हर कर्म- ज्ञान-स्वरूप होकर करो
आज बापदादा विशेष सभी अपने संगमयुगी पदमापदम भाग्यशाली, मीठे बच्चों को जैसे सम्मुख इमर्ज कर प्राप्ति प्रमाण नम्बरवार बहुत-बहुत स्नेह भरी याद-प्यार और सुन्दर शिक्षा दे रहे थे। बावा बोले – भविष्य और वर्तमान समय प्रति विशेष अटेन्शन दिला रहे हैं कि अब पुरानी दुनिया के परिवर्तन का समय समीप आ रहा है। इसलिए दिन-प्रतिदिन सर्व पिछले और अब के हिसाब-किताब चुक्तु होने की मशीनरी अब तीव्र रूप में प्रैक्टिकल में दिखाई देगी। क्योंकि कर्मों का फल मिलने की सीजन अब फुल फोर्स में चलती है। इसलिए अनेक प्रकार के भूतों का वार होता रहेगा। जैसे – व्यर्थ संकल्प-विकल्प का भूत, भय का भूत। अनेक प्रकार के दोष का भूत। जैसे -संगदोष, अपने व दूसरों के संस्कारों के वातावरण के दोष का भूत, अशुद्ध आत्माओं की छाया का भूत, दिलशिकस्त होने का भूत, बुद्धि से राइट-राँग को न समझने के कारण जीवन में खुशी, सन्तुष्टता की प्राप्ति न होने के कारण उदासी, नीरसता का भूत व स्वयं को असहारे-पन व अकेला समझने का भूत आदि-आदि सभी रूपों से अपने वश में लाने का प्रयत्न करेंगे। इसलिए इन-एडवांस बच्चों को सावधान कर रहे हैं कि कोई भी संकल्प को कर्म में लाने के पहले आदि-मध्य-अन्त स्वयं सोच-समझ व कोई श्रेष्ठ आत्मा का साकार में सहयोग ले, कर्मों की गति को समझ व बापदादा द्वारा वेरीफाय कराके फिर कर्म में आओ तो माया के वश हो उल्टे कर्म करने का अल्पकाल का जोश, रूहानी होश में बदल जायेगा, साथ-साथ वर्तमान और भविष्य के कड़े दण्ड से बच जायेंगे। क्योंकि कई बच्चे त्रिकालदर्शी स्टेज पर स्थित न होने के कारण जिन साधनों द्वारा कर्मों से व जीवन से छूटना समझते हैं, वह छूटना नहीं लेकिन लाख गुणा अनेक बार की जीवन-बन्ध स्थिति व कर्म-बन्धन की फाँसी पर लटकने का कर्म, कर्म नहीं है लेकिन कड़ा विकर्म है यह समझ नहीं सकते हैं। इसलिए ज्ञान-स्वरूप होकर हर कर्म करने से वर्तमान और भविष्य सरल और उज्ज्वल होगा। को
बापदादा बार-बार बच्चों को स्मृति-स्वरूप, समर्थी-स्वरूप बना रहे हैं और फिर से याद दिला रहे हैं कि इस संगम के हर सेकण्ड और संकल्प की अनगिनत कमाई को, अपने ऊँचे ब्राह्मण जीवन और ब्राह्मण-कुल के महत्त्व को कभी भूलो मत। बापदादा के साथ-साथ अपने अमूल्य जीवन और श्रेष्ठ संग के समय के सदा गुण गाते खुशी में नाचते चलो। क्योंकि देवताई जीवन से यह ब्राह्मण जीवन बहुत-बहुत श्रेष्ठ है, जो आज तक आपके नाम वाले ब्राह्मण भी अन्त तक पूजे और महान माने जाते हैं। इसलिए अपने स्वमान को भूलो मत। ऐसे सदा हर्षित, सदा उमंग-उत्साह में रह अन्य का भी उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले, हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाले मुरब्बी बच्चों, सपूत, सिकीलधे बच्चों को याद-प्यार।
अव्यक्त दिव्य संदेश–16
13 अक्टूबर 1977
हर कर्म ज्ञान-स्वरूप होकर करो
प्रस्तावना
इस अव्यक्त दिव्य संदेश में बापदादा बच्चों को वर्तमान और भविष्य के प्रति विशेष अटेन्शन दिलाते हैं। परिवर्तन के समीप आते समय पुराने कर्मों के हिसाब-किताब चुक्तू होने की प्रक्रिया तीव्र होगी। माया अनेक प्रकार के भूतों के रूप में आत्मा को अपने वश में करने का प्रयास करेगी। इसलिए प्रत्येक कर्म करने से पहले उसके आदि, मध्य और अन्त पर विचार करना आवश्यक है।
बापदादा की मुख्य शिक्षा है कि ज्ञान-स्वरूप होकर हर कर्म करो, अपने श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन के महत्त्व को पहचानो और सदा खुशी, उमंग तथा उत्साह में रहकर दूसरों को भी आगे बढ़ाओ।
- परिवर्तन के समय में विशेष अटेन्शन
बापदादा बच्चों को स्मृति दिलाते हैं कि पुरानी दुनिया के परिवर्तन का समय समीप आ रहा है। इस समय पिछले और वर्तमान कर्मों के हिसाब-किताब चुक्तू होने की प्रक्रिया तीव्र हो सकती है। इसलिए प्रत्येक आत्मा को अपने विचारों, संस्कारों और कर्मों के प्रति सावधान रहना है।
कर्मों का फल मिलने के समय में घबराने या परिस्थितियों के वश होने के बजाय ज्ञान और समझ से काम लेना चाहिए।
मुख्य शिक्षा: हर परिस्थिति में आत्मिक स्मृति और सावधानी बनाए रखो।
- माया के अनेक प्रकार के भूत
बापदादा समझाते हैं कि माया अनेक रूपों में आत्मा को अपने वश में करने का प्रयास करती है। इनमें प्रमुख हैं:
व्यर्थ संकल्प-विकल्प का भूत।
भय का भूत।
संगदोष और संस्कारों के वातावरण का दोष।
अशुद्ध आत्माओं की छाया का प्रभाव।
दिलशिकस्त होने का भूत।
राइट और राँग को न समझ पाने से उत्पन्न उदासी तथा नीरसता।
स्वयं को असहाय और अकेला समझने का भाव।
इन सभी कमजोरियों से बचने के लिए आत्मा को अपनी आन्तरिक शक्ति, ज्ञान और स्वमान का सहारा लेना चाहिए।
मुख्य शिक्षा: माया के किसी भी रूप को पहचानकर उसके वश में नहीं आना है।
- कर्म करने से पहले तीनों कालों का विचार
बापदादा की विशेष शिक्षा है कि किसी भी संकल्प को कर्म में लाने से पहले उसके आदि, मध्य और अन्त पर विचार करो।
कर्म करने से पहले स्वयं से पूछो:
क्या यह कर्म ज्ञान और मर्यादा के अनुकूल है?
इसका वर्तमान में क्या परिणाम होगा?
भविष्य में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
क्या किसी श्रेष्ठ आत्मा से सलाह लेने की आवश्यकता है?
क्या इस कर्म को बापदादा की शिक्षाओं के अनुसार सत्यापित किया है?
यदि निर्णय में स्पष्टता न हो, तो जल्दबाजी करने के बजाय श्रेष्ठ आत्मा का सहयोग लो और ज्ञान की कसौटी पर अपने निर्णय को परखो।
मुख्य शिक्षा: पहले विचार, फिर सत्यापन और उसके बाद कर्म।
- अल्पकाल के जोश को रूहानी होश में बदलो
कई बार मनुष्य आवेश, भय या परेशानी में ऐसा कर्म कर बैठता है, जिससे वह समस्या से मुक्त होने के बजाय और अधिक बन्धन में फँस जाता है।
बापदादा समझाते हैं कि जिन साधनों से हम स्वयं को कर्मों और जीवन की समस्याओं से मुक्त समझते हैं, वे कभी-कभी बन्धन को और बढ़ा सकते हैं। त्रिकालदर्शी स्थिति के अभाव में सही और गलत का निर्णय करना कठिन हो जाता है।
इसलिए किसी भी परिस्थिति में अल्पकाल के जोश में निर्णय न लेकर रूहानी होश से काम लेना चाहिए।
मुख्य शिक्षा: आवेश में नहीं, ज्ञान और विवेक में स्थित होकर निर्णय लो।
- ज्ञान-स्वरूप होकर हर कर्म करो
ज्ञान-स्वरूप होने का अर्थ है कि हमारे विचार, वाणी और कर्म ज्ञान की समझ से प्रेरित हों। केवल ज्ञान सुनना या पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उसे जीवन के प्रत्येक कर्म में प्रकट करना आवश्यक है।
जब आत्मा ज्ञान-स्वरूप होकर कर्म करती है, तो उसके निर्णय अधिक विवेकपूर्ण होते हैं और वह वर्तमान तथा भविष्य को श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करती है।
मुख्य शिक्षा: ज्ञान को जीवन में उतारना ही सच्चा ज्ञान-स्वरूप बनना है।
- संगमयुग के हर सेकण्ड की कमाई
बापदादा बच्चों को याद दिलाते हैं कि संगमयुग का प्रत्येक सेकण्ड और प्रत्येक श्रेष्ठ संकल्प अनगिनत कमाई करने का अवसर है।
इसलिए अपने ऊँचे ब्राह्मण जीवन, ब्राह्मण-कुल के महत्त्व और बापदादा के श्रेष्ठ संग को कभी नहीं भूलना चाहिए।
समय को व्यर्थ विचारों, निराशा और कमजोरियों में गँवाने के बजाय आत्मिक उन्नति तथा श्रेष्ठ कर्मों में लगाना चाहिए।
मुख्य शिक्षा: संगमयुग के अमूल्य समय और हर श्रेष्ठ संकल्प का महत्त्व पहचानो।
- ब्राह्मण जीवन का श्रेष्ठ स्वमान
बापदादा बताते हैं कि यह ब्राह्मण जीवन अत्यन्त श्रेष्ठ है। इस जीवन में परमात्म संग, ज्ञान, योग और श्रेष्ठ संस्कारों द्वारा स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का अवसर मिलता है।
इसलिए अपने स्वमान को भूलकर किसी कमजोरी या परिस्थिति के प्रभाव में नहीं आना है। अपने जीवन के महत्त्व को पहचानकर सदा हर्षित रहना है।
मुख्य शिक्षा: अपने श्रेष्ठ स्वमान में स्थित रहो और अपने जीवन की विशेषताओं को पहचानो।
- सदा खुशी, उमंग और उत्साह में रहो
बापदादा बच्चों को सदा हर्षित रहने और अपने उमंग-उत्साह से दूसरों को भी प्रेरित करने की शिक्षा देते हैं।
सच्ची खुशी केवल अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती। आत्मिक स्मृति, श्रेष्ठ संकल्प और परमात्म संग का अनुभव आत्मा को आन्तरिक प्रसन्नता देता है।
जब हम स्वयं उत्साहित रहते हैं, तो हमारे विचार, वाणी और व्यवहार से दूसरों को भी प्रेरणा मिलती है।
मुख्य शिक्षा: स्वयं खुश रहो और दूसरों की खुशी तथा उमंग बढ़ाओ।
- हर कदम में पदमों की कमाई जमा करो
बापदादा बच्चों को याद दिलाते हैं कि श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन का प्रत्येक कदम कमाई का अवसर है। इसलिए हर विचार, वाणी और कर्म को मूल्यवान बनाना चाहिए।
समय का सदुपयोग, आत्मिक स्थिति, श्रेष्ठ व्यवहार और दूसरों के प्रति शुभभावना जीवन की कमाई को बढ़ाते हैं।
मुख्य शिक्षा: हर कदम ऐसा हो जो आत्मा की उन्नति और श्रेष्ठ भाग्य का आधार बने।
निष्कर्ष
इस दिव्य संदेश का सार है कि वर्तमान और भविष्य को श्रेष्ठ बनाने के लिए ज्ञान-स्वरूप होकर हर कर्म करना आवश्यक है। माया के विभिन्न रूपों को पहचानकर, तीनों कालों का विचार करके और आवश्यकता पड़ने पर श्रेष्ठ आत्माओं का सहयोग लेकर ही कर्म करना चाहिए।
अपने श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन, स्वमान और संगमयुग के अमूल्य समय को कभी नहीं भूलना है। सदा हर्षित, उमंग-उत्साह से भरपूर रहकर स्वयं भी श्रेष्ठ बनना है और दूसरों को भी श्रेष्ठ बनने की प्रेरणा देनी है।
याद रखने योग्य मुख्य सूत्र:
“हर कर्म ज्ञान-स्वरूप होकर करो, हर कदम में कमाई जमा करो और सदा खुशी तथा उमंग-उत्साह में रहो।”
लघु प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. इस दिव्य संदेश की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: ज्ञान-स्वरूप होकर हर कर्म करना।
प्रश्न 2. बापदादा बच्चों को किस समय के प्रति विशेष अटेन्शन दिलाते हैं?
उत्तर: पुरानी दुनिया के परिवर्तन के समीप आने और कर्मों के हिसाब-किताब चुक्तू होने के समय के प्रति।
प्रश्न 3. माया किन-किन रूपों में वार करती है?
उत्तर: व्यर्थ संकल्प, भय, संगदोष, संस्कारों के प्रभाव, दिलशिकस्त होने, उदासी और स्वयं को असहाय समझने के रूप में।
प्रश्न 4. किसी भी कर्म को करने से पहले क्या करना चाहिए?
उत्तर: उसके आदि, मध्य और अन्त पर विचार करना चाहिए।
प्रश्न 5. निर्णय में स्पष्टता न हो तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: किसी श्रेष्ठ आत्मा का साकार में सहयोग लेकर और ज्ञान की कसौटी पर विचार करके निर्णय करना चाहिए।
प्रश्न 6. अल्पकाल के जोश को किसमें बदलना है?
उत्तर: रूहानी होश में।
प्रश्न 7. ज्ञान-स्वरूप होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: ज्ञान को अपने विचारों, वाणी और कर्मों में धारण करना।
प्रश्न 8. संगमयुग के प्रत्येक सेकण्ड का क्या महत्त्व है?
उत्तर: प्रत्येक सेकण्ड और श्रेष्ठ संकल्प अनगिनत कमाई करने का अवसर है।
प्रश्न 9. अपने ब्राह्मण जीवन के प्रति कैसी दृष्टि रखनी चाहिए?
उत्तर: श्रेष्ठ स्वमान रखते हुए उसके महत्त्व को कभी नहीं भूलना चाहिए।
प्रश्न 10. दूसरों का उमंग-उत्साह कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर: स्वयं सदा हर्षित, उत्साहित और श्रेष्ठ स्थिति में रहकर।
प्रश्न 11. हर कदम में पदमों की कमाई कैसे जमा होती है?
उत्तर: श्रेष्ठ संकल्प, ज्ञानयुक्त कर्म, समय के सदुपयोग और शुभभावना से।
प्रश्न 12. इस संदेश से हमें अपने जीवन में क्या परिवर्तन लाना है?
उत्तर: जल्दबाजी और आवेश में कर्म करने के बजाय ज्ञान, विवेक और आत्मिक स्मृति से निर्णय करना तथा सदा खुशी और उत्साह में रहना।
अभ्यास के लिए आत्मचिंतन
क्या मैं कोई भी कर्म करने से पहले उसके आदि, मध्य और अन्त पर विचार करता हूँ?
क्या मैं भय, व्यर्थ संकल्प या संस्कारों के प्रभाव में आकर निर्णय लेता हूँ?
क्या मैं अपने श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन और संगमयुग के समय का पूरा महत्त्व समझता हूँ?
क्या मेरी खुशी और उमंग-उत्साह से दूसरे भी प्रेरित होते हैं?
आज का पुरुषार्थ: हर कर्म करने से पहले एक क्षण रुककर विचार करें—क्या यह कर्म ज्ञान-स्वरूप होकर किया जा रहा है?
ॐ शान्ति।
📝 16 | अव्यक्त दिव्य संदेश | 13 अक्टूबर 1977
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