28.8.1990
अन्तर्मन के वाहन से उड़ती कला का अनुभव करो
आप सभी के दिल का याद-प्यार लेते हुए आज जब मैं बाबा के पास पहुंची तो देखा – जैसे साकार में बाबा खड़े होकर दृष्टि देते थे, ऐसे ही दूर से खड़े होकर दृष्टि दे रहे थे। उसी दृष्टि को लेते हुए मैं बाबा के नज़दीक पहुँची। आज बाबा ने स्नेह और शान्ति की शक्ति के रूप में दृष्टि दी और सबकी याद ली। फिर बाबा ने कहा आओ मेरे अन्तर्मन वाहक बच्चे, आओ। मैं बाबा की ओर देख रही थी। बाबा बोले बच्ची, तुम जानती हो कि इस नुमाः शाम के समय बाबा क्या कर रहे थे? बाबा ने बताया मैं पंछियों को उड़ा रहा था। मैं मुस्कराने लगी। बाबा ने कहा- जानती हो, कौन-से पंछी? देखो, लोग तो सफेद कबूतरों को उड़ाते है, लेकिन बाबा अपने स्नेही, समीप, शक्तिशाली, उड़ती कला वाले पंछियों को उड़ा रहे थे और देख रहे थे कि कितना उड़ते पंछी हैं और कितने समय में कितनी स्पीड तक उड़ सकते हैं मैंने कहा- बाबा, आपने जो पंछी उड़ाये, वो उड़कर कहाँ गये? बाबा ने कहा- मैने एक ग्रुप को भक्तों के पास भेजा, दूसरे को वैज्ञानिकों के पास भेजा, तीसरे ग्रुप को धर्म-नेताओं के पास भेजा और चौथे ग्रुप को आजकल के राजनेताओं के पास भेजा। क्यों भेजा? क्योंकि सभी वर्गों की आत्माएँ बहुत निराश हो चुकी हैं। ऐसे निराश बच्चों को शुभ आशा, श्रेष्ठ आशा, खुशी की आशा देने के लिए बच्चों का ग्रुप भेजा। मैंने पूछा बाबा, फिर रिज़ल्ट क्या हुई? बाबा ने कहा- रिज़ल्ट भिन्न-भिन्न प्रकार की रही। जैसे उड़ते पंछी थे, ऐसी रिज़ल्ट थी। फिर बाबा ने जो पहले अन्तर्मन वाहक बच्चे कहा था, उसका रहस्य बताते हुए कहा अन्तर्मन से ही उड़ेंगे, यही वाहन है। अन्तर्मन-वाहक बच्चों को उड़ाया। कोई तो सेकण्ड में उड़ गये, कोई को उड़ने में थोड़ा समय लगा। जैसे कभी-कभी कोई पंछी अपने पंखों को थोड़ा हिलाता है, फिर उड़ता है। कोई को कुछ सेकण्ड लगा, कोई को कुछ मिनट लगे और कोई उड़े लेकिन चक्कर लगा कर वापस आ गये।
बाबा ने आगे कहा- बाबा बच्चों से अब यही चाहते हैं कि बच्चे अन्तर्मन यानी श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से, इसी मन के वाहन से सेवा करें। यही सेवा का सबसे अच्छा साधन है। इसे चाहे शुभभावना कहो, चाहे शुभ कामना कहो या श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति कहो यही सेवा का साधन है सेफ्टी का भी साधन है और माला में समीप आने का भी साधन है। इसलिए बाबा अभी अन्तम् – अव्यक्त संदेश
वाहक बच्चों को देखना चाहते हैं। अब विश्व के सर्व वर्गों की इस अन्तर्मन-वाहक स्थिति से या श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से आप सेवा कर सकते हो। बाबा ने आज अन्तः वाहक शरीर नहीं कहा, अन्तर्मन-वाहक कहा। क्योंकि अन्तः वाहक शरीर का अर्थ है अन्तर्मन ही वाहक बने। लोगों ने इसको ही कहा है अन्तः वाहक शरीर। बाबा ने कहा कि यह अन्तर्मन-वाहक यह स्टेज आप बच्चों की अभी होनी चाहिए। जब यह आशा के दीपक जगायेंगे, तब निराश आत्माओं में यह संकल्प पैदा होगा कि कोई ठिकाना, कोई सहारा मिलने वाला है। यह श्रेष्ठ आशा का दीपक आपके श्रेष्ठ संकल्प द्वारा निराश आत्माओं में जगेगा।
बाबा ने कहा – सभी ने बहुत अच्छे प्रोग्राम बनाये हैं। बाबा को बहुत खुशी है कि सभी ने एक संकलप से दिल से यह प्रोग्राम स्वीकार किया है कि हम अभी तपस्या वर्ष मनायेंगे। लेकिन यह संकल्प तो हो गया बीज। बीज तो पड़ गया। अब यह बीच फल कब देगा? बाबा ने कहा -बीज फल तब देता है जब उसको पानी दिया जाये, धूप-गर्मी दी जाए, उसकी पालना की जाए। तब ही बीज फल बनकर सामने आता है। अब सभी बच्चे अपने आपसे यह संकल्प करो कि हमने जो बीच धारण किया है, उसे फल के स्वरूप में लाना है। फल यही निकलेगा कि सभी आत्माओं की निराशा बदल कर श्रेष्ठ आशा के रूप में बदलेगी, परिवर्तन होगा। चाहे स्वयं में आत्माएँ निराश हैं, चाहे सेवा में निराश हैं, चाहे और आत्माओं से निराश हैं उन सबमें श्रेष्ठ आशा का परिवर्तन होगा। निराशा श्रेष्ठ आशा में परिवर्तन होगी। तो यह तपस्या वर्ष का फल निकलेगा। लेकिन इसके लिए बीज की सदा पालना करते रहना। ऐसा न हो कि किसी भी कारण से ‘बीज’ बीज ही रह जाए, फल प्रत्यक्ष रूप में न आये। इसलिए अपने संकल्प द्वारा प्रैक्टिकल कर्म से पालना करते रहना।
इसके बाद बाबा ने कहा कि आप लोगों ने प्लैन तो बनाया ही है कि तपस्या वर्ष में क्या करना है। तपस्या वर्ष अर्थात् एक तरफ योग-अग्नि में भस्म करना। जैसे यज्ञ में जौ-तिल आदि भस्म करते हैं और उसके फलस्वरूप वातावरण की शुद्ध होती है। तो ऐसे एक तरफ भस्म करना और दूसरे तरफ सच्चा सोना बनना और सुनहरी गोल्डन दुनिया लाना। यह इस तपस्या के यज्ञ-कुण्ड से फल निकलेगा! यह तपस्या वर्ष यज्ञ-कुण्ड का वर्ष है, सफलता-कुण्ड से फल निकलेगा! यह स्मृति रखने से संकल्प रूपी बीज का फल सहज प्राप्त होगा। बाबा इस तपस्या वर्ष के लिए अपना प्लैन बता रहे हैं। बाबा आप बच्चों के दृढ़ संकल्प के ऊपर बार-बार हर कर्म में वारी जायेंगे। वारी जाना माना मेहनत से छुड़ा कर वरदान और सूक्ष्म सहयोग देना। तुम बच्चे बाबा की श्रीमत पर वारी जायेंगे अर्थात् तपस्या करेंगे और बाबा तुम बच्चों के ऊपर विशेष वारी जायेंगे, जिससे ज़्यादा
मेहनत नहीं करनी पड़ेगी – बाबा यह बहुत प्यार से बोल रहे थे। फिर बाबा ने एक दृश्य दिखाया। हम लोग जो यहाँ कर रहे है, उसे ही बाबा ने एक दृश्य के रूप में दिखाया। जैसे हम लोग यहाँ कुमारियों का समर्पण-समारोह करते हैं तो चमकीली चुन्नी और छत्र पहनाते हैं, ऐसे ही बाबा ने दृश्य दिखाया कि सभी तपस्या में बैठे हैं और लाइट की चुन्नी सभी के ऊपर पड़ी है। उस चुन्नी के ऊपर छोटे-छोटे लाइट के बहुत सुन्दर भिन्न-भिन्न फूल चमक रहे थे। सारी चुन्नियाँ वैराइटी फूलों से सजी हुई थीं और हर एक के ऊपर ताज भी लाइट का चमक रहा था। बाबा ने कहा इस दृश्य से समझा कि बच्चे क्या कर रहे है? बाबा ने सुनाया बच्चे, अपने को सजनी बनाए दिव्य गुणों के श्रृंगार से, श्रेष्ठ संकल्प से सज रहे हैं और सभी स्व-परिवर्तन से वायुमण्डल को, विश्व को परिवर्तन करने का ताज धारण कर रहे हैं। तो यही कर रहे हो ना! तो अभी अपने को सदा श्रृंगारे हुए रूप में ही देखना। हर संकल्प, हर कर्मेन्द्रिय में लाइट की चुन्नी पड़ी हुई हो। चुन्नी से जैसे सारा शरीर ही (बैठते समय) ढक जाता है, ऐसे ही यह लाइट की चुन्नी से सदा सजे सजाये रहना और यही सोचना कि मैं ऐसे साजन की सजी-सजाई सजनी हूँ। स्व-परिवर्तन की f. जम्मेवारी का ताज सदा धारण करने से सफलता की माला आपके गले में सदैव पड़ी हुई अनुभव होगी। तो आप यह कर रहे हो और इसे ही दृढ़ता की स्टैम्प लगा कर करते रहना।
फिर बाबा ने कहा- मेरे बच्चे बड़ी मेहनत करके आये हैं। हमने कहा- बाबा, मेहनत तो मोहब्बत में बदल गई। तो बाबा ने कहा नहीं, बच्चों ने बहुत मेहनत की है, लेकिन जितनी मेहनत की उससे ज़्यादा फल मिल गया। बाबा ने पूछा- मेहनत ज़्यादा की है या फल ज़्यादा मिला? मैने कहा – बाबा, फल ज़्यादा ही मिल रहा है। बाबा ने कहा कोई-कोई बच्चे मेहनत को ज़्यादा याद कर रहे हैं, लेकिन बच्चों को जो फल मिला है वह ड्रामा में गोल्डन लाटरी, गोल्डन चांस है! तो जब मेहनत याद आये तो गोल्डन लाटरी, गोल्डन चांस को याद करना। फल को सामने रखने से मेहनत समाप्त हो जायेगी। फिर बाबा ने इस ग्रुप के लिए एक बहुत बढ़िया सौगात दी, वह सौगात थी – एक कमल का पुष्प और उस पुष्प के ऊपर एक दीपक – कमल-दीप। कमल के ऊपर वह दीपक एकरस जग रहा था। बाबा ने कहा यह है कमल-दीप, दृढ़ संकल्प का दीपक, न्यारे, निराले और प्यारे बनने की निशानी। यह कमल-दीप बाबा सभी बच्चों को सौगात रूप में दे रहे हैं।
अव्यक्त दिव्य संदेश–31
28 अगस्त 1990 | हिंदी
अन्तर्मन के वाहन से उड़ती कला का अनुभव करो
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा ने अन्तर्मन अर्थात् श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति द्वारा सेवा करने की विधि समझाई है। यह शक्ति निराश आत्माओं में श्रेष्ठ आशा जगाने, स्वयं को उड़ती कला में ले जाने और विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनने का श्रेष्ठ साधन है।
बापदादा ने तपस्या वर्ष के संकल्प को बीज के समान बताया है। इस बीज की नियमित पालना श्रेष्ठ संकल्पों और प्रैक्टिकल कर्मों से करनी है, ताकि निराशा आशा में बदले और स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन हो। साथ ही, दिव्य गुणों के श्रृंगार, दृढ़ता की स्टैम्प और कमल-दीप की सौगात द्वारा सहज पुरुषार्थ की प्रेरणा दी है।
- अन्तर्मन-वाहक बच्चों का आह्वान
बापदादा बच्चों को स्नेह और शान्ति की शक्ति से दृष्टि देते हुए ‘अन्तर्मन-वाहक बच्चे’ कहकर बुलाते हैं।
बाबा बताते हैं कि वे उड़ती कला वाले स्नेही, समीप और शक्तिशाली बच्चों को पंछियों के समान उड़ा रहे थे। वे देख रहे थे कि कौन कितनी जल्दी और कितनी गति से उड़ सकता है।
इस दृश्य के माध्यम से बच्चों को अपनी श्रेष्ठ संकल्प शक्ति से ऊँची स्थिति में जाने की प्रेरणा दी गई है।
मुख्य शिक्षा: श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से स्वयं को उड़ती कला में ले जाना है।
- विश्व के विभिन्न वर्गों की सेवा
बापदादा बताते हैं कि उन्होंने बच्चों के विभिन्न समूहों को भक्तों, वैज्ञानिकों, धर्म-नेताओं और राजनेताओं के पास भेजा।
इन सभी वर्गों की आत्माएँ निराश हो चुकी हैं। उन्हें शुभ आशा, श्रेष्ठ आशा और खुशी की आशा देने के लिए रूहानी सेवाधारी बच्चों को भेजा गया।
कुछ आत्माएँ शीघ्र उड़ती कला में पहुँचीं, कुछ को समय लगा और कुछ उड़कर वापस अपने पुराने चक्र में आ गईं।
यह दृश्य समझाता है कि श्रेष्ठ संकल्प की सेवा का प्रभाव अलग-अलग आत्माओं पर अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है।
मुख्य शिक्षा: हर वर्ग की निराश आत्मा में श्रेष्ठ आशा जगाना ही रूहानी सेवा का लक्ष्य है।
- अन्तर्मन-वाहक बनने की विधि
बापदादा स्पष्ट करते हैं कि अन्तर्मन ही वाहन बने। अर्थात् श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से सेवा करनी है।
इस सेवा को शुभभावना, शुभकामना या श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति—किसी भी नाम से समझ सकते हैं। यही सेवा का अच्छा साधन है, सुरक्षा का साधन है और विजय की माला में समीप आने का साधन भी है।
अब विश्व के सभी वर्गों की सेवा इसी अन्तर्मन-वाहक स्थिति से करनी है।
मुख्य शिक्षा: मन की श्रेष्ठ संकल्प शक्ति को सेवा का वाहन बनाना है।
- निराश आत्माओं में आशा का दीपक जगाना
बापदादा बताते हैं कि जब बच्चे श्रेष्ठ संकल्प द्वारा सेवा करेंगे, तब निराश आत्माओं में यह आशा जगेगी कि उन्हें कोई ठिकाना और सहारा मिलने वाला है।
श्रेष्ठ आशा का दीपक बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि बच्चों के श्रेष्ठ संकल्पों से निराश आत्माओं के दिल में जगेगा।
इसलिए स्वयं की स्थिति को श्रेष्ठ बनाकर शुभभावना और शुभकामना से सेवा करनी है।
मुख्य शिक्षा: अपने श्रेष्ठ संकल्पों द्वारा दूसरों के दिल में आशा जगानी है।
- तपस्या वर्ष का बीज और उसका फल
बापदादा बच्चों के तपस्या वर्ष के संकल्प से खुश हैं। वे समझाते हैं कि संकल्प रूपी बीज तो पड़ गया, लेकिन बीज को फल देने के लिए उसकी पालना करनी पड़ती है।
जैसे बीज को पानी, धूप और देखभाल की आवश्यकता होती है, वैसे ही तपस्या के संकल्प को श्रेष्ठ संकल्पों और प्रैक्टिकल कर्मों द्वारा नियमित रूप से पालना करनी है।
तपस्या वर्ष का फल यह होगा कि आत्माओं की निराशा श्रेष्ठ आशा में बदलने लगेगी—चाहे वे स्वयं से निराश हों, सेवा से निराश हों या दूसरी आत्माओं से निराश हों।
मुख्य शिक्षा: संकल्प रूपी बीज को नियमित पुरुषार्थ से फलस्वरूप बनाना है।
- तपस्या यज्ञ-कुण्ड और योग-अग्नि
बापदादा तपस्या वर्ष को यज्ञ-कुण्ड के समान बताते हैं। एक तरफ योग-अग्नि में पुरानी कमजोरियों और व्यर्थ बातों को भस्म करना है, दूसरी तरफ स्वयं को सच्चा सोना बनाना है।
जैसे यज्ञ में जौ-तिल आदि डालने से यज्ञ की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, वैसे ही तपस्या में पुराने संस्कारों को समाप्त करके श्रेष्ठ संस्कार धारण करने हैं।
इस तपस्या का फल सुनहरी, गोल्डन दुनिया लाने के श्रेष्ठ संकल्प से जुड़ा है।
मुख्य शिक्षा: योग-अग्नि में पुरानी कमियों को भस्म करके सच्चा सोना बनना है।
- बाबा की मदद और दृढ़ संकल्प
बापदादा बच्चों को बताते हैं कि वे बच्चों के दृढ़ संकल्प पर वारी जाते हैं। बाबा की वारी जाने का अर्थ है बच्चों को मेहनत से छुड़ाने के लिए वरदान और सूक्ष्म सहयोग देना।
बच्चों को श्रीमत पर चलते हुए तपस्या करनी है और बाबा की विशेष मदद को स्वीकार करना है। इससे पुरुषार्थ सहज होता है और अनावश्यक मेहनत कम होती है।
मुख्य शिक्षा: दृढ़ संकल्प के साथ श्रीमत पर चलना और बाबा की मदद स्वीकार करना है।
- लाइट की चुन्नी और दिव्य गुणों का श्रृंगार
बापदादा एक दृश्य दिखाते हैं जिसमें सभी बच्चे तपस्या में बैठे हैं। प्रत्येक के ऊपर लाइट की चुन्नी है, जिस पर अलग-अलग प्रकार के सुन्दर लाइट के फूल चमक रहे हैं। हर एक के ऊपर लाइट का ताज भी दिखाई देता है।
बाबा इस दृश्य का रहस्य बताते हैं कि बच्चे दिव्य गुणों के श्रृंगार और श्रेष्ठ संकल्पों से स्वयं को सजा रहे हैं।
स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी का ताज धारण करके वातावरण और विश्व को बदलने का निमित्त बनना है।
हर संकल्प और कर्म में लाइट की चुन्नी से सजे हुए स्वरूप की स्मृति रखनी है।
मुख्य शिक्षा: दिव्य गुणों से स्वयं को सजाकर स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी निभानी है।
- मेहनत नहीं, फल को सामने रखो
बापदादा बच्चों से पूछते हैं कि उन्हें मेहनत अधिक याद आती है या फल अधिक मिला है। वे समझाते हैं कि बच्चों को जितनी मेहनत करनी पड़ी, उससे अधिक फल प्राप्त हुआ है।
इस प्राप्ति को ड्रामा की गोल्डन लॉटरी और गोल्डन चांस कहा गया है।
जब मेहनत याद आए, तब प्राप्त हुए फल को सामने रखना है। फल की स्मृति से मेहनत का बोझ हल्का हो जाएगा और पुरुषार्थ में उमंग बढ़ेगा।
मुख्य शिक्षा: मेहनत की याद में रुकने के बजाय प्राप्ति और गोल्डन चांस को याद करना है।
- कमल-दीप की सौगात
अन्त में बापदादा बच्चों को कमल के पुष्प पर जगते हुए दीपक की सौगात देते हैं। इसे कमल-दीप कहा गया है।
यह दृढ़ संकल्प का दीपक है और न्यारे, निराले तथा प्यारे बनने की निशानी है।
कमल की विशेषता के समान संसार में रहते हुए भी न्यारे रहना है और दीपक की तरह श्रेष्ठ संकल्प की ज्योति सदा जगाए रखनी है।
मुख्य शिक्षा: दृढ़ संकल्प के कमल-दीप को दिल में सदा जगाए रखना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: अन्तर्मन-वाहक स्थिति
प्रश्न 1. बापदादा ने बच्चों को किस नाम से पुकारा?
उत्तर: अन्तर्मन-वाहक बच्चे।
प्रश्न 2. बाबा किस प्रकार के पंछियों को उड़ा रहे थे?
उत्तर: स्नेही, समीप, शक्तिशाली और उड़ती कला वाले पंछियों को।
प्रश्न 3. बाबा ने बच्चों के समूहों को किनके पास भेजा?
उत्तर: भक्तों, वैज्ञानिकों, धर्म-नेताओं और राजनेताओं के पास।
प्रश्न 4. इन वर्गों की आत्माओं को किसकी आवश्यकता थी?
उत्तर: शुभ आशा, श्रेष्ठ आशा और खुशी की आशा की।
प्रश्न 5. अन्तर्मन-वाहक बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से सेवा करना।
भाग 2: श्रेष्ठ संकल्प की सेवा
प्रश्न 6. श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति को और किन नामों से समझाया गया है?
उत्तर: शुभभावना और शुभकामना।
प्रश्न 7. श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति किन कार्यों में सहायक है?
उत्तर: सेवा, सुरक्षा और विजय की माला में समीप आने में।
प्रश्न 8. निराश आत्माओं में आशा का दीपक किससे जगेगा?
उत्तर: बच्चों के श्रेष्ठ संकल्पों से।
प्रश्न 9. अन्तर्मन-वाहक स्थिति से किनकी सेवा करनी है?
उत्तर: विश्व के सभी वर्गों की आत्माओं की।
प्रश्न 10. श्रेष्ठ संकल्प की सेवा का लक्ष्य क्या है?
उत्तर: निराश आत्माओं में श्रेष्ठ आशा जगाना।
भाग 3: तपस्या वर्ष का बीज
प्रश्न 11. तपस्या वर्ष के संकल्प को किसके समान बताया गया है?
उत्तर: बीज के समान।
प्रश्न 12. बीज को फल देने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: पानी, धूप और पालना।
प्रश्न 13. संकल्प रूपी बीज की पालना कैसे करनी है?
उत्तर: श्रेष्ठ संकल्पों और प्रैक्टिकल कर्मों से।
प्रश्न 14. तपस्या वर्ष का मुख्य फल क्या होगा?
उत्तर: निराशा का श्रेष्ठ आशा में परिवर्तन।
प्रश्न 15. तपस्या वर्ष को किसके समान बताया गया है?
उत्तर: यज्ञ-कुण्ड के वर्ष के समान।
भाग 4: योग-अग्नि और स्व-परिवर्तन
प्रश्न 16. योग-अग्नि में क्या भस्म करना है?
उत्तर: पुरानी कमजोरियों और व्यर्थ बातों को।
प्रश्न 17. योग-अग्नि में कमियों को भस्म करके क्या बनना है?
उत्तर: सच्चा सोना।
प्रश्न 18. बाबा बच्चों के दृढ़ संकल्प पर क्या करते हैं?
उत्तर: वारी जाते हैं और वरदान तथा सूक्ष्म सहयोग देते हैं।
प्रश्न 19. स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी का प्रतीक क्या दिखाया गया?
उत्तर: लाइट का ताज।
प्रश्न 20. लाइट की चुन्नी किसका प्रतीक है?
उत्तर: दिव्य गुणों के श्रृंगार और श्रेष्ठ संकल्पों का।
भाग 5: सहज पुरुषार्थ और प्राप्ति
प्रश्न 21. तपस्या में बच्चों को किसके आधार पर चलना है?
उत्तर: बाबा की श्रीमत के आधार पर।
प्रश्न 22. बाबा की मदद से क्या लाभ होता है?
उत्तर: पुरुषार्थ सहज होता है और अनावश्यक मेहनत कम होती है।
प्रश्न 23. बापदादा ने प्राप्ति को किन शब्दों से समझाया?
उत्तर: गोल्डन लॉटरी और गोल्डन चांस।
प्रश्न 24. मेहनत याद आने पर किसे सामने रखना है?
उत्तर: प्राप्त हुए फल को।
प्रश्न 25. फल को सामने रखने से क्या लाभ होगा?
उत्तर: मेहनत का बोझ हल्का होगा और उमंग बढ़ेगा।
भाग 6: कमल-दीप
प्रश्न 26. बाबा ने बच्चों को कौन-सी सौगात दी?
उत्तर: कमल-दीप।
प्रश्न 27. कमल-दीप किसका प्रतीक है?
उत्तर: दृढ़ संकल्प का।
प्रश्न 28. कमल-दीप किन गुणों की निशानी है?
उत्तर: न्यारे, निराले और प्यारे बनने की।
प्रश्न 29. लाइट की चुन्नी और ताज धारण करने का क्या भाव है?
उत्तर: दिव्य गुणों से सजना और स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी निभाना।
प्रश्न 30. इस दिव्य संदेश का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से सेवा करना, तपस्या के बीज की पालना करना और दृढ़ संकल्प से उड़ती कला का अनुभव करना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
क्या मैं श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से अपनी और दूसरों की स्थिति में परिवर्तन लाने का अभ्यास करता हूँ?
क्या मैं निराश आत्माओं में शुभ आशा जगाने के लिए शुभभावना और शुभकामना रखता हूँ?
क्या तपस्या वर्ष का मेरा संकल्प केवल बीज है या मैं उसकी नियमित पालना भी कर रहा हूँ?
मैं अपनी किन कमजोरियों को योग-अग्नि में भस्म करना चाहता हूँ?
क्या मैं स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी का ताज धारण करके चलता हूँ?
क्या मेहनत याद आने पर मैं प्राप्त हुए फल और गोल्डन चांस को सामने रखता हूँ?
क्या मेरे दिल में दृढ़ संकल्प का कमल-दीप सदा जगता रहता है?
निष्कर्ष
28 अगस्त 1990 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि अन्तर्मन की श्रेष्ठ संकल्प शक्ति से स्वयं को उड़ती कला में ले जाना और विश्व की निराश आत्माओं में आशा जगाना है।
तपस्या वर्ष का संकल्प रूपी बीज नियमित पालना से ही फल देगा। योग-अग्नि में पुरानी कमजोरियों को भस्म करना, दिव्य गुणों से स्वयं को सजाना, स्व-परिवर्तन की जिम्मेवारी निभाना और मेहनत के बजाय प्राप्ति को सामने रखना—ये सभी सहज पुरुषार्थ के साधन हैं।
बापदादा की कमल-दीप सौगात हमें दृढ़ संकल्प, न्यारेपन और श्रेष्ठ स्थिति की स्मृति दिलाती है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति से निराशा को आशा में बदलना है।”
दैनिक अभ्यास: हर दिन एक श्रेष्ठ संकल्प चुनें, उसे अपने कर्म में लाएँ और देखें कि उससे स्वयं में तथा दूसरों के प्रति आपकी भावना में क्या परिवर्तन आया।
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल दिव्य संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 31. अव्यक्त दिव्य संदेश | 28.08.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
