3.09.1990
सबसे बड़ी शक्ति – स्नेह की शक्ति
आज जैसे ही में वतन में पहुंची तो क्या देखा कि बाबा के एक तरफ हमारी दादी जी थी और दूसरी तरफ दादी जानकी थी। दोनों के साथ बाबा बैठे थे और बहुत बिजी थे। जैसे ही पहुंची तो बाबा का अटेन्शन मेरी तरफ नहीं था लेकिन अपने ही कार्य में बिजी थे। मैं जब आगे पहुंची तो बाबा ने नयन मुलाकात की और पूछा- बच्ची क्या सन्देश लाई हो? मैने कहा-बाबा, आज तो सभी बच्चों की शुभ आशा है कि बाबा से मिलन हो। बाबा इन दोनों दादियों को देखकर मुस्कराने लगे और कहा कि आप दोनों वतन में किसलिए आई हो? इन्होंने भी कहा बाबा आपको ले जाने के लिए आये हैं। बाबा मुस्कराये और दोनों का हाथ पकड़ कर कहा-अच्छा चलो। हम तीनों जैसे बाबा के साथ चल रहे थे बाबा ने कहा- बच्ची वैसे तो बाबा का आना समय पर ही होता है. लेकिन बाबा हमेशा कहते हैं कि स्नेह की शक्ति सबसे बडी शक्ति है। स्नेह से बच्चों ने कहा है तो आप बच्चों के सदा आज्ञाकारी सेवाधारी हैं. इसलिए ‘ना’ भी नही कर सकते। लेकिन सिर्फ चक्कर लगा कर आयेंगे। दादियों ने कहा- बाबा, कुछ भी हो, आप बलो तो सही। तो बाबा ने कहा- ‘जी-हजूर’। दादियाँ बाबा के यह शब्द सुनकर स्नेह में डूब गई। फिर मैं तो गुम थी लेकिन मुझे ऐसे महसूस हुआ कि बाबा आये और जल्दी से ही वापस गये। (बाबा ने संदेशी में प्रवेश हो 3-4 मिनट बच्चों को दृष्टि दी और हाथ हिलाते हुए वापस चले गये) मैं वतन में ही थी और दादियाँ गुम थीं। थोड़े समय के बाद बाबा वतन में पहुँचे और कहा – बच्चियाँ कहाँ गई? मैंने कहा- बाबा, आप ही छोड़कर आये हो। तो कहा- नहीं, आज बाबा का तो काम है। ऐसे कहते ही फिर दादी और दादी जानकी दोनों को बाबा ने इमर्ज किया और फिर अपने काम में लग गये। आज बाबा का अटेन्शन हमारी तरफ कम था और दादियों की तरफ ही ज़्यादा था। मैंने कहा- बाबा, आखिर काम क्या है? बाबा ने कहा – आज मैं एक बहुत सुन्दर और विचित्र माला बना रहा हूँ।
दादियों के हाथों में भी पैड था और बाबा के हाथ में भी पैड था। फिर बाबा ने दादियों से पूछा – काम पूरा हुआ? तो दादियाँ मुस्कराते लगीं। फिर बाबा ने सुनाया देखो बच्ची, आज बाबा इन बच्चियों से मिलकर एक कार्य कर रहे हैं। बाबा ने कहा है कि 25 ऐसे नाम निकालो जो हर इशारे को, समय को समझते हुए, जो बाप का या बड़ों का इशारा हो, उसे बिना संकोच, बिना संकल्प के, परिणाम अच्छा होगा या बुरा होगा या कैसा होगा बिना यह संकल्प चलाये जो इशारा मिले, वह प्रैक्टिकल में करे ऐसे नाम बाबा इन दादियों के साथ मिलकर निकाल रहे थे। बाबा को ऐसे 25 नाम चाहिए। मैने कहा बाबा, 25 ही क्यों चाहिए? ज़्यादा भी तो हो अव्यक्त संदेश
सकते हैं तो बाबा ने कहा 25 ही चाहिए जो बिल्कुल संस्कारों से, बुद्धि से और कैचिग पाँवर से समीप हो, जो कहा और किया, ऐसे 25 नाम चाहिए। मैने कहा बाबा, वह नाम तो निकल गये होंगे। वो लिस्ट तो दिखाओ। बाबा ने कहा अभी 12-13 निकले हैं। मैंने कहा- बावा, यह 12-13 तो बहुत कम है। हम तो 25 को भी कम समझ रही थी। बाबा ने कहा 12-13 में भी थोड़ा-सा बीच में पतला धागा दिखाई दे रहा है। जैसे माला में जब तक दाने से दाना नहीं मिलता तो धागा दिखाई देता है, ऐसे धागा थोड़ा-सा दिखाई देता है। मैंने कहा बाबा, यह तो बहुत बड़ा पेपर है जो 12-13 में भी धागा दिखाई देता है।फिर बाबा ने कहा- माला तैयार तब होगी जब हर एक यह ऑफर करे कि मैं माला में आने के लिए तैयार हूँ। कितना भी बाबा या दादियाँ नाम निकालेंगी लेकिन जब तक बच्चों ने स्वयं ऑफर नहीं की है तब तक माला तैयार नहीं हो सकती। इसलिए दिल से खुद ऑफर करो कि मैं इस माला का मणका हूँ, अधिकारी हूँ। फिर यह माला जल्दी तैयार हो जायेगी। मैने कहा बाबा, यह तो सभी ने दृढ़ संकल्प किया है कि हम बाबा के इस संकल्प को पूरा करके ही दिखायेंगे। जैसे ही मैंने यह कहा तो बाबा बिल्कुल गंभीर हो गये, जैसे डीप विचारों में चले गये। मुझे देख भी रहे थे लेकिन देखते भी जैसे नहीं देख रहे थे। बाबा ने कहा- बच्ची, कोई बड़ी बात नहीं है, होना ही है। यह भी माला तैयार हो ही जायेगी। फिर बाबा ने यह बात सुनाकर कहा – मैं देखूँगा कि कौन-कौन बच्चे ऑफर करते हैं, फिर बाबा फाइनल करेगा। ऐसे कहते हुए यह दृश्य पूरा हो गया।
फिर बाबा ने कहा- बच्ची, और क्या समाचार लाई हो? मैंने कहा समाचार तो एक ही है। सभी के दिल में यह इच्छा तो है कि अब इतना समय बीत गया, बाकी आगे कितना होगा! सभी को यह आता है कि बस, बाबा और हम, और है ही क्या! बाबा ने कहा – संकलप तो दृढ़ है, लेकिन इस दृढ़ संकल्प को अब सील लगानी है। जैसे गवर्मेन्ट किसी चीज़ को फाइनल सील कर देती है तो कोई खोल नहीं सकता है। ऐसे बाबा ने कहा दृढ़ संकल्प का ठप्पा तो लगाते हो लेकिन उसे ऑलमाइटी गवर्मेन्ट की सील लगा दो जो एकदम 5 हज़ार वर्ष के बाद खुले। इतनी पक्की सील हो तब ही प्रैक्टिकल होगा। अभी संकल्प तक है, यह तो ठीक है। लेकिन यह कर्म में तब आयेगा जब इस दृढ़ संकल्प को सील लगायेंगे। फिर बाबा ने कहा इसके लिए सभी बच्चे यही याद रखें कि मुझे सहज स्वभाव, सरल स्वभाव और निर्माण स्वभाव वाला बनना है। अगर यह स्वभाव धारण किया तो फिर यह प्रैक्टिकल में आ सकता है। अगर इसमें से किसी की भी कमी है तो दृढ़ संकल्प केवल संकल्प तक रह जाता है, कभी वाणी तक भी आ जाता है। लेकिन संकल्प, वाणी और कर्म तीनों में एकरस रहें इसके लिए स्वभाव बहु अव्यक्त संदेशसहज, सरल और निर्माण बनाओ। फिर कोई मुश्किल नहीं है। फिर बाबा ने कहा अच्छा, चलो अभी तुमको एक दृश्य दिखाता हूँ। एक हॉल में कटेन (पर्दा) था। वह कटेन हमारे जाते ही खुला। उसमें बड़ी वण्डरफूल सभाआत्मा राजा। थी और एक बैनर लगा था जिसमें लिखत थी स्वराज्य सभा । उसमें देखा कि एक कुर्सी पर कोई बहन बैठी थी। उसकी भकुटि में आत्मा से चारों ओर किरणें निकल रही थी और वह बिन्दी (आत्मा) बहुत चमक रही थी। वह जिस कुर्सी पर बैठी थी, उस पर लिखा था फिर थोड़ी देर बाद ऑर्डर से कर्मेन्द्रियाँ वहाँ पहुंच गई और कर्मेन्द्रियों की जैसे दरबार लग गई। मन, बुद्धि आंख, नाक, कान आदि यह अलग-अलग कर्मेन्द्रियाँ दरबार में उपस्थित थी। थोडे समय के बाद आत्मा राजा ने बोला हे सहयोगी कार्यकारी! सनाओ क्या हालचाल है? जैसे राजा अपनी सभा में पूछता है। तो मन, बुद्धि, आँख, नाक आदि सबसे आत्मा राजा पूछ रहे थे। बाबा ने इसका रहस्य सुनाते हुए कहा- ऐसे स्वराज्य-अधिकारी बनकर अपने कार्यकर्ताओं कर्मेन्द्रियों से सिर्फ रात्रि में समाचार नहीं पछना है. लेकिन मैं आत्मा राजा हूँ इस सीट पर बैठकर फिर सहयोगी कार्यकारी कर्मेन्द्रियों से कार्य करो और कराओ। इस स्मृति के समर्थी की कर्सी पर बैठकर, राजा बन करके बीच-बीच में इन सहयोगी कार्यकर्त्ताओं से हालचाल लो और ऑर्डर करो। तो इस स्वराज्य के नशे में हद के सब नशे खत्म हो जायेंगे और यह बेहद का नशा हर कार्य में पदमगुणा सफलता दिलायेगा।
फिर बाबा ने कहा- बच्ची जैसे बाबा बच्चों का आज्ञाकारी है. ऐसे बच्चे भी बाप के हर संकल्प में आज्ञाकारी बनें। इसके लिए बाबा बच्चों को एक सौगात देते हैं, वह सौगात थी कंगन। कंगन भी बहुत वण्डरफुल नया था। सोने का कंगन था और उसके बीच में बहुत महीन बिन्दी-सा हीरा चमक रहा था। उस हीरे से 8 रंग की लाइट निकल कर सारे कंगन को चमका रही थी। बाबा ने कहा – यह 8 रंग की लाइट है अष्ट शक्तियों की लाइट और यह जो होरा है, यह है श्रेष्ठ आत्मा, हीरो एक्टर, श्रेष्ठ पार्टधारी आत्मा की निशानी और हर संकल्प, हर सेकण्ड आज्ञाकारी चनने का यह कंगन है। एक संकल्प में भी आज्ञा मिस न हो। हर संकल्प, हर सेकण्ड में यह स्मृ। रखो कि मैं आज्ञाकारी आत्मा, श्रेष्ठ आत्मा हूँ। यही संकल्प बुद्धि में धारण करो तो माला जल्दी बन जायेगी। 25 तो क्या 108 की बन जायेगी। लेकिन अभी कंगन फिट नहीं है। इसलिए आज यह आज्ञाकारी बनने का कंगन बापदादा सौगात में दे रहे हैं। इन अष्ट शक्तियों द्वारा सदा आज्ञाकारी रहने के संकल्प को बल मिलता रहेगा। ऐसे कहते बाबा ने सभी को याद-प्यार देते और लेते मैं साकार वतन में पहुँच गई।
सबसे बड़ी शक्ति — स्नेह की शक्ति
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने स्नेह की शक्ति, आज्ञाकारिता, दृढ़ संकल्प, स्वराज्य और अष्ट शक्तियों की महत्ता समझाई है। बाबा बताते हैं कि स्नेह की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। स्नेह के कारण बाबा बच्चों के आज्ञाकारी सेवाधारी बनते हैं और बच्चों को भी बाप के हर संकल्प में आज्ञाकारी बनना है।
बापदादा ने 25 ऐसे बच्चों की माला तैयार करने का संकल्प बताया, जो बाप और बड़ों के इशारे को बिना संकोच, बिना व्यर्थ संकल्प और बिना परिणाम की चिन्ता के प्रैक्टिकल में लाएँ। इसके साथ ही आत्मा को स्वराज्य-अधिकारी बनकर अपनी कर्मेन्द्रियों पर शासन करना है और अष्ट शक्तियों के बल से हर संकल्प तथा हर सेकण्ड आज्ञाकारी रहना है।
1. स्नेह की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति
बापदादा दादियों के साथ बच्चों के स्नेह की चर्चा करते हैं। दादियाँ बाबा को अपने साथ ले जाने के लिए कहती हैं। बाबा मुस्कराकर कहते हैं कि बाबा का आना समय पर ही होता है, लेकिन स्नेह से बच्चों ने कहा है, इसलिए वे बच्चों के आज्ञाकारी सेवाधारी हैं और ‘ना’ नहीं कर सकते।
बाबा के ये शब्द सुनकर दादियाँ स्नेह में डूब जाती हैं।
इस दृश्य से स्पष्ट होता है कि स्नेह में बहुत बड़ी शक्ति है। सच्चे स्नेह से सम्बन्धों में निकटता आती है और आज्ञाकारिता सहज बनती है।
मुख्य शिक्षा: स्नेह की शक्ति को पहचानकर स्नेही और आज्ञाकारी बनना है।
2. आज्ञाकारी बच्चों की माला
बापदादा एक विशेष माला तैयार कर रहे थे। इसके लिए ऐसे 25 बच्चों के नाम चाहिए, जो बाप या बड़ों के इशारे को समझकर बिना संकोच और बिना व्यर्थ संकल्प के प्रैक्टिकल में करें।
ऐसे बच्चे परिणाम अच्छा होगा या बुरा, इसकी चिन्ता में नहीं पड़ते, बल्कि मिले हुए इशारे को समझकर कार्य करते हैं।
बाबा बताते हैं कि केवल नाम निकालने से माला तैयार नहीं होगी। जब बच्चे स्वयं दिल से ऑफर करेंगे कि वे इस माला के मणके बनने के अधिकारी हैं, तभी माला जल्दी तैयार होगी।
मुख्य शिक्षा: आज्ञाकारिता केवल विचार या इच्छा नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल कर्म में दिखाई देनी चाहिए।
3. माला का धागा दिखाई क्यों देता है?
बापदादा बताते हैं कि 12–13 नाम निकलने के बाद भी माला में थोड़ा-सा धागा दिखाई दे रहा था।
जैसे माला में जब तक एक दाना दूसरे दाने से नहीं मिलता, तब तक धागा दिखाई देता है, वैसे ही बच्चों की स्थिति में भी कहीं न कहीं कमी रह सकती है।
माला तभी पूर्ण होगी जब प्रत्येक बच्चा स्वयं को उसके योग्य बनाने का दृढ़ संकल्प करेगा और दिल से ऑफर करेगा।
मुख्य शिक्षा: सम्पूर्ण योग्यता के लिए अपनी कमी पहचानकर स्वयं को योग्य बनाना है।
4. स्वयं को माला का मणका ऑफर करना
बापदादा समझाते हैं कि बाबा और दादियाँ कितने भी नाम निकाल लें, लेकिन जब तक बच्चे स्वयं ऑफर नहीं करेंगे, तब तक माला तैयार नहीं हो सकती।
इसलिए हर बच्चे को दिल से संकल्प करना है—मैं इस माला का मणका हूँ और अधिकारी हूँ।
यह ऑफर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि संस्कारों, बुद्धि और कैचिंग पॉवर में निकटता द्वारा प्रमाणित होना चाहिए।
मुख्य शिक्षा: स्वयं को योग्य बनाकर दिल से बाबा के प्रति समर्पित होना है।
5. दृढ़ संकल्प पर ऑलमाइटी गवर्नमेन्ट की सील
बापदादा बताते हैं कि बच्चों का संकल्प दृढ़ है, लेकिन अब उस संकल्प पर सील लगानी है।
जैसे गवर्नमेन्ट किसी वस्तु पर अन्तिम सील लगा देती है, जिसे कोई खोल नहीं सकता, वैसे ही अपने दृढ़ संकल्प को ऐसी पक्की सील लगानी है जो 5000 वर्ष के बाद खुले।
संकल्प करना पहला चरण है। उसे प्रैक्टिकल कर्म में लाना अगला चरण है। जब तक संकल्प, वाणी और कर्म तीनों में समानता नहीं होगी, तब तक संकल्प पूर्ण रूप से प्रमाणित नहीं होगा।
मुख्य शिक्षा: दृढ़ संकल्प को संकल्प, वाणी और कर्म—तीनों में प्रमाणित करना है।
6. सहज, सरल और निर्माण स्वभाव
बापदादा समझाते हैं कि दृढ़ संकल्प को प्रैक्टिकल में लाने के लिए तीन स्वभाव आवश्यक हैं—
- सहज स्वभाव
- सरल स्वभाव
- निर्माण स्वभाव
यदि इनमें से किसी भी स्वभाव की कमी होगी, तो दृढ़ संकल्प केवल संकल्प तक रह सकता है या कभी-कभी वाणी तक आ सकता है, लेकिन कर्म में समानता नहीं आएगी।
इसलिए अपने स्वभाव को ऐसा बनाना है कि संकल्प, वाणी और कर्म तीनों एकरस रहें।
मुख्य शिक्षा: सहज, सरल और निर्माण स्वभाव से संकल्प को कर्म में लाना है।
7. स्वराज्य सभा और आत्मा राजा
बापदादा एक सुन्दर सभा का दृश्य दिखाते हैं। सभा में एक बहन कुर्सी पर बैठी है और उसकी भृकुटि में आत्मा रूपी बिन्दी चमक रही है। उस कुर्सी पर लिखा है—“आत्मा राजा।”
कुछ समय बाद मन, बुद्धि, आँख, नाक, कान आदि कर्मेन्द्रियाँ दरबार में उपस्थित होती हैं। आत्मा राजा उनसे हालचाल पूछती है और आदेश देती है।
बाबा इस दृश्य का रहस्य समझाते हैं कि आत्मा को स्वराज्य-अधिकारी बनकर अपनी कर्मेन्द्रियों पर शासन करना है। केवल रात में आत्म-जाँच नहीं करनी, बल्कि दिनभर आत्मा राजा की स्मृति में रहकर कर्मेन्द्रियों से कार्य कराना है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं को आत्मा राजा समझकर कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखना है।
8. स्वराज्य के नशे से सफलता
बापदादा बताते हैं कि जब आत्मा स्वराज्य-अधिकारी बनकर अपनी सीट पर स्थित होती है, तब वह अपनी सहयोगी कर्मेन्द्रियों से कार्य कराती है।
इस स्वराज्य के नशे में रहने से हद के नशे समाप्त हो जाते हैं और बेहद का नशा हर कार्य में पदमगुणा सफलता दिलाता है।
स्वराज्य का अर्थ है अपनी आन्तरिक स्थिति और कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखना।
मुख्य शिक्षा: स्वराज्य की स्मृति में रहकर हर कर्म को श्रेष्ठ बनाना है।
9. आज्ञाकारी आत्मा बनने का कंगन
बापदादा बच्चों को एक विशेष सौगात देते हैं—सोने का कंगन, जिसके बीच में एक महीन हीरा चमक रहा है। उस हीरे से आठ रंगों की लाइट निकलकर पूरे कंगन को प्रकाशित कर रही है।
बाबा बताते हैं कि आठ रंगों की लाइट अष्ट शक्तियों की निशानी है और हीरा श्रेष्ठ आत्मा, हीरो एक्टर तथा श्रेष्ठ पार्टधारी आत्मा की निशानी है।
यह कंगन हर संकल्प और हर सेकण्ड आज्ञाकारी बनने की स्मृति दिलाता है।
मुख्य शिक्षा: अष्ट शक्तियों के बल से हर संकल्प और हर सेकण्ड आज्ञाकारी रहना है।
10. आज्ञाकारिता से माला जल्दी तैयार होगी
बापदादा समझाते हैं कि बच्चों को सदा यह स्मृति रखनी है—मैं आज्ञाकारी आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ।
एक भी संकल्प में आज्ञा मिस नहीं होनी चाहिए। जब बच्चे अष्ट शक्तियों के बल से आज्ञाकारी बनेंगे, तब माला जल्दी तैयार होगी।
बाबा कहते हैं कि 25 की माला ही नहीं, बल्कि 108 की माला भी बन सकती है।
मुख्य शिक्षा: हर संकल्प में आज्ञाकारिता रखकर स्वयं को विजयी माला का योग्य मणका बनाना है।
भाग 1: स्नेह की शक्ति
प्रश्न 1. बाबा ने सबसे बड़ी शक्ति किसे बताया?
उत्तर: स्नेह की शक्ति को।
प्रश्न 2. स्नेह के कारण बाबा बच्चों के लिए क्या बनते हैं?
उत्तर: आज्ञाकारी सेवाधारी।
प्रश्न 3. दादियाँ बाबा को अपने साथ क्यों ले जाना चाहती थीं?
उत्तर: बाबा के साथ चलने और बच्चों से मिलन कराने के लिए।
प्रश्न 4. बाबा किस प्रकार के 25 बच्चों की माला तैयार कर रहे थे?
उत्तर: हर इशारे को समझकर प्रैक्टिकल में करने वाले आज्ञाकारी बच्चों की।
प्रश्न 5. माला का मणका बनने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: स्वयं दिल से ऑफर करना।
भाग 2: माला और दृढ़ संकल्प
प्रश्न 6. बाबा को कितने नाम चाहिए थे?
उत्तर: 25 नाम।
प्रश्न 7. 12–13 नाम निकलने के बाद भी क्या कमी दिखाई दी?
उत्तर: माला में थोड़ा-सा धागा दिखाई दे रहा था।
प्रश्न 8. माला तैयार होने के लिए बच्चों को क्या करना है?
उत्तर: स्वयं को योग्य बनाकर दिल से ऑफर करना है।
प्रश्न 9. दृढ़ संकल्प पर किसकी सील लगाने की बात कही गई?
उत्तर: ऑलमाइटी गवर्नमेन्ट की सील।
प्रश्न 10. दृढ़ संकल्प को किन तीन रूपों में समान रखना है?
उत्तर: संकल्प, वाणी और कर्म में।
भाग 3: स्वभाव और आज्ञाकारिता
प्रश्न 11. दृढ़ संकल्प को प्रैक्टिकल में लाने के लिए कौन-से तीन स्वभाव चाहिए?
उत्तर: सहज, सरल और निर्माण स्वभाव।
प्रश्न 12. संकल्प और कर्म में समानता क्यों आवश्यक है?
उत्तर: ताकि संकल्प केवल विचार या वाणी तक सीमित न रहे।
प्रश्न 13. बाबा के इशारे को किस प्रकार प्रैक्टिकल में लाना है?
उत्तर: बिना संकोच और बिना व्यर्थ संकल्प के।
प्रश्न 14. आज्ञाकारी बनने के लिए किस बात पर ध्यान देना है?
उत्तर: हर संकल्प में बाबा की आज्ञा का पालन करने पर।
प्रश्न 15. आज्ञाकारिता की पहचान क्या है?
उत्तर: मिले हुए इशारे को समझकर प्रैक्टिकल में करना।
भाग 4: स्वराज्य और आत्मा राजा
प्रश्न 16. स्वराज्य सभा में कुर्सी पर कौन बैठा था?
उत्तर: आत्मा राजा।
प्रश्न 17. आत्मा राजा के दरबार में कौन उपस्थित हुईं?
उत्तर: मन, बुद्धि, आँख, नाक, कान आदि कर्मेन्द्रियाँ।
प्रश्न 18. आत्मा राजा को अपनी कर्मेन्द्रियों के साथ क्या करना है?
उत्तर: उनसे हालचाल पूछना और आदेश देकर कार्य कराना।
प्रश्न 19. स्वराज्य-अधिकारी बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: अपनी स्थिति और कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखना।
प्रश्न 20. स्वराज्य के नशे से क्या समाप्त होते हैं?
उत्तर: हद के नशे।
भाग 5: कंगन और अष्ट शक्तियाँ
प्रश्न 21. बाबा ने बच्चों को कौन-सी सौगात दी?
उत्तर: सोने का कंगन।
प्रश्न 22. कंगन के बीच में चमकता हीरा किसकी निशानी है?
उत्तर: श्रेष्ठ आत्मा, हीरो एक्टर और श्रेष्ठ पार्टधारी आत्मा की।
प्रश्न 23. कंगन से निकलने वाली आठ रंगों की लाइट किसकी निशानी है?
उत्तर: अष्ट शक्तियों की।
प्रश्न 24. कंगन किस बात की स्मृति दिलाता है?
उत्तर: हर संकल्प और हर सेकण्ड आज्ञाकारी बनने की।
प्रश्न 25. आज्ञाकारी आत्मा को स्वयं के बारे में क्या स्मृति रखनी है?
उत्तर: मैं आज्ञाकारी आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ।
भाग 6: सम्पूर्णता की ओर
प्रश्न 26. माला जल्दी तैयार करने के लिए क्या करना है?
उत्तर: अष्ट शक्तियों के बल से आज्ञाकारी बनना है।
प्रश्न 27. बाबा ने 25 के अलावा किस माला की सम्भावना बताई?
उत्तर: 108 की माला की।
प्रश्न 28. बच्चों को किसकी आज्ञा में रहना है?
उत्तर: बाप की आज्ञा में।
प्रश्न 29. आज्ञाकारिता को किस प्रकार प्रमाणित करना है?
उत्तर: संकल्प, वाणी और कर्म में।
प्रश्न 30. इस संदेश का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: स्नेह की शक्ति से आज्ञाकारी बनना, स्वराज्य-अधिकारी रहना और अष्ट शक्तियों के बल से हर संकल्प को प्रैक्टिकल में लाना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या मैं स्नेह की शक्ति से स्वयं को और दूसरों को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करता हूँ?
- क्या मैं बाप और बड़ों के इशारे को बिना संकोच प्रैक्टिकल में लाता हूँ?
- क्या मैं स्वयं को माला का योग्य मणका बनाने के लिए दिल से ऑफर करता हूँ?
- क्या मेरा दृढ़ संकल्प संकल्प, वाणी और कर्म—तीनों में समान रहता है?
- क्या मेरे स्वभाव में सहजता, सरलता और निर्माणता है?
- क्या मैं स्वयं को आत्मा राजा समझकर अपनी कर्मेन्द्रियों पर शासन करता हूँ?
- क्या मैं अष्ट शक्तियों के बल से हर संकल्प और हर सेकण्ड आज्ञाकारी रहता हूँ?
निष्कर्ष
इस दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि स्नेह की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। स्नेह के साथ आज्ञाकारिता, दृढ़ संकल्प और स्वराज्य की स्थिति धारण करनी है।
बापदादा की आज्ञा को केवल सुनना नहीं, बल्कि संकल्प, वाणी और कर्म में प्रमाणित करना है। सहज, सरल और निर्माण स्वभाव अपनाकर अष्ट शक्तियों के बल से स्वयं को माला का योग्य मणका बनाना है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“मैं आज्ञाकारी आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ।”
दैनिक अभ्यास: दिनभर समय-समय पर स्वयं से पूछें—“क्या मैं आत्मा राजा की सीट पर स्थित हूँ? क्या मेरे मन, बुद्धि और कर्मेन्द्रियाँ मेरी श्रेष्ठ स्थिति के अनुसार कार्य कर रही हैं?”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 32. अव्यक्त दिव्य संदेश | 3.09.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
