रहना है।
9. सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात
अंत में बापदादा सभी बच्चों को उनके अपने सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात देते हैं और उसे सदा याद रखने की प्रेरणा देते हैं।
इस सौगात को स्मृति में रखने से बल मिलता रहेगा। अपने सम्पूर्ण स्वरूप की स्मृति आत्मा को लक्ष्य से जोड़े रखती है और पुरुषार्थ में निरन्तरता लाती है।
मुख्य शिक्षा: अपने सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात को सदा स्मृति में रखना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: नुमाः शाम और भक्तों की पुकार
प्रश्न 1. बापदादा बच्चों से किस प्रकार मिल रहे थे?
उत्तर: स्नेह भरे नयनों से।
प्रश्न 2. बाबा ने बच्चों को किस रूप में याद किया?
उत्तर: नरे-रत्नों के रूप में।
प्रश्न 3. नुमाः शाम के समय भक्त क्या करते हैं?
उत्तर: अपने इष्ट देव और देवियों की विशेष आरती करते हैं।
प्रश्न 4. नुमाः शाम का समय किसकी स्मृति का समय बताया गया है?
उत्तर: इष्ट देव और देवियों के भक्तों की स्मृति का।
प्रश्न 5. भक्तों की पुकार का अनुभव बढ़ाने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: मन और बुद्धि को फ्री रखना।
भाग 2: विधि-विधान और पालना
प्रश्न 6. बापदादा ने बच्चों को कौन-सा टाइटिल दिया?
उत्तर: विधि-विधान रचता बच्चे।
प्रश्न 7. विधि-विधान रचने के बाद क्या करना है?
उत्तर: उनकी पालना करनी है।
प्रश्न 8. पालना करने के लिए किस बात पर ध्यान देना आवश्यक है?
उत्तर: स्वाभाविक अटेंशन पर।
प्रश्न 9. पालना के संस्कार भरने से आगे किस कार्य के निमित्त बनेंगे?
उत्तर: विश्व की पालना के।
प्रश्न 10. दूसरों में नियमों के पालन की हिम्मत कैसे आएगी?
उत्तर: बच्चों को स्वयं नियमों का पालन करते देखकर।
भाग 3: सम्पूर्ण स्वरूप का आह्वान
प्रश्न 11. सभा में प्रत्येक बच्चे के सामने क्या दिखाई दे रहा था?
उत्तर: उसका आकारी स्वरूप।
प्रश्न 12. प्रत्येक बच्चे के पीछे कौन दिखाई दे रहे थे?
उत्तर: सम्पूर्ण ब्रह्मा बाबा।
प्रश्न 13. अभी प्रत्येक बच्चे का कौन-सा स्वरूप उसका आह्वान कर रहा है?
उत्तर: उसका सम्पूर्ण स्वरूप।
प्रश्न 14. ब्रह्मा बाबा को कौन-सा स्वरूप आकर्षित करता था?
उत्तर: उनका अव्यक्त फरिश्ता और सम्पूर्ण कर्मातीत स्वरूप।
प्रश्न 15. बच्चों को किस स्थिति को लक्ष्य बनाना है?
उत्तर: सम्पूर्ण कर्मातीत स्थिति को।
भाग 4: ब्रह्मा बाबा को फॉलो करना
प्रश्न 16. बापदादा ने ब्रह्मा बाबा को क्या बताया?
उत्तर: बच्चों का बैकबोन।
प्रश्न 17. किसे फॉलो करके लॉ-मेकर बनना है?
उत्तर: ब्रह्मा बाबा को।
प्रश्न 18. दूसरों को देखकर अपनी दिशा बदलने से क्या हो सकता है?
उत्तर: लॉ-ब्रेकर बन सकते हैं।
प्रश्न 19. ब्रह्मा बाबा ने बच्चों को किस वृत्ति का साक्षात्कार कराया?
उत्तर: बेहद की सेवा के प्रति वैराग्य वृत्ति का।
प्रश्न 20. सेवा करते हुए किस स्थिति में रहना है?
उत्तर: न्यारे और प्यारे रहना है।
भाग 5: तपस्या और सौगात
प्रश्न 21. सम्पूर्ण स्वरूप की आकर्षण से क्या होता है?
उत्तर: पुरुषार्थ सहज बनता है।
प्रश्न 22. बापदादा बच्चों पर क्यों खुश थे?
उत्तर: क्योंकि बच्चों ने मिलकर तपस्या और सेवा के कार्यक्रम को स्वीकार किया था।
प्रश्न 23. सम्पूर्ण स्वरूप को सामने रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: लक्ष्य स्पष्ट रहता है और पुरुषार्थ में बल मिलता है।
प्रश्न 24. बापदादा ने बच्चों को कौन-सी सौगात दी?
उत्तर: उनके अपने सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात।
प्रश्न 25. सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात को कैसे रखना है?
उत्तर: सदा स्मृति में रखना है।
भाग 6: मुख्य शिक्षाओं की पुनरावृत्ति
प्रश्न 26. भक्तों की पुकार अनुभव करने के लिए मन-बुद्धि कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: फ्री।
प्रश्न 27. रचता बनने के साथ क्या बनना है?
उत्तर: पालनहार।
प्रश्न 28. अपने सम्पूर्ण स्वरूप को कैसा अनुभव करना है?
उत्तर: अपने सामने आह्वान करते हुए।
प्रश्न 29. सेवा में रहते हुए किससे बचना है?
उत्तर: अपनी श्रेष्ठ स्थिति से दूर होने और आसक्ति में आने से।
प्रश्न 30. इस दिव्य संदेश का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: विधि-विधान की पालना करते हुए सम्पूर्ण स्वरूप को लक्ष्य बनाना और ब्रह्मा बाबा को फॉलो करना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या मैं भक्तों की भावना अनुभव करने के लिए अपने मन और बुद्धि को फ्री रखता हूँ?
- क्या मैं केवल नियम बनाता हूँ या स्वयं भी उनकी पालना करता हूँ?
- क्या मेरा सम्पूर्ण स्वरूप मेरे पुरुषार्थ का स्पष्ट लक्ष्य है?
- क्या मैं ब्रह्मा बाबा को अपना बैकबोन समझकर उन्हें फॉलो करता हूँ?
- क्या मैं सेवा करते हुए न्यारे और प्यारे रहने का अभ्यास करता हूँ?
- क्या मैं अपने सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात को दिनभर स्मृति में रखता हूँ?
निष्कर्ष
17 अगस्त 1990 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि आत्मा को विधि-विधान रचने के साथ उनकी पालना भी करनी है। भक्तों की पुकार अनुभव करने के लिए मन-बुद्धि को फ्री रखना है और अपने सम्पूर्ण स्वरूप के आह्वान को अनुभव करना है।
ब्रह्मा बाबा को अपना बैकबोन समझकर फॉलो करना है, सेवा में न्यारे-प्यारे रहना है और अपने सम्पूर्ण स्वरूप की सौगात को सदा स्मृति में रखना है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“मेरा बैकबोन सम्पूर्ण अव्यक्त ब्रह्मा बाबा है।”
दैनिक अभ्यास: हर दिन स्वयं से पूछें—“क्या मैं विधि-विधान रचने वाला ही हूँ, या उनकी पालना करके पालनहार भी बन रहा हूँ?”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल दिव्य संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 29. अव्यक्त दिव्य संदेश | 17.08.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
