27.11.1991
योग के प्रयोग से प्रगति की प्रमोशन लो
मिलन का अनमोल अनुभव करते आगे बढ़ती गई। बापदादा बोले आओ मेरी बेहद की वैरागी आज अमृतवेले बापदादा के पास जाते ही मुख की मधुर मुस्कान और नयनों के अलौकिक स्वतः सहययोगी बच्ची. आओ! क्या समाचार लाई हो? मैं बोली- बाबा, आज तपस्या वर्षका समाचार लाई है। चारों ओर सब अपनी-अपनी लगन अनुसार तपस्या में लगे हुए हैं और अच्छे अच्छे अनुभव कर रहे हैं। विशेष तो स्वयं के पुरुषार्थ और सेवा में आपकी एकस्ट्रा मदद के बहुत विचित्र अनुभव कर रहे हैं। बापदादा मीठी मुस्कराये और बोले- बच्ची लगन तो अच्छी है और रहेगी भी। अब तो तपस्या वर्ष के सम्पन्न होने का भी समय समीप आ रहा है। इस थोडेसे रहे ह समय में और भी अधिक लाभ उठा सकते हैं। क्योकि तपस्या वर्ष विशेष खले मन से वरदान प्राप्न करने का वर्ष है। इसमें दो वरदानों का अनुभव और ज़्यादा कर सकते हैं।एक – स्व-पुरुषार्थ व सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति का प्रत्यक्षफलदूसरा निश्चय की दृढ़ता द्वारा असम्भव से सम्भव होने के प्रत्यक्ष नजाने अनुभव कर सकते हैं।अभी भी और अधिक योग के प्रयोग द्वारा स्वयं के कड़े संस्कार-स्वभाव और औरों की वृति को परिवर्तन करने की विधि पर रिसर्च करने का अनुभव बढ़ाना है।इसलिए बापदादा ने वर्ष सम्पन्न के पहले स्मृति-सो-समर्थी मास जनवरी में विशेष शक्तिशाली प्रयोग करने के लिए सम और इशारा दिया है। इसमें जो जितना सच्चाई-सफाई से, खले दिल से शुभ भावना-कामना के सम्बन्ध से स्व और सेवा प्रति प्रयोग कर प्रगति की प्रमोशन लेने चाहे, वह ले सकते हैं। लेकिन नियम, संयम और स्व साधना की आवश्यकता है। फिर तो बाबा को सेवा का समाचार सुनाया। बाबा बोले- बच्चे, इस छोटे-से प्यारे ब्राह्मण जीवन में जो पाना चाहो वह पा लो। जो बनने चाहे वह बन जाओ, जितना बनाना चाहो उतना वर्तमान और भविष्य बनाओ। उड़ो और उड़ाओ। ऐसे कहते बाबा ने देश-विदेश के सर्व बच्चों को अपने सम्मुख बहुत बड़ी सेना के रूप में इमर्ज किया और मीठी मुस्करान और नयनों द्वारा याद-प्यार दी और स्वयं में लवलीन कर लिया।
योग के प्रयोग से प्रगति की प्रमोशन लो
दिनांक: 27 नवम्बर 1991
प्रस्तावना
27 नवम्बर 1991 के इस अव्यक्त संदेश में बापदादा ने तपस्या वर्ष के अन्तिम समय का विशेष महत्व बताया। बाबा ने कहा कि तपस्या वर्ष केवल पुरुषार्थ करने का वर्ष नहीं, बल्कि खुले दिल से वरदान प्राप्त करने और योग के प्रयोग द्वारा प्रत्यक्ष परिणाम अनुभव करने का वर्ष है।
बापदादा ने दो विशेष वरदानों का अनुभव करने की प्रेरणा दी—स्व-पुरुषार्थ और सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति तथा दृढ़ निश्चय द्वारा असम्भव को सम्भव करने का अनुभव।
अब योग को केवल लगाने तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उसके प्रयोग से स्वयं के संस्कारों, स्वभाव और दूसरों की वृत्ति में परिवर्तन लाने की विधि का अनुभव बढ़ाना है।
1. तपस्या वर्ष का अन्तिम समय — अधिक लाभ उठाओ
बापदादा ने कहा कि तपस्या वर्ष के सम्पन्न होने का समय समीप आ रहा है। इस थोड़े से बचे हुए समय में भी अधिक लाभ उठाया जा सकता है।
तपस्या वर्ष विशेष रूप से खुले मन से वरदान प्राप्त करने का वर्ष है।
मुख्य शिक्षा: बचे हुए समय का पूरा लाभ उठाकर पुरुषार्थ और सेवा में श्रेष्ठ प्राप्ति करनी है।
2. पहला वरदान — सहज श्रेष्ठ प्राप्ति का प्रत्यक्षफल
बापदादा ने बताया कि तपस्या वर्ष में पहला विशेष वरदान है—स्व-पुरुषार्थ और सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति का प्रत्यक्षफल अनुभव करना।
योग के प्रयोग से अपने पुरुषार्थ और सेवा दोनों में श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
मुख्य शिक्षा: योग के प्रयोग द्वारा अपने पुरुषार्थ और सेवा की सफलता का प्रत्यक्ष अनुभव करना है।
3. दूसरा वरदान — असम्भव को सम्भव बनाना
दूसरा वरदान है निश्चय की दृढ़ता द्वारा असम्भव को सम्भव करने का प्रत्यक्ष अनुभव।
जब निश्चय दृढ़ होता है तो आत्मा में ऐसी शक्ति आती है जिससे कठिन और असम्भव लगने वाले कार्य भी सम्भव हो सकते हैं।
मुख्य शिक्षा: अपने निश्चय को इतना दृढ़ बनाना है कि असम्भव भी सम्भव अनुभव हो।
4. योग के प्रयोग द्वारा संस्कार परिवर्तन
बापदादा ने विशेष प्रेरणा दी कि अब योग के प्रयोग द्वारा स्वयं के कड़े संस्कार और स्वभाव को परिवर्तन करने की विधि पर रिसर्च करनी है।
केवल योग में बैठना पर्याप्त नहीं, बल्कि योग से प्राप्त शक्ति को जीवन में प्रयोग करना है।
मुख्य शिक्षा: योग की शक्ति से अपने पुराने संस्कार और स्वभाव को परिवर्तन करना है।
5. दूसरों की वृत्ति परिवर्तन करने का प्रयोग
बाबा ने केवल स्वयं के परिवर्तन की बात नहीं कही, बल्कि दूसरों की वृत्ति को परिवर्तन करने की विधि पर भी प्रयोग करने की प्रेरणा दी।
शुभ भावना और शुभ कामना के सम्बन्ध से स्वयं और सेवा के प्रति प्रयोग करना है।
मुख्य शिक्षा: योग के प्रयोग से अपनी स्थिति के साथ दूसरों की वृत्ति में भी परिवर्तन लाने का पुरुषार्थ करना है।
6. जनवरी — स्मृति-सो-समर्थी मास
बापदादा ने वर्ष सम्पन्न होने से पहले जनवरी को विशेष स्मृति-सो-समर्थी मास के रूप में शक्तिशाली प्रयोग करने का इशारा दिया।
इस मास में सभी को विशेष रूप से योग की शक्ति और प्रयोग द्वारा आगे बढ़ना है।
मुख्य शिक्षा: जनवरी में शक्तिशाली प्रयोग करके अपनी स्मृति और समर्थी को बढ़ाना है।
7. सच्चाई, सफाई और खुला दिल
बाबा ने कहा कि जो जितना सच्चाई-सफाई से और खुले दिल से प्रयोग करेगा, वह उतनी ही प्रगति की प्रमोशन ले सकेगा।
शुभ भावना और शुभ कामना के सम्बन्ध से स्व और सेवा दोनों में प्रयोग करना है।
मुख्य शिक्षा: सच्चाई, सफाई और खुले दिल से पुरुषार्थ करने पर प्रगति की प्रमोशन मिलती है।
8. नियम, संयम और स्व-साधना
बापदादा ने स्पष्ट किया कि प्रयोग करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता है—
- नियम
- संयम
- स्व-साधना
इनके आधार पर ही योग के प्रयोग को शक्तिशाली बनाया जा सकता है।
मुख्य शिक्षा: योग के प्रयोग में नियम, संयम और स्व-साधना को आवश्यक आधार बनाना है।
9. ब्राह्मण जीवन — जो पाना है, पा लो
बापदादा ने ब्राह्मण जीवन को छोटा-सा प्यारा जीवन बताते हुए प्रेरणा दी कि इस जीवन में जो पाना चाहो, वह पा लो और जो बनना चाहो, वह बन जाओ।
वर्तमान और भविष्य को श्रेष्ठ बनाने का अवसर इसी जीवन में है।
मुख्य शिक्षा: अपने वर्तमान पुरुषार्थ से वर्तमान और भविष्य दोनों को श्रेष्ठ बनाना है।
10. उड़ो और उड़ाओ
बापदादा ने सभी देश-विदेश के बच्चों को अपने सम्मुख विशाल सेना के रूप में इमर्ज किया।
बाबा ने सभी को अपनी मीठी मुस्कान और नयनों द्वारा याद-प्यार दिया और स्वयं में लवलीन कर लिया।
अन्त में बाबा का प्रेरणादायक संदेश था—उड़ो और उड़ाओ।
मुख्य शिक्षा: स्वयं श्रेष्ठ स्थिति में उड़ते हुए दूसरों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देनी है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: तपस्या वर्ष का महत्व
प्रश्न 1. बापदादा के पास कौन-सा समाचार लेकर पहुँची?
उत्तर: तपस्या वर्ष का समाचार।
प्रश्न 2. तपस्या वर्ष में बच्चे किस प्रकार पुरुषार्थ कर रहे थे?
उत्तर: अपनी-अपनी लगन अनुसार तपस्या कर रहे थे।
प्रश्न 3. तपस्या वर्ष के सम्पन्न होने का समय कैसा बताया?
उत्तर: समीप आ रहा है।
प्रश्न 4. तपस्या वर्ष किस प्रकार वरदान प्राप्त करने का वर्ष है?
उत्तर: खुले मन से वरदान प्राप्त करने का वर्ष।
प्रश्न 5. बचे हुए समय में क्या करना है?
उत्तर: और अधिक लाभ उठाना है।
भाग 2: दो विशेष वरदान
प्रश्न 6. पहला विशेष वरदान कौन-सा है?
उत्तर: स्व-पुरुषार्थ और सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति का प्रत्यक्षफल।
प्रश्न 7. पहला वरदान किन दो क्षेत्रों से सम्बन्धित है?
उत्तर: स्व-पुरुषार्थ और सेवा।
प्रश्न 8. दूसरा विशेष वरदान कौन-सा है?
उत्तर: दृढ़ निश्चय द्वारा असम्भव को सम्भव करने का अनुभव।
प्रश्न 9. असम्भव को सम्भव करने के लिए किसकी दृढ़ता चाहिए?
उत्तर: निश्चय की दृढ़ता।
प्रश्न 10. दोनों वरदानों का अनुभव किस वर्ष में विशेष रूप से कर सकते हैं?
उत्तर: तपस्या वर्ष में।
भाग 3: योग के प्रयोग
प्रश्न 11. अब किसके प्रयोग द्वारा आगे बढ़ना है?
उत्तर: योग के प्रयोग द्वारा।
प्रश्न 12. योग के प्रयोग से स्वयं में क्या परिवर्तन करना है?
उत्तर: कड़े संस्कार और स्वभाव को परिवर्तन करना है।
प्रश्न 13. योग के प्रयोग द्वारा दूसरों में क्या परिवर्तन करना है?
उत्तर: दूसरों की वृत्ति में परिवर्तन करने की विधि का अनुभव बढ़ाना है।
प्रश्न 14. योग के प्रयोग पर किस प्रकार का अनुभव बढ़ाना है?
उत्तर: रिसर्च करने का अनुभव।
प्रश्न 15. योग से प्राप्त शक्ति को किसमें लगाना है?
उत्तर: स्वयं के परिवर्तन और सेवा में।
भाग 4: जनवरी का विशेष महत्व
प्रश्न 16. जनवरी मास को किस रूप में बताया गया?
उत्तर: स्मृति-सो-समर्थी मास।
प्रश्न 17. जनवरी में किस प्रकार के प्रयोग करने हैं?
उत्तर: विशेष शक्तिशाली प्रयोग।
प्रश्न 18. शक्तिशाली प्रयोग किस उद्देश्य से करने हैं?
उत्तर: प्रगति की प्रमोशन लेने के लिए।
प्रश्न 19. प्रयोग किसके प्रति करने हैं?
उत्तर: स्व और सेवा के प्रति।
प्रश्न 20. प्रयोग करने के लिए कौन-से दो सम्बन्ध आधार बनेंगे?
उत्तर: शुभ भावना और शुभ कामना के सम्बन्ध।
भाग 5: पुरुषार्थ की आवश्यकताएँ
प्रश्न 21. प्रयोग करने वाले में कौन-सी विशेषता होनी चाहिए?
उत्तर: सच्चाई-सफाई और खुला दिल।
प्रश्न 22. प्रगति की प्रमोशन कौन ले सकता है?
उत्तर: जो सच्चाई-सफाई से खुले दिल से प्रयोग करता है।
प्रश्न 23. योग के प्रयोग के लिए कौन-सी तीन बातें आवश्यक हैं?
उत्तर: नियम, संयम और स्व-साधना।
प्रश्न 24. बाबा ने तपस्या वर्ष के अन्तिम समय में किस बात पर विशेष बल दिया?
उत्तर: योग के प्रयोग द्वारा स्वयं और सेवा में परिवर्तन पर।
प्रश्न 25. योग के प्रयोग का प्रत्यक्ष परिणाम कहाँ दिखाई देना चाहिए?
उत्तर: स्व-पुरुषार्थ और सेवा में।
भाग 6: ब्राह्मण जीवन और श्रेष्ठ भविष्य
प्रश्न 26. बाबा ने ब्राह्मण जीवन को कैसा बताया?
उत्तर: छोटा-सा प्यारा ब्राह्मण जीवन।
प्रश्न 27. इस ब्राह्मण जीवन में क्या प्राप्त करना है?
उत्तर: जो पाना चाहो वह पा लो।
प्रश्न 28. इस जीवन में क्या बनने की प्रेरणा दी?
उत्तर: जो बनना चाहो वह बन जाओ।
प्रश्न 29. वर्तमान और भविष्य को कितना श्रेष्ठ बनाना है?
उत्तर: जितना बनाना चाहो उतना श्रेष्ठ बनाओ।
प्रश्न 30. बापदादा का अन्तिम प्रेरणादायक संदेश क्या था?
उत्तर: उड़ो और उड़ाओ।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या मैं योग केवल लगाता हूँ या योग से प्राप्त शक्तियों का प्रयोग भी करता हूँ?
- क्या मेरे कड़े संस्कार और स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है?
- क्या मैं दृढ़ निश्चय द्वारा असम्भव को सम्भव बनाने का अनुभव करता हूँ?
- क्या मेरी शुभ भावना और शुभ कामना से दूसरों की वृत्ति में परिवर्तन आता है?
- क्या मेरे पुरुषार्थ और सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति दिखाई देती है?
- क्या मैं नियम, संयम और स्व-साधना का पालन करता हूँ?
- क्या मैं सच्चाई-सफाई से और खुले दिल से अपने प्रयोग करता हूँ?
- क्या मैं स्वयं आगे बढ़ने के साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाता हूँ?
निष्कर्ष
27 नवम्बर 1991 के इस अव्यक्त संदेश का मुख्य सार है कि योग को प्रयोग में लाकर प्रगति की प्रमोशन लेनी है।
तपस्या वर्ष के बचे हुए समय में दो विशेष वरदानों का अनुभव करना है—स्व-पुरुषार्थ और सेवा में सहज श्रेष्ठ प्राप्ति तथा दृढ़ निश्चय द्वारा असम्भव को सम्भव बनाना।
इसके लिए स्वयं के संस्कार और स्वभाव को परिवर्तन करने के साथ दूसरों की वृत्ति परिवर्तन करने की विधि पर भी प्रयोग करना है। सच्चाई-सफाई, खुला दिल, नियम, संयम और स्व-साधना को आधार बनाकर आगे बढ़ना है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“योग लगाओ, योग का प्रयोग करो, स्वयं परिवर्तन बनो और दूसरों को भी परिवर्तन की प्रेरणा दो — उड़ो और उड़ाओ।”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए 27 नवम्बर 1991 के मूल अव्यक्त संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी संदेश की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 01.42.अव्यक्त दिव्य संदेश | 27.11.1991
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
