25. अव्यक्त दिव्य संदेश | 28.06.1990

28.06.1990

अपनी पॉवरफुल स्टेज से आशीर्वाद का ठप्पा लगाओ

/ संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम बनो

आप सबका याद-प्यार लेते हुए बाबा के पास पहुँची। आज बाबा का स्वरूप दूर से ही जैसे विश्व-रक्षक का स्वरूप लग रहा था। बाबा के सामने एक ग्लोब था और उस ग्लोब पर बहुत-सी मनुष्यात्माएँ थी, जिससे सारा ही ग्लोब भरा हुआ था और बाबा के दोनों हाथ विश्व की सभी आत्माओं के ऊपर थे। मैं जब गई तो यह दृश्य सामने से देखा। बाबा ने मुझे देखते हुए कहा कि -“आओ विश्व-कल्याणकारी बच्ची, आओ। बाप के साथ तुम बच्चों का भी अन्त में यही कर्त्तव्य है। तुम बच्चों द्वारा ही बाप विश्व के आगे प्रत्यक्ष होने वाला है, इसलिए तुम भी यहाँ बाबा के साथ आ जाओ”। जैसे ही मैं बाबा के पास पहुँची तो सभी आत्माएँ ऐसे लग रही थीं जैसे कोई बहुत प्यासी होती है, उनके जो नयन थे वे ऐसे थे जो देखकर के रहम आता था। ऐसे लग रहा था जैसे बहुत प्यासी, तड़फती हुई आत्माएँ हैं। बाबा ने कहा- तुम इनको दृष्टि दो। तो जब मैं दृष्टि दे रही थी, जैसे कोई भी देवी का चित्र जब कृपा या आशीर्वाद का दिखाते हैं, उनके नयनों में जैसे दया-कृपा के मोती चमकते हैं – यह रहम की भावना का स्वरूप होता है, ऐसा ही स्वरूप था। बाबा ने कहा

“इस समय तुम अपना फोटो निकालो। इसी समय के फोटो की भक्तों ने कॉपी की है। लेकिन कुछ भाव वह दिखा सकते हैं, कुछ नहीं। फिर बाबा ने कहा- तुम चारों ओर घूम करके ऐसे हाथ घुमाओ। चारों ओर अनेकानेक मनुष्यात्माएँ थीं।बाबा ने कहा – “देखो, कितनी मनुष्यात्माएँ है। तुम्हें कितनों के ऊपर रहम, कृपा व आशीर्वाद अभी करनी है। यह विश्व का गोला देखो और बताओ कि कितनी आत्माओं पर तुमने रहम किया है या बाबा का जो आशीर्वाद मिला है, वह कितनों को दिया है”। मैं मुस्कराती रही। मैंने कहा -बाबा, अभी तो मिनट मोटर होना पड़ेगा। तो बाबा ने कहा- “बच्चे मिनट-मोटर के लिए तैयार है? एक मिनट में ऐसी पॉवरफुल स्टेज हो जो आशीर्वाद का ठप्पा लगाया और वह पार हो जाए? मैने कहा – बाबा, नम्बरवार सभी बच्चे इसी पुरुषार्थ में लगे हुए हैं। बाबा ने कहा – “नम्बरवार है, यह तो ठीक है, लेकिन हर एक नम्बरवार अपनी सम्पन्न स्टेज पर तो आयेंगे ना। लास्ट दाना भी अपनी सम्पूर्ण स्टेज तक आयेगा, वह आया है? बाबा यही देख रहे हैं कि चाहे लास्ट नम्बर है, चाहे फस्ट्र है, चाहे रॉयल फैमली में आने वाले है. चाहे राज अधिकारी बनने वाले हैं. चाहे साहूकार प्रजा मेंअव्यक्त संदेश

आने वाले सम्पर्क वाले है – हर एक बच्चे को अपने नम्बर के अनुसार जो सम्पन्न, सम्पूर्ण स्टेज प्राप्त करनी है, उसमें कितनी दूरी है? बाबा यह नहीं देखते कि सभी 100 प्रतिशत हो गये हैं, बाबा जानते हैं – सब तो एक जैसे होने नहीं है, लेकिन उनकी अपने अनुसार तो सम्पूर्णता होगी ना, उसको सामने रखते हुए बाबा चेक करते हैं कि अभी कितनी दूरी है।

बाबा ने पूछा- आप क्या समझती हो, अभी कितनी दूरी है? मैंने कहा- बाबा, मैं तो समझती हूँ कि थोड़ा समय समीप आयेगा तो सेकण्ड में हो जायेगा। बाबा ने कहा- समय पर तो हो ही जायेगा, लेकिन जो मेरे पास-विद ऑनर बच्चे हैं, वे समय को स्वयं आह्वान करेंगे, न कि समय प्रमाण सम्पूर्णता को पायेंगे। हमने कहा बाबा, लगता तो ऐसा ही है कि सभी के मन में जो आपके प्रति प्यार है, जिस समय प्यार में खो जाते हैं तो समझते हैं बस, कल ही सम्पूर्ण बन जायेंगे, लेकिन जब कोई बात आती है तो थोड़ा-सा दूर हो जाते हैं। बाबा ने कहा “बाबा यह तो देखते हैं कि कई बच्चों में दिल की सच्ची लगन है, उमंग है, संकल्प है कि करके ही दिखाना है, लेकिन सभी बच्चो में नहीं है। कईयों में है जो बाबा के पास पहुँचता है”। मैने कहा बाबा, ऐसे ही लहर फैलती जायेगी। बाबा ने कहा- “लहर फैल रही है, लेकिन लहर फैलने की जो गति है, वह जितनी और जैसी होनी चाहिए, उसमें थोड़ा अन्तर है”। उसके बाद यह सीन गायब हो गई। फिर बाबा ने कहा अच्छा बच्ची, चलो तो तुमको एक और सीन दिखाऊँ।हम आगे चले। जैसे तारघर व टी. पी. रूम होता है तो टिक टिक की आवाज़ होती रहती है, उसी रीति से जैसे मशीनरी चल रही थी। मैने कहा बाबा, यहाँ कौन-सी मशीनरी चल रही है? बाबा ने कहा- “तुमको पता नहीं है कि वतन में कौन-सी मशीनरी चल रही है? देखो, बाबा तुम सभी बच्चों के लिए राखियाँ तैयार करवा रहे हैं। बाबा ने तुम बच्चों के लिए बहुत सुन्दर-सुन्दर राखियाँ बनवाई हैं। दिखाऊँ कौन-सी राखियाँ तैयार कराई हैं? वह राखियाँ बहुत सुन्दर थी। राखी के पट्टे की जगह पर पाँच लड़ियाँ थीं और बीच में 5 रंग के बहुत सुन्दर हीरे थे जो ऐसे बने थे जैसे शिव बाबा का शेप (आकार) था। चार हीरे चारों ओर थे और बीच में एक बिन्दी चमक रही थी। बहुत सुन्दर डिजाइन था। बाबा ने कहा देखो, मैने कितनी बढ़िया राखियाँ तैयार की हैं। वह लाइट में बहुत सुन्दर चमक रही थीं। बाबा ने कहा इन्हें ध्यान से देखो और पढ़ो। जो 5 लड़ियाँ थी, उसमे मोतियों से शब्द लिखे थे। जैसे सफेद-सफेद मोती होते हैं, उसी रीति से सच्चे सफेद मोतियों से 5 शब्द लिखे थे 1. स्व-रक्षक, 2. कुल-रक्षक, 3. सेवा-रक्षक, 4. मर्यादाएँ-रक्षक-अव्यक्त संदेशऔर 5. विश्व-रक्षक। मैने कहा बाबा, आपने तो यह राखियाँ अभी से तैयार करवा ली हैं। हमारे पास तो अभी बनी ही नहीं हैं. मैं इन्हें लेकर जाऊँ? बाबा ने कहा “बच्ची, बाबा के पास तो सब चीजें फटाफट अति शीघ बन जाती है। तुम्हें चाहिए और ले जाने में तुम समर्थ हो तो ले जाओ” मैने कहा- बाबा, समर्थ तो हम हैं लेकिन यह चीजें गुम हो जाती है, मतलब रूह-रूहान चल रही थी।

फिर बाबा ने कहा – “बाबा देखते हैं कि यही 5 चीजें जो है, बच्चे अगर उसके रक्षक बने तो सम्पूर्ण होने में कोई देरी नहीं है। लेकिन कहाँ तक सम्पूर्ण बने हैं, वह बाबा सीन दिखाते हैं”। फिर बाबा गायब हो गये और लाइट के दो हाथ सामने आये। उन हाथों में राखी थी। बाबा ने कहा -अभी सीन देखना। बाबा ने ऐसी ताली बजाई तो सारे ब्राह्मण इमर्ज हो गये। सब राखी को देख करके बड़े खुश हो रहे थे। बाबा ने कहा – यह जो हाथ है, अभी इससे एक-एक क्रास करो। सभी ने जब क्रास किया तो राखी में जो 5 लड़े थीं, उसमें से किसी को तीन फिट आती, किसी को दो फिट आती, किसी की लूज रह जाती, किसी को पूरी फिट हो जाती। जिनकी लड़ें लूज रह जाती वे कास करते समय टाइट करने की बहुत कोशिश करते लेकिन होती ही नहीं थी। कास तो मिनट में हो करना था। जब सभी कास करके गये, फिर बाबा ने कहा अच्छा, सभी सब हाथ ऊपर करो। तो जिनकी लड़ियाँ लटकने वाली थीं, उनकी दूर से ही लटकती दिखाई दे रही थीं। बाबा ने कहा-

“बच्ची, एक काम करो। अभी देखो, मैजॉरिटी की ‘मर्यादा’ की लड़ ढीली थी और उसका असर ‘कुल’ और ‘सेवा’ की जो लड़े थी, उन दोनों पर पड़ रहा था। मैजॉरिटी की यह तीन लड़ें ढीली थी, बाकी दो टाइट थी।

बाबा ने कहा – “बच्ची, वर्तमान समय बाबा क्या चाहता है? जैसे आप और बातों के ऊपर अटेन्शन देते हो, वैसे अगर मर्यादाओं पर अटेन्शन दो तो स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति हुई पड़ी है। वर्तमान समय चाहिए मर्यादा सम्पन्न जीवन। इसलिए आप जब सम्पूर्ण देवता बनते हो तब उसमें भी महिमा आती है – मर्यादा पुरुषोत्तम। मर्यादाएँ ही आगे बढ़ाने का साधन है। कोई-न-कोई मर्यादा का ढीलापन ही पुरुषार्थ में भी ढीला कर देता है। इससे मेहनत बहुत करनी पड़ती, सफलता कम होती है। अभी जो राखी बंधन आप मनायेंगे, इसमें विशेष बच्चों को यह मर्यादा के रक्षक की लड़ो विशेष टाइट करनी है। क्योंकि आपको ही मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर सारे वर्ल्ड की मर्यादाएँ स्थापन करनी है। यह मर्यादाएँ ही सतयुग-त्रेता तक चलेंगे। जब इस समय मर्यादाओं के रक्षक बनेंगे तभीअव्यक्त संदेश-

यह सारा कल्प यादगार रहेगा। बाबा ने इस राखी पर विशेष अटेन्शन दिलाया कि “अमृतवेले से रात्रि तक हर दिनचर्या में जो ईश्वरीय मर्यादाएँ मिली हैं, उन सब पर चलकर मर्यादा सम्पन्न बनना है। बाबा अभी मर्यादा सम्पन्न संगमयुगी पुरुषोत्तम बच्चे देखने चाहते हैं”। बाबा ने कहा- “इस राखी का टाइटिल है- ‘संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम’। ऐसे राखी का सन्देश देते बाबा ने सभी बच्चों को याद-प्यार दिया और पहला जो दृश्य दिखाया बाबा ने इशारा दिया कि इसी से ही विश्व-रक्षक का जो पार्ट है, वह प्रैक्टिकल में आगे बढ़ेगा।

अव्यक्त दिव्य संदेश

संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम बनो

मुख्य बिन्दु एवं 30 छोटे प्रश्न-उत्तर

भाग 1 — मुरली के मुख्य बिन्दु

1. विश्व-रक्षक स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

बाबा विश्व-रक्षक के स्वरूप में दिखाई दिए। उनके सामने विश्व का ग्लोब था, जिस पर अनेक मनुष्यात्माएँ थीं। बाबा के दोनों हाथ सभी आत्माओं के ऊपर थे।

बाबा ने कहा कि अन्त में बच्चों का भी यही कर्तव्य है। बच्चों द्वारा ही बाप विश्व के सामने प्रत्यक्ष होने वाला है।

मुख्य शिक्षा: प्रत्येक आत्मा के प्रति रहम, कृपा और कल्याण की भावना रखकर विश्व-रक्षक बनना है।

2. प्यासी आत्माओं को दृष्टि और आशीर्वाद दो

विश्व की आत्माएँ प्यासी और तड़पती हुई दिखाई दे रही थीं। बाबा ने उन आत्माओं को दृष्टि देने के लिए कहा।

बाबा ने बच्चों को यह भी जाँचने के लिए कहा कि कितनी आत्माओं पर रहम किया है और बाप से मिले आशीर्वाद कितनों को दिए हैं।

मुख्य शिक्षा: अपनी शक्तिशाली स्थिति द्वारा विश्व की आत्माओं को दृष्टि और आशीर्वाद देना है।

3. एक मिनट में शक्तिशाली स्थिति बनाओ

बाबा ने पूछा कि क्या बच्चे मिनट-मोटर बनने के लिए तैयार हैं?

अर्थात् एक मिनट में इतनी शक्तिशाली स्थिति हो कि आशीर्वाद का ठप्पा लगाते ही आत्मा पार हो जाए।

मुख्य शिक्षा: कम समय में शक्तिशाली स्थिति बनाने का अभ्यास करना है।

4. प्रत्येक बच्चे को अपनी सम्पूर्ण स्थिति प्राप्त करनी है

बाबा सभी बच्चों को एक समान 100 प्रतिशत बनने की अपेक्षा से नहीं देखते।

हर बच्चे का नम्बर और पार्ट अलग है, लेकिन प्रत्येक को अपने नम्बर के अनुसार सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति प्राप्त करनी है।

बाबा यह देखते हैं कि बच्चे की अपनी सम्पूर्ण स्थिति प्राप्त करने में अभी कितनी दूरी है।

मुख्य शिक्षा: दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी सम्पूर्ण स्थिति तक पहुँचने का पुरुषार्थ करना है।

5. समय का इंतजार नहीं, समय का आह्वान करो

बाबा ने कहा कि पास विद ऑनर बच्चे समय के अनुसार सम्पूर्ण नहीं बनेंगे, बल्कि स्वयं समय का आह्वान करेंगे।

उनकी सम्पूर्णता केवल परिस्थितियों या समय के दबाव पर निर्भर नहीं होगी।

मुख्य शिक्षा: समय आने की प्रतीक्षा करने के बजाय अभी से सम्पन्न बनने का पुरुषार्थ करना है।

6. सच्ची लगन और उमंग की गति बढ़ाओ

बाबा ने बताया कि कई बच्चों में दिल की सच्ची लगन, उमंग और करके दिखाने का संकल्प है, लेकिन सभी में एक जैसी स्थिति नहीं है।

लहर फैल रही है, परन्तु उसकी गति जितनी होनी चाहिए, उतनी नहीं है।

मुख्य शिक्षा: उमंग-उत्साह के साथ पुरुषार्थ की गति भी तेज करनी है।

7. पाँच लड़ियों वाली राखी का रहस्य

बाबा ने पाँच लड़ियों और पाँच सुन्दर हीरों वाली विशेष राखी दिखाई। उसकी लड़ियों पर मोतियों से पाँच शब्द लिखे थे।

  1. स्व-रक्षक — स्वयं की रक्षा करने वाला।
  2. कुल-रक्षक — कुल की रक्षा करने वाला।
  3. सेवा-रक्षक — सेवा की रक्षा करने वाला।
  4. मर्यादाएँ-रक्षक — ईश्वरीय मर्यादाओं की रक्षा करने वाला।
  5. विश्व-रक्षक — विश्व की आत्माओं के कल्याण के लिए निमित्त बनने वाला।

बाबा ने समझाया कि यदि बच्चे इन पाँच बातों के रक्षक बन जाएँ, तो सम्पूर्ण बनने में देरी नहीं होगी।

8. राखी की ढीली लड़ियों का रहस्य

बाबा ने सभी ब्राह्मण बच्चों को राखी पहनने का दृश्य दिखाया।

किसी की लड़ियाँ पूरी फिट थीं, किसी की कुछ ढीली थीं और किसी की अधिक ढीली थीं।

बाबा ने बताया कि अधिकांश बच्चों की मर्यादा की लड़ी ढीली थी। इसका प्रभाव कुल और सेवा की लड़ियों पर भी पड़ रहा था।

मुख्य शिक्षा: मर्यादाओं में ढीलापन आने से कुल और सेवा पर भी प्रभाव पड़ता है।

9. मर्यादाएँ पुरुषार्थ को आगे बढ़ाती हैं

बाबा ने कहा कि मर्यादाओं पर विशेष ध्यान देने से स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति होती है।

किसी-न-किसी मर्यादा का ढीलापन पुरुषार्थ को भी ढीला बना देता है। इससे मेहनत अधिक करनी पड़ती है और सफलता कम मिलती है।

मुख्य शिक्षा: मर्यादाओं का दृढ़ पालन पुरुषार्थ और सेवा में सफलता का साधन है।

10. अमृतवेले से रात्रि तक मर्यादा सम्पन्न जीवन

बाबा ने कहा कि अमृतवेले से लेकर रात्रि तक दिनचर्या में मिली हुई सभी ईश्वरीय मर्यादाओं पर चलना है।

बाबा संगमयुग में बच्चों को मर्यादा सम्पन्न पुरुषोत्तम स्वरूप में देखना चाहते हैं।

इस विशेष राखी का शीर्षक बाबा ने दिया—

“संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम”

बाबा ने यह भी बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर बच्चों को विश्व की मर्यादाएँ स्थापित करनी हैं।


भाग 2 — 30 छोटे प्रश्न और उत्तर

खण्ड A — विश्व-रक्षक स्वरूप

प्रश्न 1. बाबा किस स्वरूप में दिखाई दिए?
उत्तर: विश्व-रक्षक स्वरूप में।

प्रश्न 2. बाबा के सामने क्या था?
उत्तर: विश्व का एक ग्लोब, जिस पर अनेक मनुष्यात्माएँ थीं।

प्रश्न 3. बाबा के दोनों हाथ किनके ऊपर थे?
उत्तर: विश्व की सभी आत्माओं के ऊपर।

प्रश्न 4. बाबा ने बच्चों का अन्तिम कर्तव्य क्या बताया?
उत्तर: विश्व-कल्याणकारी और विश्व-रक्षक बनना।

प्रश्न 5. बाप विश्व के सामने किसके द्वारा प्रत्यक्ष होगा?
उत्तर: बच्चों के द्वारा।

प्रश्न 6. विश्व की आत्माएँ किस अवस्था में दिखाई दे रही थीं?
उत्तर: प्यासी और तड़पती हुई अवस्था में।

प्रश्न 7. बाबा ने उन आत्माओं के लिए क्या करने को कहा?
उत्तर: उन्हें दृष्टि देने और रहम-कृपा की भावना रखने को।

खण्ड B — शक्तिशाली और सम्पूर्ण स्थिति

प्रश्न 8. बाबा ने बच्चों को कौन-सा मोटर बनने के लिए पूछा?
उत्तर: मिनट-मोटर।

प्रश्न 9. मिनट-मोटर का संदेश क्या था?
उत्तर: एक मिनट में शक्तिशाली स्थिति बनाना।

प्रश्न 10. बाबा बच्चों की कौन-सी स्थिति चेक कर रहे थे?
उत्तर: अपने नम्बर अनुसार सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति।

प्रश्न 11. क्या सभी बच्चों की स्थिति एक जैसी होगी?
उत्तर: नहीं, सभी अपने-अपने नम्बर अनुसार सम्पूर्ण बनेंगे।

प्रश्न 12. बाबा प्रत्येक बच्चे में क्या देख रहे थे?
उत्तर: उसकी अपनी सम्पूर्ण स्थिति प्राप्त करने में कितनी दूरी है।

प्रश्न 13. पास विद ऑनर बच्चे समय के सम्बन्ध में क्या करेंगे?
उत्तर: स्वयं समय का आह्वान करेंगे।

प्रश्न 14. कई बच्चों में बाबा ने कौन-सी विशेषताएँ देखीं?
उत्तर: सच्ची लगन, उमंग और करके दिखाने का संकल्प।

प्रश्न 15. बाबा ने पुरुषार्थ की लहर में क्या कमी बताई?
उत्तर: उसकी गति अपेक्षा के अनुसार नहीं थी।

खण्ड C — पाँच रक्षक

प्रश्न 16. बाबा ने बच्चों के लिए कौन-सी विशेष सौगात तैयार कराई?
उत्तर: पाँच लड़ियों वाली सुन्दर राखियाँ।

प्रश्न 17. राखी की लड़ियों पर क्या लिखा था?
उत्तर: पाँच प्रकार के रक्षक बनने की स्मृति।

प्रश्न 18. पहला रक्षक कौन-सा था?
उत्तर: स्व-रक्षक।

प्रश्न 19. दूसरा रक्षक कौन-सा था?
उत्तर: कुल-रक्षक।

प्रश्न 20. तीसरा रक्षक कौन-सा था?
उत्तर: सेवा-रक्षक।

प्रश्न 21. चौथा रक्षक कौन-सा था?
उत्तर: मर्यादाएँ-रक्षक।

प्रश्न 22. पाँचवाँ रक्षक कौन-सा था?
उत्तर: विश्व-रक्षक।

प्रश्न 23. पाँचों के रक्षक बनने से क्या लाभ बताया गया?
उत्तर: सम्पूर्ण बनने में देरी नहीं होगी।

खण्ड D — मर्यादाओं की रक्षा

प्रश्न 24. अधिकांश बच्चों की कौन-सी लड़ी ढीली थी?
उत्तर: मर्यादा की लड़ी।

प्रश्न 25. मर्यादा की लड़ी ढीली होने का प्रभाव किन दो लड़ियों पर पड़ा?
उत्तर: कुल और सेवा की लड़ियों पर।

प्रश्न 26. मर्यादाओं पर विशेष ध्यान देने से किनकी उन्नति होती है?
उत्तर: स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति।

प्रश्न 27. मर्यादाओं में ढीलापन होने से क्या परिणाम होता है?
उत्तर: पुरुषार्थ ढीला होता है, मेहनत अधिक और सफलता कम होती है।

प्रश्न 28. बाबा किस प्रकार का जीवन चाहते हैं?
उत्तर: मर्यादा सम्पन्न जीवन।

प्रश्न 29. ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन कब से कब तक करना है?
उत्तर: अमृतवेले से रात्रि तक।

प्रश्न 30. बाबा ने विशेष राखी का क्या शीर्षक दिया?
उत्तर: संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम।


भाग 3 — आत्मचिंतन के लिए पाँच प्रश्न

1. स्व-रक्षक: क्या मैं अपने संकल्पों, बोल और कर्मों पर ध्यान देकर अपनी स्थिति की रक्षा करता हूँ?

2. कुल-रक्षक: क्या मेरे व्यवहार से ब्राह्मण कुल की मर्यादा बनी रहती है?

3. सेवा-रक्षक: क्या मेरी सेवा में ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन होता है?

4. मर्यादाएँ-रक्षक: क्या मैं अमृतवेले से रात्रि तक अपनी दिनचर्या में मिली ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करता हूँ?

5. विश्व-रक्षक: क्या मैं विश्व की आत्माओं के प्रति रहम, कृपा और कल्याण की भावना रखता हूँ?


आज की मुख्य धारणा

“मर्यादाओं की रक्षा ही स्व-उन्नति, सेवा की उन्नति और विश्व-कल्याण का आधार है।”

आज का दृढ़ संकल्प

मैं स्व-रक्षक, कुल-रक्षक, सेवा-रक्षक, मर्यादाएँ-रक्षक और विश्व-रक्षक बनूँगा। अमृतवेले से रात्रि तक ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करके संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम बनने का पुरुषार्थ करूँगा।

सार

इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बाबा ने स्पष्ट किया कि विश्व-रक्षक बनने के लिए केवल रहम और कल्याण की भावना रखना पर्याप्त नहीं है। स्वयं को सम्पन्न बनाना, शक्तिशाली स्थिति का अभ्यास करना और पाँचों प्रकार के रक्षक बनना आवश्यक है।

विशेष रूप से मर्यादाओं की रक्षा पर ध्यान दिलाया गया है, क्योंकि मर्यादाओं का ढीलापन स्व-उन्नति, कुल और सेवा को प्रभावित करता है।

इसलिए इस संदेश का विशेष पुरुषार्थ है—

“मर्यादाओं की लड़ी टाइट करो और संगमयुगी मर्यादा पुरुषोत्तम बनो।”


अस्वीकरण: यह अध्ययन-सामग्री उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए अव्यक्त दिव्य संदेश पर आधारित है। मुख्य बिन्दुओं को सरल भाषा में व्यवस्थित किया गया है और प्रश्न-उत्तर मूल संदेश के अध्ययन तथा आत्मचिंतन के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं।

📝 79. साकार मुरली | 20-10-2026

20 Questions × 5 Marks = 100 Marks

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