| 22-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – महावीर बनो, माया के तूफानों से लड़ने के बजाए अचल-अडोल बनो” | |
| प्रश्नः- | ब्रह्मा बाबा के सामने अनेक हंगामें होते भी कभी रंज नहीं हुए – क्यों? |
| उत्तर:- | क्योंकि बाबा को नशा था कि हमें बाप से वर्सा लेना है। यह तो सब कल्प पहले मुआफिक हो रहा है नथिंग न्यु। गालियाँ तो सबसे अधिक बाप को मिली। फिर श्रीकृष्ण को भी गाली देते। अगर हमें भी गाली खानी पड़े तो क्या बड़ी बात। दुनिया हमारी बातों को जानती ही नहीं तो जरूर गाली देगी इसलिए कोई भी बात में रंज नहीं हुआ। ऐसे ही फालो फादर। |
| गीत:- | भोलेनाथ से निराला…. |
ओम् शान्ति। यह भक्तिमार्ग वालों का गीत है। ज्ञान मार्ग में गीत आदि नहीं गाया जाता है, न बनाया जाता है, न जरूरत है क्योंकि गाया हुआ है – बाप से सेकेण्ड में जीवनमुक्ति का वर्सा मिलता है। उसमें गीत आदि की कोई बात ही नहीं। तुम जानते हो हमें बेहद के बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। जो भक्ति मार्ग की रसम-रिवाज है, वह इसमें नहीं आ सकती। बच्चे कविता आदि बनाते हैं वह भी औरों को सुनाने के लिए। वह भी जब तक तुम नहीं समझाओ तब तक कोई समझ न सके। अब तुम बच्चों को बाप मिला है तो खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। बाप ने 84 जन्मों के चक्र का नॉलेज भी सुनाया है। खुशी होनी चाहिए कि अभी हम स्वदर्शन चक्रधारी बने हैं। बाप से विष्णुपुरी के मालिक बन रहे हैं। निश्चयबुद्धि ही विजयन्ती। जिसको निश्चय होता वह सतयुग में जायेंगे ही। तो बच्चों को सदैव खुशी रहनी चाहिए, फालो फादर। बच्चे जानते हैं निराकार बाबा जब से इस तन में प्रवेश हुआ है, तो इनके पास भी बड़े हंगामें हुए। भाईयों के झगड़े, शहर के झगड़े, सारे सिन्ध के झगड़े चले। बच्चे बड़े हुए कहेंगे, जल्दी शादी करो। शादी बिगर काम कैसे चलेगा। गीता पढ़ना मिस नहीं करते थे, जब मालूम पड़ गया कि गीता का भगवान शिव है तो वह गीता पढ़ना छूट गई। फिर नशा चढ़ गया कि हम तो विश्व के मालिक बनते हैं। यह तो शिव भगवानुवाच है तो उस गीता को छोड़ दिया और फिर पवित्रता पर बड़ा हंगामा हुआ। भाई, काके, चाचे आदि कितने थे। इसमें बहादुरी चाहिए ना। तुम हो ही महावीर महावीरनी। सिवाए एक के और कोई की परवाह नहीं। पुरुष है रचता। रचता खुद पावन बनता है तो रचना को भी पावन बनाना है। पवित्र हंस और अपवित्र बगुले, इकट्ठे कैसे रह सकते हैं। क्रियेटर तो झट हुक्म करेगा हमारी मत पर चलना है तो चलो, नहीं तो निकल जाओ। तुमको पता है लौकिक बच्ची शादी की हुई थी। उनको मिला ज्ञान, तो बोले वाह! बाप कहते हैं पवित्र बनो तो हम क्यों नहीं बनेंगे। जवाब दे दिया पति को कि हम विष नहीं देंगे। बस इस बात पर ही बहुतों का झगड़ा चला। बड़े-बड़े घरों से बच्चियाँ निकल आई, कोई भी परवाह नहीं की। जिनकी तकदीर में नहीं है तो समझ भी न सकें। पवित्र रहना है तो रहो, नहीं तो जाकर अपना प्रबन्ध करो। इतनी हिम्मत भी तो चाहिए ना। बाप के सामने कितने हंगामें हुए। बाबा को कभी रंज हुआ देखा! अमेरिका तक अखबारों में निकल गया। नथिंग न्यु। यह तो कल्प पहले मुआफिक होता है, इसमें डर की बात क्या है। हमको तो अपने बाप से वर्सा लेना है। अपनी रचना को बचाना है। बाप जानते हैं सारी क्रियेशन इस समय पतित है। मुझे ही सबको पावन बनाना है। बाप को ही सब कहते हैं हे पतित-पावन, लिबरेटर आओ। तो उनको ही तरस पड़ता है। रहमदिल है ना। तो बाप समझाते हैं कि बच्चे कोई भी बात में डरो मत। डरने से इतना ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। अत्याचार, माताओं पर ही होते हैं। यह भी निशानी है। द्रोपदी को नंगन करते हैं। बाप 21 जन्मों के लिए नंगन होने से बचाते हैं। दुनिया इन बातों को नहीं जानती है। सद्गति दाता तो मैं हूँ ना। जब तक मनुष्य दुर्गति को न पायें तब तक मैं कैसे आकर सद्गति दूँ। पतित तमोप्रधान सृष्टि भी बननी है। हर चीज़ नई से पुरानी जरूर होती है। पुराने घर को छोड़ना ही पड़ता है। नई दुनिया गोल्डन एज, पुरानी दुनिया आइरन एज। सदैव नई तो रह न सके। तुम बच्चे जानते हो यह सृष्टि का चक्र है। देवी देवताओं का राज्य फिर से स्थापन हो रहा है। बाप कहते हैं फिर से तुमको गीता ज्ञान सुनाता हूँ। यहाँ रावणराज्य में दु:ख है। रामराज्य किसको कहा जाता है, यह भी किसको पता नहीं और समझते भी नहीं हैं। बाप कहते हैं मैं स्वर्ग अथवा रामराज्य की स्थापना करने आया हूँ। तुम बच्चों ने अनेक बार राज्य लिया और फिर गँवाया है। यह सबकी बुद्धि में है। 21 जन्म सतयुग में रहते हैं, उसको कहा जाता है 21 पीढ़ी अर्थात् जब बूढ़े होते हैं तब शरीर छोड़ते हैं। अकाले मृत्यु कभी होती नहीं। अब तुम जैसे त्रिकालदर्शी बन गये हो। अभी तुम जानते हो हम जन्म-जन्मान्तर भक्ति करते हैं। रावण राज्य में भी भभका देखो कितना है। यह है पिछाड़ी का भभका। रामराज्य सतयुग में होगा – वहाँ यह विमान आदि सब थे फिर यह सब गुम हो गये। फिर इस समय यह सब निकले हैं। अभी यह सब सीख रहे हैं। जो सीखने वाले हैं वह संस्कार ले जायेंगे। फिर आकर वहाँ विमान बनायेंगे। यह तुमको भविष्य में सुख देने वाले हैं। यह विमान आदि भारतवासी भी बना सकते हैं। कोई नई बात नहीं। अक्लमंद तो हैं ना। यह सांइस तुमको फिर काम आयेगी। अभी यह सांइस दु:ख के लिए है फिर वहाँ सुख के लिए होगी। वहाँ तो हर चीज़ नई होगी। अभी तो नई दुनिया की स्थापना हो रही है। बाप ही नई दुनिया की राजधानी स्थापन कर रहे हैं। तो बच्चों को महावीर बनना है। दुनिया में यह कोई थोड़ेही जानते कि भगवान आया हुआ है।
बाप कहते हैं – गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र रहो। इसमें डरने की बात नहीं, करके गाली देंगे। गाली इनको भी बहुत दी हैं। श्रीकृष्ण ने गाली खाई, ऐसा दिखाते हैं। अब श्रीकृष्ण तो गाली खा न सके। गाली तो कलियुग में खाते हैं। तुम्हारा रूप जो अभी है फिर कल्प बाद इस समय होगा। बीच में हो न सके। जन्म बाई जन्म फीचर्स बदलते जाते हैं। एक आत्मा को 84 जन्मों में एक जैसे फीचर्स मिल न सके। सतो रजो तमो में आते जाते हैं, फीचर्स बदलते जाते हैं। यह ड्रामा बना हुआ है। 84 जन्मों में जो फीचर्स वाले जन्म लिए हैं, वही लेंगे। अब तुम जानते हो इनके फीचर्स बदल दूसरे जन्म में यह लक्ष्मी-नारायण हो जायेंगे। तुम्हारी बुद्धि का ताला अब खुला है। अब यह है नई बात। बाबा भी नया, बातें भी नई। यह बातें किसकी समझ में जल्दी नहीं आयेंगी। जब तकदीर में हो तब कुछ समझें। महावीर कोई तूफान से डरेंगे नहीं। वह अवस्था पिछाड़ी में होनी है इसलिए गाया हुआ है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप गोपियों से पूछो। बाप आये ही हैं तुम बच्चों को स्वर्ग के लायक बनाने। कल्प पहले मिसल नर्क का विनाश तो होना ही है। सतयुग में तो एक ही धर्म होगा। चाहते भी हैं वननेस हो। एक धर्म होना चाहिए। यह भी किसको पता नहीं है कि रामराज्य, रावण राज्य अलग-अलग है। यहाँ विकार बिगर जन्म हो न सके। मूत पलीती हैं ना। अब बाप में निश्चय है तो श्रीमत पर पूरी रीति चलना पड़े ना। हर एक की नब्ज भी देखी जाती है। उस अनुसार राय भी दी जाती है। बाबा ने भी बच्चों को कहा कि अगर शादी करनी है तो जाकर करो। बहुत मित्र-सम्बन्धी आदि बैठे हैं, उनको शादी करा लेंगे। तो हर एक की नब्ज देखी जाती है। पूछते हैं बाबा; इस हालत में हैं, हम पवित्र रहने चाहते हैं, हमारे सम्बन्धी हमको घर से निकालने चाहते हैं। अब क्या करना है? यह पूछते हो, पवित्र रहना है। अगर नहीं रह सकते हो तो जाकर शादी करो। अच्छा समझो किसकी सगाई हुई है। राज़ी करना है, हर्जा थोड़ेही हैं। हथियाला जब बांधते हैं तो भी कहते हैं – यह तुम्हारा पति गुरू है। अच्छा उस समय तुम उनसे लिखवाते जाना। मानती हो मैं तुम्हारा गुरू ईश्वर हूँ, लिखो। अच्छा अब मैं तुमको हुक्म देता हूँ, पवित्र रहना है। हिम्मत चाहिए ना। मंजिल बहुत भारी है। दोनों इकट्ठे कैसे रहते हैं, यह सबको दिखलाना है। प्राप्ति बहुत जबरदस्त है। आग तब लगती है जब प्राप्ति का पता नहीं है। बाप कहते हैं – इतनी बड़ी प्राप्ति होती है तो एक जन्म पवित्र रहो, तो क्या बड़ी बात है। हम तुम्हारा पति ईश्वर हैं। हमारी आज्ञा पर पवित्र रहना पड़ेगा। बाप युक्तियाँ बता देते हैं। भारत में यह कायदा है, स्त्री को कहते हैं तुम्हारा पति ईश्वर है, उनकी आज्ञा पर चलना है। पति के पांव दबाना है क्योंकि समझते हैं लक्ष्मी ने नारायण के पांव दबाये थे। यह आदत कहाँ से निकली? इन झूठे चित्रों से। सतयुग में तो ऐसी बातें होती नहीं। नारायण कब थकता है क्या जो लक्ष्मी बैठ पांव दबायेगी? थकावट की बात हो न सके। यह तो दु:ख की बात हो जाती है। वहाँ दु:ख कहाँ से आया। तो कितनी झूठी बातें लिख दी हैं। बाबा को छोटेपन से ही वैराग्य रहता था, इसलिए भक्ति करते थे।
बाबा बच्चों को युक्ति बहुत अच्छी बताते हैं। कोई बच्चे को सम्बन्धी तंग करते हैं, अच्छा शादी कर लो। स्त्री तुम्हारी हो गई। फिर कोई कुछ कर न सके। आपस में मिल पवित्र रहो, कम्पैनियन हो गये। विलायत में बूढ़े होते हैं तो सम्भाल के लिए कम्पैनियन रख देते हैं। सिविल मैरेज करते हैं। विकार में नहीं जायेंगे। अब तुम जानते हो हम एक बाप के बच्चे हैं, आपस में भाई-बहन हो गये। दादे से वर्सा लेते हैं। बाप को बुलाते भी पतित दुनिया में हैं। हे पतित-पावन, सब सीताओं के राम। मनुष्य राम-राम जपते हैं तो सीता को थोड़ेही याद करते हैं। उनसे बड़ी तो लक्ष्मी है। परन्तु याद तो एक बाप को करते हैं। लक्ष्मी-नारायण को फिर भी जानते हैं, शिव को तो कोई जानते नहीं। आत्मा बिन्दी है तो आत्माओं का बाप भी बिन्दी होगा ना। आत्मा में सारा ज्ञान है। उनको कहा जाता है ज्ञान का सागर। तुम आत्मा भी ज्ञान सागर बनती हो। ज्ञान सागर बैठ तुम आत्माओं को समझाते हैं। आत्मा चैतन्य है। तुम्हारी आत्मा ज्ञान का सागर बन रही है। सारी सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान तुमको है। मीठे बच्चों को हिम्मत रखनी चाहिए। हमको बाबा की श्रीमत पर चलना चाहिए ना। बेहद का बाप बेहद के बच्चों को स्वर्ग का मालिक बनाते हैं तो बाप कहते हैं तुम भी अपनी रचना को हाथ में रखो। अगर बच्चा तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता है तो बच्चा, बच्चा नहीं। वह तो कपूत ठहरा। आज्ञाकारी, फरमानबरदार बच्चा हो तो वर्से का हकदार बन सकता। बेहद का बाप भी कहते हैं मेरी श्रीमत पर चलेंगे तो तुम ऐसे श्रेष्ठ बनेंगे। नहीं तो प्रजा में चले जायेंगे। बाप तुमको नर से नारायण बनाने आये हैं। यह है सच्ची सत्य नारायण की कथा। तुम राजाई प्राप्त करने आये हो। अब मम्मा बाबा राजा रानी बनते हैं तो तुम भी हिम्मत करो। बाप तो जरूर आप समान बनायेंगे। प्रजा बनने में ही राज़ी नहीं होना चाहिए। पुरुषार्थ करना है – हम बाप से पूरा वर्सा लेंगे, वारी जायेंगे। तुम उनको अपना वारिस बनायेंगे तो यह तुमको 21 जन्मों के लिए वर्सा देंगे। बाप बच्चों पर वारी जाते हैं। बच्चे कहते हैं बाबा यह तन-मन-धन सब आपका है। आप बाप भी हो तो बच्चे भी हो। त्वमेव माता च पिता त्वमेव। एक बाप की महिमा कितनी बड़ी है। दुनिया में इन बातों को कोई नहीं जानते। भारत की ही सारी बात है। तुम बच्चे जानते हो यह वही 5 हजार वर्ष पहले वाली लड़ाई है। अभी स्वर्ग की स्थापना हो रही है। तो बच्चों को सदैव बहुत खुशी में रहना चाहिए। भगवान ने तुमको एडाप्ट किया है तो तुमको खुशी होनी चाहिए। फिर तुम बच्चों का बाप श्रृंगार कर रहे हैं। पढ़ाते भी हैं – बेहद का बाप, ज्ञान का सागर है। हमको सारी सृष्टि के आदि मध्य अन्त का राज़ समझाते हैं। जो बाप को ही नहीं जानते, वह हैं नास्तिक। तुम बाप और रचना को जानते हो, तुम हो आस्तिक। लक्ष्मी-नारायण आस्तिक हैं या नास्तिक? तुम क्या कहेंगे? तुम खुद कहते हो सतयुग में परमात्मा को कोई याद नहीं करते हैं। वहाँ है सुख, तो सुख में परमात्मा का सिमरण करते नहीं क्योंकि परमात्मा को जानते नहीं। इस समय तुम आस्तिक बनकर वर्सा पा रहे हो। फिर वहाँ याद ही नहीं करते हो। यहाँ याद करते हैं परन्तु उनको जानते नहीं हैं इसलिए नास्तिक कहा जाता है। वहाँ जानते भी नहीं तो याद भी नहीं करते। उन्हों को यह भी पता नहीं होगा कि यह वर्सा हमको शिवबाबा से मिला है। लेकिन उनको नास्तिक नहीं कहेंगे क्योंकि पावन है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर चलने की पूरी-पूरी हिम्मत रखनी है। किसी भी बात में डरना वा रंज (नाराज) नहीं होना है।
2) अपनी रचना अपने हाथ में रखनी है। उन्हें विकारों से बचाना है। पावन बनने की राय देनी है।
| वरदान:- | सदा बाप के सम्मुख रह खुशी का अनुभव करने वाले अथक और आलस्य रहित भव कोई भी प्रकार के संस्कार या स्वभाव को परिवर्तन करने में दिलशिकस्त होना या अलबेलापन आना भी थकना है, इससे अथक बनो। अथक का अर्थ है जिसमें आलस्य न हो। जो बच्चे ऐसे आलस्य रहित हैं वे सदा बाप के सम्मुख रहते और खुशी का अनुभव करते हैं। उनके मन में कभी दु:ख की लहर नहीं आ सकती इसलिए सदा सम्मुख रहो और खुशी का अनुभव करो। |
| स्लोगन:- | सिद्धि स्वरूप बनने के लिए हर संकल्प में पुण्य और बोल में दुआयें जमा करते चलो। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
जिसका आपके प्रति शुभ भाव है उसके प्रति आप भी शुभ भाव रखते हो, उपकारी पर उपकार करते हो, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन कोई आपको बार-बार गिराने की कोशिश करे, आपके मन को डगमग करे, फिर भी आपको उसके प्रति सदा शुभचिंतक का, अचल-अटल भाव हो, बात के कारण भाव न बदले, कोई अपकार करे, आप एक सेकेण्ड में अपकार को उपकार में परिवर्तित कर दो तब कहेंगे कमाल।
महावीर बनो
माया के तूफानों
में
अचल-अडोल रहो!
मुख्य विषय: निर्भयता • श्रीमत पर दृढ़ता • फॉलो फादर • पवित्रता • अपकार करने वाले के प्रति भी
शुभभावना
- विरोध से घबराओ नहीं • बाबा पर निश्चय रखो • अपने पुरुषार्थ से श्रेष्ठ
भाग्य बनाओ
1. आज की मुरली का मुख्य प्रश्न
ब्रह्मा बाबा के सामने अनेक हंगामे होते हुए भी वे कभी रंज क्यों नहीं हुए?
मूल मुरली की बात
22 अक्टूबर की साकार मुरली में उत्तर दिया गया है कि बाबा को निश्चय था कि उन्हें परमपिता से वर्सा लेना है। विरोध और गालियाँ मिलने पर भी वे इस स्मृति में रहते थे कि यह कल्प-चक्र में पहले भी हुआ है—“नथिंग न्यू।” इसी आधार पर बच्चों को भी “फॉलो फादर” अर्थात् ब्रह्मा बाबा के उदाहरण का अनुसरण करने की प्रेरणा दी गई है।
मुरली का आरम्भिक संदेश है:
“मीठे बच्चे – महावीर बनो, माया के तूफानों से लड़ने के बजाए अचल-अडोल बनो।”
हमारी मंथनात्मक व्याख्या
महावीर बनने का अर्थ हर परिस्थिति से लड़ते रहना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थिति में भी अपनी श्रेष्ठ स्थिति, विवेक और लक्ष्य को न खोना है।
यदि कोई हमारी बात नहीं समझता, आलोचना करता है या विरोध करता है, तो हर बार क्रोधित होना या निराश हो जाना आवश्यक नहीं। हम अपनी बात शान्ति से रख सकते हैं, अपने आचरण की जाँच कर सकते हैं और जहाँ आवश्यक हो वहाँ सुधार भी कर सकते हैं।
आज का मंथन: क्या किसी के विरोध या आलोचना से मेरी आंतरिक खुशी और आध्यात्मिक लक्ष्य डगमगा जाते हैं?
2. आज की मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
1. महावीर बनो — माया के तूफानों में स्थिर रहो
मूल मुरली की बात: बाबा बच्चों को महावीर और महावीरनी बनने की प्रेरणा देते हैं। विरोध, हंगामे और कठिनाइयों के बीच भी बाप से वर्सा लेने का लक्ष्य नहीं भूलना है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: जब कोई परिस्थिति हमारे अनुकूल न हो, तब अपनी स्थिति की असली परीक्षा होती है। स्थिरता का अभ्यास यह है कि पहले मन को सम्भालें, फिर परिस्थिति को समझकर उचित कदम उठाएँ।
2. फॉलो फादर — लक्ष्य से ध्यान न हटाओ
मूल मुरली की बात: ब्रह्मा बाबा ने विरोध और गालियों के बावजूद अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा। मुरली बच्चों को इसी उदाहरण से प्रेरित करती है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: किसी श्रेष्ठ आदर्श का अनुसरण करने का अर्थ केवल उनके शब्दों को दोहराना नहीं, बल्कि कठिन समय में भी धैर्य, निश्चय और जिम्मेदारी बनाए रखनाहै।
3. गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल समान पवित्र रहो
मूल मुरली की बात: बाबा गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहने की शिक्षा देते हैं। मुरली में पवित्रता के मार्ग पर आने वाले विरोध और उसे धारण करने के लिए आवश्यक हिम्मत का वर्णन है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: पवित्रता को अपने आध्यात्मिक लक्ष्य के रूप में अपनाते हुए भी व्यक्ति को विवेक, सुरक्षा, पारस्परिक सम्मान और जिम्मेदारियों का ध्यान रखना चाहिए। दृढ़ता का अर्थ दूसरों पर दबाव डालना या अपने ऊपर होने वाले अनुचित व्यवहार को चुपचाप सहना नहीं है।
4. ड्रामा के ज्ञान से भय और रंज कम करो
मूल मुरली की बात: बाबा समझाते हैं कि सृष्टि-चक्र में पुरानी दुनिया का परिवर्तन और नई दुनिया की स्थापना होती है। बच्चों को इस ज्ञान के आधार पर निर्भय रहकर अपने पुरुषार्थ में लगे रहने की प्रेरणा दी जाती है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ड्रामा का ज्ञान कठिन परिस्थितियों में स्वीकार और स्थिरता का सहारा बन सकता है। लेकिन किसी घटना को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि हम उससे सीखना, अन्याय रोकना या उचित सहायता लेना छोड़ दें।
5. अपनी रचना को श्रेष्ठ दिशा दो
मूल मुरली की बात: धारणा में बाबा कहते हैं कि अपनी रचना को अपने हाथ में रखना और उसे विकारों से बचाने की राय देना है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: परिवार में अपने उदाहरण, संवाद और सहयोग से श्रेष्ठ संस्कारों को बढ़ावा देना उपयोगी है। मार्गदर्शन का सबसे प्रभावी रूप वह है जिसमें प्रेम, समझ और सम्मान हो—केवल आदेश या भय नहीं।
6. अपकार करने वाले के प्रति भी शुभभावना रखो
मूल मुरली की बात: अव्यक्त इशारे में बाबा कहते हैं कि जो बार-बार गिराने की कोशिश करे या मन को डगमग करे, उसके प्रति भी शुभचिंतक भाव बनाए रखना और अपकार को उपकार में बदलना विशेषता है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: शुभभावना का अर्थ गलत व्यवहार को सही मानना नहीं है। हम किसी के प्रति द्वेष न रखते हुए भी स्पष्ट सीमाएँ बना सकते हैं, असहमति व्यक्त कर सकते हैं और आवश्यक सहायता ले सकते हैं।
3. तुलनात्मक अध्ययन — विरोध के बीच अचल-अडोल रहना
आज की मुरली से चुना गया प्रमुख विषय है: विरोध और कठिनाइयों के बीच अपने लक्ष्य पर अटल रहना तथा अपकार करने वाले के प्रति भी शुभभावना बनाए रखना।
मुरली 1
18 जनवरी 1986 अव्यक्त मुरली
विषय: मन्सा शक्ति तथा निर्भयता की शक्ति
मूल मुरली की बात: इस अव्यक्त मुरली का मुख्य विषय मन की शक्ति और निर्भयता है। इसे ब्रह्माकुमारी मुरली पोर्टल पर इसी शीर्षक से सूचीबद्ध किया गया है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 22 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली में ब्रह्मा बाबा के विरोध के बीच अचल रहने का उदाहरण है। 18 जनवरी 1986 की मुरली का विषय हमें याद दिलाता है कि निर्भयता के लिए मन की शक्ति का अभ्यास भी आवश्यक है।
आत्मचिन्तन प्रश्न: क्या कठिन परिस्थिति में मैं पहले अपने मन को स्थिर करता हूँ, या तुरन्त प्रतिक्रिया देने लगता हूँ?
18 जनवरी 1986 की अव्यक्त मुरली खोजें
मुरली 2
16 मार्च 1992
अव्यक्त मुरली
विषय: होली मनाना अर्थात् दृढ़ संकल्प की अग्नि में कमजोरियों को जलाना और मिलन की मौज मनाना
मूल मुरली की बात: मुरली पोर्टल पर इस दिन की मुरली का शीर्षक कमजोरियों को दृढ़ संकल्प से समाप्त करने और आध्यात्मिक खुशी का अनुभव करने पर केन्द्रित है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
22 अक्टूबर की मुरली में बाहरी विरोध के कारण रंज न करने और अपने लक्ष्य पर टिके रहने की प्रेरणा है। 16 मार्च 1992 की मुरली इस अभ्यास का आंतरिक पक्ष सामने रखती है—अपनी कमजोरियों को पहचानकर दृढ़ संकल्प से बदलना।
उदाहरण के लिए, यदि आलोचना सुनकर क्रोध आता है, तो केवल आलोचक को बदलने की अपेक्षा करने के बजाय अपनी प्रतिक्रिया को समझना भी पुरुषार्थ का हिस्सा है।
आत्मचिन्तन प्रश्न:
विरोध के समय मेरी कौन-सी कमजोरी सबसे पहले सामने आती है?
16 मार्च 1992 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3
2 नवम्बर 2004
अव्यक्त मुरली
विषय: स्व-उपकारी बन अपकारी पर भी उपकार करो
मूल मुरली की बात: बाबा स्वयं का उपकार करने के साथ अपकार करने वाले के प्रति भी उपकार करने, सम्मान देने और सर्वशक्तियों तथा सर्वगुणों से सम्पन्न बनने की प्रेरणा देते हैं।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
22 अक्टूबर की मुरली के अव्यक्त इशारे में भी कहा गया है कि जो व्यक्ति बार-बार मन को डगमग करे, उसके प्रति भी शुभचिंतक भाव बनाए रखना विशेषता है। दोनों शिक्षाओं का साझा पक्ष है—दूसरे के व्यवहार के कारण अपनी श्रेष्ठता और शुभभावना न खोना।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपकार को स्वीकार करें या अनुचित व्यवहार को जारी रहने दें। शुभभावना के साथ विवेकपूर्ण सीमाएँ रखना भी आवश्यक है।
आत्मचिन्तन प्रश्न: क्या मैं किसी के अनुचित व्यवहार से प्रभावित हुए बिना अपनी ओर से सम्मानपूर्ण और उचित व्यवहार कर सकता हूँ?
2 नवम्बर 2004 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 4
30 नवम्बर 2023
अव्यक्त मुरली
विषय: स्व-उपकारी बन अपकारी पर भी उपकार करो, सर्व शक्ति, सर्व गुण सम्पन्न सम्मान दाताबनो
मूल मुरली की बात:
बाबा बताते हैं कि केवल सहयोगी के साथ सहयोग करना विशेषता नहीं; असहयोगी को भी सहयोग की शक्ति से सहयोगी बनाना और कमजोर को बल देना महावीरता है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
22 अक्टूबर 2026 की मुरली में भी महावीर बनने और विरोध के कारण रंज न करने पर बल है। 30 नवम्बर 2023 की मुरली इस विचार को सेवा के व्यवहार से जोड़ती है—दूसरे की कमजोरी देखकर उसे छोड़ना नहीं, बल्कि उचित सहयोग से बलवान बनाने का प्रयास करना।
आत्मचिन्तन प्रश्न:
क्या मैं असहमत व्यक्ति कोभी सम्मान और उचित सहयोग दे सकता हूँ?
30 नवम्बर 2023 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
मुरली की तारीख
मुख्य विषय
आज की मुरली से सम्बन्ध
18 जनवरी 1986
मन्सा शक्ति और निर्भयता
विरोध में मन को स्थिर रखना
16 मार्च 1992
दृढ़ संकल्प से कमजोरियों का परिवर्तन
अपनी प्रतिक्रियाओं पर विजय
2 नवम्बर 2004
अपकारी पर भी उपकार
शुभभावना और सम्मान बनाए रखना
30 नवम्बर 2023
असहयोगी को सहयोग देना, कमजोर को बल देना
महावीरता को व्यवहार में लाना
22 अक्टूबर 2026
विरोध के बीच अचल-अडोल रहना, फॉलो फादर
लक्ष्य, निर्भयता और शुभभावना पर दृढ़ रहना
तुलनात्मक निष्कर्ष: इन मुरलियों के चुने हुए विषयों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता। वे एक साझा आध्यात्मिक दिशा को अलग-अलग पहलुओं से प्रस्तुत करते हैं—निर्भयता, अपने संस्कारों का परिवर्तन, अपकारी के प्रति शुभभावना और कमजोर को सहयोग देना। यह हमारा तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली का अतिरिक्त कथन नहीं।
4. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: महावीर बनकर माया के तूफानों और विरोध के बीच अचल-अडोल रहना।
प्रश्न 2: ब्रह्मा बाबा के सामने हंगामे होने पर भी वे रंज क्यों नहीं हुए?
उत्तर: मुरली के अनुसार उन्हें बाप से वर्सा लेने का निश्चय था और वेघटनाओं को“नथिंगन्यू” समझते थे।
प्रश्न 3: “फॉलो फादर” का क्या अर्थ है?
उत्तर: ब्रह्मा बाबा के उदाहरण से प्रेरणा लेकर धैर्य, निश्चय और श्रेष्ठ लक्ष्य पर टिके रहना।
प्रश्न 4: महावीर बनने का व्यावहारिक अर्थ क्या है?
उत्तर: कठिन परिस्थिति में भी विवेक और आत्मिक स्थिरता बनाए रखना।
प्रश्न 5: गृहस्थ व्यवहार में पवित्रता कैसे धारण करें?
उत्तर: अपनी आध्यात्मिक प्रतिज्ञाके साथ जिम्मेदारी, सम्मान, विवेक और सुरक्षा का ध्यान रखकर।
प्रश्न 6: 18 जनवरी 1986 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: मन की शक्ति और निर्भयता का अभ्यास करना।
प्रश्न 7: 16 मार्च 1992 की मुरली का मुख्य सन्देश क्या है?
उत्तर: दृढ़ संकल्प से अपनी कमजोरियों को बदलना।
प्रश्न 8: अपकारी के प्रति शुभभावना का क्या अर्थ है?
उत्तर: द्वेष न रखना, लेकिन अनुचित व्यवहार को सही मानना भी नहीं; आवश्यक सीमाएँ बनाए
रखना।
प्रश्न 9: 30 नवम्बर 2023 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: असहयोगी को भी सहयोग देना और कमजोर व्यक्ति को बल देना।
प्रश्न 10: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: क्या किसी के विरोध के कारण मैं अपना लक्ष्य और आंतरिक खुशी खो देता हूँ?
मुख्य प्रश्न
क्या विरोध और आलोचना के समय भी मैं अपने लक्ष्य पर अचल-अडोल रह
सकता हूँ?
प्रमुख बिंदु
1. ब्रह्मा बाबा के उदाहरण से “फॉलो फादर” की शिक्षा।
2. माया के तूफानों में अचल-अडोल रहने का अभ्यास।
3. श्रीमत पर चलने के लिए हिम्मत और विवेक।
4. गृहस्थ जीवन में पवित्रता तथा जिम्मेदारी का संतुलन।
5. अपकारी के प्रति भी शुभभावना और उचित सहयोग।
6. 18 जनवरी 1986, 16 मार्च 1992, 2 नवम्बर 2004 और 30 नवम्बर 2023 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो 22 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली के कथन और अन्य दिनांकित मुरलियों से की गई तुलनात्मक व्याख्या को अलग-अलग समझें। “महावीर”, “माया के तूफान”, “ड्रामा” और “वर्सा” जैसे शब्द ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। विरोध के बीच अचल-अडोल रहने का अर्थ अनुचित व्यवहार, हिंसा या अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। पवित्रता और श्रीमत पर चलने की चर्चा का उद्देश्य आत्मचिन्तन है, किसी व्यक्ति पर दबाव डालना या उसकी स्वायत्तता तथा सुरक्षा की उपेक्षा करना नहीं। तुलनात्मक निष्कर्ष हमारी मंथनात्मक व्याख्या हैं, मूल मुरली के अतिरिक्त शब्द नहीं। कृपया मूल मुरली का अध्ययन करें और अपने विवेक से मंथन करें।
7. आज का संकल्प
“मैं विरोध या आलोचना के समय पहले अपनी स्थिति को स्थिर करूँगा, अपने लक्ष्य को याद रखूँगा और आवश्यक होने पर शान्ति से अपनी बात रखूँगा। किसी के प्रति द्वेष रखे बिना, विवेकपूर्ण सीमाओं और सम्मान के साथ श्रेष्ठ व्यवहार करने का पुरुषार्थ करूँगा।”
अंतिम मंथन प्रश्न: आज किस परिस्थिति में मैं प्रतिक्रिया देने के बजाय अचल-अडोल रहकर “फॉलो फादर” का अभ्यास कर सकता हूँ?
📝 81. साकार मुरली | 22-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
