24.5.1990
डबल लाइट बनने की साधना करो
आज जब आप सभी का याद-प्यार लेते हुए बाबा के पास पहुँची तो हमें बाबा सामने दिखाई नहीं दिये। लेकिन मैं आगे बढ़ती गई तो कुछ समय आगे बढ़ने के बाद हमने देखा – सामने एक लाइट की पहाड़ी थी और पहाडी पर लाइट का एक सुन्दर चबूतरा बना था। उस पर भी लाइट की एक दिये। लेकिन मैं आगे बढती गई तो कुछ समय आगे बढ़ने के बाद हमने देखा सामने एक साइट आज जब आप सभी का याद प्यार लेते हुए बाबा के पास पहुंची तो हमें बाबा सामने दिखाई नही कुछ समय के बाद हमने औरों को भी देखा। सभी पहाडी के चबूतरे के नीचे थे. बाबा ऊपर था। यह ऊँची चोटी दिखाई दे रही थी जिस पर बाबा बैठे थे। वहाँ पहले मैंने अपने को अकेले देखा लेकिन हैं। उसके बाद संकल्प चला कि हमें जाना तो बाबा के पास है. लेकिन बाबा ऊपर है, हम नीचे है। सीन बडी अच्छी लग रही थी। ऐसी अनुभूति हो रही थी जैसे बाबा हम सबको लाइट-माइट दे रहे तो इसी संकल्प से हम भी मुसकरा रहे थे, बाबा भी ऊपर से मुस्करा रहे थे।
थोडे समय के बाद बाबा ने कहा- बच्ची, ऊपर आना चाहती हो ? ऊपर आने का साधन आपके पास है? हमने कहा बाबा, हल्के बनकर उड़कर आ जायेंगे। बाबा ने कहा- उड़कर तो आयेंगे लेकिन उडाने वाला कौन है? फिर बाबा ने कहा अच्छा, हम आपको एक बहुत अच्छा साधन देते हैं. उस साधन के आधार पर आ जाओ। लेकिन वह साधन अव्यक्त है. व्यक्त नहीं नजदीक आ गई। बाबा ने कहा- इस पर आ सकते हो, यही साधन है। अभी देखता हूँ कि कौन इतने में बाबा ने अपनी बाँहें ऐसे की। वह बाँहें इतनी लम्बी हो गई जो बाहों की तिल्ली (हथेली) हमारे बिना साधना के इस साधन द्वारा ऊपर नहीं पहुँच सकेंगे। इसके लिए कौन-सी साधना चाहिए? हम इस साधन द्वारा बाबा के पास पहुँच सकता है। इस पर वही पहुँचेगा जिसकी निरन्तर साधना होगी। सबने कहा – डबल लाइट बनने की साधना। बाबा ने कहा- अच्छा, सभी डबल लाइट हो? तो सभी काँध हिला कर हाँ-हाँ करने लगे। बाबा यह सब देखते बोले- अच्छा, बाबा अभी आपको दिखाते हैं कि आपकी डबल लाइट की साधना निरन्तर है या अन्तर है!
बाबा ने कहा – इस हथेली पर खड़े होकर ऊपर आ जाओ। तो हरेक हथेली पर खड़े होने की कोशिश करने लगा। बाँह तो बाबा की थी लेकिन कोई एक सेकण्ड में हथेली पर खड़े होते हो सेकण्ड में ऊपर पहुँच जाता। पहुँचना सबको सेकण्ड में था, लेकिन कोई पौने तक पहुँचा, कोई आधे तक, कोई बहुत थोड़ा आगे बढ़ा। बहुत थोड़े थे जो सेकण्ड में ऊपर पहुँच सके। फिर बाबा ने कहा – देखा, निरन्तर साधना में रहने वाले अर्थात् डबल लाइट रहने वाला कौन है। इसी से हो समझ सकते हो कि डबल लाइट की साधना निरन्तर है या आधे-पौने तक है या बहुत थोड़ी है या अव्यक्त संदेश
कोई-न-कोई भारीपन है। बाबा आप बच्चों को यह रिजल्ट दिखाता है। ओ ऊपर पहुंच गये थे वे बाबा के साथ खेल रहे थे। साथ-साथ सबके अन्दर रहम का भाव था कि यह भी ऊपर पहुंच जाएँ। फिर बाबा ने सबको युक्ति बताई कि एक सेकण्ड में पॉवरफल स्टेज पर खड़े हो जाओ तो तुम भी ऊपर आ जायेंगे। ऐसे कहते बाबा ने सभी को सेकण्ड (दुसरा) चाँस दिया। मैजॉरिटी उस विधि से ऊपर पहुंच गये। फिर भी थोडे थे जो सेकण्ड चाँस में भी ऊपर नहीं चढ़ सके। बाबा ने कहा अभी तुम चढ करके आओ। उसमें तो बहुत मेहनत थी. लेकिन जब सभी चवतरे के पास पहुँच गये तो बडी अच्छी सीन लग रही थी। हम सभी बाबा के चारों ओर खडे हो गये। बाबा को गोदी तक हमारा सिर पहुंच रहा था, बाबा का सिर ऊपर था। बाबा ने हाथ ऐसे किया तो हम सबका सिर बाबा की गोद में हो गया। ऐसे लगा जैसे हम सब पंखुडियाँ है, बाबा का सिर ऊपर फूल के बर की तरह है। यह सीन भी बडी न्यारी-प्यारी थी। उसके बाद बाबा नीचे आये और कहा- बच्ची अभी बताओ कि आपके स्थूल संसार का और बाह्मण संसार का क्या हालचाल है? मैंने कहा- बाबा, स्थूल संसार में तो मारामारी हो रही है और ब्राह्मण संसार में सबका लक्ष्य है जो बाबा ने कहा है वह हम करके दिखायें। बाबा हमारा यह जवाब सुनकर बहत राज़युक्त मुस्कराने लगे और काफी समय तक मुस्कराते रहे। हम भी बाबा का मुस्कराना देखकर
मुस्कराती रही। बाबा ने कहा- बच्ची, यही समाचार है? मैंने कहा- हाँ बाबा। बाबा ने कहा- बच्ची. संसार में तो मारामारी है. लेकिन ब्राह्मण संसार में सिर्फ लक्ष्य है या बाबा ने जो कहा है वह करने के लक्षण भी दिखाई देते हैं? मैंने कहा- बाबा, हम दाते हैं कि लक्ष्य तो सभी ने रखा है. बाकी लक्षण कहाँ तक आये हैं वह तो उनकी दिल जाने और दिलाराम जाने। तो बाबा बोले – लक्ष्य तो ठीक है, लेकिन ‘लक्ष्य’ और ‘लक्षण’ जो दोनों ही समान होने चाहिए उसके अन्तर है। लक्ष्य तो रखा है, उमंग-उत्साह भी है कि हमको करके दिखाना है, लेकिन लक्ष्य औ लक्षण का बैलेंस नहीं है। इसलिए संकल्प तक लक्ष्य है लेकिन जो लक्षण प्रैक्टिकल कर्म में अ चाहिए, उसमें नम्बरवार और काफी अन्तर है। जब तक बच्चों ने लक्ष्य को लक्षण में नहीं लाय और ‘लक्ष्य’ लक्षण का बैलेंस नहीं हुआ है तब तक निरन्तर डबल लाइट नहीं रह सकते। कुछ स डबल लाइट होते हैं, कुछ समय यथा शक्ति, अन्तर पड़ जाता है। लेकिन बाबा क्या चाहत बाबा ने कहा – अभी देख भी रहे हो कि संसार की हालत मारामारी की तरफ, सिविल-वा तैयारियों की तरफ, परिवर्तन की तरफ बहुत फास्ट गति से बढ़ रही है, अति में जा रही है
समय की गति फास्ट जा रही है. इसी हिसाब से सेवा और स्व-उन्नति दोनों ही इतनी फास्ट है? जब दोनों की गति फास्ट होगी तब परिवर्तन होगी। सेवा और स्व-उन्नति लक्ष्य और लक्षण का बैलेस होना चाहिए। उसमें थोडा अन्तर दिखाई दे रहा है। ऐसे कहते बाबा सबको दृष्टि देते फिर मुस्कराने लगे। मैंने कहा बाबा अभी आपके मन में क्या आ रहा है? बाबा ने कहा में सभी बच्चों में एक बात देख रहा हूँ। मैने कहा- बाबा सुनाओ।
बाबा बोले- देखो, तुम बच्चे कहते हो कि इस संसार की हालत बडी नाजुक है। बाबा भी देख रहे है कि संसार की हालत तो नाजुक है ही लेकिन संसार की हालत के साथ-साथ बच्चे भी पुरुषार्थ में बहुत नाजुक है। तो बाबा दोनों का नाजुकपन देख रहे हैं। देखो, बच्चों का लक्ष्य है कि बाबा की आश पूर्ण करनी है। लेकिन वर्तमान समय जो लहर है वह नाजुकपन की ज्यादा है। कोई शरीर से भी नाजुक है. कोई पुरुषार्थ में नाजुक हैं। पुरुषार्थ में नाजुक किस हिसाब से हैं? फास्ट गति का संकल्प करके चलते हैं लेकिन जब सामने कोई बात आती है तो उसमें नाजुकपन यह आता है कि ‘चल तो रहे है, ‘लक्ष्य तो अच्छा है’, ‘चाहते तो हैं’ ‘करेंगे जरूर’, ‘यह तो होता ही है ना, ‘यह तो चलता ही है’, ‘इतना जो हो रहा है. यह तो होगा ही’। बुद्धि में यह नहीं आता कि इतने को भी खत्म करके सम्पूर्ण बनें। यह नाजुकपन के जब संकल्प आते हैं तो कोई-न-कोई परिस्थिति का भारीपन आ जाता है और सोचते हैं मेरे में इतनी ही हिम्मत है. इतना ही चल सकती हूँ….।
यह नाजुकपन है। इसके बजाए ‘मुझे इसे पार कर, सम्पन्न बनकर दिखाना है’ शक्तिशाली संकल्प। यह है ज्ञान-योग के बाद यह जो रॉयल नाजुकपन आ गया है, इस नाजुकपन के कारण बाबा जो चाहता है कि सेवा और स्व-उन्नति का बैलेंस हो, वह कम दिखाई देता है। बाबा जैसे यह बहु एक्ट करके बोल रहे थे। यह भी बहुत वण्डरफुल दृश्य लग रहा था। फिर उसके बाद बाबा ने 1-बाबा तो जानते हैं कि यह सब नाजुकपन खत्म होना ही है। जब यह खत्म होगा तब बाबा विश्व के आगे नाज़ से कहेगा – देखो, मेरे बच्चे कैसे हैं। जो डबल लाइट बच्चे है, वे विश्व के आगे प्रत्यक्ष हो जायेंगे।
फिर हमने कहा – बाबा, अभी मधुबन में छोटे बच्चे आये हैं। बाबा ने कहा- बच्चे माना माया से बचे हुए है। उन्हों को कहना कि तुम बच्चे हो, माया से बचे हुए हो और आगे चलकर भी बचे हो रहना। तुम जैसे अभी ताज़े फूल हो, पवित्र हो, माया से बचे हुए हो, इसी रीति से सदैव बचे ही रहना।
सदा बचपन की लाइफ में अर्थात कोमल रहना और बचकर रहना। बाबा ने कहा- बच्चों को हमारी तरफ से याद देना और कहना कि बाबा की शुरू से लेकर छोटे बच्चों में उम्मीदें रही हैं और बच्यों ने ही माया से बचकर बाबा की उम्मीदें पर्ण की हैं। वही बच्चे आज विश्व-कल्याण के निमित्त बने हुए है। बाबा आप बच्चों में भी शुभ उम्मीदें रखते हैं, तुम बच्चे भी कमाल करके दिखाना। बाबा ने फिर सभी बच्चों को एक सौगात दी। एक बहुत सुन्दर डिब्बी थी। उस डिब्बी में ‘वी’ आकार के बहुत चमकीले तिलक थे। बाबा ने कहा- यह विजय का तिलक सभी बच्चों को सौगात में देना। ऐसे कहते देश-विदेश के चारों ओर के सभी बच्चों को बाबा ने बाप समान बनने तथा निरन्तर डबल लाइट बनने की दुआओं के साथ याद-प्यार दी।
डबल लाइट बनने की साधना करो
छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: डबल लाइट बनने की साधना
प्रश्न 1. बाबा किस प्रकार की साधना करने की शिक्षा देते हैं?
उत्तर: निरन्तर डबल लाइट बनने की साधना।
प्रश्न 2. बाबा के पास ऊपर पहुँचने के लिए कौन-सा साधन बताया गया?
उत्तर: डबल लाइट बनने का साधन।
प्रश्न 3. बाबा ने अपनी लम्बी बाँहों और हथेली के माध्यम से क्या समझाया?
उत्तर: निरन्तर डबल लाइट रहने की आवश्यकता।
प्रश्न 4. बाबा की हथेली पर कौन ऊपर पहुँच सकता था?
उत्तर: जिसकी डबल लाइट बनने की साधना निरन्तर थी।
प्रश्न 5. सभी बच्चे एक सेकण्ड में ऊपर क्यों नहीं पहुँच सके?
उत्तर: उनकी डबल लाइट की साधना में अन्तर था।
प्रश्न 6. डबल लाइट की साधना में किस प्रकार का अन्तर दिखाई दिया?
उत्तर: कोई पूरा पहुँचा, कोई आधा या पौने तक और कोई थोड़ा ही आगे बढ़ा।
प्रश्न 7. बाबा ने बच्चों को दूसरा अवसर क्यों दिया?
उत्तर: ताकि वे बताई गई युक्ति से ऊपर पहुँच सकें।
प्रश्न 8. एक सेकण्ड में ऊपर पहुँचने के लिए बाबा ने क्या युक्ति बताई?
उत्तर: एक सेकण्ड में पावरफुल स्टेज पर खड़े हो जाओ।
प्रश्न 9. बाबा के साथ खेल रहे बच्चों के मन में कौन-सा भाव था?
उत्तर: रहम का भाव कि दूसरे बच्चे भी ऊपर पहुँच जाएँ।
प्रश्न 10. बाबा की गोद में सिर होने की अनुभूति कैसी थी?
उत्तर: सभी स्वयं को पंखुड़ियों के समान और बाबा को फूल के वर के समान अनुभव कर रहे थे।
भाग 2: लक्ष्य और लक्षण
प्रश्न 11. स्थूल संसार की हालत कैसी बताई गई?
उत्तर: मारामारी और परिवर्तन की ओर बढ़ती हुई।
प्रश्न 12. ब्राह्मण संसार में सभी का लक्ष्य क्या था?
उत्तर: बाबा ने जो कहा है, उसे करके दिखाना।
प्रश्न 13. बाबा ने लक्ष्य और लक्षण के विषय में क्या कमी बताई?
उत्तर: लक्ष्य और लक्षण में समानता तथा बैलेंस की कमी।
प्रश्न 14. लक्ष्य का क्या अर्थ है?
उत्तर: जो करने का निश्चय किया है।
प्रश्न 15. लक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर: लक्ष्य के अनुसार व्यवहार और कर्म में दिखाई देने वाले चिन्ह।
प्रश्न 16. लक्ष्य और लक्षण में अन्तर होने से क्या होता है?
उत्तर: संकल्प तो रहता है, लेकिन कर्म में नम्बरवार अन्तर दिखाई देता है।
प्रश्न 17. निरन्तर डबल लाइट रहने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: लक्ष्य और लक्षण का बैलेंस।
प्रश्न 18. परिवर्तन के लिए किन दो बातों की गति तेज होनी चाहिए?
उत्तर: सेवा और स्व-उन्नति की।
भाग 3: पुरुषार्थ में नाजुकपन
प्रश्न 19. बाबा ने संसार की हालत के साथ किसकी हालत को भी नाजुक बताया?
उत्तर: बच्चों के पुरुषार्थ की हालत को।
प्रश्न 20. पुरुषार्थ में नाजुकपन किस प्रकार दिखाई देता है?
उत्तर: संकल्प ऊँचा होता है, लेकिन परिस्थिति आने पर हिम्मत कम हो जाती है।
प्रश्न 21. नाजुकपन के समय मन में कौन-से संकल्प आते हैं?
उत्तर: ‘चल तो रहे हैं’, ‘चाहते तो हैं’, ‘करेंगे जरूर’ और ‘यह तो होता ही है।’
प्रश्न 22. नाजुकपन के स्थान पर कौन-सा शक्तिशाली संकल्प रखना है?
उत्तर: मुझे परिस्थिति पार करके सम्पन्न बनकर दिखाना है।
प्रश्न 23. रॉयल नाजुकपन का क्या परिणाम बताया गया?
उत्तर: सेवा और स्व-उन्नति के बैलेंस में कमी आती है।
प्रश्न 24. बाबा बच्चों में कौन-सी विशेषता देखना चाहते हैं?
उत्तर: शक्तिशाली पुरुषार्थ, सम्पन्नता और निरन्तर डबल लाइट स्थिति।
भाग 4: छोटे बच्चे और विजय का तिलक
प्रश्न 25. बाबा के अनुसार बच्चे किससे बचे हुए होने चाहिए?
उत्तर: माया से।
प्रश्न 26. छोटे बच्चों को बाबा ने क्या शिक्षा दी?
उत्तर: जैसे अभी ताज़े फूल और पवित्र हो, वैसे ही सदैव माया से बचे रहना।
प्रश्न 27. बाबा को बच्चों से शुरू से क्या उम्मीद रही है?
उत्तर: बच्चे माया से बचकर बाबा की उम्मीदें पूर्ण करें।
प्रश्न 28. बाबा ने बच्चों को किस कार्य के लिए निमित्त बताया?
उत्तर: विश्व-कल्याण के लिए।
प्रश्न 29. बाबा ने बच्चों को कौन-सी सौगात दी?
उत्तर: ‘वी’ आकार के चमकीले तिलक।
प्रश्न 30. ‘वी’ आकार के तिलक को बाबा ने किसका प्रतीक बताया?
उत्तर: विजय के तिलक का।
मुख्य शिक्षा
डबल लाइट बनने के लिए निरन्तर साधना करनी है। केवल लक्ष्य रखना पर्याप्त नहीं है; लक्ष्य को अपने लक्षणों और व्यावहारिक कर्मों में लाना है। सेवा तथा स्व-उन्नति दोनों की गति तेज करनी है और परिस्थितियों के सामने नाजुक होने के बजाय शक्तिशाली संकल्प रखना है।
आज का दृढ़ संकल्प:
मैं लक्ष्य और लक्षण का बैलेंस रखूँगा, हर परिस्थिति को पार करूँगा और निरन्तर डबल लाइट बनने की साधना करूँगा।
अस्वीकरण: ये प्रश्न-उत्तर उपलब्ध कराए गए अव्यक्त दिव्य संदेश के आधार पर अध्ययन और आत्मचिंतन के लिए तैयार किए गए हैं।
📝 24. अव्यक्त दिव्य संदेश | 24.05.1990
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