26 January 1971 | हिंदी · “ज़िम्मेवारी उठाने से फायदे”
“ज़िम्मेवारी उठाने से फायदे”
तुम बच्चे हो विश्व को परिवर्तन करने वाले विश्व के आधार मूर्त। उद्धार करने वाले भी हो और साथ-साथ विश्व के आगे उदाहरण बनने वाले भी हो। जो आधारमूर्त होते हैं उनके ऊपर ही सारी ज़िम्मेवारी रहती है। अभी आपके एक-एक कदम के पीछे अनेकों के कदम उठाने की ज़िम्मेवारी है। पहले साकार रूप फॉलो फादर के रूप में सामने था। अभी आप लोग निमित्त मूर्तियां हो। तो ऐसे समझो कि जैसे जिस रूप से जहाँ हम कदम उठायेंगे वैसे सर्व आत्मायें हमारे पीछे फॉलो करेंगी। यह ज़िम्मेवारी है। सर्व के उद्धारमूर्त बनने कारण सर्व आत्माओं की जो आशीर्वाद मिलती है तो फिर हल्कापन भी आ जाता है, मदद भी मिलती है। जिस कारण ज़िम्मेवारी हल्की हो जाती है। बड़ा कार्य होते हुए भी ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कोई करा रहा है। यह ज़िम्मेवारी और ही थकावट मिटाने वाली है। फ्री रहना मन को भाता ही नहीं है। ज़िम्मेवारी अवस्था को बनाने में बहुत मदद करती है। बापदादा जब महारथी बच्चों को देखते हैं तो सभी के वर्तमान स्वरूप और इसी जन्म के अन्तिम स्वरूप और दूसरे जन्म के भविष्य स्वरूप तीनों ही सामने आते हैं। आप लोगों को यह फीलिंग स्पष्ट रूप में आती है कि यह हम बनने वाले हैं, हम ताज व तख्तधारी होंगे? आगे चल यह भी अनुभव करेंगे। जैसे साकार रूप में प्रत्यक्ष अनुभव किया ना। कर्मातीत अवस्था भी स्पष्ट थी और भविष्य स्वरूप की स्मृति भी स्पष्ट थी। भविष्य संस्कार इस स्वरूप में प्रत्यक्ष दिखाई देते थे। तो आप सभी ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि बस यह शरीर छोड़ा और वह तैयार है। बुद्धिबल द्वारा इतना स्पष्ट अनुभव होगा। अभी दिन प्रतिदिन अपनी सर्विस से अपने सहयोगीपन से और अपने संस्कारों को मिटाने की शक्ति से अपने अन्तिम स्वरूप और भविष्य को जान जायेंगे। पहले कहते थे ऐसा समय आयेगा जो नज़दीक वाले और दूर वाले स्पष्ट दिखाई देंगे। लेकिन अब वह समय चल रहा है। जो दैवी परिवार की आत्मायें हैं वह समझ सकती हैं – कौन-कौन समीप रत्न हैं। जिनको जितना समीप आना है वह सरकमस्टांस अनुसार भी इतना समीप आयेंगे। जिनको कुछ दूर होना है तो सरकमस्टांस भी बीच में निमित्त बन जायेंगे। जो चाहते हुए भी आ नहीं सकेंगे। यह सभी भविष्य का साक्षात्कार अभी प्रैक्टिकल सर्विस चल रही है। अपने भविष्य को जानना अब मुश्किल नहीं है।
हरेक को व्यक्तिगत अपने लिए भी कोई विशेष प्रोग्राम रखना चाहिए। जैसे सर्विस आदि के और प्रोग्राम बनाते हो वैसे सवेरे से लेकर रात तक बीच-बीच में कितना और कैसे अपनी याद की यात्रा पर अटेन्शन रखने के लिए प्रोग्राम रख सकते हो – यह डायरी बनानी चाहिए। अमृतवेले ही याद का प्लैन बनाना चाहिए। समझो, आप लोग कोई स्थूल कार्य आदि में बिज़ी रहते हो लेकिन उसमें भी थोड़े समय के लिए जैसे नियम बांधा हुआ हो याद में रहने का। उस समय दूसरे को भी दो तीन मिनट के लिए स्मृति दिलाओ कि अभी हमारा यह कार्य है। आप भी याद में रहो। जैसे मुकर्रर टाइम पर ट्रैफिक भी रोक लेते हैं। कितना भी भले ज़रूरी काम हो। इस रीति जहाँ तक कर सको उतना टाइम-टेबुल अपना बनाओ। तो और भी देखेंगे इन्हों का यह टाइम याद का मुकर्रर है तो और भी आपको फॉलो करेंगे। कोई कार्य हो उनको आगे पीछे करके भी दो चार मिनट का टाइम याद में रहने लिए ज़रूर निकालो तो उससे वायुमण्डल में भी सारा प्रभाव रहेगा। सभी एक दो को फॉलो करेंगे। बुद्धि को रेस्ट भी मिलेगी और शक्ति भी भरेगी और वायुमण्डल को सहयोग मिलेगा। फिर एक अनोखापन दिखाई पड़ेगा। जैसे कुछ समय आप एक दो को याद दिलाते थे – शिवबाबा याद है? वैसे ही जब देखते हो कोई व्यक्त भाव में ज्यादा है तो उनको बिना कहे अपना अव्यक्त शान्त रूप ऐसा धारण करो जो वह भी इशारे से समझ जाये। तो फिर वातावरण कुछ अव्यक्त रहेगा। तुम्हारी अन्तिम स्टेज है – साक्षात्कार मूर्त। जैसा-जैसा साक्षात् मूर्त बनेंगे वैसे ही साक्षात्कार मूर्त बनेंगे। जब सभी साक्षात् मूर्त बन जायेंगे तो संस्कार भी सभी के साक्षात् मूर्त समान बन जायेंगे। जितना-जितना अपने को चार्ज करेंगे उतना इन्चार्ज बनने का कर्तव्य सफलतापूर्वक कर सकेंगे। अपने को निमित्त समझ कर कदम उठाना है। क्योंकि सारे विश्व के आत्माओं की नज़र आप आत्माओं के ऊपर है। जैसे आप लोगों से ईश्वरीय स्नेह, श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ चरित्रों का साक्षात्कार होता है। वैसे अव्यक्त स्थिति का भी उतना ही स्पष्ट साक्षात्कार हो। ऐसा प्लैन बनाना चाहिए जो कोई भी महसूस करे – यह तो चलता फिरता फरिश्ता है। जैसे साकार रूप में फरिश्तेपन का अनुभव किया ना। इतनी बड़ी ज़िम्मेवारी होते भी आकारी और निराकारी स्थिति का अनुभव कराते रहे। आप लोगों का भी अन्तिम स्टेज का स्वरूप स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। कोई कितना भी अशान्त वा बेचैन घबराया हुआ आये लेकिन आपकी एक दृष्टि, स्मृति और वृत्ति की शक्ति उनको बिल्कुल शान्त कर दे। भले कितना भी कोई व्यक्त भाव में हो लेकिन आप लोगों के सामने आते ही अव्यक्त स्थिति का अनुभव करे। आप लोगों की दृष्टि किरणों जैसा कार्य करे। अभी तक के रिज़ल्ट में मास्टर सूर्य के समान नॉलेज की लाइट देने के कर्तव्य में सफल हुए हो लेकिन किरणों की माइट से हरेक आत्मा के संस्कार रूपी कीटाणु को नाश करने का कर्तव्य करना है। लाइट देने में पास हो। माइट देने का कर्तव्य अब रहा हुआ है। बापदादा के पास चार लिस्ट हैं।
1\. सर्विसएबुल 2\. सेन्सीबुल 3\. सक्सेसफल और 4\. वैल्युएबल।
सक्सेसफुल भी सब नहीं होते, वैल्युएबल भी सब नहीं होते हैं। कोई अपने गुणों से, चरित्रों से वैल्युएबल बन जाते हैं लेकिन सर्विस के प्लैनिंग में सक्सेस नहीं होते हैं। हरेक अपने चार्ट को जान सकते हैं। देखना है हमारा किस लिस्ट में नाम होगा। कोई-कोई का चारों में भी नाम है। कोई का दो में, कोई का तीन में कोई का एक में है। वैल्युएबल का मुख्य गुण यह होता है जो उसको स्वयं भी अपने समय की, संकल्प की और सर्विस की वैल्यू होती है। इसलिए उनके संकल्प, शब्द वा उस द्वारा जो सर्विस होती है उसकी और भी वैल्यू रखते हैं वा ड्रामा अनुसार उनकी वैल्यू हो जाती है। सभी उनको वैल्युएबल की दृष्टि से देखते हैं। सर्विसएबल फर्स्ट हैं या सेन्सीबुल फर्स्ट है? दोनों की अपनी-अपनी विशेषता है। सेन्सीबुल की प्लैनिंग बुद्धि ज्यादा होगी लेकिन प्रैक्टिकल में लाने की विशेषता कम होती है। और सर्विसएबुल जो होता है वह प्लैनिंग कम करता लेकिन प्रैक्टिकल में आने का उसमें विशेष गुण होता है। कोई में सेन्स भी होता है और सर्विसएबुल का गुण भी होता है। इस स्थापना के कर्तव्य में दोनों ही आवश्यक हैं। उनका संकल्प, प्लैन जो चलता है उससे भविष्य बनता है। उनका कर्म से बनता है। अधिक प्रभाव इसका रहता है और सफलता मूर्त का फिर अव्यक्त स्थिति के आधार पर परिणाम निकलता है। कोई-कोई का प्लैन भी चलता है, प्रैक्टिकल भी करते हैं लेकिन सफलता कम होती है। सर्विसएबुल हो सकते हैं लेकिन सफलतामूर्त सभी नहीं हो सकते। कोई को ड्रामा अनुसार जैसे स़फलता का वरदान प्राप्त हुआ होता है। उन्हों को मेहनत कम करनी पड़ती है। सहज ही स़फलता मिल जाती है। यह ड्रामा में हरेक का अपना पार्ट है। अच्छा!
टीचर्स तो है ही टीचर्स। टीचर्स को सदैव यह स्मृति में रहना चाहिए कि टीचर बनने से पहले स्टूडेन्ट हूँ। स्टूडेन्ट स्मृति से स्टडी याद रहेगी। जब स्वयं स्टडी करेंगे तो औरों को स्टडी करायेंगे। स्टूडेन्ट लाइफ़ न होने के कारण औरों को स्टूडेन्ट नहीं बना सकेंगे। वातावरण को बदलने के लिए अपने को सदैव यह समझना चाहिए कि मैं मास्टर सूर्य हूँ। सूर्य का कर्तव्य क्या होता है? एक तो रोशनी देना, दूसरा किचड़े को खत्म करना। तो सदैव यह समझना चाहिए कि मेरी चलन रूपी किरणों से यह दोनों कर्तव्य होते हैं। सर्व आत्माओं को रोशनी भी मिले, किचड़ा भी खत्म हो। मानो रोशनी मिलते किचड़ा खत्म न हो तो समझो कि मेरी किरणों में पावर नहीं। जैसे धूप तेज़ नहीं तो कीटाणु खत्म नहीं होंगे। मेरे में पावर कम होगी तो ज्ञान रोशनी देगा परन्तु पुराने संस्कारों रूपी कीटाणु खत्म नहीं होंगे। जितनी पावरफुल चीज उतनी जल्दी खत्म। पावर कम तो समय बहुत लगेगा। तो पावरफुल बनना है। ऐसे नहीं समझो कि पढ़ी लिखी नहीं हूँ। सृष्टि की नॉलेज पढ़ ली तो उसमें सब आ जाता है।
मुरली मंथन — 31 अक्टूबर 2026
प्रातः मुरली | मुख्य टाइटल, मुख्य बिंदु, अन्य मुरलियों से तुलना एवं प्रश्न–उत्तर
आज की मुरली का केंद्रीय संदेश है: विचार सागर मंथन करो, ज्ञान को बुद्धि में धारण करो और अपने समय तथा संकल्पों को स्व-कल्याण एवं विश्व-सेवा में लगाओ।
मुरली में बाबा बच्चों को याद दिलाते हैं कि दुनिया जिस परमपिता को पुकार रही है, वह हमें पढ़ा रहे हैं। इसलिए इस ऊँची पढ़ाई से खुशी और उमंग में रहना है तथा दूसरों को भी ज्ञान का रास्ता बताना है।
- आज की मुरली का मुख्य टाइटल
विचार सागर मंथन कर ज्ञान रत्न बाँटो!
समय व्यर्थ न गँवाओ — स्व-कल्याण और सर्विस के नए प्लैन बनाओ
31 अक्टूबर 2026 · प्रातः मुरली · मुरली मंथन–89
मुरली का मुख्य प्रश्न: जिन बच्चों को विचार सागर मंथन करना आता है, उनकी निशानी क्या होगी?
मुरली का उत्तर: उनकी बुद्धि में सारा दिन यही तात लगी रहती है कि कैसे सबको रास्ता बतायें और किसका कल्याण करें। वे सर्विस के नये-नये प्लैन बनाते रहते हैं। उनकी बुद्धि में सारा ज्ञान टपकता रहता है और वे अपना समय व्यर्थ नहीं करते।
2. आज की मुरली के मुख्य बिंदु
- हम कितने सौभाग्यशाली हैं जिस परमपिता परमात्मा को सारी दुनिया पुकारती है, वही हमें पढ़ा रहे हैं। इस श्रेष्ठ भाग्य की खुशी और उमंग सदा बनी रहनी चाहिए।
- बाप, टीचर और सतगुरु की मत पर चलो बाबा हमारी पढ़ाई भी करा रहे हैं और श्रेष्ठ जीवन का रास्ता भी बता रहे हैं। इसलिए उनकी मत को जीवन में अपनाना है।
- विचार सागर मंथन करो ज्ञान को केवल सुनना नहीं, बल्कि उस पर गहराई से विचार करना है। जैसे लक्ष्मी-नारायण ने राज्य कैसे प्राप्त किया, भारत का स्वर्ग से पतन कैसे हुआ—ऐसे विषयों पर चिंतन करके दूसरों को समझाने योग्य बनना है।
- सारा दिन रूह-रिहान और ज्ञान का चिंतन आपस में ज्ञान की बातें करनी हैं। शरीर निर्वाह के कार्य करते हुए भी रूहानी सेवा का लक्ष्य बुद्धि में रखना है।
- समय बहुत मूल्यवान है व्यर्थ की बातें सुनने और बोलने में समय नष्ट नहीं करना है। मुरली कहती है कि एक-एक सेकण्ड मूल्यवान है; इसलिए ज्ञान और याद में समय लगाना है।
- सर्विस के लिए सदैव तैयार रहो ज्ञान के चित्रों और समझाने की सामग्री को तैयार रखना है। अवसर मिलने पर दूसरों को बाप का परिचय और ज्ञान का रास्ता बताना है।
- स्व-कल्याण के साथ दूसरों का कल्याण सच्चे महावीर की निशानी है कि उनके मन में सारा दिन यह तात रहती है कि किस आत्मा को रास्ता दिखाऊँ और किसका कल्याण करूँ।
- तीनों प्रकार की सेवा साथ-साथ वरदान में मन्सा, वाचा और कर्मणा—तीनों प्रकार की सेवा करने की शिक्षा है। शुभ संकल्प और श्रेष्ठ वृत्ति से मनसा सेवा, ज्ञान-वाणी से वाचा सेवा तथा श्रेष्ठ कर्मों से कर्मणा सेवा करनी है।
- हर आत्मा को शान्ति, शक्ति और खुशी का अनुभव कराओ स्लोगन के अनुसार हमारे बोल, कर्म और दृष्टि से दूसरी आत्माओं को शान्ति, शक्ति और खुशी का अनुभव होना चाहिए।
- अपकारी पर भी उपकार अव्यक्त इशारे में अपनी वृत्ति और दृष्टि से दूसरों के कड़े संस्कारों को बदलने में सहयोग देने की प्रेरणा है। परोपकारी आत्मा अपकारी के प्रति भी उपकार की भावना रखती है।
- एक मुख्य शिक्षा — अन्य दिनांकित मुरलियों से तुलना
आज की मुरली में विशेष रूप से तीन प्रकार की सेवा—मनसा, वाचा और कर्मणा—को साथ-साथ करने की शिक्षा दी गई है। इसी बात को आधार बनाकर अन्य मुरलियों के ये संदर्भ देखिए: - 31 दिसंबर 1989 — “वाचा सेवा के साथ मन्सा सेवा को नेचुरल बनाओ, शुभ भावना सम्पन्न बनो”
आज की मुरली के वरदान में मनसा, वाचा और कर्मणा तीनों प्रकार की सेवा साथ-साथ करने की बात है। 31 दिसंबर 1989 का शीर्षक विशेष रूप से वाणी के साथ मनसा सेवा और शुभ भावना पर ध्यान दिलाता है।
मंथन प्रश्न: क्या मेरी वाणी के साथ मेरे संकल्प और वृत्ति भी दूसरों की सेवा कर रहे हैं?
स्रोत: ब्रह्माकुमारीज़ — कर्मणा सेवा विषय की मुरलियाँ।
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- 18 फरवरी 1985 — “संगमयुग – तन, मन, धन और समय सफल करने का युग”
आज की साकार मुरली में एक-एक सेकण्ड को मूल्यवान बताते हुए व्यर्थ बातें सुनने और बोलने से बचने की शिक्षा है। 18 फरवरी 1985 की अव्यक्त मुरली का शीर्षक तन, मन, धन और समय को सफल करने पर केंद्रित है।
मंथन प्रश्न: क्या मेरा समय केवल दैनिक कार्यों में जा रहा है, या मैं उसे ज्ञान और सेवा में भी सफल कर रहा हूँ?
स्रोत: ब्रह्माकुमारीज़ — कर्मणा सेवा विषय की मुरलियाँ।
Brahma Kumaris Murli Portal
- 2 नवंबर 2004 — “स्व-उपकारी बन अपकारी पर भी उपकार करो, सर्व शक्ति, सर्व गुण सम्पन्न सम्मान दाता बनो”
आज के अव्यक्त इशारे में भी अपकारी पर उपकार करने और अपनी वृत्ति-दृष्टि से सेवा करने की बात है। इस दिनांकित मुरली का शीर्षक उसी शिक्षा को आगे समझने का अवसर देता है।
मंथन प्रश्न: क्या मैं केवल अच्छे व्यवहार करने वालों की सेवा करता हूँ, या अपकारी के प्रति भी शुभ भावना रखता हूँ?
स्रोत: ब्रह्माकुमारीज़ — दिनांकित अव्यक्त मुरली सूची।
Avyakt Murli Topic
तुलनात्मक निष्कर्ष: 31 अक्टूबर की मुरली हमें ज्ञान का मंथन करके सेवा के नए प्लैन बनाने की प्रेरणा देती है। 31 दिसंबर 1989 मनसा-वाचा सेवा, 18 फरवरी 1985 समय और साधनों की सफलता तथा 2 नवंबर 2004 अपकारी पर उपकार करने की शिक्षा से इस संदेश को और स्पष्ट करती है। ये विषयगत तुलनाएँ हैं; पुराने पाठ के शब्दशः उद्धरण नहीं।
4. आज की मुरली पर छोटे प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. विचार सागर मंथन करने वाले बच्चों की मुख्य निशानी क्या है?
उत्तर: उनकी बुद्धि में सारा दिन दूसरों का कल्याण करने और रास्ता बताने की तात रहती है।
प्रश्न 2. ऐसे बच्चे अपना समय कैसे बिताते हैं?
उत्तर: वे समय व्यर्थ नहीं करते और सर्विस के नए-नए प्लैन बनाते रहते हैं।
प्रश्न 3. हम बच्चों को किस बात की खुशी होनी चाहिए?
उत्तर: बेहद का बाप स्वयं हमें पढ़ा रहा है।
प्रश्न 4. बाबा के तीन मुख्य स्वरूप कौन-से हैं?
उत्तर: बाप, टीचर और सतगुरु।
प्रश्न 5. विचार सागर मंथन का क्या अर्थ है?
उत्तर: सुने हुए ज्ञान पर गहराई से चिंतन करके उसे समझने और दूसरों को समझाने योग्य बनना।
प्रश्न 6. बाबा ने किस प्रकार की बातों को सुनने और बोलने से मना किया है?
उत्तर: व्यर्थ और कल्याण न करने वाली बातों से।
प्रश्न 7. शरीर निर्वाह के साथ कौन-सी सेवा करनी है?
उत्तर: रूहानी सेवा और ज्ञान द्वारा दूसरों का कल्याण।
प्रश्न 8. ज्ञान की सामग्री के बारे में क्या शिक्षा है?
उत्तर: ज्ञान के चित्र और समझाने की सामग्री सदैव तैयार रखनी है।
प्रश्न 9. मुरली के वरदान में कितने प्रकार की सेवा बताई गई है?
उत्तर: तीन—मनसा, वाचा और कर्मणा।
प्रश्न 10. मनसा सेवा किसे कहेंगे?
उत्तर: शुभ संकल्प और श्रेष्ठ वृत्ति द्वारा आत्माओं की सेवा करना।
प्रश्न 11. महान आत्मा की महानता किसमें है?
उत्तर: अपने बोल, कर्म और दृष्टि से हर आत्मा को शान्ति, शक्ति और खुशी का अनुभव कराना।
प्रश्न 12. अव्यक्त इशारे के अनुसार अपकारी के प्रति क्या भावना रखनी है?
उत्तर: उसके प्रति भी उपकार और कल्याण की भावना रखनी है।
5. आज का मंथन प्रश्न और संकल्प
मंथन प्रश्न: क्या मैं प्रतिदिन केवल मुरली सुनकर संतुष्ट हो जाता हूँ, या उसके ज्ञान का विचार सागर मंथन करके अपने संकल्पों, वाणी और कर्मों से दूसरों का कल्याण भी करता हूँ?
आज का संकल्प:
“मैं आत्मा हूँ। मेरा हर संकल्प शुभ हो, मेरी वाणी में ज्ञान रत्न हों और मेरे कर्मों से दूसरों को सुख मिले। मैं अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाऊँगा और मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों प्रकार की सेवा करूँगा।”
समापन स्लोगन:
ज्ञान का मंथन करो, शुभ संकल्पों से सेवा करो और अपने हर बोल-कर्म से शान्ति, शक्ति और खुशी बाँटो।
6. डिस्क्लेमर
यह “मुरली मंथन” 31 अक्टूबर 2026 की उपलब्ध साकार मुरली, उसके धारणा-सार, वरदान, स्लोगन और अव्यक्त इशारे पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन एवं चिंतन सामग्री है। अन्य दिनांकित मुरलियों के संदर्भ उनके शीर्षकों और उपलब्ध विषय-सूचियों के आधार पर तुलना एवं आगे के अध्ययन के लिए दिए गए हैं; उन्हें मूल पाठ के शब्दशः उद्धरण के रूप में न समझें।
परमात्मा, आत्मा, मूलवतन, सूक्ष्मवतन, सृष्टि-चक्र, सतयुग तथा अन्य आध्यात्मिक अवधारणाएँ ब्रह्माकुमारीज़ की शिक्षाओं और मान्यताओं के संदर्भ में प्रस्तुत हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। इस प्रस्तुति का उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति, समुअव्यक्त मुरली — 26 जनवरी 1971
“ज़िम्मेवारी उठाने से फायदे”
मुख्य विषय
विश्व परिवर्तन की जिम्मेदारी, निमित्त बनकर श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करना, याद की यात्रा का टाइम-टेबल, अव्यक्त स्थिति, भविष्य स्वरूप का साक्षात्कार तथा सर्विसएबुल, सेन्सीबुल, सक्सेसफुल और वैल्युएबल बनने की विशेषताएँ।
- विश्व परिवर्तन की जिम्मेदारी
प्रश्न 1. बच्चों को विश्व के प्रति कौन-सी जिम्मेदारी दी गई है?
उत्तर: विश्व परिवर्तन करने वाले आधारमूर्त, उद्धारमूर्त और विश्व के सामने श्रेष्ठ उदाहरण बनने की जिम्मेदारी।
प्रश्न 2. आधारमूर्त आत्माओं के प्रत्येक कदम की क्या जिम्मेदारी है?
उत्तर: हमारे एक-एक कदम को देखकर अनेकों आत्माएँ अपने कदम उठाएँगी और हमें फॉलो करेंगी।
प्रश्न 3. जिम्मेदारी उठाने से क्या फायदे होते हैं?
उत्तर: आत्मा को सर्व आत्माओं की आशीर्वाद मिलती है, मदद प्राप्त होती है और अवस्था हल्की बनती है।
प्रश्न 4. बड़ी जिम्मेदारी होते हुए भी थकावट क्यों नहीं होती?
उत्तर: जब आत्मा सर्व आत्माओं के उद्धार का निमित्त बनती है, तो अनुभव होता है कि कार्य स्वयं बाप करा रहे हैं।
प्रश्न 5. जिम्मेदारी हमारी अवस्था बनाने में कैसे मदद करती है?
उत्तर: जिम्मेदारी आत्मा को व्यस्त, एकाग्र और पुरुषार्थी बनाती है तथा फ्री रहने की आदत से बचाती है।
2. वर्तमान पुरुषार्थ और भविष्य स्वरूप का साक्षात्कार
प्रश्न 6. बापदादा महारथी बच्चों में कौन-से तीन स्वरूप देखते हैं?
उत्तर: वर्तमान स्वरूप, इसी जन्म का अंतिम स्वरूप और दूसरे जन्म का भविष्य स्वरूप।
प्रश्न 7. भविष्य स्वरूप का अनुभव किस प्रकार होना चाहिए?
उत्तर: बुद्धिबल द्वारा इतना स्पष्ट अनुभव हो कि जैसे शरीर छोड़ा और भविष्य का ताजधारी, तख्तधारी स्वरूप तैयार है।
प्रश्न 8. अपने भविष्य स्वरूप को जानने के आधार क्या हैं?
उत्तर: अपनी सर्विस, सहयोगीपन और पुराने संस्कारों को मिटाने की शक्ति।
प्रश्न 9. समीप रत्नों की पहचान कैसे होती है?
उत्तर: आत्माओं के संस्कार और भविष्य पार्ट के अनुसार उनके समीप आने या दूर रहने का साक्षात्कार होता है।
प्रश्न 10. क्या भविष्य का साक्षात्कार केवल भविष्य में होगा?
उत्तर: नहीं, वर्तमान की प्रैक्टिकल सर्विस और संस्कारों से भविष्य का साक्षात्कार अभी भी हो सकता है।
3. याद की यात्रा का व्यक्तिगत टाइम-टेबल
प्रश्न 11. प्रत्येक आत्मा को अपने लिए कौन-सा विशेष प्रोग्राम बनाना चाहिए?
उत्तर: सुबह से रात तक याद की यात्रा पर अटेन्शन रखने का व्यक्तिगत टाइम-टेबल बनाना चाहिए।
प्रश्न 12. याद का प्लैन कब बनाना चाहिए?
उत्तर: अमृतवेले ही पूरे दिन की याद का प्लैन बनाना चाहिए।
प्रश्न 13. व्यस्त कार्यों के बीच याद में रहने का अभ्यास कैसे करें?
उत्तर: कार्य के बीच निश्चित समय पर दो-तीन मिनट निकालकर याद में रहना चाहिए।
प्रश्न 14. सामूहिक रूप से याद का निश्चित समय रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: एक-दूसरे को याद की स्मृति मिलती है, बुद्धि को विश्राम मिलता है, शक्ति भरती है और वातावरण में सहयोग मिलता है।
प्रश्न 15. दूसरों को अव्यक्त स्थिति का अनुभव कैसे कराएँ?
उत्तर: जब कोई व्यक्त भाव में हो, तब बिना कुछ कहे अपने अव्यक्त और शांत स्वरूप द्वारा उसे इशारा देना चाहिए।
4. अव्यक्त स्थिति और साक्षात्कारमूर्त बनना
प्रश्न 16. आत्मा की अंतिम स्टेज कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: साक्षात्कारमूर्त अर्थात् अपने श्रेष्ठ स्वरूप और फरिश्तेपन का अनुभव कराने वाली।
प्रश्न 17. साक्षात् मूर्त बनने का क्या परिणाम होगा?
उत्तर: हमारे संस्कार और चलन भी श्रेष्ठ एवं साक्षात्कारमूर्त के समान बनेंगे।
प्रश्न 18. स्वयं को चार्ज करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: जितना स्वयं को चार्ज करेंगे, उतना ही इन्चार्ज बनने का कर्तव्य सफलतापूर्वक कर सकेंगे।
प्रश्न 19. निमित्त समझकर कदम क्यों उठाना चाहिए?
उत्तर: क्योंकि सारे विश्व की आत्माओं की नज़र हमारे ऊपर है और हमारी चलन से उन्हें ईश्वरीय ज्ञान, स्नेह तथा श्रेष्ठ चरित्रों का अनुभव होता है।
प्रश्न 20. फरिश्तेपन की वास्तविक पहचान क्या है?
उत्तर: बड़ी जिम्मेदारी निभाते हुए भी आकारी और निराकारी स्थिति का अनुभव कराना।
5. दृष्टि की शक्ति और मास्टर सूर्य बनना
प्रश्न 21. आत्मा की दृष्टि में कितनी शक्ति होनी चाहिए?
उत्तर: हमारी एक दृष्टि, स्मृति और वृत्ति की शक्ति अशांत तथा बेचैन आत्मा को भी शांत कर दे।
प्रश्न 22. मास्टर सूर्य का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर: सर्व आत्माओं को ज्ञान की रोशनी देना और उनके पुराने संस्कारों रूपी कीटाणुओं को समाप्त करना।
प्रश्न 23. लाइट और माइट में क्या अंतर है?
उत्तर: लाइट अर्थात् ज्ञान की रोशनी देना और माइट अर्थात् शक्ति द्वारा पुराने संस्कारों को नष्ट करना।
प्रश्न 24. वर्तमान सेवा में किस बात की कमी बताई गई है?
उत्तर: ज्ञान की लाइट देने में सफलता मिली है, लेकिन किरणों की माइट द्वारा आत्माओं के संस्कार समाप्त करने का कार्य अभी बाकी है।
प्रश्न 25. यदि ज्ञान मिलने के बाद भी संस्कार समाप्त नहीं होते तो क्या समझना चाहिए?
उत्तर: हमारी किरणों में शक्ति की कमी है। ज्ञान की रोशनी के साथ शक्ति भी आवश्यक है।
6. चार प्रकार की आत्माओं की लिस्ट
प्रश्न 26. बापदादा के पास कौन-सी चार लिस्ट हैं?
उत्तर:
- सर्विसएबुल (Serviceable)
- सेन्सीबुल (Sensible)
- सक्सेसफुल (Successful)
- वैल्युएबल (Valuable)
प्रश्न 27. वैल्युएबल आत्मा की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर: उसे अपने समय, संकल्प और सर्विस की वैल्यू होती है। इसलिए दूसरे भी उसके समय, संकल्प और सेवा का मूल्य समझते हैं।
प्रश्न 28. सेन्सीबुल आत्मा की विशेषता क्या है?
उत्तर: उसकी बुद्धि में अच्छी प्लैनिंग और समझने की शक्ति अधिक होती है।
प्रश्न 29. सर्विसएबुल आत्मा की विशेषता क्या है?
उत्तर: वह प्लैनिंग कम करती है, लेकिन योजनाओं को प्रैक्टिकल में लाने की विशेषता रखती है।
प्रश्न 30. सेन्सीबुल और सर्विसएबुल में क्या अंतर है?
उत्तर: सेन्सीबुल में प्लैनिंग की विशेषता होती है और सर्विसएबुल में प्रैक्टिकल करने की विशेषता होती है।
प्रश्न 31. स्थापना के कार्य में दोनों गुण क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर: क्योंकि भविष्य का निर्माण श्रेष्ठ संकल्प और प्लैनिंग से भी होता है तथा प्रैक्टिकल कर्म से भी।
प्रश्न 32. क्या सर्विसएबुल होने से सफलता निश्चित है?
उत्तर: नहीं। सर्विस करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सफलतामूर्त नहीं होता। सफलता के लिए अव्यक्त स्थिति भी आवश्यक है।
प्रश्न 33. कुछ आत्माओं को सहज सफलता क्यों मिलती है?
उत्तर: ड्रामा अनुसार कुछ आत्माओं को सफलता का वरदान प्राप्त होता है, इसलिए उन्हें कम मेहनत में भी सफलता मिल जाती है।
7. टीचर बनने से पहले स्टूडेन्ट बनना
प्रश्न 34. टीचर्स को सदैव कौन-सी स्मृति रखनी चाहिए?
उत्तर: टीचर बनने से पहले मैं स्वयं एक स्टूडेन्ट हूँ।
प्रश्न 35. स्टूडेन्ट स्मृति रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: स्वयं पढ़ाई करने और सीखने से ही दूसरों को अच्छी तरह पढ़ा सकते हैं।
प्रश्न 36. स्वयं स्टूडेन्ट न बनने का क्या परिणाम होता है?
उत्तर: दूसरों को स्टूडेन्ट बनाने और पढ़ाई में आगे बढ़ाने की शक्ति कम हो जाती है।
8. मास्टर सूर्य का दोहरा कर्तव्य
प्रश्न 37. सूर्य के दो मुख्य कर्तव्य कौन-से हैं?
उत्तर: रोशनी देना और किचड़े को समाप्त करना।
प्रश्न 38. आध्यात्मिक जीवन में रोशनी देने का क्या अर्थ है?
उत्तर: ज्ञान द्वारा आत्माओं को सत्य का मार्ग दिखाना।
प्रश्न 39. किचड़ा समाप्त करने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आत्माओं के पुराने संस्कारों और कमजोरियों को शक्ति द्वारा समाप्त करना।
प्रश्न 40. यदि ज्ञान मिलने पर भी पुराने संस्कार समाप्त नहीं होते तो क्या कारण है?
उत्तर: ज्ञान की लाइट तो मिल रही है, लेकिन उसे धारण कराने वाली माइट अर्थात् शक्ति कम है।
प्रश्न 41. संस्कारों को जल्दी समाप्त करने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: अधिक शक्तिशाली स्थिति धारण करना। जितनी शक्ति अधिक होगी, उतनी जल्दी पुराने संस्कार समाप्त होंगे।
प्रश्न 42. क्या आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए लौकिक पढ़ाई आवश्यक है?
उत्तर: नहीं। सृष्टि के चक्र और ज्ञान को समझने से भी आवश्यक आध्यात्मिक नॉलेज प्राप्त हो सकती है।
- मुरली की मुख्य शिक्षाएँ
- जिम्मेदारी उठाओ: विश्व परिवर्तन के निमित्त बनकर श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करो।
- हल्के रहो: जिम्मेदारी को बोझ नहीं, अवस्था बनाने का साधन समझो।
- भविष्य स्वरूप देखो: वर्तमान पुरुषार्थ से अपने अंतिम और भविष्य स्वरूप को पहचानो।
- याद का टाइम-टेबल बनाओ: अमृतवेले पूरे दिन की याद का प्लैन बनाओ।
- अव्यक्त स्थिति धारण करो: अपनी दृष्टि और वृत्ति से दूसरों को शांति का अनुभव कराओ।
- मास्टर सूर्य बनो: ज्ञान की लाइट के साथ शक्ति की माइट भी दो।
- चारों लिस्ट में आओ: सर्विसएबुल, सेन्सीबुल, सक्सेसफुल और वैल्युएबल बनो।
- पहले स्टूडेन्ट बनो: स्वयं पढ़ाई करके दूसरों को पढ़ाओ।
- संस्कार समाप्त करो: ज्ञान की शक्ति से पुराने संस्कारों का परिवर्तन करो।
- आत्म-जाँच के लिए प्रश्न
- क्या मैं अपनी विश्व परिवर्तन की जिम्मेदारी को समझकर कदम उठाता हूँ?
- क्या मेरी जिम्मेदारी मेरी अवस्था को हल्का और शक्तिशाली बनाती है?
- क्या मैंने पूरे दिन के लिए याद का टाइम-टेबल बनाया है?
- क्या मेरे सामने अपने भविष्य स्वरूप का स्पष्ट लक्ष्य है?
- क्या मेरी दृष्टि और वृत्ति दूसरों को शांति का अनुभव कराती है?
- क्या मैं केवल ज्ञान की लाइट देता हूँ या संस्कार परिवर्तन की माइट भी देता हूँ?
- मैं चार लिस्ट में से किस लिस्ट में आता हूँ?
- क्या मैं स्वयं स्टूडेन्ट बनकर पढ़ाई करता हूँ?
- क्या मैं अपनी चलन से दूसरों के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बन रहा हूँ?
मुरली का सार
जिम्मेदारी उठाना बोझ नहीं, बल्कि अपनी अवस्था को श्रेष्ठ बनाने का साधन है।
जितना हम स्वयं को चार्ज करेंगे, उतना ही विश्व परिवर्तन के इन्चार्ज बन सकेंगे। हमारी अंतिम स्थिति ऐसी हो कि ज्ञान की लाइट से आत्माओं को रास्ता मिले और शक्ति की माइट से उनके पुराने संस्कार समाप्त हों।
विशेष स्मृति:
मास्टर सूर्य बनो — ज्ञान की रोशनी भी दो और संस्कारों को समाप्त करने वाली शक्ति की किरणें भी दो।दाय या परंपरा की आलोचना करना नहीं है। दर्शकों से निवेदन है कि वे मूल मुरली का अध्ययन करें और विचारों को विवेकपूर्वक समझें।
📝 89. अव्यक्त मुरली |26 January 1971
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
