59. अव्यक्त मुरली | 21 May 1970

21 May 1970 | हिंदी · “भिन्नता को मिटाने की युक्ति”

“भिन्नता को मिटाने की युक्ति”

आज हरेक बच्चे की दो बातें देख रहे हैं, वह दो बातें कौन सी देख रहे हैं? बापदादा के देखने को भी देख रहे हो? ऐसी अवस्था अब आने वाली है। जो कोई के संकल्प को ऐसे ही स्पष्ट जान लेंगे, जैसे वाणी द्वारा सुनने के बाद जाना जाता है। मास्टर जानी-जाननहार यह डिग्री भी यथायोग्य यथा शक्तिशाली को प्राप्त होती है जरूर। तो आज क्या देख रहे हैं? हरेक पुरुषार्थी के पुरुषार्थ में अभी तक मार्जिन क्या रही हुई है – एक तो उस मार्जिन को देख रहे हैं, दूसरा हरेक की माइट को देख रहे हैं। मार्जिन कितनी है और माइट कितनी है। दोनों का एक दो से सम्बन्ध है। जितनी माइट है उतनी मार्जिन है। तो माइट और मार्जिन दोनों ही हरेक पुरूषार्थी की देख रहे हैं। कोई बहुत नज़दीक तक पहुंच गये हैं। कोई बहुत दूर तक मंजिल को देख रहे हैं। तो भिन्न-भिन्न पुरुषार्थियों की भिन्न-भिन्न स्थिति देख क्या सोचते होंगे? भिन्नता को देख क्या सोचते होंगे?

बापदादा सभी को मास्टर नॉलेजफुल बनाने की पढ़ाई पढ़ाते हैं। प्रैक्टिकल में भगवान के जितना साकार सम्बन्ध में नज़दीक आयेंगे, उतना पुरुषार्थ में भी नज़दीक आयेंगे। अपने पुरुषार्थ और औरों के पुरुषार्थ को देख क्या सोचते हो? बीज तो अविनाशी है। अविनाशी बीज को संग का जल देना है। तो फिर फल निकल आयेगा। तो अब फल-स्वरूप दिखाना है। वृक्ष से मेहनत फल के लिये करते हैं ना। तो जो ज्ञान की परवरिश ली है उनकी रिजल्ट फल-स्वरूप बनना है। तो यह जो भिन्नता है वह कैसे मिटेगी? भिन्नता को मिटाने का सहज उपाय कौन सा है? जो अभी की भिन्नता है वह अन्त तक रहेगी वा फर्क आयेगा? सम्पूर्ण अवस्था की प्राप्ति के बाद अब के पुरुषार्थी जीवन की भिन्नता रहेगी? आजकल की जो भिन्नता है वह एकता में लानी है। एकता के लिए वर्तमान की भिन्नता को मिटाना ही पड़ेगा। बापदादा इस भिन्नता को देखते हुए भी एकता ही देखते हैं। एकता होने का साधन है – दो बातें लानी पड़ें। एक तो एकनामी बन सदैव हर बात में एक का ही नाम लो, एकनामी और एकॉनामी वाले बनना है। एकॉनामी कौन सी? संकल्पों की भी एकॉनामी चाहिए और समय की भी और ज्ञान के खजाने की भी एकॉनामी चाहिए। सभी प्रकार की एकॉनामी जब सीख जायेंगे। फिर क्या हो जायेगा? फिर मैं समाकर एक बाप में सभी भिन्नता समा जायेगी। एक में समाने की शक्ति चाहिए। समझा। यह पुरुषार्थ अगर कम है तो इतना ही इसको ज्यादा करना है। कोई भी कार्य होता है उसमें कोई भी अपनापन न हो। एक ही नाम हो। तो फिर क्या होगा? बाबा-बाबा कहने से माया भाग जाती है। मैं-मैं कहने से माया मार देती है। इसलिए पहले भी सुनाया था कि हर बात में भाषा को बदली करो। बाबा-बाबा की ढाल सदैव अपने साथ रखो। इस ढाल से फिर जो भी विघ्न हैं वह खत्म हो जायेंगे। साथ-साथ एकॉनामी करने से व्यर्थ संकल्प नहीं चलेंगे। और न व्यर्थ संकल्पों का टक्कर होगा। यह है स्पष्टीकरण। अच्छा। जो भी जाने वाले हैं वह क्या करके जायेंगे? जो कोई जहाँ से जाते हैं तो जहाँ से जाना होता है वहाँ अपना यादगार देकर जाना होता है। तो जो भी जाते हैं उन्हों को अपना कोई न कोई विशेष यादगार देकर जाना है।

सरल याद किसको रहती है। मालूम है? जितना जो स्वयं सरल होंगे उतना याद भी सरल रहती है। अपने में सरलता की कमी के कारण याद भी सरल नहीं रहती है। सरल चित्त कौन रह सकेगा? जितना हर बात में जो स्पष्ट होगा अर्थात् साफ होगा उतना सरल होगा। जितना सरल होगा उतना सरल याद भी होगी। और दूसरों को भी सरल पुरुषार्थी बना सकेंगे। जो जैसा स्वयं होता है वैसे ही उनकी रचना में भी वही संस्कार होते हैं तो हरेक को अपना विशेष यादगार देकर जाना है।

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