| 21-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – योग अग्नि से पापों को भस्म कर सम्पूर्ण सतोप्रधान बनना है, कोई भी पाप कर्म नहीं करना है” | |
| प्रश्नः- | सतयुग में ऊंच पद किस आधार पर मिलता है? यहाँ का कौन सा कायदा सबको सुनाओ? |
| उत्तर:- | सतयुग में पवित्रता के आधार पर ऊंच पद मिलता है। जो पवित्रता की कम धारणा करते हैं वह सतयुग में देरी से आते हैं और पद भी कम पाते हैं। यहाँ जब कोई आता है तो उन्हें कायदा सुनाओ – दे दान तो छूटे ग्रहण। 5 विकारों का दान दो तो तुम 16 कला सम्पूर्ण बन जायेंगे। तुम बच्चे भी अपनी दिल से पूछो कि हमारे में कोई विकार तो नहीं हैं? |
ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं कि मनुष्यों को कैसे समझाओ कि अब स्वर्ग की स्थापना हो रही है। 5 हजार वर्ष पहले भी भारत में स्वर्ग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। विचार करना चाहिए, उस समय कितने मनुष्य थे। सतयुग आदि में बहुत करके 9-10 लाख होंगे। शुरूआत में झाड़ छोटा ही होता है। इस समय जबकि कलियुग का अन्त है तो कितना बड़ा झाड हो गया है, अब इसका विनाश भी जरूर होना है। बच्चे समझते हैं यह वही महाभारत लड़ाई है। इस समय ही गीता के भगवान ने राजयोग सिखाया और देवी-देवता धर्म की स्थापना की। संगम पर ही अनेक धर्मों का विनाश, एक धर्म की स्थापना हुई थी। बच्चे यह भी जानते हैं कि आज से 5 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था और कोई धर्म नहीं था। ऐसी नई दुनिया स्थापन करने बाप संगम पर आते हैं। अब वह स्थापन हो रही है। पुरानी दुनिया विनाश हो जायेगी। सतयुग में एक ही भारत खण्ड था और कोई खण्ड था नहीं। अभी तो कितने खण्ड हैं। भारत खण्ड भी है परन्तु इसमें आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। वह प्राय: लोप हो गया है। अब फिर परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा स्थापना कर रहे हैं। बाकी सब धर्म विनाश हो जाते हैं। यह तो याद रखना है कि सतयुग त्रेता में कोई और राज्य नहीं था और सब धर्म अभी आये हैं। कितना दु:ख अशान्ति मारामारी है। महाभारी महाभारत लड़ाई भी वही है। एक तरफ यूरोपवासी यादव भी हैं। 5 हजार वर्ष पहले भी इन्होंने मूसलों की (मिसाइल्स की) इन्वेन्शन की थी। कौरव पाण्डव भी थे। पाण्डवों की तरफ खुद परमपिता परमात्मा मददगार था। सभी को यही कहा कि गृहस्थ व्यवहार में रहते मुझे याद करने से तुम्हारे पाप बढ़ेंगे नहीं और पास्ट के विकर्म विनाश होंगे।
अभी बाप समझाते हैं, तुम ही भारतवासी सतयुग में जो सतोप्रधान थे, वह इस समय 84 जन्म लेते-लेते अब तुम्हारी आत्मा तमोप्रधान बन गई है। अब सतोप्रधान कैसे बनें। सतोप्रधान तब बनेंगे जब मुझ पतित-पावन बाप को याद करेंगे। इस योग अग्नि से ही पाप भस्म होंगे और आत्मा सतोप्रधान बन जायेगी। और फिर स्वर्ग में 21 जन्मों के लिए वर्सा पायेंगे। बाकी इस पुरानी दुनिया का विनाश तो होना ही है। भारत सतयुग में श्रेष्ठाचारी था और सृष्टि के आदि में बहुत थोड़े मनुष्य थे। भारत स्वर्ग था, दूसरे कोई खण्ड नहीं थे। अभी और धर्म बढ़ते-बढ़ते झाड़ कितना बड़ा हो गया है और तमोप्रधान जड़ जड़ीभूत हो गया है। अब इस तमोप्रधान झाड़ का विनाश और नई देवी-देवता धर्म के झाड़ की स्थापना जरूर चाहिए। संगम पर ही होगा। अभी तुम हो संगम पर। आदि सनातन देवी-देवता धर्म का अभी सैपलिंग लग रहा है। पतित मनुष्यों को बाप पावन बना रहे हैं, वह फिर देवता बनेंगे। जो पहले नम्बर में थे जिन्होंने 84 जन्म लिए हैं। वही फिर पहले नम्बर में आयेंगे। सबसे पहले-पहले देवी-देवताओं का पार्ट था। वही पहले बिछुड़े हैं। फिर उन्हों का ही पार्ट होना चाहिए ना। सतयुग में हैं ही सर्वगुण सम्पन्न…. अभी है विशश वर्ल्ड, रात-दिन का फ़र्क है। अभी विशश वर्ल्ड को वाइसलेस वर्ल्ड कौन बनाये। पुकारते भी हैं हे पावन बनाने वाले आओ। अभी वह आया है। बाप कहते हैं – हम तुमको वाइसलेस बना रहे हैं। इस विशश दुनिया के विनाश के लिए लड़ाई लगनी है। अब वह कहते हैं एक मत कैसे हो क्योंकि अभी अनेक मत हैं ना। अनेक इतने मत-मतान्तरों के अन्दर एक धर्म की मत कौन स्थापन करे। बाप समझाते हैं अभी एक मत की स्थापना हो रही है। बाकी सब विनाश हो जायेंगे। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले जो पावन थे, वही फिर 84 जन्म भोग अब पतित बने हैं। फिर बाप आकर भारतवासियों को फिर से स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं अर्थात् असुर से देवता बना रहे हैं। तुम किसको भी समझा सकते हो कि बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम पतित से पावन बन जायेंगे। अब तुम ज्ञान चिता पर बैठो। चिता पर बैठने से तुम पावन बन जाते हो। फिर द्वापर में रावण राज्य होने कारण काम चिता पर बैठते-बैठते भ्रष्टाचारी दुनिया बन गई है। आज से 5 हजार वर्ष पहले देवी-देवता थे। थोड़े मनुष्य थे। अभी तो कितने आसुरी बन पड़े हैं। और धर्म भी एड हो झाड़ बड़ा हो गया है। बाप समझाते हैं झाड़ जड़जड़ीभूत हो गया है। अब फिर मुझे एक मत का राज्य स्थापन करना है। भारतवासी कहते भी हैं एक धर्म में एक मत हो। यह भारतवासी भूल गये हैं कि सतयुग में एक ही धर्म था। यहाँ तो अनेक धर्म हैं। अब बाप आकर फिर से एक धर्म स्थापन कर रहे हैं। तुम बच्चे राजयोग सीख रहे हो। जरूर भगवान ही राजयोग सिखायेंगे। यह किसको पता नहीं है। प्रदर्शनी का उद्घाटन जब कोई करने आते हैं तो उनको भी समझाना चाहिए – तुम किसका उद्घाटन करते हो। बाप इस भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। बाकी नर्कवासी सब विनाश हो जायेंगे। विनाश के पहले जिनको बाप से वर्सा लेना है तो आकर समझें। यह बी.के. का जो आश्रम है यह है क्वारनटाइन क्लास, यहाँ 7 रोज़ क्लास करना है ताकि 5 विकार निकल जाएं। देवताओं में यह 5 विकार होते नहीं। अब यहाँ 5 विकारों का दान देना है, तब ग्रहण छूटेगा। दे दान तो छूटे ग्रहण। फिर तुम 16 कला सम्पूर्ण बन जायेंगे। भारत सतयुग में 16 कला सम्पूर्ण था, अभी तो कोई कला नहीं रही है। सब कंगाल बन पड़े हैं।
कोई ओपनिंग करने आते हैं, बोलो, यहाँ का कायदा है, बाप कहते हैं दे 5 विकारों का दान तो छूटे ग्रहण। तुम 16 कला सम्पूर्ण देवता बन जायेंगे। पवित्रता अनुसार पद पायेंगे। बाकी अगर कुछ न कुछ कला कम रह गई तो जन्म भी देरी से लेंगे। विकारों का दान देना तो अच्छा है ना। चन्द्रमा को ग्रहण लगता है तो आगे ब्राह्मण लोग दान लेते थे। अभी तो ब्राह्मण बड़े आदमी हो गये हैं। गरीब लोग तो बिचारे भीख मांगते रहते, पुराने कपड़े आदि भी लेते रहते। वास्तव में ब्राह्मण पुराने कपड़े नहीं लेते, उन्हों को नया दिया जाता है। तो अब तुम समझाते हो भारत 16 कला सम्पूर्ण था। अब आइरन एजेड हो गया है। 5 विकारों का ग्रहण लगा हुआ है। अभी तुम जो 5 विकारों का दान दे यह अन्तिम जन्म पवित्र रहेंगे तो नई दुनिया के मालिक बनेंगे। स्वर्ग में बहुत थोड़े थे। पीछे वृद्धि को पाया है। अब तो विनाश भी सामने खड़ा है। बाप कहते हैं – 5 विकारों का दान दो तो ग्रहण छूट जाए। अब तुमको श्रेष्ठाचारी बन स्वर्ग का सूर्यवंशी राज्य लेना है, तो भ्रष्टाचार को छोड़ना पड़ेगा। 5 विकारों का दान दो। अपनी दिल से पूछो हम सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी बने हैं? नारद का मिसाल है ना। एक भी विकार होगा तो लक्ष्मी को वर कैसे सकेंगे। कोशिश करते रहो, खाद को आग लगाते रहो। सोना जब गलाते हैं, गलते-गलते यदि आग ठण्डी हो जाती है तो खाद निकलती नहीं है, इसलिए पूरी आग में गलाते हैं। फिर जब देखते हैं किचड़ा अलग हो गया है तब कार्ब में डालते हैं। बाप अब खुद कहते हैं कोई भी विकार में मत जाओ। तीव्र वेग से पुरुषार्थ करो। पहले तो पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। बाबा आप पावन बनाने आये हो, हम कभी विकार में नहीं जायेंगे। देही-अभिमानी बनना है। बाप हम आत्माओं को समझाते हैं। वह सुप्रीम आत्मा है। तुम जानते हो हम पतित हैं। आत्मा में ही संस्कार रहते हैं। मैं तुम्हारा बाप तुम आत्माओं से बात करता हूँ। ऐसा कोई नहीं कह सकता – मैं तुम्हारा बाप परमात्मा हूँ। मैं आया हूँ पावन बनाने। तुम पहले-पहले सतोप्रधान थे फिर सतो, रजो, तमो में आये। तमोप्रधान बने हो। इस समय 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं इसलिए दु:ख देते हैं। हर चीज़ दु:ख देती है। यही तत्व जब सतोप्रधान होते हैं – तब सुख देते हैं। उसका नाम ही है – सुखधाम। यह है दु:खधाम। सुखधाम है बेहद के बाप का वर्सा। दु:खधाम है रावण का वर्सा, अब जितना श्रीमत पर चलेंगे, उतना ऊंच बनेंगे। फिर प्रसिद्ध हो जायेंगे कि कल्प-कल्प यह ऐसे ही पुरुषार्थ करने वाले हैं। यह कल्प-कल्प की बाजी है। जो जास्ती पुरुषार्थ कर रहे हैं वह अपना राज्य भाग्य ले रहे हैं। ठीक पुरुषार्थ नहीं किया होगा तो थर्ड ग्रेड में चला जायेगा। प्रजा में भी पता नहीं क्या जाकर बनेगा। लौकिक बाप भी कहते हैं तुम हमारा नाम बदनाम करते हो, निकलो घर से बाहर। बेहद का बाप भी कहते हैं तुमको माया का थप्पड़ ऐसा लगेगा जो सूर्यवंशी चन्द्रवंशी में आयेंगे ही नहीं। अपने आपको चमाट मार देंगे।
बाप तो कहते हैं वारिस बनो। राजतिलक लेना चाहते हो तो मुझे याद करो और औरों को भी याद दिलाओ तो तुम राजा बनेंगे। नम्बरवार तो होते हैं ना। कोई बैरिस्टर एक-एक केस का लाखों रूपया कमाते हैं और कोई-कोई को देखो पहनने के लिए कोट भी नहीं होगा। पुरुषार्थ पर मदार है ना। तुम भी पुरुषार्थ करेंगे तो ऊंच पद पायेंगे। मनुष्य से देवता बनना है। चाहे मालिक बनो, चाहे प्रजा बनो। प्रजा में भी नौकर-चाकर बनेंगे। स्टूडेन्ट की चलन से टीचर समझ जाते हैं। वन्डर यह है जो पहले वाले से पिछाड़ी वाले तीखे चले जाते हैं क्योंकि अभी दिन-प्रतिदिन रिफाइन प्वाइंट्स मिलती रहती हैं। सैपलिंग लगाते जाते हैं। पहले वाले तो कई भागन्ती हो गये। न्यू एड होते जाते हैं। नई-नई प्वाइंट्स मिलती जाती हैं। बहुत युक्ति से समझाया जाता है। बाबा कहते हैं बहुत गुह्य-गुह्य रमणीक बातें सुनाते हैं, जिससे तुम झट निश्चयबुद्धि हो जाओ। जहाँ तक मेरा पार्ट है, तुमको पढ़ाता रहूँगा। यह भी ड्रामा में नूँध है। जब कर्मातीत अवस्था को पायेंगे तब पढ़ाई पूरी होगी। बच्चे भी समझ जायेंगे। पिछाड़ी में इम्तहान की रिजल्ट मालूम होती है ना। इस पढ़ाई में नम्बरवन सब्जेक्ट है – पवित्रता की। जब तक बाबा की याद नहीं रहती है, बाप की सर्विस नहीं करते हैं, तब तक आराम नहीं आना चाहिए। तुम्हारी लड़ाई है ही माया के साथ। रावण को भल जलाते हैं परन्तु जानते नहीं हैं कि यह है कौन। दशहरा बहुत मनाते हैं। अभी तुमको वन्डर लगता है – राम भगवान की भगवती सीता चुराई गई। फिर बन्दरों का लश्कर लिया। ऐसा कब हो सकता है क्या? कुछ भी समझते नहीं। तो जब प्रदर्शनी में आते हैं पहले-पहले बताना चाहिए – भारत में इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तब कितने मनुष्य होंगे। 5 हजार वर्ष की बात है। अभी कलियुग है, वही महाभारी महाभारत लड़ाई भी है, बाप आकर राजयोग सिखलाते हैं। विनाश भी होगा। यहाँ एक धर्म एक मत अथवा पीस कैसे हो सकती है। जितना माथा मारते हैं एक मत होने के लिए उतना ही लड़ते हैं। बाप कहते हैं – अब मैं उन सबको आपस में लड़ाए माखन तुमको दे देता हूँ। बाप समझाते हैं जो करेगा सो पायेगा। कोई-कोई बच्चे बाप से भी ऊंच बन सकते हैं। तुम मेरे से भी साहूकार विश्व के मालिक बनोगे। मैं नहीं बनूँगा। मैं तुम बच्चों की निष्काम सेवा करता हूँ। मैं दाता हूँ। ऐसे कोई मत समझे हम शिवबाबा को 5 रूपया देते हैं। परन्तु शिवबाबा से 5 पदम स्वर्ग में लेते हैं। तो क्या यह देना हुआ! अगर समझते हैं कि हम देते हैं, यह तो शिवबाबा की बड़ी इनसल्ट करते हैं। बाप तुमको कितना ऊंच बनाते। तुम 5 रूपया शिवबाबा के खजाने में देते हो। बाबा तुमको 5 करोड़ देते हैं। कौड़ी से हीरे जैसा बना देते हैं। ऐसा कब संशय नहीं लाना कि हमने शिव-बाबा को दिया। यह कितना भोलानाथ है। यह कभी ख्याल नहीं आना चाहिए – हम बाबा को देते हैं। नहीं, शिव-बाबा से हम 21 जन्मों के लिए वर्सा लेते हैं। शुद्ध विचार से नहीं दिया तो स्वीकार कैसे होगा। सब बातों की समझ बुद्धि में रखनी चाहिए। ईश्वर अर्थ दान करते हैं, वह कोई भूखा है क्या? नहीं, समझते हैं हमको दूसरे जन्म में मिलेगा। अभी तुमको बाप, कर्म, अकर्म, विकर्म की गति बैठ समझाते हैं। यहाँ जो कर्म करेंगे सो विकर्म ही होगा क्योंकि रावण राज्य है। सतयुग में कर्म अकर्म हो जाता है। हम तुमको अभी उस दुनिया में ट्रांसफर करते हैं, जहाँ तुमसे विकर्म होगा ही नहीं। बहुत बच्चे हो जायेंगे फिर तुम्हारे पैसे भी क्या करेंगे। हम कच्चा सर्राफ नहीं हूँ, जो लेवें और काम में न आये, फिर भरकर देना पड़े। मैं पक्का सर्राफ हूँ। कह देंगे जरूरत नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) तीव्र वेग से पुरुषार्थ कर विकारों की खाद को योग की अग्नि में गला देना है। पवित्रता की पूरी प्रतिज्ञा करनी है।
2) कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को बुद्धि में रखकर अपना सब कुछ नई दुनिया के लिए ट्रांसफर कर देना है।
| वरदान:- | श्रीमत के आधार पर खुशी, शक्ति और सफलता का अनुभव करने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव जो बच्चे स्वयं को ट्रस्टी समझकर श्रीमत प्रमाण चलते हैं, श्रीमत में जरा भी मनमत या परमत मिक्स नहीं करते उन्हें निरन्तर खुशी, शक्ति और सफलता की अनुभूति होती है। पुरुषार्थ वा मेहनत कम होते भी प्राप्ति ज्यादा हो तब कहेंगे यथार्थ श्रीमत पर चलने वाले। परन्तु माया, ईश्वरीय मत में मनमत वा परमत को रायॅल रूप से मिक्स कर देती है इसलिए सर्व प्राप्तियों का अनुभव नहीं होता। इसके लिए परखने और निर्णय करने की शक्ति धारण करो तो धोखा नहीं खायेंगे। |
| स्लोगन:- | बालक सो मालिक वह है जो तपस्या के बल से भाग्यविधाता बाप को अपना बना दे। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
सन्तुष्ट को सन्तुष्ट रखना, स्नेही को स्नेह देना, सहयोगी के साथ सहयोगी बनना – यह महावीरता नहीं है। लेकिन कोई कितना भी असहयोगी बने, अपने सहयोग की शक्ति से असहयोगी को सहयोगी बनाना इसको महावीरता कहा जाता है। कमजोर को कमजोर समझ छोड़ न दो। लेकिन उसको बल देकर बलवान बनाओ, कमजोर को हाईजम्प देने योग्य बनाओ तब कहेंगे महावीर अथवा सब पर उपकार करने वाले।
योग अग्नि निरन्तर जलाओ
पवित्रता से ऊँचा पद पाओ!
* योग अग्नि
• पाँच विकारों का दान
• सम्पूर्ण पवित्रता
• श्रीमत पर चलना
- याद में निरन्तर रहो
• विकारों को त्यागो
• अपने पुरुषार्थ से श्रेष्ठ भाग्य बनाओ
1. आज का मुख्य प्रश्न
क्या मेरी योग-अग्नि निरन्तर जल रही है, या मेरी याद कभी तेज़ और कभी बिल्कुल कम हो जाती है?
21 अक्टूबर की साकार मुरली का मुख्य संदेश है: “योग अग्नि से पापों को भस्म कर सम्पूर्ण सतोप्रधान बनना है, कोई भी पाप कर्म नहीं करना है।” मुरली में यह भी पूछा गया है कि सतयुग में ऊँचा पद किस आधार पर मिलता है और यहाँ कौन-सा कायदा सबको सुनाना है। उत्तर में पवित्रता, पाँच विकारों का दान और आत्म-जाँच पर विशेष बल दिया गया है।
मूल मुरली की बात
– बाबा को याद करने से आत्मा को सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ करना है।
– योग को “अग्नि” के रूप में समझाया गया है, जो निरन्तर अभ्यास औरश्रीमत पर चलने से जुड़ी है।
– पाँच विकारों का दान देने और पवित्रता धारण करने की प्रेरणा दी गई है।
– ऊँचा पद पाने के लिए अपने पुरुषार्थ की जाँच करनी है।
– श्रीमत पर चलते हुए मनमत या परमत को उसमें मिलाने से बचना है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या
मुरली में योग-अग्नि की तुलना ऐसी आग से की गई है जो लगातार जलती रहे। इस उदाहरण से हम यह सीख ले सकते हैं कि आध्यात्मिक अभ्यास केवल अमृतवेले या कभी-कभी याद करने तक सीमित न रहे; उसे दैनिक कर्म, निर्णय और व्यवहार में भी बनाए रखने की
कोशिश करनी चाहिए।
आज का मंथन:
मैं दिन में कितनी बार अपने संकल्प, वाणी और कर्म को श्रीमत के अनुसार जाँचता हूँ? क्या मैं गलती होने पर उसे पहचानकर सुधारने का प्रयास करता हूँ?
2. आज की मुरली के मुख्य
मंथन-बिंदु
1. योग-अग्नि क्यों कहा गया है?
मूल मुरली की बात: योग-अग्नि से पाप भस्म करने और आत्मा को सम्पूर्ण सतोप्रधान बनाने की शिक्षा दी गई है। मुरली में अग्नि का उदाहरण निरन्तर जलने वाली आग के रूप में आता है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
जिस प्रकार कोई चीज़ पकाने के लिए आग का लगातार जलना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक पुरुषार्थ में भी नियमितता महत्त्वपूर्ण है। कभी याद करना, फिर लम्बे समय तक भूल जाना, और उसके बाद फिर याद करना—इस अभ्यास को धीरे-धीरे अधिक निरन्तर बनाने की जरूरत है।
व्यावहारिक अभ्यास यह हो सकता है कि भोजन करते समय, काम शुरू करने से पहले, किसी निर्णय के समय और सोने से पहले कुछ क्षण रुककर अपनी आत्मिक स्थिति तथा बाबा की याद का अभ्यास करें।
2. पाँच विकारों का दान दो — ग्रहण से मुक्त बनो
मूल मुरली की बात: आज की मुरली का कायदा है—“दे दान तो छूटे ग्रहण।” बाबा पाँच विकारों का दान देने और पवित्रता धारण करने की प्रेरणा देते हैं।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
यहाँ दान का अर्थ धन या वस्तु दान करना नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों और विकारों को त्यागने का संकल्प है।
आज जाँचें कि हमारे जीवन में सबसे अधिक कौन-सा विकार प्रभाव डालता है—क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार या कामना। एक विकार को पहचानकर उसके कारणों और उससे पैदा होने वाली प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देना परिवर्तन की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम है।
3. ऊँचा पद पवित्रता के
आधार पर
मूल मुरली की बात: प्रश्नोत्तर में बाबा बताते हैं कि सतयुग में ऊँचा पद पवित्रता के आधार पर मिलता है। पवित्रता की धारणा में कमी होने पर पद भी कम मिलने की बात कही गई है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
मुरली की आध्यात्मिक दृष्टि में पवित्रता केवल एक प्रतिज्ञा नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है। अपने विचार, वाणी, व्यवहार और सम्बन्धों में संयम तथा सम्मान को विकसित करना उसके अभ्यास का हिस्सा हो सकता है।
4. केवल प्रतिज्ञा नहीं,
दृढ़ पुरुषार्थ
मूल मुरली की बात: बाबा बच्चों से पूछते हैं कि क्या वे सम्पूर्ण निर्विकारी बने हैं। पवित्रता की प्रतिज्ञा करने, तीव्र वेग से पुरुषार्थ करने और विकारों की खाद को योग-अग्नि में गलाने की प्रेरणा दी गई है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
प्रतिज्ञा करने के बाद भी पुरानी आदतें उभर सकती हैं।इसलिए एक बार संकल्प कर लेना ही पर्याप्त नहीं; अपने आचरण की समय-समय पर जाँच और सुधार करना आवश्यक है। गलती होने पर निराश होने के बजाय उससे सीखकर दोबारा प्रयास करें।
5. श्रीमत और मनमत में अन्तर पहचानो
मूल मुरली की बात: वरदान में कहा गया है कि श्रीमत के आधार पर चलने वाले बच्चे मनमत या परमत को उसमें नहीं मिलाते। ऐसे बच्चों को खुशी, शक्ति और सफलता की अनुभूति होती है। परखने और निर्णय करने की शक्ति धारण करने पर बल दिया गया है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: अपने निर्णयों की जाँच करें—क्या मैं कोई कार्य विवेक और अपने आध्यात्मिक सिद्धान्तों के अनुसार कर रहा हूँ, या केवल अपनी इच्छा, आदत अथवा आवेश के कारण?
इस मंथन को व्यावहारिक बनाने के लिए हर दिन एक निर्णय चुनें और देखें कि उसमें आपका उद्देश्य क्या था तथा उससे दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ा।
6. कमजोर को छोड़ो नहीं,
बल दो
मूल मुरली की बात: अव्यक्त इशारे में बाबा बताते हैं कि केवल सहयोगी के साथ सहयोग करना महावीरता नहीं; असहयोगी को भी सहयोग की शक्ति से सहयोगी बनाना और कमजोर को
बल देना महावीरता है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
अपने भीतर के विकारों पर विजय पाने के साथ दूसरों के प्रति सहयोगी दृष्टि रखना भी महत्त्वपूर्ण है। किसी की कमजोरी देखकर उसका अपमान करने के बजाय, उचित सीमा और विवेक के साथ उसे सुधारने में मदद करना इस शिक्षा का व्यावहारिक रूप हो सकता है।
3. तुलनात्मक अध्ययन — योग-अग्नि, पवित्रता और पुराने संस्कारों का परिवर्तन
आज की मुरली से चुना गया मुख्य विषय है:
योग को निरन्तर अभ्यास बनाकर पुराने संस्कारों को बदलना और पवित्रता में दृढ़ रहना।
मुरली 1
25 मार्च 1990
अव्यक्त मुरली
शीर्षक:
“सर्व अनुभूतियों की प्राप्ति का आधार — पवित्रता”
मूल मुरली की बात:
बाबा बताते हैं कि रूहानियत का आधार पवित्रता है। संकल्प, बोल और कर्म में जितनी पवित्रता धारण की जाती है, उसी के अनुसार जीवन में रूहानियत की झलक
दिखाई देती है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
21 अक्टूबर की साकार मुरली में पवित्रता को ऊँचे पद का आधार बताया गया है। 25 मार्च 1990 की अव्यक्त मुरली इसी बात को दैनिक जीवन से जोड़ती है—पवित्रता की जाँच केवल विचारों में नहीं, बल्कि वाणी और कर्म में भी करनी चाहिए।
उदाहरण के लिए, यदि मन में क्रोध है लेकिन हम बाहर से मीठा बोलते हैं, तो अपने भीतर की प्रतिक्रिया को भी पहचानने का अभ्यास जरूरी है।
आत्मचिन्तन प्रश्न: क्या मेरी पवित्रता मेरे विचार, बोल और कर्म—तीनों में दिखाई देती है?
25 मार्च 1990 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2
7 मार्च 1993
अव्यक्त मुरली
शीर्षक:
“होली मनाना अर्थात् हाइएस्ट और होलीएस्ट बनना”
मूल मुरली की बात: बाबा सम्पूर्ण पवित्रता का लक्ष्य बताते हैं और समझाते हैं कि स्वप्न मात्र भीअपवित्रता मन और बुद्धि को स्पर्श न करे—यह सम्पूर्ण पवित्रता की आदर्श स्थिति है। मुरली में लक्ष्य को ढीला न करने तथा पुराने संस्कारों को अपनी वास्तविक पहचान न मानने की प्रेरणा भी दी गई है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: आज की साकार मुरली में पाँच विकारों का दान देकर पवित्रता धारण करने की शिक्षा है। 7 मार्च 1993 की अव्यक्त मुरली उस लक्ष्य की गहराई स्पष्ट करती है—केवल बाहरी व्यवहार बदलना नहीं, बल्कि मन और बुद्धि में उठने वाले संकल्पों को भी समझना है।
यह एक आध्यात्मिक आदर्श का वर्णन है। इसे अपने ऊपर कठोरता या निरन्तर आत्म-दोष लगाने के बजाय, नियमित अभ्यास और क्रमशः परिवर्तन के लक्ष्य के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।
आत्मचिन्तन प्रश्न:
क्या मैं केवल बाहरी व्यवहार बदलने का प्रयास करता हूँ, या अपने संकल्पों को भी श्रेष्ठ बनाने पर ध्यान देता हूँ?
7 मार्च 1993 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3
31 दिसंबर 2005
अव्यक्त मुरली
शीर्षक:
“अपने पुराने संस्कारों को योग अग्नि में भस्म कर ब्रह्मा बाप समान त्याग, तपस्या और सेवा में नम्बरवन बनो”
मूल मुरली की बात:
बाबा बताते हैं कि पुराने संस्कार एक सूक्ष्म बोझ की तरह रह सकते हैं। केवल उन्हें दबा देना पर्याप्त नहीं; योग को शक्तिशाली बनाकर, एकाग्रता और दृढ़ संकल्प से पुराने संस्कारों को समाप्त करने का अभ्यास करना है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
यह 21 अक्टूबर की मुरली के सबसे निकट का तुलनात्मक विषय है। आज की साकार मुरली योग-अग्नि से पापों को भस्म करने की बात करती है, जबकि 31 दिसंबर 2005 की अव्यक्त मुरली इसे पुराने संस्कारों के परिवर्तन के
रूप में विस्तार देती है।
उदाहरण के लिए,यदि किसी परिस्थिति में क्रोध कीपुरानी आदत बार-बार उभरती है, तो उसे केवल कुछ समय दबाने के बजाय उसके कारणों को पहचानना,अपनी प्रतिक्रिया पर ध्यान देना और अगली बार बेहतर व्यवहार का अभ्यास करना उपयोगी हो सकता है।
आत्मचिन्तन प्रश्न:
कौन-सा पुराना संस्कार मेरे पुरुषार्थ में बार-बार बाधा बनता है, और उसे बदलने के लिए मैं क्या नियमित अभ्यास करूँगा?
31 दिसंबर 2005 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 4
30 मार्च 1999
अव्यक्त मुरली
शीर्षक:
“तीव्र पुरुषार्थ की लगन को ज्वाला रूप बनाकर बेहद के वैराग्य की लहर फैलाओ”
मूल मुरली की बात: बाबा आत्मा और बाप की बिन्दु रूप स्मृति का अभ्यास बताते हैं। मुरली में बार-बार स्मृति की बिन्दी लगाने और उसे दिनभर बनाए रखने पर बल है। आगे बाबा लगन को ज्वाला रूप में लाने और पुराने हिसाब-किताब तथा संस्कारों को भस्म करने की प्रेरणा देते हैं।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
21 अक्टूबर की साकार मुरली निरन्तर योग-अग्नि पर बल देती है। 30 मार्च 1999 की अव्यक्त मुरली एक सरल अभ्यास बताती है—दिनभर आत्मा, बाप और ड्रामा की स्मृति को बार-बार जागृत करना।
इसका व्यावहारिक अर्थ है कि केवल अमृतवेले के अभ्यास पर निर्भर न रहें। दिन में जब भी याद टूटे, उसे फिर से जागृत करें और अपने कार्यों को श्रेष्ठ दिशा में ले जाएँ।
आत्मचिन्तन प्रश्न: आज मैंने कितनी बार अपनी स्मृति को फिर से जागृत किया और अपने मन को सही दिशा में लौटाया?
30 मार्च 1999 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
दिनांकित मुरली
विशेष बल
आज के लिए सीख
25 मार्च 1990
संकल्प, वाणी और कर्म की पवित्रता
तीनों स्तरों पर आत्म-जाँच करें
7 मार्च 1993
मन और बुद्धि में सम्पूर्ण पवित्रता का लक्ष्य
आंतरिक संकल्पों पर भी ध्यान दें
31 दिसंबर 2005
पुराने संस्कारों को योग-अग्नि से बदलना
आदतों को केवल दबाएँ नहीं, परिवर्तन का अभ्यास करें
30 मार्च 1999
निरन्तर स्मृति और ज्वाला रूप लगन
दिनभर याद को फिर से जागृत करते रहें
21 अक्टूबर 2026
योग-अग्नि द्वारा पापों का क्षय और पवित्रता
निरन्तर योग, पाँच विकारों का त्याग और दृढ़ पुरुषार्थ
तुलनात्मक निष्कर्ष:
इन मुरलियों के चुने हुए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता। वे पवित्रता और आत्म-परिवर्तन के विषय को अलग-अलग पहलुओं से समझाती हैं—विचार, वाणी और कर्म की शुद्धता; मन-बुद्धि का अभ्यास; पुराने संस्कारों का परिवर्तन; और निरन्तर स्मृति। यह हमारा तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली का अतिरिक्त कथन नहीं।
4. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: योग-अग्नि से पापों को भस्म करके सम्पूर्ण सतोप्रधानबनने औरपवित्रता धारण करने का पुरुषार्थ।
प्रश्न 2: योग-अग्नि का उदाहरण क्यों दिया गया है?
उत्तर: निरन्तर जलती आग के उदाहरण से नियमित और निरन्तर योग-अभ्यास का महत्त्व समझाने के लिए।
प्रश्न 3: “दे दान तो छूटे ग्रहण” का क्या अर्थ है?
उत्तर: पाँच विकारों का दान देकर अपने भीतर की कमजोरियों और तमोप्रधान–ता से मुक्त होने का पुरुषार्थ
करना।
प्रश्न 4: सतयुग में ऊँचा पद किस आधार पर मिलता है?
उत्तर: मुरली के अनुसार पवित्रता की धारणा और पुरुषार्थ के आधार पर।
प्रश्न 5: श्रीमत पर चलने का व्यावहारिक अर्थ क्या है?
उत्तर: अपने विचारों, निर्णयों और कर्मों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन के अनुरूप जाँचना।
प्रश्न 6: 25 मार्च 1990 की अव्यक्त मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: पवित्रता संकल्प, वाणी और कर्म—तीनों में दिखाई देनी चाहिए।
प्रश्न 7: 7 मार्च 1993 की अव्यक्त मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: सम्पूर्ण पवित्रता को लक्ष्य बनाना और मन-बुद्धि के संकल्पों को भी श्रेष्ठ बनाना।
प्रश्न 8: 31 दिसंबर 2005 की अव्यक्त मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: पुराने संस्कारों को केवल दबाने के बजाय योग-अग्नि, दृढ़ संकल्प और एकाग्रता से बदलने
का पुरुषार्थ करना।
प्रश्न 9: निरन्तर याद का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?
उत्तर: दिनभर छोटे-छोटे अवसरों पर अपनी आत्मिक स्थिति और बाबा की याद को फिर से जागृत करके।
प्रश्न 10: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: कौन-सा विकार या पुराना संस्कार मेरी योग-अग्नि को कमजोर करता है, और मैं उसे बदलने के लिए कौन-सा नियमित अभ्यास करूँगा?
मुख्य प्रश्न
क्या मेरीयोग-अग्निनिरन्तर जलती है, या मेरी याद बीच-बीच में बुझ जाती है?
प्रमुख बिंदु
1. योग-अग्नि का अर्थ और निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता।
2. पाँच विकारों का दान और “दे दान तो छूटे ग्रहण”।
3. पवित्रता और ऊँचे पद का मुरली-संदर्भ।
4. श्रीमत और मनमत में अन्तर पहचानना।
5. 25 मार्च 1990, 7 मार्च 1993, 31 दिसंबर 2005 और 30 मार्च
6. अपने पुराने संस्कारों की जाँच और एक 1999 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन। नियमित परिवर्तन-अभ्यास।
7. कमजोर आत्माओं के प्रति सहयोग और उपकार की भावना।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो 21 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली की शिक्षाओं और अन्य दिनांकित मुरलियों की तुलनात्मक व्याख्या को अलग-अलग समझें। “योग-अग्नि”, “विकर्म भस्म होना”, “सतोप्रधान” और “सतयुग में ऊँचा पद” जैसे शब्द ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। इन्हें किसी वैज्ञानिक रूप से मापी जा सकने वाली भौतिक अग्नि या भविष्य के पद की स्वतंत्र रूप से सत्यापित गारंटी न समझें। तुलनात्मक मुरलियों से निकाले गए निष्कर्ष मंथनात्मक व्याख्याएँ हैं, मूल मुरली के अतिरिक्त शब्द नहीं। इस प्रस्तुति का उद्देश्य किसी मुरली में परिवर्तन करना या बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि आत्मचिन्तन, पवित्रता और व्यवहार में श्रेष्ठ परिवर्तन को प्रोत्साहित करना है। कृपया मूल मुरली का अध्ययन भी करें और अपने विवेक से मंथन करें।
7. आज का संकल्प
“मैं बाबा की याद को केवल एक समय का अभ्यास न रखकर दिनभर फिर से जागृत करने का प्रयास करूँगा। अपने विचार, वाणी और कर्म की जाँच करूँगा तथा जिस विकार या पुराने संस्कार को पहचानूँगा, उसे बदलने के लिए दृढ़ और नियमित पुरुषार्थ करूँगा।”
अंतिम मंथन प्रश्न: आज मैं अपनी योग-अग्नि को निरन्तर रखने और पवित्रता बढ़ाने के लिए कौन-सा एक ठोस कदम उठाऊँगा?
📝 80. साकार मुरली | 21-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
