| 18-10-26 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति”अव्यक्त-बापदादा” | रिवाइज: 02-02-12 मधुबन |
अब स्मृति स्वरूप अनुभव की अथॉरिटी बनो, ज्वालामुखी योग द्वारा सबको लाइट माइट की किरणों का सहयोग दो
आज बापदादा अपने सामने या चारों तरफ के अपने छोटे से संसार को देख हर्षित हो रहे हैं क्योंकि यह संसार है छोटा लेकिन अति प्यारा है क्योंकि इस संसार की एक-एक आत्मा श्रेष्ठ आत्मा है। कोटों में कोई आत्मायें हैं। बाप के वर्से के अधिकारी आत्मायें हैं। बापदादा हर बच्चे को देख खुश होते हैं कि यह एक-एक बच्चा राजा बच्चा है। बापदादा ने हर एक बच्चे को स्वराज्य अधिकारी और विश्व राज्य अधिकारी बनाया है। इस समय सभी स्वराज्य अधिकारी हैं अर्थात् मन-बुद्धि, संस्कार, कर्मेन्द्रियों के राजा हैं। कर्मेन्द्रियों के वश नहीं हैं। मन के भी मालिक हैं। तो ऐसे ही आप हर एक बच्चा अपने को मन के मालिक, संस्कारों के भी मालिक समझते हो? ऐसे तो नहीं कभी आप मन के मालिक होते वा कभी मन आपका मालिक होता! क्योंकि कहते ही हो मेरा मन, मैं मन नहीं कहते हो। तो मेरे के आप मालिक हो। चेक करो कभी मन तो मालिक नहीं बन जाता? क्योंकि इस समय बापदादा ने हर एक को स्वराज्य अधिकारी की सीट पर बिठाया है। अब के स्वराज्यधारी हो और भविष्य का राज्य तो आपका है ही। डबल राज्य अधिकारी हो। बापदादा देखते हैं हर बच्चा स्वराज्य अधिकारी के साथ स्वमानधारी भी है। तो मैं स्वमानधारी आत्मा हूँ, इस स्मृति में बैठो तो देखो कितने स्वमानों की लिस्ट आपके सामने आती है। अनेक स्वमान की माला सामने आ जाती है ना!
बापदादा ने बच्चों के स्वमानों की माला हर बच्चे को डाली है। स्वमान सुनते ही आपके सामने भी अपने स्वमान स्मृति में आ गये! याद करो, अनादि स्वरूप में आपका स्वमान कितना बड़ा है! चले गये अनादि स्वरूप में? हर एक का स्वमान है – एक तो बाप के साथ-साथ चमकती हुई आत्मा है, बाप के साथ के कारण विशेष चमकती हुई दिखाई दे रही है। देख रहे हो? जैसे आकाश में भी यहाँ कोई-कोई सितारा विशेष चमकता है, ऐसे बाप के साथ-साथ होने कारण चमकती हुई आत्मा हो। याद आया अपना अनादि स्वरूप? सेकण्ड में अपने अनादि स्वरूप में स्थित हो सकते हो? अभी एक सेकण्ड में उस अनादि स्वरूप में एक सेकण्ड के लिए स्थित हो जाओ। कितना नशा चढ़ता है! आगे बढ़ो, इस सृष्टि चक्र के आदि में आ गये! यह ड्रिल करो सतयुग आदि में अपना स्वरूप देखो, कितना श्रेष्ठ सुख स्वरूप है। कितना सर्व प्राप्ति स्वरूप है। दु:ख का नामनिशान नहीं है। प्रकृति कितनी सुन्दर सतोगुणी है। अनुभव करो अपने देवता स्वरूप का। देख रहे हो अपना स्वरूप? कोई भी राजा हो, महात्मा हो, नेता हो ऐसा सर्व प्राप्ति स्वरूप कोई देखा! तो एक सेकण्ड के लिए अपने देवता स्वरूप में स्थित हो जाओ। अपने स्वमान में मजा आता है ना! हम सो देवता… बापदादा यह ड्रिल करा रहा है। फिर नीचे आओ कौन सा युग आ गया? द्वापर में भी आपका स्वमान पूज्य का है। पूज्य स्वरूप है। अपने पूज्य स्वरूप को देख रहे हो? कितने सभी भावना से कायदे प्रमाण पूजा करते हैं। ऐसे कायदे प्रमाण पूजा और किसी की भी नहीं होती। चाहे धर्म पितायें आये, चाहे गुरू बने, नेतायें बने, अभिनेतायें बने लेकिन ऐसी कायदे प्रमाण पूजा किसकी नहीं होती। तो अपना स्वमान देखा, अनुभव किया? अब आओ संगम में, सब चक्र लगा रहे हो? पीछे वाले चक्र लगा रहे हो! हाथ उठाओ। देखो अपना स्वमान क्योंकि स्वराज्य अधिकारी हो ना! तो संगम पर स्वयं भगवान, आपकी जीवन में स्वयं मालिक आप बच्चों में पवित्रता की विशेषता भरता है। जो पवित्रता आपके सर्व अविनाशी सुखों की खान है। और बनाने वाला कौन? स्वयं भगवान। वह तो अभी भी प्रत्यक्ष प्रमाण आपको पवित्रता की जायदाद बाप से प्राप्त हो गई है। अब चेक करो – पवित्रता सर्व प्राप्तियों का आधार है, पवित्रता से आप सभी मास्टर सर्वशक्तिमान बन गये। तो चेक करो सर्वशक्तियां प्राप्त हैं? कोई-कोई बच्चे कहते हैं बाप ने तो सर्व शक्तियां दी लेकिन कोई-कोई समय जिस शक्ति की आवश्यकता होती है वह थोड़ा टाइम के बाद आती है। बात पूरी हो जाती है फिर आती है। इसका कारण क्या? वरदान में बाप ने दी फिर भी समय पर नहीं आती है उसका कारण क्या? अपने मास्टर सर्वशक्तिमान के स्मृति की सीट पर नहीं होते हो, कोई भी किसका आर्डर मानते हैं तो सीट वाले का आर्डर मानते हैं। तो जब भी आप कोई भी शक्ति का आर्डर करते हो, पहले यह देखो स्मृति की सीट पर हैं? स्वमान के सीट पर हैं? स्मृति की सीट पर स्थित हो जाओ तो सर्व शक्तियां आपके पास समय पर बंधी हुई हैं आने के लिए क्योंकि सर्वशक्तिमान बाप ने आपको मास्टर सर्वशक्तिमान बनाया है। तो इतने पावरफुल स्वमानधारी बन चल रहे हो ना? अपने स्वमान देखे? संगम के बाद कहाँ जायेंगे? रिटर्न जरनी करेंगे ना! इसलिए बापदादा यही चाहते हैं कि हर एक सारे दिन में यह एक्सरसाइज़ करते रहें। समय निकालो बार-बार यह स्वमान की माला पहनने से, अनुभव करने से जो बापदादा ने स्वराज्य अधिकारी बनाया है, वह हो नहीं सकता कि स्वमान आपके आर्डर पर नहीं चले। सिर्फ सीट पर सेट रहो।
बापदादा ने देखा सभी अटेन्शन रखते हैं लेकिन नियमित रूप से अपनी दिनचर्या सेट करो। बीच-बीच में यह अपने स्वमान के स्मृति स्वरूप में स्थित रहो। जैसे ट्रैफिक कन्ट्रोल करते हो ऐसे यह स्वमान की स्मृति आदिकाल से रिटर्न जरनी तक की, बीच-बीच में टाइम फिक्स करो। यह चलते फिरते भी कर सकते हो क्योंकि मन को सीट पर बिठाना है। बापदादा ने देखा, पहले भी कहा है योग सब लगाते हो लेकिन अब आवश्यकता किसकी है? समय की हालतों को देख पहले भी सुनाया अब ज्वालामुखी योग की आवश्यकता है, जिससे डबल काम होगा। एक तो अपने पुराने संस्कार का संस्कार हो जायेगा, अभी संस्कारों को मारते हो लेकिन जलाते नहीं हो। मारने के बाद फिर भी कभी-कभी वह जाग जाते हैं। जैसे रावण को सिर्फ मारा नहीं, जलाया। ऐसे आप भी अपने पुराने संस्कारों को जो बीच-बीच में तीव्र पुरुषार्थ में कमी कर देते हैं, उसके लिए ज्वालामुखी योग की आवश्यकता है। एक स्वयं के लिए और दूसरा ज्वालामुखी योग द्वारा औरों को भी लाइट रूप होने के कारण, माइट रूप होने के कारण उन्हों को भी अपनी किरणों द्वारा सहयोग दे सकते हो। तो अभी सभी ने योग को ज्वालामुखी योग में परिवर्तन किया? समय अनुसार अभी आत्माओं को आपके सहयोग की आवश्यकता है। बाकी बापदादा तो अमृतवेले हर बच्चे को स्नेह देते हैं।
बापदादा देखते हैं लक्ष्य बहुत अच्छा रखते हैं, हिम्मत भी रखते हैं लेकिन सारा दिन उसी अटेन्शन में रहें, जैसे अमृतवेले रहता है, वह कम हो जाता है। कारण क्या होता है? यह जो कर्म में लगते हो, कर्मयोगी बन कर्म करना, इसमें अन्तर पड़ जाता है। आप सिर्फ योग लगाने वाले नहीं हो, योगी जीवन वाले हो। तो जीवन सदा रहती है, कभी-कभी नहीं। तो बापदादा अभी क्या चाहते हैं? प्यार में तो बहुत करके पास हैं, प्यार की सबजेक्ट में बाप ने देखा मैजारिटी बाप के साथ मेरा बाबा, मेरा बाबा कह प्यार का अनुभव करते हैं। प्यार में तो मैजारिटी पास हैं, अब किसमें पास होना है? बाप समान बनने में। सभी क्या चाहते हैं? बाप समान बनना है कि बाप बाप रहेगा आप बच्चे हैं, तो बाप समान तो बनना पड़ेगा। प्यार माना क्या? प्यार वाला जो कहे वह करना ही है। तो सभी बाप के प्यारे हो, बाप का प्यार आपसे है? इसमें हाथ उठाओ। प्यार है अच्छा, प्यार है? तो अभी बापदादा यही चाहते हैं कि जैसे प्यार है, ऐसे यह लक्ष्य रखो कि हमें बाप समान बनना ही है, इसमें हाथ उठाओ। तो निश्चय रखते हैं, हाथ तो बहुत अच्छा उठाते हैं। बापदादा देख रहे हैं।
बापदादा चाहता है एक-एक बच्चा ऐसा खुशनुमा, खुशनसीब दिखाई दे, चेहरे से चलन से क्योंकि समय प्रमाण अभी आपका चेहरा बहुत सेवा करेगा। आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए बापदादा चाहता है कि अभी से लक्ष्य रखो जैसे अभी यह 75 वर्ष के कारण सबको उमंग है सेवा करने का। ऐसे उमंग हो चेहरे से सेवा करने का क्योंकि दिनप्रतिदिन समय नाज़ुक आना ही है। तो ऐसे समय पर आपका चेहरा आत्माओं को चियरफुल बना दे।
बापदादा ने आज अमृतवेले चक्कर लगाया, तो क्या देखा? बैठते सभी अपने रूचि से भी हैं लेकिन सबसे बड़ी अथॉरिटी है अनुभव की। तो देखा बैठते हैं लेकिन अनुभव की अथॉरिटी बनकर बैठें, स्मृति में बैठते हैं लेकिन स्मृति स्वरूप अनुभव हो। अनुभव की अथॉरिटी का आनंद वह थोड़ा समय होता है। सोचते हैं मैं बापदादा के तख्तनशीन हूँ लेकिन स्वरूप के स्मृति स्वरूप अनुभवी मूर्त, अनुभव में खो जायें, उसे अभी और भी आगे बढ़ाना होगा क्योंकि अनुभव की अथॉरिटी सबसे बड़े ते बड़ी है। स्मृति स्वरूप रहना इसको कहा जाता है अनुभव। तो अनुभव में खो जाना जो स्वरूप की स्मृति रखते हैं, उस स्वरूप की अनुभूति में रहना इसकी और आवश्यकता है क्योंकि अनुभव कभी भी भूलता नहीं है। किसी को भी आप किसी के अनुभव द्वारा सुनाने की कोशिश करते हो तो अनुभव का प्रभाव पड़ता है। तो स्वयं को जो स्वरूप स्मृति में रखते हो उसके स्वरूप की अनुभूति में खो जायें, अनुभव अपने पुरुषार्थ में भी बहुत मदद करता है। तो बापदादा ने देखा अनुभव की अथॉरिटी में नम्बरवार हैं। तो अभी इस अनुभव की अथॉरिटी के अभ्यास के ऊपर और अटेन्शन दो। अनुभव स्वरूप की स्थिति सदा समाई हुई रहती है, उसकी शक्ल, चलन सेवा करती है।
तो आज बापदादा बच्चों का रिकार्ड देख रहे थे। तो एक तो ज्वालामुखी योग के ऊपर और अटेन्शन दो जिससे स्वभाव संस्कार परिवर्तन में सहयोग मिलेगा। संस्कार जिसको आप नेचर कहते हो वह अभी भी अपना कार्य बीच-बीच में कर लेती है। बाकी बापदादा खुश है, किस बात पर? जानते हो, किस बात पर बापदादा खुश है? जानते हो? आजकल की मुरलियां सुनते हुए बापदादा ने देखा अपने दिनचर्या में अटेन्शन ज्यादा गया है। अटेन्शन बढ़ा है तो टेन्शन संस्कारों का कम होता जायेगा। बापदादा ने पहले भी कहा जब भी टेन्शन आवे ना, ए लगा दो, एड कर दो ए, अटेन्शन। चलना तो सबको है ही। यह तो वायदा है ही पक्का। साथ चलेंगे, साथ राज्य करेंगे। तो सभी खुश हैं या कभी-कभी खुश हैं? जो समझते हैं हम सदा खुश हैं, कभी-कभी नहीं, सदा खुश हैं, देखो सोचके हाथ उठाओ। अच्छा। हाथ भी सोचके उठा रहे हैं। खुशी अपनी चीज़ है। अपनी चीज़ क्यों जाये? तो अभी क्या करेंगे? आगे चलना तो है ही। तो अभी आगे क्या करेंगे?
हर सेन्टर निर्विघ्न, व्यर्थ संकल्प रहित, हो सकता है? हो सकता है या इसके लिए समय चाहिए? अभी तक बाप-दादा के पास कोई सेन्टर ने यह रिपोर्ट नहीं दी है कि हमारा सेन्टर सदा निर्विघ्न है, साथी भी निर्विघ्न हैं। सिर्फ स्वयं नहीं, साथी भी निर्विघ्न हों। वह भी टाइम आना है। हो जायेगा क्योंकि बनना तो बच्चों को ही है और कोई एक्जैम्पुल में आयेंगे जो पीछे तीव्र पुरुषार्थी बन आगे जायेंगे लेकिन मैजारिटी तो आपको ही आगे जाना है। बापदादा ने देखा मुरली से प्यार मैजारिटी का है लेकिन जैसे जगत अम्बा ने प्रत्यक्ष जीवन में दिखाया कि जो बाप ने कहा वह करना ही है, लक्ष्य रखा और पुरुषार्थ के तरफ अटेन्शन भी दिया। आपकी दीदी दादियां जो एडवांस पार्टी में भी गई हैं उन्होंने भी अटेन्शन दिया, अभी आप लोगों का इन्तजार कर रहे हैं। पूछती हैं वह कि समाप्ति का गेट कब खोलेंगे? एक दो तो नहीं खोलेगा ना! तो अभी पुरुषार्थ करके गेट खुलने के समय को समीप लाओ। सम्पन्न बनना अर्थात् समीप लाना।
सभी चारों ओर के बच्चों को बापदादा दिल का स्नेह दे रहे हैं। साथ-साथ जो बापदादा ने दो मास का कार्य दिया है, उसकी भी स्मृति दिला रहे हैं, क्यों? बहुत करके यह व्यर्थ संकल्प पुरुषार्थ को तीव्र के बजाए साधारण कर देते हैं इसलिए चारों ओर के बच्चों को बापदादा यादप्यार के साथ यह भी स्मृति दिला रहे हैं कि अब संगम का समय कितना श्रेष्ठ सुहावना है, इस संगम के समय ही सर्व खजाने बाप द्वारा प्राप्त होते हैं, संगम का एक-एक सेकण्ड महान है इसलिए संगम के समय का मूल्य सदा अपने बुद्धि में रखो। संगम का एक सेकण्ड प्राप्ति कितना कराता है। आपसे कोई पूछे आपको क्या मिला है! तो क्या जवाब देंगे? अप्राप्त नहीं कोई वस्तु हम ब्राह्मणों के दिल में। पाना था वो पा लिया। अब उसको कार्य में लगाते हुए तीव्र पुरुषार्थी बन समय को समीप लाओ। अच्छा। बापदादा देखते हैं सभी को उमंग भी आता है और यह उमंग सदा आगे बढ़ाते रहो। अच्छा।
| वरदान:- | अपने स्वरूप द्वारा भक्तों को लाइट के क्राउन का साक्षात्कार कराने वाले इष्ट देव भव जबसे आप बाप के बच्चे बने, पवित्रता की प्रतिज्ञा की तो रिटर्न में लाइट का ताज प्राप्त हो गया। इस लाइट के ताज के आगे रत्न जड़ित ताज कुछ भी नहीं है। जितना-जितना संकल्प, बोल और कर्म में प्योरिटी को धारण करते जायेंगे उतना यह लाइट का क्राउन स्पष्ट होता जायेगा और इष्ट देव के रूप में भक्तों के आगे प्रत्यक्ष होते जायेंगे। |
| स्लोगन:- | सदा बापदादा की छत्रछाया के अन्दर रहो तो विघ्न-विनाशक बन जायेंगे। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
जैसे बापदादा सदा बच्चों के साथ हर कदम में सहयोगी हैं और अन्त तक रहेंगे। बाप को किसी के प्रति घृणा नहीं होती। सदैव अपकारी के भी शुभ चिन्तक हैं, ऐसे फालो फादर। हर आत्मा के प्रति सदा शुभ भाव और भावना रखो। इसने ऐसा क्यों किया, यह सोचने के बजाए इस आत्मा का कल्याण कैसे हो – यह सोचो तब कहेंगे शुभचिंतक वा विश्व कल्याणकारी आत्मा।
विशेष सूचना – मास के तीसरे रविवार का योग अभ्यास
आज मास का तीसरा रविवार है, सभी भाई बहिनें संगठित रूप में एकत्रित होकर सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अपने शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित हो, शान्ति के सागर की गहराई में जाकर उस परम सुख वा शीतलता की गहन अनुभूति करें तथा सर्व आत्माओं को शान्ति का दान देने की सेवा करें।
सिर्फ याद नहीं, अनुभव की अथॉरिटी बनो!
मूल मुरली: 2 फरवरी 2012
मुख्य विषय:
स्वमान, स्वराज्य, ज्वालामुखी योग और संस्कार परिवर्तन
उपशीर्षक:
स्वमान की सीट पर स्थित रहो • पुराने संस्कार जलाओ • लाइट-माइट से आत्माओं को सहयोग दो
तारीख का स्पष्टीकरण: आपके संलग्न मूल पाठ पर 18 अक्टूबर 2026 की तारीख और “अव्यक्त-बापदादा, रिवाइज: 02-02-2012, मधुबन” लिखा है। इसलिए नीचे का मंथन इसी अव्यक्त मुरली पर आधारित है, न कि 18 अक्टूबर की साकार मुरली पर।
1. आज का मुख्य प्रश्न
क्या मैं केवल बाबा को याद करता हूँ, या उस याद का अनुभव करके अपने मन, संस्कार और कर्मों को भी बदल रहा हूँ?
आज की मुरली में बाबा बच्चों को स्वराज्य अधिकारी और स्वमानधारी बनने, स्मृति को अनुभव में बदलने तथा ज्वालामुखी योग द्वारा पुराने संस्कारों को समाप्त करने की प्रेरणा देते हैं। साथ ही, अपनी स्थिति से दूसरे लोगों को भी शान्ति और शक्ति का सहयोग देने पर बल दिया गया है।
2. आज की मुरली के मुख्य
मंथन-बिंदु
1. स्वराज्य अधिकारी बनो
अपने मन के
मालिक रहो
मूल मुरली की बात: बाबा पूछते हैं कि क्या बच्चे मन और संस्कारों के मालिक हैं, या कभी मन उनका मालिक बन जाता है? स्वराज्य अधिकारी होने का अर्थ मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेन्द्रियों पर
अधिकार रखना है।
हमारा मंथन: यदि कोई परिस्थिति आते ही हमारा स्वभाव बदल जाता है, क्रोध हावी हो जाता है या मन व्यर्थ विचारों में उलझ जाता है, तो यह अपनी स्थिति की जाँच करने का अवसर है।
स्वराज्य का अभ्यास यह है कि प्रतिक्रिया से पहले रुकें, अपने संकल्प को पहचानें और फिर श्रेष्ठ निर्णय लें।
2. स्वमान की सीट पर स्थित रहो
मूल मुरली की बात: बाबा बच्चों को अपने अनादि स्वरूप, देवता स्वरूप और पूज्य स्वरूप की स्मृति का अभ्यास कराते हैं। दिनभर समय निकालकर बार-बार स्वमान की स्मृति में स्थित होने की प्रेरणा देते हैं।
हमारा मंथन: स्वमान का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि अपनी आत्मिक पहचान और श्रेष्ठ लक्ष्य को याद रखना है। जब हम स्वमान में स्थित होते हैं, तो दूसरों की प्रशंसा या आलोचना से अपनी आंतरिक स्थिरता को अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं होने देते।
3. स्मृति से आगे बढ़कर अनुभव की अथॉरिटी बनो
मूल मुरली की बात: बाबा कहते हैं कि केवल स्मृति में बैठना पर्याप्त नहीं; अपने स्वरूप की अनुभूति में स्थित होने का अभ्यास बढ़ाना है। अनुभव की अथॉरिटी को सबसे बड़ी अथॉरिटी बताया गया है।
हमारा मंथन: शान्ति के बारे में जानना और कठिन परिस्थिति में शान्त रहना अलग-अलग बातें हैं। आत्म-अभिमानी होने का ज्ञान और वास्तविक व्यवहार में आत्म-अभिमानी रहना भी अलग हैं।
इसलिए स्वयं से पूछें—आज मैंने किस श्रेष्ठ गुण को केवल याद नहीं किया, बल्कि अनुभव करके अपने व्यवहार में उतारा?
4. पुराने संस्कारों को केवल दबाओ नहीं, बदलो
मूल मुरली की बात: बाबा ज्वालामुखी योग की आवश्यकता बताते हैं। मुरली में समझाया गया है कि पुराने संस्कारों को केवल दबा देने से वे फिर उभर सकते हैं; उनके परिवर्तन के लिए शक्तिशाली योग की आवश्यकता है।
हमारा मंथन:
किसी आदत को कुछ समय रोक लेना और उसके मूल प्रभाव से मुक्त होना एक जैसी बात नहीं है। उदाहरण के लिए, क्रोध को बाहर न दिखाना पहला कदम हो सकता है; लेकिन मन में बनी कटुता और शिकायत को पहचानकर बदलना अधिक गहरा अभ्यास है।
5. योग लगाने वाले नहीं, योगी जीवन वाले बनो
मूल मुरली की बात: बाबा बताते हैं कि अमृतवेले का अटेन्शन दिनभर कर्म करते समय कम हो जाता है। इसलिए केवल कुछ समय योग करने के बजाय योगी जीवन अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
हमारा मंथन:
आध्यात्मिक अभ्यास का प्रभाव हमारे काम, बातचीत और सम्बन्धों में भी दिखाई देना चाहिए। याद को दैनिक जीवन से जोड़ने के लिए बीच-बीच में कुछ क्षण रुककर अपने स्वमान और स्थिति की जाँच की जा सकती है।
6. अपने परिवर्तन से दूसरों को सहयोग दो
मूल मुरली की बात: बाबा ज्वालामुखी योग द्वारा स्वयं पुराने संस्कारों को जलाने और लाइट-माइट के स्वरूप से दूसरों को सहयोग देने की प्रेरणा देते हैं। अव्यक्त इशारे में अपकारी आत्मा के प्रति भी शुभ भावना और उसके कल्याण की भावना रखने
को कहा गया है।
हमारा मंथन:
दूसरों को सलाह देना सेवा का एक तरीका है, लेकिन हमारा शांत, स्थिर और सहयोगी व्यवहार भी प्रेरणा दे सकता है। किसी से असहमति होने पर भी उसके प्रति घृणा के बजाय विवेकपूर्ण शुभ भावना रखना इस शिक्षा का व्यावहारिक रूप हो सकता है।
3. तुलनात्मक अध्ययन — स्मृति को अनुभव और परिवर्तन में कैसे बदलें?
आज की मुरली से चुना गया मुख्य विषय है:
स्मृति स्वरूप बनना, अनुभव की अथॉरिटी प्राप्त करना और उस अनुभव से अपने संस्कार तथा कर्म बदलना।
मुरली 1
18 जनवरी 1991
अव्यक्त मुरली
विषय: विश्व कल्याणकारी बनने के लिए सर्व स्मृतियों से सम्पन्न बन सर्व को सहयोग दो
मूल मुरली की बात: बाबा समझाते हैं कि स्मृति स्वरूप बनने का अर्थ केवल स्मृतियों को दोहराना नहीं, बल्कि उनके स्वरूप की अनुभूति करना है। मुरली में श्रेष्ठ आत्मिक स्वरूपों की स्मृति को अनुभव में लाने और उस शक्ति से विश्व की आत्माओं को सहयोग देने पर बल है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
18 अक्टूबर की मुरली में भी बाबा कहते हैं कि स्मृति में बैठने के साथ-साथ स्मृति स्वरूप का अनुभव करना आवश्यक है।
उदाहरण के लिए, केवल स्वयं को शान्त आत्मा याद करना एक बात है; कठिन परिस्थिति में वास्तव में शान्त रहना और दूसरों को भी शान्ति का अनुभव कराना दूसरी बात है।
आज का प्रश्न: क्या मेरी स्मृति का प्रभाव मेरे व्यवहार और दूसरों के साथ सम्बन्धों में दिखाई देता है?
18 जनवरी 1991 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2
30 जनवरी 2010
अव्यक्त मुरली
विषय: चारों सब्जेक्ट में स्वमान के अनुभवी स्वरूप बन अनुभव की अथॉरिटी को कार्य में लगाओ
मूल मुरली की बात: बाबा ज्ञान, योग, धारणा और सेवा—चारों विषयों में केवल ज्ञानी या पुरुषार्थी बनने के बजाय अनुभवी स्वरूप बनने की आवश्यकता बताते हैं। मुरली के अनुसार, अनुभव की स्थिति सहज और स्वाभाविक बनती है तथा स्वभाव-संस्कार के परिवर्तन और सेवा की सफलता में सहायता करती है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
आज की मुरली भी स्मृति को अनुभव में बदलने और कर्मयोगी जीवन में उसे बनाए रखने पर बल देती है।
यदि हमें ज्ञान है कि क्रोध नहीं करना चाहिए, लेकिन बार-बार वही प्रतिक्रिया होती है, तो केवल ज्ञान याद करना पर्याप्त नहीं। हमें अपने व्यवहार में शान्ति का अभ्यास करना होगा।
आज का प्रश्न:
क्या मेरे ज्ञान, योग, धारणा और सेवा में अनुभव की झलक दिखाई देती है?
30 जनवरी 2010 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3
31 दिसंबर 2011
अव्यक्त मुरली
विषय: ज्वालामुखी योग से व्यर्थ को जलाओ और अशान्त आत्माओं को शक्तियों का दान दो
मूल मुरली की बात: बाबा ज्वालामुखी योग को लाइट-माइट स्वरूप शक्तिशाली योग के रूप में समझाते हैं। मुरली में अपने पुराने संस्कारों के परिवर्तन के साथ दुःखी और अशान्त आत्माओं को मन्सा सेवा द्वारा शक्ति और शान्ति देने की आवश्यकता बताई गई है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
18 अक्टूबर की मुरली इसी शिक्षा को आगे बढ़ाती है—पहले अपने संस्कारों का परिवर्तन, फिर अपनी स्थिति से दूसरों को सहयोग।
इससे यह समझना उपयोगी है कि ज्वालामुखी योग का मंथन केवल तीव्रता तक सीमित न रहे; उसका परिणाम व्यर्थ संकल्पों में कमी, स्थिर स्वभाव और शुभ भावना में भी दिखना चाहिए।
आज का प्रश्न: क्या मैं अपनी साधना से केवल स्वयं को बदलने का प्रयास कर रहा हूँ, या अपने व्यवहार से दूसरों को भी शान्ति और सहयोग दे रहा हूँ?
31 दिसंबर 2011 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 4
18 मार्च 2019
अव्यक्त मुरली
विषय: चारों सब्जेक्ट में अनुभव की अथॉरिटी बनो, लक्ष्य और लक्षण को समान बनाओ
मूल मुरली की बात: बाबा लक्ष्य और लक्षण में समानता रखने की प्रेरणा देते हैं। मुरली में स्पष्ट किया गया है कि ज्ञान को जानना और ज्ञान के अनुभव स्वरूप में हर कर्म करना अलग बातें हैं। अनुभव की अथॉरिटी को श्रेष्ठ बताते हुए स्व-स्थिति में स्थिर रहने पर बल है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
आज की मुरली में बाबा समान बनने के लक्ष्य को केवल संकल्प तक सीमित नहीं रखते। लक्ष्य है—स्मृति और अनुभव को स्वभाव तथा कर्म का
हिस्सा बनाना।
यदि हम अपने लक्ष्य में सदा खुश रहना चाहते हैं, तो स्वयं की जाँच करें कि क्या हमारी खुशी परिस्थितियों के साथ बार-बार बदलती है या हम अपनी स्थिति को सम्भालने का अभ्यास कर रहे हैं।
आज का प्रश्न:
क्या मेरे जीवन के लक्षण मेरे आध्यात्मिक लक्ष्य के अनुरूप हैं?
18 मार्च 2019 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
दिनांक
मूल मुरली का विशेष बल
आज के लिए सीख
18 जनवरी 1991
स्मृतियों की अनुभूति और विश्व कल्याण
अनुभव को दूसरों के सहयोग में लगाएँ
30 जनवरी 2010
चारों विषयों में अनुभव की अथॉरिटी
ज्ञान को व्यवहार में उतारें
31 दिसंबर 2011
ज्वालामुखी योग और संस्कार परिवर्तन
व्यर्थ संकल्प घटाएँ, दूसरों को शक्ति दें
18 मार्च 2019
लक्ष्य और लक्षण में समानता
जो कहते हैं, उसे जीवन में उतारें
2 फरवरी 2012
आज संलग्न मूल मुरली का दिनांक
स्वमान, अनुभव और ज्वालामुखी योग
स्वयं का परिवर्तन कर दूसरों को सहयोग दें
तुलनात्मक निष्कर्ष: इन चुने हुए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता। सभी में एक साझा दिशा है—स्मृति को अनुभव में लाना, अनुभव को कर्म में उतारना और अपनी स्थिति से दूसरों को सहयोग देना। यह हमारा तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली के अतिरिक्त शब्द नहीं।
छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर:स्मृति स्वरूप अनुभव की अथॉरिटी बनना और ज्वालामुखी योग से पुराने संस्कार बदलना।
प्रश्न 2: स्वराज्य अधिकारी किसे कहते हैं?
उत्तर: जो अपने मन, बुद्धि,संस्कार और कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखने का अभ्यास करता है।
प्रश्न 3: स्वमान और अहंकार में क्या अन्तर है?
उत्तर: स्वमान अपनी आत्मिक पहचान और श्रेष्ठ लक्ष्य की स्मृति है; अहंकार स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की भावना है।
प्रश्न 4: स्मृति स्वरूप बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: केवल किसी गुण को याद करना नहीं, बल्कि उसकी अनुभूति करके उसके अनुसार कर्म करना।
प्रश्न 5: ज्वालामुखी योग का एक मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: पुराने संस्कारों को बदलना और अपनी स्थिति से दूसरों को लाइट-माइट का सहयोग देना।
प्रश्न 6: केवल अमृतवेले योग करना पर्याप्त क्यों नहीं?
उत्तर: क्योंकि दिनभर कर्म करते समय भी योगी जीवन और श्रेष्ठ स्थिति बनाए रखने का अभ्यास
आवश्यक है।
प्रश्न 7: अनुभव की अथॉरिटी का व्यावहारिक प्रमाण क्या है?
उत्तर: ज्ञान और स्वमान के अनुसार व्यवहार, निर्णय और कर्म करना।
प्रश्न 8: 31 दिसंबर 2011 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: ज्वालामुखी योग से व्यर्थ संकल्पों को जलाना और अशान्त आत्माओं को शान्ति तथा शक्ति का
सहयोग देना।
प्रश्न 9: लक्ष्य और लक्षण में समानता का क्या अर्थ है?
उत्तर: जिस श्रेष्ठ स्थिति को प्राप्त करना चाहते हैं, उसके अनुरूप अपना व्यवहार और स्वभावबनाना।
प्रश्न 10: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: क्या जिस श्रेष्ठ गुण को मैं याद करता हूँ, उसका अनुभव मेरे कर्मों और स्वभाव में दिखाई
देता है?
📝 1001. अव्यक्त मुरली | 02-02-12
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
