20.8.1990
लक्ष्य और लक्षण समान करना ही समर्पित होना है
आप सभी का याद-प्यार लेते हुए वतन में बाबा के पास पहुंची। मैं बाबा की ओर बढ़ रही थी और बाबा हमारी ओर आ रहे थे ऐसे बाबा से मिलन हुआ। बाबा ने मुस्कराते हुए बोला – बच्ची, आज क्या समाचार लाई हो? तो मैने कहा बाबा, आज चार जीन की समर्पित बहनें इकट्ठी हुई हैं, उन सबकी याद लाई हूँ। बाबा मुस्कराया और कहा समर्पित बहनें आई हैं। बाबा जैसे ‘समर्पित’ शब्द को अण्डरलाइन करके बोल रहे थे। बाबा ने पूछा बताओ, समर्पण की निशानी क्या है? मैं बाबा के आगे क्या सुनाऊँ, मुस्कराती रही। तो बाबा ने सुनाया कि ‘समर्पण उसको कहते हैं जो आदि (पहले) दिन से अपने लक्ष्य प्रमाण लक्षण धारण कर चलते आ रहे है, जिनका लक्ष्य और लक्षण समान है उनको कहते हैं समर्पण’। मैंने कहा- बाबा, यह तो सबका होगा ही।
बाबा ने कहा- नहीं बच्ची, पहले दिन का जो लक्ष्य होता है वह बहुत उमंग-उत्साह का, ऊँचा होता है। फिर जब लक्षण धारण करने पड़ते हैं तो उसमें लक्ष्य के प्रमाण लक्षण में फर्क पड़ जाता है। क्योंकि जिस लक्ष्य से आते हैं उस लक्ष्य को प्राप्त करने व मंजिल तक पहुँचने के लिए बीच में जो रास्ता तय करना पड़ता है, उस रास्ते में जो साइडसीन आती है, जिसको आप परिस्थितियाँ कहते हो, वह लक्ष्य प्रमाण लक्षण धारण करना भुला देती हैं। पहले सभी का लक्ष्य रहता है कि जीवन को श्रेष्ठ बनाना है। लेकिन चलते-चलते ‘जीवन बनाने’ का लक्ष्य ‘जीवन बिताने’ के लक्ष्य में चेंज हो जाता है। पीछे जा नहीं सकते, आगे चल नहीं सकते – इसलिए चलना ही है। यह लक्ष्य और लक्षण में फर्क पड़ जाता है। यह राज़ जैसे बाबा सुना रहे थे। बाबा ने कहा- बाबा, इसको ही कहते हैं लक्ष्ण और लक्षण सदा समान रहे। जब तक सम्पूर्ण मंज़िल तक पहुंचे तब तक जो लक्ष्य रखा है, वही सदा चलता रहे। हम सुनती रही।
फिर बाबा ने कहा- सभी से यह पूछना कि सेन्टर पर रहने वाली समर्पित बहनें हो या संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क इन पाँचों में समर्पित हो? अर्पण हैं या समर्पण है? मैंने कहा- बावा, यह तो सभी समर्पण की लिस्ट में हैं। तो बाबा ने कहा- सभी ने अपनी जीवन अर्पण तो की है, लेकिन जीवन अर्पण करने के बाद यह 5 बातें अर्पण करना – इसको कहते हैं समर्पण अर्थात् सब-कुछ अर्पण। तो अर्पण की लिस्ट में हैं या समर्पण है – यह सभी-अव्यक्त संदेश
70 अपने आपको चेक करे। क्योंकि यहाँ और तो कोई बुद्धि को काम नहीं है। रिफ्रेशर कोर्स करने आये हैं ना। अभी सिर्फ स्टडी है और चेकिंग का टाइम है। तन-मन दोनों से बाबा ने फ्री कर दिया है। न जिज्ञासु संभालने हैं, न सेन्टर का कोई काम है। यह जो समय मिला है इसमें एकदम अन्तर्मुखी होकर अपनी चेकिंग करो कि सचमुच, समर्पण और अर्पण में क्या अन्तर है! मैं अर्पण हूँ या समर्पण हूँ? समर्पण हूँ तो कितने परसेन्ट ? किन-किन बातों में समर्पण हूँ? उसकी परसेन्टेज कितनी है? यह महीन रूप से चेक करेंगे तो चेंज करने का भी उमंग आयेगा। इसलिए दूसरा कोई करे, उसके पहले स्वयं ही चेक करना और चेंज करना।
फिर बाबा ने कहा कि – बाबा को एक बात की बहुत खुशी है। मैंने कहा – बाबा, किस बात की आपको खुशी है? तो बाबा ने कहा- बाबा को खुशी है कि इतनी कुमारियाँ आत्मघात से बच गई। स्युसाइड करना – वह तो है जीवघात, लेकिन विकारों में फंसना – यह है आत्मघात। इतनी मेरी कुमारियाँ आत्मघात से बच गईं। साथ-साथ ब्रह्माकुमारी बनने की, योगी जीवन बिताने की हिम्मत रखी है – यह दूसरी खुशी है। तो बाबा बच्चों की हिम्मत पर खुश हैं। यह हिम्मत तो बहुत अच्छी रखी है, लेकिन हिम्मत का रिटर्न है- बाबा की मदद। बाबा जो बच्चों की हिम्मत देखकर मदद देता है वह लेने में थोड़ा-सा कमी कर देते हैं। बाबा जितनी मदद देता है, वह मदद अगर बच्चे लेते जायें और चलते जायें तो पहाड़ जैसी परिस्थिति भी स्व-स्थिति में बदल जाए। लेकिन बाबा जो मदद देता है, उसको लेने के लिए दो बातें चाहिए –
- एक तो ‘एकॉनामी’ की बुद्धि चाहिए
- ‘एकाग्र’ बुद्धि चाहिए।
एकॉनामी में बाबा ने कहा – व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ समय की एकॉनामी हो। यह दोनों विशेषताएँ जिनमें हैं, उन्हें बाबा की मदद हज़ार गुणा मिलती है और उस मदद से उड़ते रहते हैं। लेकिन संकल्प की, समय की, बोल की, कर्म की जो एकॉनामी नहीं करते वह कभी एकाग्र-बुद्धि नहीं हो सकते और जहाँ एकाग्रता नहीं है, वहाँ बाबा की मदद कैच नहीं कर सकते।
बाबा ने कहा- आप बच्चे मुझे बहुत अच्छे लगते हो। बहुत सहज उड़ भी सकते हो। लेकिन मेहनत क्यों करते? उसका कारण यह है कि बाबा जो मेहनत से बचाने की मदद देता है वह कैच नहीं करते, फिर मेहनत की लाइफ हो जाती है। इसलिए सभी बच्चों को कहो कि बाबा बच्चों के बहुत-बहुत स्नेही हैं और मददगार हैं। तुम बच्चों को कुछ भी सोचने की, मेहनत करने की ज़रूरत ही नहीं है। जैसे बाबा चला रहा है, ऐसे चलते रहो। बाबा को बच्चों पर रहम भी आता है, स्नेह भी आता है। बाबा के चेहरे पर रहम और स्नेह – दोनों ही दिखाई दे रहे थे। फिर बाबा ने कहा- बाबा का आप बच्चों से जिगरी प्यार है। भले वह जिगर में कभी रखते हैं लेकिन बाबा के जिगर में तो सभी बच्चे हैं ही। अच्छा, चलो तो तुमको एक दृश्य दिखाऊँ।
बाबा हमें ले चला। सामने देखा कि एक बहुत बड़ा हॉल है। पहले वह हॉल खाली था, सिर्फ बीच में एक दीपक जल रहा था। वह जगा हुआ दीपक बहुत सुन्दर लग रहा था। बाबा ने कहा -बच्चों को मैं वतन में बुलाता हूँ। बाबा ने संकल्प ही किया तो सभी बच्चे वतन में पहुँच गये और हॉल में राउण्ड की रीति से बैठते गये। चार सर्कल बन गये और बीच में दीपक जग रहा था। सभी का अटेन्शन दीपक की तरफ था। मैं कोशिश कर रही थी कि देखें यह दीपक क्या है। बाबा ने हमारा संकल्प कैच करते हुए बोला बच्ची, तुम दीपक को देखना चाहती हो? तो मैंने कहा -हाँ बाबा! बाबा ने कहा- देखकर आओ।
मैने देखा जिस स्टैण्ड पर दीपक रखा था उसका शेप हॉर्ट की रीति से था, उसके ही बीच में दीपक था। उसमें जो लौ (ज्योत) जग रही थी वह एकदम सीधी थी, उसका प्रकाश चारों ओर बहुत अच्छा फैल रहा था। उसके नीचे एक लिखत थी बापदादा की आशा का दीपक। यह न. जदीक से ही पढ़ने में आता था। बाबा ने कहा- देखो, बाबा बच्चों से क्या चाहता है? बाप की बच्चों प्रति कौन-सी आश है? बाबा की यही एक आश है कि मेरा हर एक बच्चा जो है, वह राजा बन जाये! मैंने कहा- बाबा, यह तो बहुत खुशी की बात है। प्रजा कौन बनना चाहता है। बाबा ने कहा – राजा बनने के लिए जैसे इस दीपक का इतना तेज प्रकाश एकाग्र है, ऐसे यह आशा का दीपक सदा एकाग्र जगता रहे। फिर बाबा ने कहा अच्छा, दूसरी एक सीन दिखाता हूँ।
इतने में क्या हुआ जैसे यज्ञ करते हैं तो यज्ञ में जौ-तिल आदि डालते हैं और उससे बहुत खुशबू आदि निकलती है, आवाज़ भी होता रहता है, ऐसे ही जो चारों ओर बैठे थे, उनकी तरफ से दीपक की जगह पर कुछ पड़ रहा था। हाथ नहीं दिख रहे थे, लेकिन चारों तरफ से कुछ आ रहा था। उसमें से कुछ भस्म हो रहा था और कुछ जैसे आधा कच्चा दूर जाकर पड़ता है, ऐसे चारों ओर यह सीन हो गई। मैंने कहा बाबा, इसमें क्या पड़ रहा है? तो बाबा ने कहा कि -यह बाबा की एक आश पूर्ण करने का दीपक दिल में जगाते हैं तो और सब हद की आशायें इसमें स्वाहा हो जाती हैं। हद की आशायें तो अनेक हैं लेकिन बाप की आशा एक है। जब बच्चों के दिल में यही एक आशा रहती है कि बस, बाबा की आशा को पूर्ण करना है, मुझे राजा बनना ही है। बाबा की एक आशा पूर्ण करने से सब आशायें उसमें स्वाहा हो जाती हैं। राजा, प्रजा से कैसे चलता है, कैसे प्रजा के सम्बन्ध सम्पर्क में आता है तथा राजा संस्कार क्या है इसका अनुभव करो। यह कर्मेन्द्रियाँ भी आपकी प्रजा हैं।
ऐसे रहस्य सुनाते हुए बाबा ने कहा कि एक-एक हद की आशाओं को खत्म करने को कोशिश करेंगे तो आशा-तृष्णा ऐसो बोज है जो बहती आयेगी कम नहीं होगी। लेकिन एक बय को आशा को पूर्ण करना माना हद को सब आशायें फटाफट स्वाहा होना। ऐसे कहते जैसे बवा हर एक बच्चे को यही गिरफ्ट दे रहे थे कि बाबा को आशा का दीपक जगाओ। यह गिफ्ट हो सहज पुरुषार्थी बना देगी। ऐसे कहते बाबा ने सभी को बहुत-बहुत याद दी।
साइड सीन लक्ष्य के अनुसार लक्षण धारण करने में बाधा बन सकते हैं।
धीरे-धीरे जीवन को श्रेष्ठ बनाने का लक्ष्य केवल जीवन बिताने तक सीमित हो जाता है। यही लक्ष्य और लक्षण के बीच अन्तर है।
मुख्य शिक्षा:
सम्पूर्ण मंजिल तक पहुँचने तक लक्ष्य के अनुसार लक्षण धारण
करके चलना है।
2. अर्पण और समर्पण में अन्तर
बापदादा बच्चों को आत्म-जाँच करने के लिए कहते हैं कि वे केवल अर्पण हैं या वास्तव में समर्पण हैं।
जीवन अर्पण करना एक बात है, लेकिन जीवन अर्पण करने के बाद पाँचों बातों को भी अर्पण
करना आवश्यक है—
संकल्प
बोल
कर्म
सम्बन्ध
सम्पर्क
जब ये पाँचों बातें भी अर्पण हो जाती हैं, तब उसे सम्पूर्ण समर्पण कहा जा सकता है।
इसलिए स्वयं से पूछना है—मैं किन-किन बातों में समर्पित हूँ? मेरा समर्पण कितने प्रतिशत है?
मुख्य शिक्षा:
जीवन अर्पण के साथ संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क भी
अर्पण करने हैं।
3. अन्तर्मुखी होकर अपनी जाँच करना
बापदादा बच्चों को रिफ्रेशर कोर्स के समय का सही उपयोग करने की प्रेरणा देते हैं। यह समय अन्तर्मुखी होकर स्वयं की जाँच करने का है।
दूसरों की कमियाँ देखने के बजाय पहले अपनी स्थिति को जाँचना है। अपने समर्पण की वास्तविक स्थिति पहचानने से परिवर्तन करने का उमंग आता है।
बापदादा कहते हैं कि दूसरे के जाँचने से पहले स्वयं ही अपनी जाँच और परिवर्तन करना चाहिए।
मुख्य शिक्षा:
पहले स्वयं को चेक करो और फिर अपनी कमियों को चेंज करो।
4. हिम्मत का रिटर्न — बाबा की मदद
बापदादा बच्चों की हिम्मत देखकर खुश होते हैं। वे बताते हैं कि अनेक कुमारियाँ विकारों में फँसने से बचीं और ब्रह्माकुमारी बनकर योगी जीवन बिताने की हिम्मत रखी। इसे बाबा बच्चों की विशेष उपलब्धि मानते हैं।
हिम्मत का रिटर्न बाबा की मदद है। बाबा बच्चों की हिम्मत देखकर मदद देते हैं, लेकिन कभी-कभी बच्चे उस मदद को पूरी तरह कैच नहीं कर पाते।
यदि बच्चे बाबा की मदद लेते हुए आगे बढ़ें, तो पहाड़ जैसी परिस्थिति भी स्व-स्थिति में बदल
सकती है।
मुख्य शिक्षा:
हिम्मत रखो और बाबा से मिलने वाली मदद को स्वीकार करके आगे बढ़ो।
5. एकॉनामी और एकाग्र बुद्धि
बापदादा बताते हैं कि बाबा की मदद लेने के लिए दो विशेषताएँ आवश्यक हैं—
एकॉनामी की बुद्धि
एकाग्र बुद्धि
एकॉनामी का अर्थ है व्यर्थ संकल्पों, व्यर्थ कर्मों और व्यर्थ समय की बचत करना। इसके साथ बोल और कर्म में भी एकॉनामी रखनी है।
जो संकल्प, समय, बोल और कर्म की बचत नहीं करते, वे एकाग्र बुद्धि नहीं बन सकते। जहाँ एकाग्रता नहीं होती, वहाँ बाबा की मदद को कैच करना भी कठिन होता है।
इन दोनों विशेषताओं से सम्पन्न आत्मा बाबा की मदद से सहज उड़ती रहती है।
मुख्य शिक्षा:
व्यर्थ की बचत और एकाग्रता से बाबा की मदद को कैच करना है।
6. बाबा की मदद से सहज पुरुषार्थ
बापदादा बच्चों को स्नेही और मददगार बताते हैं। बाबा चाहते हैं कि बच्चे सहज पुरुषार्थ करें, लेकिन कई बार वे बाबा की मदद को कैच नहीं करते और स्वयं ही मेहनत करते रहते हैं।
बाबा बच्चों को आश्वासन देते हैं कि वे स्नेही हैं और मददगार हैं। इसलिए बाबा के मार्गदर्शन के अनुसार चलते रहना है।
बाबा के स्नेह और मदद को स्मृति में रखकर अनावश्यक चिन्ता और मेहनत से बचना है।
मुख्य शिक्षा:
बाबा की मदद कोपहचान कर उसके आधार पर सहज पुरुषार्थ करना है।
7. बाप की आशा का दीपक
बापदादा बच्चों को एक सुन्दर दृश्य दिखाते हैं। एक विशाल हॉल में बच्चे चार सर्कल बनाकर बैठे हैं और बीच में एक दीपक जल रहा है।
दीपक का स्टैण्ड हृदय के आकार का है। दीपक की लौ सीधी है और उसका प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। उसके नीचे लिखा है—“बापदादा की आशा का दीपक।”
बाबा समझाते हैं कि बच्चों से उनकी एक ही आशा है—हर बच्चा राजा बने।
राजा बनने के लिए दीपक की लौ के समान एकाग्रता आवश्यक है। आशा का दीपक सदा एकाग्र और जागृत रहना चाहिए।
मुख्य शिक्षा:
बाबा की आशा को पूरा करने का दीपक दिल में सदा जगाए रखना है।
8. हद की आशाओं को स्वाहा करना
बापदादा दीपक के दृश्य का रहस्य बताते हैं। जब बच्चे बाबा की एक आशा पूर्ण करने का दीपक दिल में जगाते हैं, तो दूसरी हद की आशाएँ उसमें स्वाहा होने लगती हैं।
हद की आशाएँ अनेक होती हैं, लेकिन बाप की आशा एक है। जब आत्मा का दृढ़ संकल्प होता है कि मुझे बाबा की आशा पूरी करनी है और राजा बनना है, तब अन्य सीमित आशाओं का प्रभाव समाप्त होने लगता है।
एक-एक आशा को अलग-अलग समाप्त करने का प्रयास करते रहने के बजाय बाबा की एक आशा को पूरा करने में मन लगाना है।
मुख्य शिक्षा: बाबा की एक श्रेष्ठ आशा पूरी करने से अनेक हद की आशाओं को समाप्त करने में सहायता मिलती है।
9. राजा बनने के संस्कार
बापदादा बच्चों को राजा और प्रजा के सम्बन्धों तथा राजा के संस्कारों का अनुभव करने के लिए कहते हैं। यहाँ कर्मेन्द्रियों को भी अपनी प्रजा के समान समझने की शिक्षा दी गई है।
राजा बनने के लिए आत्मा को अपनी कर्मेन्द्रियों और आन्तरिक स्थिति पर अधिकार रखना है। अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहकर श्रेष्ठ संस्कार धारण करने हैं।
मुख्य शिक्षा: अपनी कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखकर राजा बनने के संस्कार धारण करने हैं।
10. सहज पुरुषार्थ की सौगात
बापदादा प्रत्येक बच्चे को आशा का दीपक जगाने की सौगात देते हैं। यह सौगात सहज पुरुषार्थ करने में सहायक है।
जब आत्मा बाबा की एक आशा को जीवन का मुख्य लक्ष्य बना लेती है, तब अन्य आशाओं के पीछे भागने की आवश्यकता कम होती जाती है। एकाग्रता, एकॉनामी और सम्पूर्ण समर्पण से आत्मा अपने लक्ष्य की ओर सहजता से आगे बढ़ सकती है।
मुख्य शिक्षा: बाबा की आशा का दीपक जगाकर सहज पुरुषार्थी बनना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: लक्ष्य और लक्षण
प्रश्न 1. सच्चे समर्पण की पहचान क्या है?
उत्तर: लक्ष्य और लक्षण का समान होना।
प्रश्न 2. आरम्भ में आत्मा का लक्ष्य कैसा होता है?
उत्तर: ऊँचा और उमंग-उत्साह से भरा हुआ।
प्रश्न 3. लक्ष्य और लक्षण में अन्तर क्यों आ जाता है?
उत्तर: परिस्थितियों और रास्ते के साइड सीन के कारण।
प्रश्न 4. जीवन बनाने का लक्ष्य किसमें बदल सकता है?
उत्तर: जीवन बिताने के लक्ष्य में।
प्रश्न 5. लक्ष्य और लक्षण कब तक समान रखने हैं?
उत्तर: सम्पूर्ण मंजिल तक पहुँचने तक।
भाग 2: अर्पण और समर्पण
प्रश्न 6. जीवन अर्पण करने के बाद किन पाँच बातों को अर्पण करना है?
उत्तर: संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क।
प्रश्न 7. बापदादा बच्चों को किस बात की जाँच करने के लिए कहते हैं?
उत्तर: मैं अर्पण हूँ या समर्पण हूँ।
प्रश्न 8. अपनी जाँच किसे पहले करनी चाहिए?
उत्तर: स्वयं को।
प्रश्न 9. रिफ्रेशर कोर्स के समय का मुख्य उपयोग क्या है?
उत्तर: अन्तर्मुखी होकर स्टडी और आत्म-जाँच करना।
प्रश्न 10. आत्म-जाँच के बाद क्या करना है?
उत्तर: अपनी कमियों को चेंज करना है।
भाग 3: हिम्मत और बाबा की मदद
प्रश्न 11. बापदादा बच्चों की किस बात पर खुश हैं?
उत्तर: उनकी हिम्मत पर।
प्रश्न 12. हिम्मत का रिटर्न क्या है?
उत्तर: बाबा की मदद।
प्रश्न 13. पहाड़ जैसी परिस्थिति को किसमें बदला जा सकता है?
उत्तर: स्व-स्थिति में।
प्रश्न 14. बाबा की मदद लेने के लिए कौन-सी दो विशेषताएँ चाहिए?
उत्तर: एकॉनामी की बुद्धि और एकाग्र बुद्धि।
प्रश्न 15. एकॉनामी में किन बातों की बचत करनी है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्प, कर्म और समय की।
भाग 4: एकाग्रता और सहज पुरुषार्थ
प्रश्न 16. संकल्प, समय, बोल और कर्म की एकॉनामी न करने से क्या कमी रहती है?
उत्तर: एकाग्र बुद्धि बनने में कमी रहती है।
प्रश्न 17. एकाग्रता न होने पर किसे कैच करना कठिन होता है?
उत्तर: बाबा की मदद को।
प्रश्न 18. बाबा बच्चों के प्रति कैसे हैं?
उत्तर: स्नेही और मददगार।
प्रश्न 19. बाबा की मदद को कैच करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: सहज पुरुषार्थ करने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 20. बाबा बच्चों को किस प्रकार आगे बढ़ते देखने चाहते हैं?
उत्तर: सहज पुरुषार्थ करते हुए।
भाग 5: बाप की आशा का दीपक
प्रश्न 21. बापदादा बच्चों को कौन-सी सौगात देते हैं?
उत्तर: बापदादा की आशा का दीपक।
प्रश्न 22. बाबा की बच्चों से एक आशा क्या है?
उत्तर: हर बच्चा राजा बने।
प्रश्न 23. आशा के दीपक की लौ कैसी थी?
उत्तर: सीधी और एकाग्र।
प्रश्न 24. राजा बनने के लिए कौन-सी विशेषता आवश्यक है?
उत्तर: एकाग्रता।
प्रश्न 25. बाबा की एक आशा पूरी करने से अन्य आशाओं का क्या होता है?
उत्तर: वे उसमें स्वाहा होने लगती हैं।
भाग 6: राजा बनने के संस्कार
प्रश्न 26. बापदादा बच्चों को किन संस्कारों का अनुभव करने के लिए कहते हैं?
उत्तर: राजा के संस्कारों का।
प्रश्न 27. कर्मेन्द्रियों को किसके समान बताया गया है?
उत्तर: अपनी प्रजा के समान।
प्रश्न 28. सहज पुरुषार्थ के लिए क्या करना है?
उत्तर: बाबा की आशा को मुख्य लक्ष्य बनाना है।
प्रश्न 29. आशा का दीपक दिल में कैसा रखना है?
उत्तर: सदा एकाग्र और जागृत।
प्रश्न 30. इस दिव्य संदेश का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: लक्ष्य और लक्षण समान रखकर सम्पूर्ण समर्पण करना तथा बाबा की आशा का दीपक जगाना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
क्या मेरा लक्ष्य और मेरे लक्षण समान हैं?
क्या मैं केवल जीवन अर्पण करके रुका हूँ या संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क भी
अर्पण कर रहा हूँ?
क्या मैं नियमित रूप से अपनी स्थिति की जाँच करता हूँ?
क्या मैं व्यर्थ संकल्पों, बोल, कर्म और समय की बचत करता हूँ?
क्या मैं बाबा की मदद को कैच करने के लिए एकाग्र बुद्धि बनता हूँ?
क्या बाबा की एक आशा मेरे जीवन का मुख्य लक्ष्य है?
मेरी कौन-सी हद की आशाएँ मुझे लक्ष्य से दूर करती हैं?
क्या मैं अपनी कर्मेन्द्रियों पर अधिकार रखकर राजा बनने के संस्कार धारण कर रहा हूँ?
निष्कर्ष
20 अगस्त 1990 के इस अव्यक्त दिव्य संदेश का मुख्य संदेश है कि लक्ष्य और लक्षण समान करना ही समर्पित होना है। जीवन अर्पण करने के साथ संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क को भी अर्पण करना आवश्यक है।
बाबा की मदद लेने के लिए व्यर्थ की बचत और एकाग्र बुद्धि चाहिए। बापदादा की आशा का दीपक दिल में जगाकर अन्य हद की आशाओं को उसमें स्वाहा करना है। यही एकाग्रता और सम्पूर्ण समर्पण सहज पुरुषार्थ का आधार बनते हैं।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“बाप की आशा पूर्ण करना ही मेरा श्रेष्ठ लक्ष्य है।”
दैनिक अभ्यास: दिन के अन्त में स्वयं से पूछें—“आज मेरे लक्ष्य और लक्षण कितने समान रहे? क्या मैंने बाबा की आशा का दीपक जगाए रखा?”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए मूल दिव्य संदेश पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 30. अव्यक्त दिव्य संदेश | 20.08.1990
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
