| 20-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – योगबल से विकारों रूपी रावण पर विजय प्राप्त कर सच्चा-सच्चा दशहरा मनाओ” | |
| प्रश्नः- | रामायण और महाभारत का आपस में क्या कनेक्शन है? दशहरा किस बात को सिद्ध करता है? |
| उत्तर:- | दशहरा होना माना रावण खत्म होना और सीताओं को छुटकारा मिलना। लेकिन दशहरा मनाने से तो रावण से छुटकारा मिलता नहीं। जब महाभारत होता है तब सब सीताओं को छुटकारा मिल जाता है। महाभारत लड़ाई से रावणराज्य खत्म होता है तो रामायण, महाभारत और गीता का आपस में बहुत गहरा कनेक्शन है। |
| गीत:- | महफिल में जल उठी शमा… |
ओम् शान्ति। बाप फरमाते हैं कि तुम हो ब्राह्मण सम्प्रदाय, तुमको अब दैवी सम्प्रदाय नहीं कह सकते। तुम अब हो ब्राह्मण सम्प्रदाय, पीछे दैवी सम्प्रदाय बनने वाले हो। यह जो रामायण है, आज (दशहरे पर) जैसे इनका रामायण पूरा होने वाला है परन्तु पूरा होता नहीं। अगर रावण मरता है तो रामायण की कथा पूरी होनी चाहिए, परन्तु होती नहीं है। छुटकारा होता है महाभारत से। अब यह भी समझने की बाते हैं। रामायण क्या है और महाभारत क्या है? दुनिया तो इन बातों को जानती नहीं। रामायण और महाभारत दोनों का कनेक्शन है। महाभारत लड़ाई से रावण राज्य खत्म होता है। फिर यह दशहरा आदि मनाने का ही नहीं है। गीता अथवा महाभारत भी है रावण राज्य को खत्म करने वाले। अभी तो टाइम है, तैयारी भी हो रही है – वह है हिंसक, तुम्हारी है अहिंसक। तुम्हारी है गीता, तुम गीता का ज्ञान सुनते हो। उससे क्या होने का है? रावणराज्य खलास होने का है। वह भल रावण को मारते हैं परन्तु रामराज्य तो होता नहीं। अब रामायण और महाभारत है ना। तो महाभारत है रावण को खलास करने के लिए। यह बड़ी गुह्य समझने की बातें हैं इसमें विशाल बुद्धि चाहिए। बाप समझाते हैं महाभारत लड़ाई से रावणराज्य खत्म होता है। ऐसे नहीं कि सिर्फ रावण को मारने से रावण राज्य खत्म हो जाता है। उसके लिए तो संगम चाहिए। अब संगम है। अब तुम तैयारी कर रहे हो, रावण पर विजय पाने की। इसमें ज्ञान के अस्त्र शस्त्र चाहिए। वह नहीं। जैसे दिखाते हैं रावण और राम की युद्ध हुई। यह शास्त्र सब है भक्ति मार्ग के। अभी तुम रावण राज्य पर विजय पाते हो योगबल से। यह हो गई गुप्त बात। 5 विकारों रूपी रावण पर तुम्हारी विजय होती है। किससे? गीता से। बाबा तुमको गीता सुना रहे हैं। भागवत तो है नहीं। भागवत में दिखाते हैं कृष्ण चरित्र। कृष्ण के चरित्र तो कुछ हैं नहीं। तुम जानते हो जब विनाश होगा, महाभारी लड़ाई लगेगी, उनसे ही रावणराज्य खत्म हो जायेगा। सीढ़ी में भी दिखाया गया है। जब से रावण राज्य शुरू हुआ है तब से भक्ति मार्ग हुआ है। यह तुम ही जानते हो। गीता का कनेक्शन महाभारत लड़ाई से है। तुम गीता सुनकर राज्य पाते हो और लड़ाई लगती है सफाई के लिए। बाकी भागवत में चरित्र आदि फालतू हैं। शिव पुराण में कुछ भी नहीं है। नहीं तो गीता का नाम होना चाहिए शिव पुराण। शिवबाबा बैठ ज्ञान देते हैं – सबसे ऊंची है गीता। गीता सब शास्त्रों से छोटी है और सब पुस्तक बहुत बड़े बनाये हैं। मनुष्यों की जीवन कहानी भी बहुत बड़ी-बड़ी बनाई है। नेहरू ने शरीर छोड़ा, उनके कितने बड़े वाल्युम बनाते हैं। यह गीता शिवबाबा के वाल्यूम्स की कितनी बड़ी होनी चाहिए। परन्तु गीता कितनी छोटी है क्योंकि बाप सुनाते ही एक बात हैं कि मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे और चक्र को समझो। बस, इसलिए गीता छोटी बना दी है। यह ज्ञान है कण्” करने का। तुमको मालूम है गीता का लॉकेट बनाते हैं। उसमें छोटे अक्षर होते हैं। अब बाबा भी तुम्हारे गले में लॉकेट पहनाते हैं – त्रिमूर्ति और राजाई का। बाबा कहते हैं गीता है दो अक्षर – अल्फ और बे। यह है गुप्त मन्त्र का लॉकेट मनमनाभव। मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। तुम्हारा काम है योगबल से विजय पाना फिर तुम्हारे लिए सफाई भी चाहिए। बाप समझाते हैं कि तुम्हारे योगबल से ही रावणराज्य का विनाश होना है। रावणराज्य कब शुरू हुआ है, यह भी जानते नहीं। यह ज्ञान बड़ा सहज है। सेकेण्ड की बात है ना। 84 जन्मों की सीढ़ी में भी इतने-इतने जन्म लिए हैं। कितना सहज है। बाप है ज्ञान का सागर। ज्ञान सुनाते ही आते हैं। तुम सब मुरली के कागज इकट्ठे करो तो ढेर हो जाएं। बाप डिटेल में समझाते हैं। नटशेल में तो कहते हैं – अल्फ को याद करो। बस बाकी टाइम किसमें लगाते हैं? तुम्हारे सिर पर पापों का बोझा बहुत है। वह याद से ही उतरना है, इसमें मेहनत लगती है। घड़ी-घड़ी तुम भूल जाते हो। तुम बाबा को याद करते रहो तो कभी विघ्न नहीं पड़ेंगे। देह-अभिमानी बनने से विघ्न पड़ते हैं। देही-अभिमानी बनते हो अन्त में। फिर आधाकल्प कुछ विघ्न नहीं पड़ता। यह कितनी गुह्य बातें हैं समझने की। शुरू से लेकर कितना सुनाते आये हैं फिर भी कहते हैं सिर्फ अल्फ बे को याद करो। बस। झाड़ का है विस्तार। बीज तो छोटे से छोटा होता है। झाड़ कितना बड़ा निकलता है।
आज दशहरा है ना। अब बाबा समझाते हैं – रामायण का महाभारत से क्या सम्बन्ध है। रामायण तो भक्ति मार्ग का है। आधाकल्प से चला आता है। गोया अब रावणराज्य चल रहा है। फिर महाभारत आयेगा तो रावण राज्य खत्म हो रामराज्य शुरू हो जायेगा। रामायण और महाभारत में क्या फ़र्क है? रामराज्य की स्थापना और रावणराज्य का विनाश होने का है। गीता सुनकर तुम विश्व का मालिक बनने लायक बनते हो। गीता और महाभारत भी है अभी के लिए। रावणराज्य खत्म होने के लिए। बाकी उन्होंने जो लड़ाई दिखाई है वह रांग है। लड़ाई है 5 विकारों पर जीत पाने की। तुमको बाप गीता के दो अक्षर सुनाते हैं मनमनाभव-मध्याजी भव। गीता के शुरू में और अन्त में यह दो अक्षर आते हैं। बच्चे समझते हैं – बरोबर गीता का एपीसोड चल रहा है। परन्तु किसको कहेंगे तो कहेंगे कृष्ण कहाँ है? बाबा की समझानी और भक्ति मार्ग के शास्त्रों में कितना फर्क है। यह कोई नहीं जानता – कि यह रामायण क्या है? महाभारत क्या है? महाभारत लड़ाई के बाद ही स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। परन्तु मनुष्य यह समझेंगे नहीं, इसलिए तुम परिचय ही बाप का दो। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। यह बाप सारी दुनिया के लिए कहते हैं। एक गीता को ही खण्डन किया है। गीता का सभी भाषाओं में प्रचार है। तुम्हारे राज्य में भाषा ही एक होगी। वहाँ कोई शास्त्र पुस्तक आदि नहीं होगा। वहाँ भक्ति मार्ग की कोई बात नहीं रहती। भारत का तैलुक है ही रामायण, महाभारत और गीता से। भगवान तो बच्चों को गीता सुनाते हैं, जिससे तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। महाभारत लड़ाई जरूर लगनी चाहिए, जो पतित दुनिया खत्म हो जाए। गीता से तुम पावन बनते हो। पतित-पावन भगवान आते ही अन्त में हैं। कहते हैं काम महाशत्रु है, इस पर विजय पानी है। काम विकार से कभी हार नहीं खानी है, इनसे बहुत नुकसान होता है। विकारों के पिछाड़ी बड़े-बड़े नामीग्रामी, मिनिस्टर्स आदि भी अपना नाम बदनाम करते हैं। काम के पिछाड़ी बहुत खराब होते हैं इसलिए बाप समझाते हैं – बाबा के पास जवान-जवान बच्चे आते हैं। ऐसे बहुत हैं जो ब्रह्मचर्य में रहते हैं। सारी आयु शादी नहीं करते हैं। फीमेल्स भी होती हैं। नन्स कब विकार में नहीं जाती। परन्तु उससे कोई प्राप्ति है नहीं। यहाँ तो बात है पवित्र बन जन्म-जन्मान्तर स्वर्ग के मालिक बनने की। जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा सिर पर है। वह जब कटे तब स्वर्ग में चलें। यहाँ मनुष्य पाप करते रहते हैं। करके एक जन्म कोई संन्यासी बनते हैं, जन्म तो विकार से लेते हैं। रावणराज्य में विकार बिगर जन्म होता नहीं। पूछते हैं, वहाँ जन्म कैसे होगा? योगबल किसको कहा जाता है? यह पूछने की दरकार नहीं है। है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। रावण राज्य ही नहीं तो प्रश्न उ” नहीं सकता। सब साक्षात्कार होंगे। जब बूढ़े होते हैं तो यह साक्षात्कार होता है कि जाकर बच्चा बनूँगा। माता के गर्भ में जाऊंगा। यह नहीं मालूम रहता कि फलाने घर जाऊंगा। सिर्फ अब छोटा बच्चा बनना है, मोर और डेल का मिसाल है। आंखों के आंसू से गर्भ होता है। पपीते के झाड़ में भी एक मेल, एक फीमेल का झाड़ होता है। एक दो के बाजू में होने से फल देते हैं। यह भी वन्डर है। जब जड़ चीजों में भी ऐसा है तो चैतन्य में सतयुग में क्या नहीं हो सकता है। यह सब डिटेल आगे चलकर समझ में आ जायेगा। मुख्य बात है तुम बाप को याद कर तमोप्रधान से सतोप्रधान बन वर्सा तो ले लो। फिर वहाँ की रसम जो होगी सो देखेंगे। तुम योगबल से विश्व के मालिक बनते हो, तो बच्चा क्यों नहीं पैदा हो सकता। ऐसे-ऐसे प्रश्न बहुत पूछते हैं फिर कोई बात में जवाब पूरा नहीं मिला तो गिर पड़ते। थोड़ी बात पर भी संशय आ जाता है। शास्त्रों में ऐसी कोई बातें हैं नहीं। शास्त्र हैं भक्ति मार्ग के। परमपिता परमात्मा आकर ब्राह्मण धर्म, सूर्यवंशी चन्द्रवंशी धर्म की स्थापना करते हैं।
तुम ब्राह्मण हो संगमयुगी, बाबा को संगमयुग पर आना पड़ता है। पुकारते भी हैं हे पतित-पावन आओ। उस तरफ वाले कहते हैं हे लिबरेटर, दु:ख से लिबरेट करो। दु:ख देते कौन हैं – यह भी उन्हों को मालूम नहीं। तुम जानते हो रावणराज्य खत्म होता है। तुमको बाबा राजयोग सिखलाते हैं। जब पढ़ाई पूरी होती है तब विनाश होता है, जिसका नाम महाभारत रखा है। महाभारत में रावण राज्य खत्म होता है। दशहरे में एक रावण को खत्म करते हैं। वह हैं हद की बातें। यह हैं बेहद की बातें। यह सारी दुनिया खत्म हो जायेगी। इतनी छोटी-छोटी बच्चियाँ नॉलेज कितनी बड़ी ले रही हो। वह जिस्मानी नॉलेज जैसे घासलेट है, यह है सच्चा घी। तो रात-दिन का फर्क है ना। रावण राज्य में तुमको घासलेट खाना पड़ता है। आगे इतना सस्ता सच्चा घी मिलता था, फिर महंगा हो गया तो घासलेट (तेल) खाना पड़ा। यह गैस, बिजली आदि पहले कुछ भी नहीं था। थोड़े ही वर्षों में कितना फ़र्क पड़ा है। अभी तुम जानते हो सब खत्म होने वाला है। शिवबाबा हमें लक्ष्मी-नारायण जैसा बनने के लिए पढ़ा रहे हैं। यह नशा इस बाबा को तो बहुत रहता है। बच्चों को माया भुला देती है। जब कहते हैं हम बाबा से वर्सा लेने आये हैं तो वह नशा क्यों नहीं चढ़ता! स्वीट होम, स्वीट राजधानी भूल जाती है। बाबा जानते हैं जो जो हड्डी सर्विस करते हैं वही महाराजकुमार बनेंगे। तुमको यह नशा क्यों नहीं रहता है? क्योंकि याद में नहीं रहते हैं। सर्विस में पूरा तत्पर नहीं रहते हैं। कभी तो सर्विस में उछल पड़ते, कभी “ण्डे हो जाते। यह हर एक अपने से पूछो – ऐसा होता है ना। कभी-कभी भूलें भी हो जाती है, इसलिए बाबा समझाते हैं। जबान बड़ी मीठी चाहिए, सबको राज़ी करना है। किसको आवेश न आये। बाप कितना प्यार का सागर है। अब गऊ कोस बन्द कराने के लिए कितना माथा मारते हैं। बाबा कहते हैं सबसे बड़ा कोस है काम कटारी चलाना। पहले तो वह बन्द करो। बाकी वह कोई बन्द होने का नहीं है, कितना माथा मारते हैं। यह काम कटारी दोनों को नहीं चलाना चाहिए। कहाँ मनुष्यों की बात, कहाँ बाप की बात। जो काम विकार को जीतेंगे वही पवित्र दुनिया का मालिक बनेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप समान प्यार का सागर बनना है। कभी भी आवेश में नहीं आना है। अपनी जबान बड़ी मीठी रखनी है। सबको राज़ी करना है।
2) हड्डी सर्विस करनी है। नशे में रहना है कि अब यह पुराना शरीर छोड़ जाकर प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे।
| वरदान:- | देही-अभिमानी स्थिति में स्थित हो सदा विशेष पार्ट बजाने वाले सन्तुष्टमणि भव जो बच्चे विशेष पार्टधारी हैं उनकी हर एक्ट विशेष होती, कोई भी कर्म साधारण नहीं होता। साधारण आत्मा कोई भी कर्म देह-अभिमानी होकर करेगी और विशेष आत्मा देही-अभिमानी बनकर करेगी। जो देही-अभिमानी स्थिति में स्थित रहकर कर्म करते हैं वे स्वयं भी सदा सन्तुष्ट रहते हैं और दूसरों को भी सन्तुष्ट करते हैं इसलिए उन्हें सन्तुष्टमणि का वरदान स्वत: प्राप्त हो जाता है। |
| स्लोगन:- | प्रयोगी आत्मा बन योग के प्रयोग से सर्व खजानों को बढ़ाते चलो। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
कल्याणकारी भावना वा वृत्ति रखकर कोई भी आत्मा की पालना करो तो कैसी भी अपकारी आत्मा को अपनी पालना से उपकारी बना सकते हो। कैसी भी पतित आत्मा, पतित-पावन की वृत्ति से पावन हो सकती है। जैसे माँ बच्चे की कमजोरियों वा कमियों को नहीं देखती है। उनको ठीक करने का ही रहता है। तो यह पालना करने का कर्तव्य इस रूप में स्थित रहने से यथार्थ चल सकता है।
योगबल से विकारों रूपी रावण पर विजय पाओ सच्चा दशहरा मनाओ!
- काम विकार पर विजय
- पवित्रता
• एक बाप की याद
• सच्चा दशहरा
- रावण के पुतले के साथ अपनी कमजोरियाँ भी जलाओ
• मनमनाभव
• योगबल से पावन बनो
आज की साकार मुरली का मुख्य संदेश है:
“योगबल से विकारों रूपी रावण पर विजय प्राप्त कर सच्चा-सच्चा दशहरा मनाओ।”
मुरली में रामायण, महाभारत और गीता के आपसी सम्बन्ध को ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाया गया है। इसमें बाहरी युद्ध के प्रतीक के साथ पाँच विकारों पर आंतरिक विजय, एक बाप की याद और पवित्रता के पुरुषार्थ
पर बल है।
1. आज का मुख्य प्रश्न
क्या मैं हर वर्ष रावण का पुतला जलाकर दशहरा मनाता हूँ, या अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय पाने का भी पुरुषार्थ करता हूँ?
मूल मुरली की बात
20 अक्टूबर की मुरली के प्रश्न में पूछा गया है: “रामायण और महाभारत का आपस में क्या कनेक्शन है? दशहरा किस बात को सिद्ध करता है?”
मुरली की अपनी व्याख्या के अनुसार दशहरा रावण को समाप्त करने का प्रतीक है, जबकि रामराज्य की स्थापना और रावणराज्य का अन्त एक व्यापक आध्यात्मिक परिवर्तन से जुड़े हैं। बाबा बच्चों को गीता का ज्ञान सुनने, एक बाप को याद करने और योगबल द्वारा पाँच विकारों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या
दशहरा हमें आत्म-जाँच का अवसर दे सकता है। किसी दूसरे व्यक्ति को रावण मानकर दोष देने के बजाय हम स्वयं से पूछें—मेरे भीतर कौन-सा संस्कार मुझे बार-बार
कमजोर करता है?
– कामना या आकर्षण मुझे विवेक से दूर तो नहीं ले जा रहा?
– क्रोध के समय क्या मैं अपनी वाणी पर अधिकार रख पाता हूँ?
– क्या लोभ और मोह मेरी शान्ति को प्रभावित करते हैं?
– क्या अहंकार मुझे अपनी गलती स्वीकार करने से रोकता है?
मंथन का सार: रावण पर सच्ची विजय का आध्यात्मिक अर्थ है—अपने विकारों और कमजोर संस्कारों को पहचानना और उन्हें बदलने का निरन्तर पुरुषार्थ करना।
2. आज की मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
1. योगबल से पाँच विकारों पर विजय
मूल मुरली की बात:
बाबा समझाते हैं कि रावण को केवल बाहरी पुतले के रूप में जलाना पर्याप्त नहीं; योगबल द्वारा पाँच विकारों पर विजय पाना है। ज्ञान और याद को इस विजय के साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
किसी विकार को जीतने के लिए केवल उसे बुरा कहना पर्याप्त नहीं। उसके उठने के कारण पहचानना, प्रतिक्रिया से पहले रुकना, अपने संकल्प को सही दिशा देना और नियमित अभ्यास करना आवश्यक है।
2. “मनमनाभव”
एक बाप की याद
मूल मुरली की बात: मुरली में गीता का सार “मुझे याद करो और सृष्टि-चक्र को समझो” के रूप में समझाया गया है। बाबा को याद करने से विकर्मों का बोझ उतरने की शिक्षा दी गई है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: याद को केवल एक समय तक सीमित न रखें। जब मन किसी आकर्षण, इच्छा या क्रोध में उलझे, तब अपने लक्ष्य को याद करके सोचें—मेरा अगला कदम मुझे श्रेष्ठता की ओर ले जाएगा या पुरानी आदत की ओर?
3. काम विकार को महाशत्रु मानकर सावधान रहो
मूल मुरली की बात: बाबा काम विकार से हार न खाने की प्रेरणा देते हैं और पवित्रता को स्वर्ग के वर्से के पुरुषार्थ से जोड़ते हैं। मुरली यह भी कहती है कि विकारों के कारण लोग अपने मान-सम्मान को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: इस शिक्षा को आत्म-संयम, जिम्मेदारी और दूसरे व्यक्ति के सम्मान के रूप में समझ सकते हैं। आकर्षण या इच्छा होने पर भी विवेक, मर्यादा और सहमति का ध्यान रखना जरूरी है। किसी की गरिमा या सुरक्षा को चोट पहुँचाना आध्यात्मिकता नहीं है।
4. गृहस्थ जीवन में पवित्रता का पुरुषार्थ
मूल मुरली की बात: मुरली में ब्रह्मचर्य, पवित्रता और योगबल का उल्लेख है तथा इन्हें विकारों पर विजय के आध्यात्मिक अभ्यास से जोड़ा गया है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: पवित्रता का अर्थ केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में ईमानदारी, संयम, जिम्मेदारी और सम्मान बनाए रखना भी है। गृहस्थ जीवन में अपने कर्तव्यों को निभाते हुए आत्म-संयम का अभ्यास किया जा सकता है।
5. याद के साथ सेवा में तत्पर रहो
मूल मुरली की बात: बाबा कहते हैं कि सेवा में उमंग बनाए रखना चाहिए, याद में नियमित रहना चाहिए और वाणी मीठी होनी चाहिए।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या:
आध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव हमारे चेहरे, बोल और व्यवहार में दिखना चाहिए। यदि हम पवित्रता की शिक्षा देते हैं, तो अपने व्यवहार से भी दूसरों के प्रति सम्मान और शुभ भावना प्रदर्शित करें।
6. दृढ़ संकल्प से पुरानी कमजोरियों को फुलस्टॉप
मूल मुरली की बात: मुरली के वरदान में कमजोरियों को फुलस्टॉप देने, पुराने संस्कार-स्वभाव को समाप्त करने तथा दूसरों के अवगुणों की नकल न करने का सन्देश है।
हमारी मंथनात्मक व्याख्या: हर बार गलती होने पर निराश होकर रुकने के बजाय यह पहचानें कि गलती किस परिस्थिति में हुई। फिर अगली बार उस परिस्थिति में बेहतर प्रतिक्रिया देने का संकल्प लें। यही आत्म-सुधार का व्यावहारिक अभ्यास है।
3. तुलनात्मक अध्ययन — पवित्रता और काम विकार पर विजय
आज की मुरली से चुना गया विषय है:
योगबल द्वारा विकारों पर विजय और सम्पूर्ण पवित्रता का पुरुषार्थ।
मुरली 1
15 अक्टूबर 1975 अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात:
बाबा “डबल अहिंसा” को अपवित्रता से मुक्त रहने से जोड़ते हैं। मुरली में काम विकार को महाशत्रु कहा गया है और स्मृति, वृत्ति तथा दृष्टि में पवित्रता बनाए रखने पर
बल है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
20 अक्टूबर की साकार मुरली योगबल से पाँच विकारों पर विजय पाने की प्रेरणा देती है। 15 अक्टूबर 1975 की मुरली यह समझने में सहायता करती है कि पवित्रता केवल बाहरी व्यवहार का विषय नहीं; हमारे विचार और दूसरे व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण भी उसके अभ्यास में शामिल हैं।
आत्मचिन्तन प्रश्न: क्या मेरे विचार, वाणी और कर्म एक-दूसरे के अनुरूप हैं?
15 अक्टूबर 1975 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2
14 नवम्बर 1987 अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात: बाबा पवित्रता की शक्ति को ब्राह्मण जीवन का आधार बताते हैं।मुरली के अनुसार पवित्रता सुख-शान्ति तथा श्रेष्ठ जीवन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक गुण है।
हमारी तुलनात्मक व्याख्या:
20 अक्टूबर की मुरली में पवित्रता और विकारों पर विजय को राजयोग के पुरुषार्थ से जोड़ा गया है। 14 नवम्बर 1987 की मुरली पवित्रता को एक सकारात्मक शक्ति के रूप में सामने रखती है—अर्थात् केवल गलत कार्य से बचना नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में श्रेष्ठता को बढ़ाना।
आत्मचिन्तन प्रश्न:
क्या मेरा आत्म-संयम मेरे व्यवहार में शान्ति और सम्मान बढ़ा रहा है?
14 नवम्बर 1987 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3
7 मार्च 1993
अव्यक्त मुरली
मूल मुरली की बात:
बाबा सम्पूर्ण पवित्रता का लक्ष्य बताते हैं। मुरली में स्पष्ट किया गया है कि पवित्रता केवल बाहरी कर्म तक सीमित नहीं; स्वप्न, मन और बुद्धि में भी अपवित्र संकल्प न आने देने का अभ्यास इसका हिस्सा है।
रली इस विजय की एक आंतरिक कसौटी प्रस्तुत करती है—क्या हम अपने संकल्पों को भी समझते और सँभालते हैं, या केवल बाहरी व्यवहार को बदलने का प्रयास करते हैं?
यह एक आध्यात्मिक लक्ष्य का वर्णन है; इसे अपने ऊपर कठोरता या निरन्तर आत्म-दोष लगाने का कारण नहीं बनाना चाहिए। उद्देश्य नियमित पुरुषार्थ और क्रमशः स्वभाव-परिवर्तन है।
7 मार्च 1993 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक सारांश
दिनांकित मुरली
विशेष बल
20 अक्टूबर की मुरली से सम्बन्ध
15 अक्टूबर 1975
काम विकार से सावधानी और डबल अहिंसा
विकारों पर विजय का अभ्यास
14 नवम्बर 1987
पवित्रता की शक्ति
पवित्रता को सकारात्मक जीवन-गुण बनाना
7 मार्च 1993
मन और संकल्पों में पवित्रता
आंतरिक स्तर पर विकारों की जाँच
20 अक्टूबर 2026
योगबल से विकारों रूपी रावण पर विजय
याद, आत्म-संयम और पवित्रता का नियमित पुरुषार्थ
तुलनात्मक निष्कर्ष:
इन मुरलियों के चुने हुए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास नहीं दिखाई देता। वे पवित्रता को अलग-अलग स्तरों पर समझाती हैं—विकारों से सावधानी, पवित्रता की शक्ति और संकल्पों की शुद्धता। यह हमारा तुलनात्मक निष्कर्ष है, मूल मुरली का अतिरिक्त कथन नहीं।
4. विशेष तथ्य-सावधानी — मोर, आँसू और संतानोत्पत्ति
पिछले मंथन में आपने मोर–मोरनी के आँसुओं, गर्भधारण और oral sex से जुड़ी चर्चा पर विशेष ध्यान दिलाया था। इसलिए इस मुरली के लिए मूल कथन, आध्यात्मिक सन्दर्भ और आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी को अलग रखना आवश्यक है।
मूल मुरली में क्या कहा गया है?
20 अक्टूबर की मूल मुरली में मोर और “डेल” के उदाहरण के साथ “आँखों के आँसुओं से गर्भ होता है” जैसी बात लिखी है। आगे पपीते के पौधे का उदाहरण और सतयुग में योगबल से संतान होने के विषय में प्रश्न भी आता है। Pasted text.txt
आधुनिक विज्ञान क्या बताता है?
मोर–मोरनी: Smithsonian’s National Zoo के विवरण के अनुसार मोरनी नर को चुनने और प्रजनन व्यवहार के बाद अंडे देती है; सामान्यतः वह अंडों को लगभग 30 दिन सेती है। आँसू पीने से गर्भधारण होने का कोई स्थापित जैविक तंत्र इस वैज्ञानिक विवरण में नहीं है।
nationalzoo.si.edu
Oral sex: Planned Parenthood के अनुसार oral sex करने या वीर्य निगलने से गर्भधारण नहीं होता। गर्भधारण के लिए शुक्राणु का योनि या जनन मार्ग तक पहुँचना आवश्यक है।
plannedparenthood.org
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संलग्न मुरली-मंथन रिकॉर्डिंग का अतिरिक्त दावा: रिकॉर्डिंग में एक कथित चिकित्सकीय मामले के बारे में कहा गया है कि oral sex, उपवास और चोट/ऑपरेशन के कारण शुक्राणु गर्भाशय तक पहुँचा। उपलब्ध रिकॉर्डिंग के इस अंश में उस मामले की पुष्टि करने वाला शोध-पत्र, अस्पताल या पहचान योग्य चिकित्सा-स्रोत नहीं दिया गया है। इसलिए इसे प्रमाणित चिकित्सकीय तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
इस अन्तर को कैसे समझें?
– मूल मुरली का कथन: उसे उसी रूप में उद्धृत करें, लेकिन स्पष्ट करें कि वह मुरली में दिया गया आध्यात्मिक उदाहरण है।
– हमारी व्याख्या: मुरली का व्यापक विषय योगबल, पवित्रता और विकारों पर विजय है।
– वैज्ञानिक जानकारी: मोरनी अंडे देती है और oral sex से गर्भधारण नहीं होता; इन तथ्यों को मुरली की आध्यात्मिक शिक्षा से अलग प्रस्तुत करना चाहिए।
उसी तरह रामायण, महाभारत और गीता के सम्बन्ध की व्याख्या को ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करें, न कि सभी इतिहासकारों द्वारा स्वीकार किए गए ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में।
5. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: योगबल से पाँच विकारों पर विजय पाकर सच्चा दशहरा मनाना।
प्रश्न 2: मुरली में रावण किसका प्रतीक है?
उत्तर: पाँच विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—का।
प्रश्न 3: रामायण, महाभारत और गीता का सम्बन्ध मुरली में कैसे समझाया गया है?
उत्तर: मुरली की आध्यात्मिक व्याख्या में गीता का ज्ञान और योगबल आंतरिक विकारों पर विजय से जुड़ते हैं, जबकि रामराज्य की स्थापना को रावणराज्य के अन्त से जोड़ा गया है।
प्रश्न 4: “मनमनाभव” का मुख्य सन्देश क्या है?
उत्तर: एक बाप को याद करना और उस याद को जीवन में बनाए रखना।
प्रश्न 5: काम विकार पर विजय का व्यावहारिक अर्थ क्या है?
उत्तर: अपनी इच्छाओं पर विवेकपूर्ण नियंत्रण रखना तथा दूसरों के सम्मान, मर्यादा और सहमति का
ध्यान रखना।
प्रश्न 6: 15 अक्टूबर 1975 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: पवित्रता और डबल अहिंसा का अभ्यास करना।
प्रश्न 7: 14 नवम्बर 1987 की मुरली किस बात पर बल देती है?
उत्तर: पवित्रता की शक्ति और उससे जुड़े श्रेष्ठ जीवन-गुणों पर।
प्रश्न 8: 7 मार्च 1993 की मुरली से क्या सीख मिलती है?
उत्तर: पवित्रता की जाँच केवल बाहरी कर्मों में नहीं, बल्कि संकल्पों में भी करनी चाहिए।
प्रश्न 9: क्या मोर के आँसू पीने से मोरनी गर्भवती होती है?
उत्तर: यह मुरली में दिया गया उदाहरण है, लेकिन आधुनिक जीवविज्ञान इसका समर्थन नहीं करता। मोरनी सामान्य प्रजनन प्रक्रिया से निषेचित अंडे देती है।
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प्रश्न 10: क्या oral sex या वीर्य निगलने से गर्भधारण होता है?
उत्तर: नहीं। गर्भधारण के लिए शुक्राणु का योनि या प्रजनन मार्ग तक पहुँचना आवश्यक है।
प्रश्न 11: क्या मुरली-मंथन रिकॉर्डिंग में बताई गई चिकित्सकीय घटना प्रमाणित है?
उत्तर: उपलब्ध अंश में सत्यापन योग्य चिकित्सा-स्रोत नहीं दिया गया है, इसलिए उसे अप्रमाणित
दावा मानना उचित है।
प्रश्न 12: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है?
उत्तर: इस दशहरे पर मैं अपने किस विकार या पुराने संस्कार को बदलने का ठोस अभ्यास करूँगा?
मुख्य प्रश्न
क्या मैं केवल रावण का पुतला जलाता हूँ, या अपने भीतर के विकारों को बदलने का भी पुरुषार्थ करता हूँ?
मुख्य प्रश्न
वीडियो के प्रमुख बिंदु
1. रामायण, महाभारत और गीता का सम्बन्ध—मुरली की आध्यात्मिक व्याख्या।
2. रावण के प्रतीक के रूप में पाँच विकार।
3. योगबल और “मनमनाभव” का अभ्यास।
4. काम विकार पर विजय और पवित्रता।
5. 15 अक्टूबर 1975, 14 नवम्बर 1987 और 7 मार्च 1993 की मुरलियों से तुलनात्मक अध्ययन।
6. मोर के आँसुओं और oral sex सम्बन्धी दावों पर मूल मुरली तथा वैज्ञानिक तथ्यों का स्पष्ट अन्तर।
7. रोज़मर्रा में पुराने संस्कारों को बदलने का संकल्प।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो 20 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली, हमारी तुलनात्मक व्याख्या और आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी को अलग-अलग समझें। रामायण, महाभारत, गीता, रावणराज्य और योगबल से जुड़ी व्याख्याएँ मुरली की आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार प्रस्तुत की गई हैं; इन्हें सर्वमान्य ऐतिहासिक या वैज्ञानिक निष्कर्ष न समझें।
मुरली में मोर–मोरनी तथा आँसुओं से गर्भधारण का जो उदाहरण दिया गया है, वह मुरली का कथन है; आधुनिक जीवविज्ञान इसका समर्थन नहीं करता। मोरनी सामान्य प्रजनन प्रक्रिया से अंडे देती है। इसी प्रकार, संलग्न मंथन-रिकॉर्डिंग में oral sex, उपवास और ऑपरेशन से गर्भधारण के बारे में बताई गई घटना के लिए उपलब्ध अंश में सत्यापन योग्य चिकित्सकीय संदर्भ नहीं दिया गया है। oral sex या वीर्य निगलने से गर्भधारण नहीं होता।
इस प्रस्तुति का उद्देश्य मूल मुरली को बदलना, किसी आध्यात्मिक मान्यता का उपहास करना या अप्रमाणित दावे को विज्ञान के रूप में प्रचारित करना नहीं है। उद्देश्य है—आध्यात्मिक शिक्षाओं का सम्मानपूर्वक अध्ययन करना, उनके संदर्भ को समझना और तथ्यात्मक दावों की अलग से जाँच करना। दर्शक मूल मुरली का अध्ययन करें और तुलनात्मक निष्कर्षों को हमारी व्याख्या के रूप में समझें।
8. आज का संकल्प
“मैं बाहरी प्रतीकों के साथ अपने भीतर की कमजोरियों को भी पहचानूँगा। बाबा की याद, विवेक और नियमित पुरुषार्थ से क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तथा कामना पर संयम रखने का अभ्यास करूँगा।”
अंतिम मंथन प्रश्न: आज मैं अपने किस एक विकार पर विजय पाने के लिए कौन-सा ठोस कदम उठाऊँगा?
📝 79. साकार मुरली | 20-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
