| 14-10-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – बाप को याद करने की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ रचो, पुरुषार्थ कर चार्ट रखो, थको नहीं, तूफानों में अडोल रहो” | |
| प्रश्नः- | बच्चों को अपना कौन सा अनुभव आपस में एक दो को सुनाना चाहिए? |
| उत्तर:- | हम बाप को कितना समय और कैसे याद करते हैं! भोजन के समय बाप की याद रहती है या अनेक प्रकार के विचार आ जाते हैं! बाबा कहते बच्चे ट्राई करके देखो। भोजन पर बाप के सिवाए दूसरा कुछ याद तो नहीं आता है! फिर आपस में एक दो को अनुभव सुनाओ। 2- कोई भी दर्दनाक सीन देखते हमारी स्थिति कैसी रही! इसका भी अनुभव सुनाना चाहिए। |
| गीत:- | लाख जमाने वाले…. |
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे अब बेहद बाप को कैसे भूलेंगे, जिससे बेहद का वर्सा मिलता है। जिसको आधा-कल्प से याद करते थे। यह तो समझाया है कि मनुष्य को कभी भगवान नहीं कहा जाता। तो अब जबकि बेहद का बाप मिला है, उसकी याद में ही करामत है। जितना पतित-पावन बाप को याद करेंगे, उतना पावन बनते जायेंगे। तुम अपने को अब पावन कह नहीं सकते हो, जब तक अन्त हो। जब सम्पूर्ण पावन बन जायेंगे तो यह शरीर छोड़ जाए सम्पूर्ण पवित्र शरीर लेंगे। जब सतयुग में नया शरीर मिले तब सम्पूर्ण कहेंगे। फिर रावण का खात्मा हो जाता है। सतयुग में रावण की एफीजी नहीं बनाई जाती है। तो तुम बच्चे जब बैठते हो, चलते-फिरते हो तो बुद्धि में यह याद रहे। अब हमने 84 का चक्र पूरा किया है फिर नया चक्र शुरू होता है। वह है ही नई पवित्र दुनिया, नया भारत नई देहली। बच्चे जानते हैं पहले जमुना का कण्ठा है, जहाँ पर परिस्तान बनना है। बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाया जाता है, पहले-पहले तो बाप को याद करो। भगवान बाप पढ़ाते हैं। वही बाप टीचर गुरू है, यह भला याद रखो। बाबा ने यह भी समझाया था कि तुम बाजोली खेलते हो। वर्णों का चित्र भी बहुत जरूरी है। सबसे ऊपर है शिवबाबा फिर चोटी ब्राह्मण। यह समझाने के लिए बाबा कहते हैं। अच्छा यह बुद्धि में रखो कि हम 84 जन्मों की बाजोली खेलते हैं। अब संगम है, बाप जास्ती समय नहीं रहते हैं। फिर भी 100 वर्ष तो लगते हैं। उथल पाथल पूरी हो फिर राज्य शुरू हो जाता है। महाभारत लड़ाई तो वही है, जिसमें अनेक धर्म विनाश, एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। तुम्हारी कलाबाजी तो वन्डरफुल है। तुमको पता है फकीर लोग कलाबाजी खेलते, तीर्थों पर जाते हैं। मनुष्यों की श्रद्धा तो रहती है ना। तो उन्हों को कुछ न कुछ दे देते हैं। परवरिश उन्हों की होती रहती है क्योंकि ऐसे मनुष्य अपने साथ क्या उठायेंगे। बाबा तो इन सब बातों का अनुभवी है। बाबा ने अनुभवी रथ लिया है। गुरू भी किये। देखा भी बहुत कुछ। तीर्थ भी किये हैं। अब बाबा कहते हैं बाजोली तो याद कर सकते हो। हम अभी ब्राह्मण हैं फिर देवता, क्षत्रिय बनेंगे। यह है सारी भारत की बात। बाप ने ऐसे समझाया है और धर्म तो जैसे बाईप्लाट हैं। बाप ने तुमको ही तुम्हारे 84 जन्मों की कहानी बताई है। सेन्सीबुल जो हैं वह हिसाब से समझ सकते हैं। इस्लामी आयेंगे तो एवरेज कितने जन्म लेंगे। एक्यूरेट हिसाब की तो दरकार नहीं। इन बातों में तो कोई फिकरात की बात नहीं। सबसे जास्ती फिकर यह रहती है कि हम बाबा को याद करते रहें। बस एक ही फिकर है, एक को याद करने का। घड़ी-घड़ी माया और फिकरात में डाल देती है, इसमें माया फिकर में बहुत डालती है। बच्चों को याद करना ही चाहिए। अब हमको घर जाना है। स्वीट होम किसको याद नहीं आयेगा। पुकारते भी हैं शान्ति देवा। भगवान को कहते हैं – हमको शान्ति दो।
अब तुम बच्चे यह तो जानते हो यह पुरानी दुनिया खत्म हो जानी है। यह भी तुम्हारी बुद्धि में है और मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। शान्ति सतयुग में ही होती है। एक धर्म, एक भाषा, रसम-रिवाज भी एक ही है। वहाँ है ही शान्ति का राज्य। अद्वैत की बात ही नहीं। वहाँ तो एक ही राजाई होती है और सतोप्रधान हैं। रावणराज्य है नहीं जो लड़ाई हो। तो तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। शास्त्रों में जो गायन है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो। गोप-गोपियाँ तो तुम हो ना। तुम सम्मुख में बैठे हो। तुम्हारे पास भी नम्बरवार हैं जिनको याद रहता है कि बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। यह तो वन्डर है ना। लाइफ तक साथ देते हैं। गोद में लिया और पढ़ाई शुरू कर देते। तो यह याद रहने से भी खुशी बहुत रहेगी। परन्तु माया फिर यह भी भुला देती है। मनुष्यों को यह भी समझाना होता है, मनुष्य पूछते हैं बाकी थोड़ा समय कहते हो, क्या प्रूफ है? बोलो, देखो इसमें लिखा हुआ है भगवानुवाच। यज्ञ भी रचा हुआ है। यह है ज्ञान यज्ञ। अब श्रीकृष्ण तो यज्ञ रच न सकें।
बच्चों को यह भी बुद्धि में रहना चाहिए कि हम ब्राह्मण इस बेहद यज्ञ के हैं। बाबा ने हमको निमित्त बनाया है। जब तुम अच्छी रीति ज्ञान और योग की धारणा करते हो, आत्मा सम्पूर्ण बन जाती है तब इस भंभोर को आग लगेगी। मनुष्यों को ही पता होता है ना कि यह बेहद का कर्मक्षेत्र है, जहाँ सभी आकर खेल करते हैं। बनी बनाई बन रही… बाप कहते हैं बच्चे चिंता उनकी की जाए जो अनहोनी हो। हो गया सो ड्रामा में था फिर उनका चिंतन काहे का करें। हम ड्रामा को देखते हैं। ड्रामा में जब कोई ऐसा दर्दनाक सीन होता है तो मनुष्य देखकर रोते हैं। अब वह तो हुआ झूठा ड्रामा। यह तो सच्चा ड्रामा है। सच-सच करते हैं। परन्तु तुमको कोई दु:ख के आंसू नहीं आने चाहिए। साक्षी होकर तुमको देखना है। जानते हो यह ड्रामा है, इसमें रोने की क्या दरकार है। पास्ट इज़ पास्ट। कब विचार भी नहीं करना चाहिए। तुम आगे बढ़ते बाप को याद करते रहो और सबको रास्ता बताते रहो। बाबा तो राय देते रहते हैं। त्रिमूर्ति के चित्र तुम्हारे पास बहुत हैं। क्लीयर लिखा हुआ है वह शिवबाबा यह वर्सा। तुम बच्चों को यह चित्र देखने से बहुत खुशी होनी चाहिए। बाबा से हमको विष्णुपुरी का वर्सा मिलता है। पुरानी दुनिया तो खत्म होनी है। बस यह चित्र सामने रख दो, इसमें खर्चा तो कुछ भी नहीं है। झाड़ भी बहुत अच्छा है। रोज़ सवेरे उठकर विचार सागर मंथन करो। अपना टीचर आपेही बनकर पढ़ो। बुद्धि तो सबको है। चित्र अपने घर में रख दो। हर एक चित्र में फर्स्टक्लास ज्ञान है। कहते हैं विनाश होगा तो तुम्हारी बाप के साथ प्रीत है ना। कहते भी हैं सतगुरू मिला दलाल के रूप में… तो तुम्हें कितनी अच्छी-अच्छी बातें समझने-समझाने के लिए मिली हैं। फिर भी माया का पाम्प बहुत है। 100 वर्ष पहले यह बिजली, गैस आदि थोड़ेही थी। आगे वाइसराय आदि 4 घोड़े की, 8 घोड़े की गाड़ी में आते थे। आगे साहूकार लोग गाड़ी में चढ़ते थे। अब तो विमान आदि निकल पड़े हैं। आगे यह कुछ नहीं था। 100 वर्ष के अन्दर यह क्या हो गया है। मनुष्य समझते हैं कि यही स्वर्ग है। अब तुम बच्चे जानते हो स्वर्ग तो स्वर्ग है। यह सब पाई पैसे की चीजें हैं, इनको आर्टीफिशल पाम्प कहा जाता है। अब तुम बच्चों को यही एक फुरना चाहिए कि हम बाप को याद करें, जिसमें ही माया विघ्न डालती है। बाबा अपना मिसाल भी बतलाते हैं। भोजन खाता हूँ, बहुत कोशिश करता हूँ – याद में रह खाऊं फिर भी भूल जाता हूँ। तो समझता हूँ बच्चों को तो मेहनत बहुत होती होगी। अच्छा बच्चे तुम ट्राई करके देखो। बाबा की याद में रहकर दिखाओ। देखो सारा समय याद ठहर सकती है। अनुभव सुनाना चाहिए। बाबा सारा समय याद ठहर नहीं सकती है। बहुत किसम-किसम की बातें याद आ जाती हैं। बाबा खुद अपना अनुभव बताते हैं। बाबा ने जिसमें प्रवेश किया यह भी पुरुषार्थी है, इन पर तो बड़े झंझट हैं। बड़ा कहलाना, बड़ा दु:ख पाना। कितने समाचार आते हैं। विकारों के कारण कितना मारते हैं। घर से निकाल देते हैं। बच्चियाँ कहती हैं मैं ईश्वर की शरण में आई हूँ। कितने विघ्न पड़ते हैं। कोई के पास शान्ति नहीं है। तुम बच्चों को खातिरी है। अभी पुरुषार्थ कर श्रीमत पर चल शान्ति में रहते हो। इस बाबा ने यहाँ भी कई ऐसे घर देखे हैं जहाँ आपस में मेल-मिलाप में बहुत रहते हैं। सभी बड़ों की आज्ञा में चलते हैं। कहते हैं हमारे पास तो जैसे स्वर्ग लगा पड़ा है।
अभी बाबा तुमको ऐसे स्वर्ग में ले जाते हैं। जहाँ सब प्रकार के सुख हैं। देवताओं का 36 प्रकार का भोजन गाया हुआ है। अब तुम स्वर्ग का वर्सा बाप से लेते हो। वहाँ तो कितने स्वादिष्ट वैभव खाते रहेंगे और पवित्र होंगे। अब तुम उस दुनिया के मालिक बनते हो। राजा-रानी, प्रजा में फ़र्क होगा ना। आगे राजायें लोग बहुत भभके में रहते थे। यह तो ठहरे पतित और रावण के राज्य में, तो विचार करो सतयुग में क्या होगा। सामने चित्र लक्ष्मी-नारायण के रखे हैं। श्रीकृष्ण के लिए झूठी बातें लिख बदनामी कर दी है। झूठ माना झूठ, सच की रत्ती नहीं। अब तुम समझते हो हम स्वर्ग के मालिक थे फिर 84 जन्म ले बिल्कुल शूद्र बुद्धि बन गये हैं। क्या हाल हो गया है। अब फिर पुरुषार्थ कर क्या बनते हो! बाबा पूछते भी हैं ना कि तुम क्या बनेंगे? तो सब हाथ उठाते हैं सूर्यवंशी बनेंगे। हम तो मात-पिता को पूरा फालो करेंगे। कम पुरुषार्थ थोड़ेही करेंगे। सारी मेहनत याद और आप समान बनाने पर है इसलिए बाप कहते हैं जितना हो सके सर्विस करना सीखो। है बहुत सहज। यह शिवबाबा, यह विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा। यह तो बहुत अनुभवी है। सीढ़ी पर तुम समझा सकते हो।
तुम बच्चों को यह झाड़, चक्र देखने से ही बुद्धि में सारा ज्ञान आ जाना चाहिए। यह जो लक्ष्मी-नारायण हैं इन्हों की राजधानी कहाँ चली गई! किसने लड़ाई की! जिससे हराया। अब तो वह राज्य है नहीं। इन ईश्वरीय बातों को कुछ नहीं जानते हैं। तुम बच्चों को यह भी साक्षात्कार हुआ है। कैसे गुफाओं, खानियों से जाकर सोने, हीरे आदि ले आते हैं। यह साइंस तुम्हारे सुख के लिए होगी। यहाँ है दु:ख के लिए, वहाँ एरोप्लेन भी फुलप्रूफ होंगे। बच्चों ने शुरू-शुरू में यह सब कुछ साक्षात्कार किया हुआ है। पिछाड़ी में भी तुम बहुत साक्षात्कार करेंगे। यह भी तुमने साक्षात्कार किया है। चोर लूटने आते हैं, फिर तुम्हारी शक्ति का रूप देख भाग जाते हैं। वह सब बातें पिछाड़ी की हैं। चोर लूटने तो आयेंगे, तुम बाप की याद में खड़े होंगे तो वह एकदम भाग जायेंगे।
अब बाप कहते हैं बच्चे खूब पुरुषार्थ करो। मुख्य बात है पवित्रता की। एक जन्म पवित्र बनना है। मौत तो सामने खड़ा है। कुदरती आपदायें बहुत कड़ी आयेंगी, जिसमें सब खत्म हो जाएं। शिवबाबा इन द्वारा समझाते हैं, इनकी आत्मा भी सुनती है। यह बाबा सब बतलाते हैं। शिवबाबा को तो अनुभव नहीं है। बच्चों को अनुभव होता है। माया के तूफान कैसे आते हैं। पहले नम्बर में यह है, तो इनको सब अनुभव होगा। तो इसमें डरना नहीं है, अडोल रहना है। बाप की याद में रहने से ही शक्ति मिलती है। कोई बच्चे चार्ट लिखते हैं फिर चलते-चलते बन्द कर देते हैं। बाबा समझ जाते है थक गया है। पारलौकिक बाप जिससे इतना बड़ा वर्सा मिलता है ऐसे बाप को कभी पत्र भी नहीं लिखते हैं। याद ही नहीं करते! ऐसे बाप को तो कितना याद करना चाहिए। शिवबाबा हम आपको बहुत याद करते हैं। बाबा आपकी याद बिगर हम भला कैसे रह सकते हैं! जिस बाप से विश्व की बादशाही मिलती है, ऐसे बाप को कैसे भूलेंगे। एक कार्ड लिखा वह भी तो याद किया ना। लौकिक बाप भी बच्चों को चिट्ठी लिखते हैं – नूरे रत्न…. स्त्री, पति को कैसे चिट्ठी लिखती है! यहाँ तो दोनों सम्बन्ध हैं। यह भी याद करने की युक्ति है। कितना मीठा बाबा है! हमसे क्या मांगते हैं? कुछ भी नहीं। वह तो दाता है, देने वाला है ना। यह लेने वाला नहीं। कहते हैं स्वीट चिल्ड्रेन मैं आया हूँ, भारत को खुशबूदार बगीचा बनाकर जाता हूँ। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सूर्यवंशी बनने के लिए मात-पिता को पूरा-पूरा फालो करना है। याद में रहने की और आप समान बनाने की मेहनत करनी है।
2) पुरुषार्थ कर श्रीमत पर चल शान्त रहना है। बड़ों की आज्ञा माननी है।
| वरदान:- | एक बल एक भरोसे के आधार पर मंजिल को समीप अनुभव करने वाले हिम्मतवान भव ऊंची मंजिल पर पहुंचने से पहले आंधी तूफान लगते ही हैं, स्टीमर को पार जाने के लिए बीच भंवर से क्रास करना ही पड़ता है इसलिए जल्दी में घबराओ मत, थको वा रूको मत। साथी को साथ रखो तो हर मुश्किल सहज हो जायेगी, हिम्मतवान बन बाप की मदद के पात्र बनो। एक बल एक भरोसा – इस पाठ को सदा पक्का रखो तो बीच भंवर से सहज निकल आयेंगे और मंजिल समीप अनुभव होगी। |
| स्लोगन:- | विश्व कल्याणकारी वह है जो प्रकृति सहित हर आत्मा के प्रति शुभ भावना रखते हैं। |
ये अव्यक्त इशारे – परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
हर आत्मा के प्रति रहम की भावना, सदा सहयोग की भावना, हिम्मत बढ़ाने की भावना हो। हर परिस्थिति में, हर कार्य में, हर सहयोगी संगठन में नि:स्वार्थ पन हो, तब कहेंगे पर उपकार की भावना। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्व के प्रति कुछ भी स्वीकार नहीं किया। न महिमा स्वीकार की, न वस्तु स्वीकार की, न रहने का स्थान स्वीकार किया। स्थूल और सूक्ष्म सदा “पहले बच्चे”, इसको कहते हैं पर-उपकारी, इसमें फालो फादर कर समान बनो।
14 अक्टूबर 2026
आज की मुरली मंथन
साकार मुरली | मधुबन
याद में थको नहीं, तूफानों में अडोल रहो!
मुख्य विषय: बाप की याद करने की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ, पुरुषार्थ का चार्ट और साक्षी स्थिति।
उपशीर्षक: याद की नई-नई युक्तियाँ बनाओ • अपना चार्ट रखो • हर परिस्थिति में स्थिर रहो
1. आज की मुरली का मुख्य प्रश्न
क्या मेरी याद केवल अमृतवेले तक रहती है, या भोजन करते, काम करते और कठिन परिस्थितियों में भी मैं बाबा को याद कर सकता हूँ?
आज की साकार मुरली में बाबा याद करने की अलग-अलग युक्तियाँ अपनाने, अपने पुरुषार्थ का चार्ट रखने, थककर अभ्यास छोड़ न देने और तूफानों में अडोल रहने की प्रेरणा देते हैं।
मुरली का एक विशेष अभ्यास है—भोजन करते समय यह देखना कि बाबा की याद बनी रहती है या मन दूसरे विचारों में चला जाता है। इसी प्रकार कोई दर्दनाक दृश्य देखने या सुनने पर अपनी स्थिति कैसी रही, इसका अनुभव भी एक-दूसरे के साथ बाँटना है।
मुख्य मंथन: याद केवल एक समय का अभ्यास न रहे; धीरे-धीरे वह हमारे दैनिक जीवन और व्यवहार में भी सहज बने।
2. मूल मुरली के मुख्य मंथन-बिंदु
1. बाबा को याद करने की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ बनाओ
मूल मुरली की बात: बाबा को पिता, टीचर, सतगुरु और मित्र के रूप में याद करने का अभ्यास करो। बैठते, चलते-फिरते और कर्म करते बुद्धि में यह स्मृति रहे कि बाबा हमारा पिता भी है, शिक्षक भी और मार्गदर्शक भी।
हमारा मंथन: यदि याद केवल एक ही तरीके से करने की कोशिश होगी, तो कभी-कभी अभ्यास यांत्रिक लग सकता है। अपने विभिन्न अनुभवों और सम्बन्धों की भावना से बाबा को याद करना याद को सहज बनाने में सहायता कर सकता है।
2. अपने पुरुषार्थ का चार्ट रखो
मूल मुरली की बात: दिनभर कितना समय बाबा की याद में रहा, कितनों को सुख दिया और कोई गलती तो नहीं हुई—इस प्रकार अपने पुरुषार्थ की जाँच करते रहो। थककर चार्ट लिखना बंद नहीं करना है।
हमारा मंथन: चार्ट का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं, बल्कि अपनी प्रगति को पहचानना है। दिन के अंत में कुछ सरल प्रश्न पूछें: आज कब याद सहज रही? कब भूल गया? अगली बार क्या युक्ति अपनाऊँगा?
3. भोजन करते समय याद का अभ्यास
मूल मुरली की बात: बाबा अपना अनुभव बताते हैं कि भोजन करते समय याद में रहने की कोशिश के बाद भी कभी-कभी दूसरे विचार आ जाते हैं। बच्चों को भी अभ्यास करके अपना अनुभव बताने की प्रेरणा दी गई है।
हमारा मंथन: भोजन से पहले कुछ क्षण बाबा की याद में रहें। फिर भोजन करते हुए बीच-बीच में ध्यान दें कि मन कहाँ जा रहा है। याद टूट जाए तो निराश न हों; सहजता से फिर याद में लौट आएँ।
4. दर्दनाक दृश्य में साक्षी स्थिति
मूल मुरली की बात: किसी दर्दनाक दृश्य को देखकर केवल दुःख में डूब जाने के बजाय साक्षी होकर देखने और बीती बातों में उलझे न रहने की शिक्षा दी गई है।
हमारा मंथन: साक्षी स्थिति का अभ्यास यह है कि हम परिस्थिति से पूरी तरह विचलित न हों और विवेक से प्रतिक्रिया दें। इसका अर्थ संवेदनहीन होना, किसी पीड़ित की सहायता न करना या अपने दुःख को दबाना नहीं है। स्थिरता के साथ करुणा और उचित सहयोग भी आवश्यक हैं।
5. माया के तूफानों में अडोल रहो
मूल मुरली की बात: बाबा बताते हैं कि याद के अभ्यास में विघ्न और भूल होना सम्भव है, लेकिन पुरुषार्थ छोड़ना नहीं है। याद से शक्ति लेकर श्रीमत पर चलते रहना है।
हमारा मंथन: अभ्यास में एक दिन अच्छा परिणाम आए और दूसरे दिन मन भटके, तो इसे असफलता मानकर रुकना नहीं चाहिए। अपनी विधि में सुधार करके फिर प्रयास करना ही नियमित पुरुषार्थ है।
6. स्नेह को व्यवहार में उतारो
मूल मुरली की बात: बाबा को याद करने के साथ सेवा करना, मात-पिता के समान बनने का पुरुषार्थ करना और दूसरों को भी रास्ता बताना आवश्यक बताया गया है।
हमारा मंथन: बाबा की याद का प्रभाव हमारे स्वभाव में दिखना चाहिए—शान्ति, धैर्य, श्रेष्ठ कर्म और दूसरों के प्रति शुभ भावना के रूप में।
3. तुलनात्मक अध्ययन — याद को निरन्तर कैसे बनाएँ?
आज की मुरली से हमने एक मुख्य विषय चुना है:
बाप की याद का नियमित अभ्यास — चार्ट, दैनिक कर्म और कठिन परिस्थितियों में साक्षी स्थिति।
नीचे तीन अन्य दिनांकित अव्यक्त मुरलियों के साथ इसका संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन है।
मुरली 1 — 26 जनवरी 1971 | अव्यक्त मुरली
विषय: दिनचर्या में याद की यात्रा का कार्यक्रम बनाना
मूल मुरली की बात: बाबा सुबह से रात तक याद की यात्रा पर ध्यान देने के लिए अपना कार्यक्रम और डायरी बनाने की प्रेरणा देते हैं। व्यस्त काम के बीच भी कुछ मिनट याद के लिए निर्धारित करने और एक-दूसरे को याद दिलाने का सुझाव दिया गया है।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 14 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली में पुरुषार्थ का चार्ट रखने और अलग-अलग युक्तियाँ अपनाने की बात है। 26 जनवरी 1971 की अव्यक्त मुरली इसी अभ्यास को दिनचर्या में व्यवस्थित करने का तरीका बताती है।
उदाहरण के लिए, किसी काम को शुरू करने से पहले कुछ क्षण रुककर बाबा की याद करना और दिन के अंत में अपनी स्थिति की समीक्षा करना उपयोगी अभ्यास हो सकता है।
26 जनवरी 1971 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 2 — 8 जुलाई 1973 | अव्यक्त मुरली
विषय: दर्दनाक दृश्य में भी साक्षी स्थिति
मूल मुरली की बात: बाबा सृष्टि को एक खेल के रूप में समझने और विविध परिस्थितियों तथा दर्दनाक दृश्यों में भी अपनी स्थिति को स्थिर रखने की प्रेरणा देते हैं। मुरली में परिस्थितियों को खेल समझकर परेशान न होने और साक्षी स्थिति में रहने का संदेश है।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: 14 अक्टूबर की साकार मुरली विशेष रूप से पूछती है कि दर्दनाक दृश्य देखकर हमारी स्थिति कैसी रही। 8 जुलाई 1973 की अव्यक्त मुरली इस अनुभव को साक्षीपन और ड्रामा की स्मृति से जोड़ती है।
दोनों को साथ रखकर हम अपनी जाँच कर सकते हैं: घटना होने पर क्या मैं पूरी तरह प्रतिक्रिया में बह गया, या स्थिर रहकर परिस्थिति को समझने और उचित कदम उठाने में समर्थ रहा?
यहाँ साक्षीपन का अर्थ दुःख या करुणा का अभाव नहीं है। इसका अर्थ है कि हम परिस्थिति से अभिभूत हुए बिना आवश्यक सहयोग और सहायता दे सकें।
8 जुलाई 1973 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
मुरली 3 — 1 मार्च 1999 | अव्यक्त मुरली
विषय: सेवा में थको नहीं, बाप को साथी बनाओ
मूल मुरली की बात: बाबा समझाते हैं कि सेवा और कर्मयोग में बहुत व्यस्त होने पर बच्चे बाप के साथ का अनुभव भूल सकते हैं और थक जाते हैं। वे साथ का अनुभव बनाए रखने, याद को जागृत रखने और चार्ट द्वारा अभ्यास की जाँच करने की प्रेरणा देते हैं। उस विशेष संदर्भ में चार्ट के लिए याद के घंटों का लक्ष्य भी बताया गया था।
हिंदी Avyakt Murli
हमारी तुलनात्मक व्याख्या: आज की साकार मुरली में भी बाबा कहते हैं कि याद का चार्ट रखते-रखते थकना नहीं है। 1 मार्च 1999 की मुरली बताती है कि सेवा की व्यस्तता के बीच भी बाबा के साथ का अनुभव बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है।
उस मुरली में दिया गया घंटों का लक्ष्य उस समय के श्रोताओं के संदर्भ में था; उसे आज के प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य संख्या मानना उचित नहीं। हमारे लिए मुख्य शिक्षा है—अपनी क्षमता और दिनचर्या के अनुरूप नियमित अभ्यास बनाए रखना।
1 मार्च 1999 की अव्यक्त मुरली पढ़ें
तुलनात्मक निष्कर्ष
| दिनांक | मूल मुरली का विशेष बल | आज के अभ्यास में उपयोग |
|---|---|---|
| 26 जनवरी 1971 | दिनभर याद के लिए कार्यक्रम और डायरी | याद को दिनचर्या में शामिल करना |
| 8 जुलाई 1973 | ड्रामा की स्मृति और साक्षी स्थिति | दर्दनाक परिस्थितियों में स्थिर रहना |
| 1 मार्च 1999 | सेवा में थको नहीं, बाप के साथ का अनुभव | व्यस्तता के बीच भी याद बनाए रखना |
| 14 अक्टूबर 2026 | याद की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ, चार्ट और अडोल स्थिति | अनुभव साझा करते हुए नियमित पुरुषार्थ करना |
हमारी व्याख्या: इन मुरलियों का साझा सूत्र है—याद का अभ्यास केवल एक समय या एक परिस्थिति तक सीमित न रहे। दिनचर्या में याद के अवसर बनाए जाएँ, अपने अनुभव की जाँच की जाए और कठिन समय में स्थिरता का अभ्यास किया जाए। चुने गए अंशों में कोई स्पष्ट विरोधाभास दिखाई नहीं देता; प्रत्येक मुरली अपने विशेष संदर्भ से इसी पुरुषार्थ को समझाती है।
4. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली में बाबा कौन-सी मुख्य युक्ति बताते हैं? उत्तर: बाबा को अलग-अलग सम्बन्धों से याद करना और दिनभर याद का अभ्यास करना।
प्रश्न 2: पुरुषार्थ का चार्ट क्यों रखना है? उत्तर: अपनी याद, व्यवहार और परिवर्तन की प्रगति जाँचने के लिए।
प्रश्न 3: भोजन करते समय क्या अभ्यास करना है? उत्तर: ध्यान देना है कि बाबा की याद बनी रहती है या मन दूसरे विचारों में चला जाता है।
प्रश्न 4: अपना अनुभव दूसरों को क्यों सुनाना है? उत्तर: ताकि एक-दूसरे की युक्तियों से सीखकर याद का अभ्यास सहज बनाया जा सके।
प्रश्न 5: दर्दनाक दृश्य देखकर क्या करना है? उत्तर: साक्षी स्थिति बनाए रखनी है, विवेक से काम लेना है और आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी करनी है।
प्रश्न 6: अभ्यास में बार-बार भूल हो तो क्या करें? उत्तर: निराश होकर छोड़ें नहीं; फिर से याद में लौटें और अपनी युक्ति में सुधार करें।
प्रश्न 7: 26 जनवरी 1971 की मुरली से क्या सीख मिलती है? उत्तर: दिनचर्या में याद के लिए निर्धारित समय और डायरी बनाना।
प्रश्न 8: 8 जुलाई 1973 की मुरली का मुख्य सन्देश क्या है? उत्तर: विविध परिस्थितियों को ड्रामा का खेल समझकर साक्षी और स्थिर रहने का अभ्यास।
प्रश्न 9: 1 मार्च 1999 की मुरली क्या प्रेरणा देती है? उत्तर: सेवा में व्यस्त रहते हुए भी बाप के साथ का अनुभव बनाए रखना और थककर पुरुषार्थ न छोड़ना।
प्रश्न 10: आज का आत्मचिन्तन प्रश्न क्या है? उत्तर: क्या मैं अपनी याद और स्थिति में सुधार को नियमित रूप से जाँच रहा हूँ?
याद में थको नहीं, तूफानों में अडोल रहो!
बाप को याद करने की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ शीर्षक कॉपी करें
उपशीर्षक
14 अक्टूबर 2026 | साकार मुरली मंथन | याद का चार्ट • भोजन में याद • दर्दनाक दृश्य में साक्षीपन
मुख्य प्रश्न
क्या मेरी याद केवल अमृतवेले तक रहती है, या भोजन, कर्म और कठिन परिस्थितियों में भी मेरे साथ रहती है? मुख्य प्रश्न कॉपी करें
प्रमुख बिंदु
- बाबा को पिता, टीचर, सतगुरु और मित्र के रूप में याद करने की युक्तियाँ।
- अपने पुरुषार्थ का चार्ट और दैनिक आत्म-जाँच।
- भोजन करते समय याद का अभ्यास।
- दर्दनाक दृश्यों में साक्षीपन और विवेक।
- विघ्नों के बावजूद अभ्यास जारी रखना।
- 26 जनवरी 1971, 8 जुलाई 1973 और 1 मार्च 1999 की मुरलियों का तुलनात्मक अध्ययन।
- अनुभव साझा करके एक-दूसरे का सहयोगी बनना।
6. डिस्क्लेमर
डिस्क्लेमर: यह वीडियो 14 अक्टूबर 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक मंथन है। मूल मुरली की शिक्षाओं और अन्य दिनांकित मुरलियों के तुलनात्मक अध्ययन को अलग-अलग प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। तुलनात्मक व्याख्या मूल मुरली का शब्दशः कथन नहीं है और इसका उद्देश्य बिना आधार विरोधाभास स्थापित करना नहीं, बल्कि आत्मचिन्तन को प्रोत्साहित करना है। अन्य मुरलियों के संदर्भ और श्रोताओं की परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं; इसलिए उनके अभ्यासों को संदर्भ के अनुसार समझें। साक्षी स्थिति का अर्थ संवेदनहीन होना, दुःख को दबाना या किसी पीड़ित की सहायता से पीछे हटना नहीं है। दर्शक मूल मुरली का अध्ययन करें और अपनी समझ तथा विवेक से मंथन करें।
7. आज का संकल्प
“मैं बाबा की याद के लिए रोज़ नई युक्तियाँ अपनाऊँगा, अपने पुरुषार्थ का चार्ट रखूँगा और भूल होने पर थककर रुकने के बजाय फिर से अभ्यास करूँगा।”
अंतिम मंथन प्रश्न: आज मैंने कितनी बार बाबा की याद को अपने भोजन, कर्म और परिस्थिति के बीच फिर से जागृत किया?
📝 74. साकार मुरली | 14-10-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
