9 June 1969 | हिंदी · “सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य”
“सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य”
सभी व्यक्त में होते अव्यक्त स्थिति में हो? अव्यक्त स्थिति किसको कहते हैं, उसकी पहचान है? पहले है अव्यक्त स्थिति की पहचान और पहचान के बाद फिर है परख तो इन दोनों बातों का ज्ञान है? अव्यक्त स्थिति किसको कहते है? (व्यक्त का भान न रहे) व्यक्त में कार्य करते हुए भी व्यक्त का भान कैसे नहीं रहेगा? व्यक्त में होते हुए अव्यक्त स्थिति रहे, यह कितना अनुभव होता है, आज यह सभी से पूछना है! अव्यक्त स्थिति में ज्यादा से ज्यादा कितना समय रहते हो? ज्यादा में ज्यादा कितना समय होना चाहिए, मालूम है? (आठ घंटा) सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से तो आठ घंटा भी कम से कम है। आप के वर्तमान पुरुषार्थ के हिसाब से आठ घंटा ज्यादा है? (कोई ने भी हाथ नहीं उठाया) अच्छा। जो 6 घंटे तक पहुंचे हैं वह हाथ उठायें। (कोई नहीं उठाते हैं।) अच्छा 4 घंटे तक जो पहुंचे हैं वह हाथ उठाये (कोई ने 4 घंटे में कोई ने 2 घंटे में हाथ उठाया) इस रिजल्ट के हिसाब से कितना समय पुरुषार्थ का चाहिए? कोर्स भी पूरा हो गया। रिवाइज कोर्स भी हो रहा है फिर भी मैजारिटी की रिजल्ट… इसका क्या कारण है? सभी पुरुषार्थ भी करते हो, उमंग भी है, लक्ष्य भी है फिर भी क्यों नहीं होता है? (अटेन्शन कम है) किस बात का अटेन्शन कम है? यह तो अटेन्शन सभी रखते हैं कि लायक बनें, नज़दीक आयें फिर भी मुख्य कौन सा अटेन्शन कम है, जिस कारण अव्यक्त स्थिति कम रहती है? सभी पुरुषार्थी ही यहाँ बैठे हो। ऐसा कोई होगा जो कहे मैं पुरुषार्थी नहीं हूँ। पुरुषार्थी होते हुए भी कमी क्यों? क्या कारण है? अन्तर्मुख रहना चाहते हुए भी क्यों नही रह सकते हो? बाहरमुखता में भी क्यों आ जाते हो? ज्ञानी तू आत्मा भी तो सभी बने हैं, ज्ञानी तू आत्मा, समझदार बनते हुए फिर बेसमझ क्यों बन जाते हो। समझ तो मिली है। समझ का कोर्स भी पूरा हो चूका है। कोर्स पूरा हुआ गोया समझदार बन ही गये। फिर भी बेसमझ क्यों बनते हो?
मुख्य कारण यह देखा जाता है – कोई-कोई में अलबेलापन आ गया है, जिसको सुस्ती कहते हैं। सुस्ती का मीठा रूप है आलस्य। आलस्य भी कई प्रकार का होता है। तो मैजारिटी में किस न किस रूप में आलस्य और अलबेलापन आ गया है। इच्छा भी है, पुरुषार्थ भी है लेकिन अलबेलापन होने कारण जिस तरह से पुरुषार्थ करना चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। बुद्धि में ज्यादा ज्ञान आ जाता है तो उससे फिर ज्यादा अलबेलापन हो जाता है। जो अपने को कम समझदार समझते हैं वह फिर भी तीव्र पुरुषार्थ कर रहे हैं। लेकिन जो अपने को ज्यादा समझदार समझते हैं, वह ज्यादा अलबेलेपन में आ गये हैं। जैसे पहले-पहले पुरुषार्थ की तड़पन थी। ऐसा बन कर दिखायेंगे। यह करके दिखायेंगे। अभी वह तड़पन खत्म हो गई है। तृप्ति हो गई है। अपने आप से तृप्त हो गये हैं। ज्ञान तो समझ लिया, सर्विस तो कर ही रहे हैं। चल ही रहे हैं, यह तृप्त आत्मा इस रूप से नहीं बनना है। पुरुषार्थ में तड़प होनी चाहिए। जैसे बांधेलियां तड़फती हैं तो पुरुषार्थ भी तीव्र करती हैं। और जो बांधेली नहीं, वह तृप्त होती हैं तो अलबेले हो जाते हैं। ऐसी रिजल्ट मैजारिटी पुरुषार्थियों की देखने में आती है। हमेशा समझो कि हम नम्बरवन पुरुषार्थी बन रहे हैं। बन नहीं गये हैं। तीनों कालों का ज्ञान बुद्धि में आने से अपने को ज्यादा समझदार समझते हैं। पहले भी सुनाया था ना – जहाँ बालक बनना चाहिए वहाँ मालिक बन जाते हो, जहाँ मालिक बनना चाहिए वहाँ बालक बन जाते हो। तो अभी बच्चे रूप का मीठा-मीठा पुरुषार्थ तो कर रहे हो। राज्य के अधिकारी तो बन गये। तिलक भी आ गया लेकिन यह ढीला और मीठा पुरुषार्थ अभी नहीं चल सकेगा। जितना शक्तिरूप में स्थित होंगे तो पुरुषार्थ भी शक्तिशाली होगा। अभी पुरुषार्थ शक्तिशाली नहीं है। ढीला-ढीला है। पुरुषार्थी तो सभी हैं लेकिन पुरुषार्थ शक्तिशाली जो होना चाहिए वह शक्ति पुरुषार्थ में नहीं भरी है। सवेरे उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने की कोई न कोई प्वाइन्ट सामने रखो। अमृतवेले जैसे रूह-रूहान करते हो वैसे ही अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने के लिए भी कोई न कोई प्वाइन्ट विशेष रूप से बुद्धि में याद रखो। अभी विशेष पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। साधारण पुरुषार्थ करने के दिन अभी बीत रहे हैं। जैसे विशेष फंक्शन आदि के प्रोग्राम रखते हो ना वैसे अब यही समझना है कि समय थोड़ा है। उसमें विशेष पुरुषार्थ का प्रोग्राम रखना है। यह विशेष पुरुषार्थ करने का लक्ष्य रख आगे बढ़ना है। अगर ऐसी ढीली रिजल्ट में रहेंगे तो जो आने वाली परीक्षायें हैं उनकी रिजल्ट क्या रहेगी? परीक्षायें कड़ी आने वाली हैं। उसका सामना करने के लिए पुरुषार्थ भी कड़ा चाहिए। अगर पुरुषार्थ साधारण, परीक्षा कड़ी तो रिजल्ट क्या होगी?अच्छा आज तो गोपों से मुलाकात करते हैं। अपने पुरुषार्थ में सन्तुष्ट हो? चल तो रहे हो लेकिन कितनी परसेन्टेज में? जो समझते हैं हम 75 प्रतिशत श्रीमत पर चल रहे हैं वह हाथ उठायें। (कइयों ने हाथ उठाया) अच्छा मुख्य श्रीमत क्या है? मुख्य श्रीमत यही है कि ज्यादा से ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना। क्योंकि इस याद की यात्रा से ही पवित्रता, दैवीगुण और सर्विस की सफलता भी होगी। जो 75 प्रतिशत श्रीमत पर चलते हैं उन्हों का याद का चार्ट कितना है? याद का चार्ट भी 75 प्रतिशत होना चाहिए। इसको कहेंगे पूरी-पूरी श्रीमत पर चलने वाले। आज खास गोपों को आगे किया है। गोपियों को पीछे मंगाया है क्योंकि जब भी मिलन की कोई बात होती है तो गोपियां जल्दी आ जाती हैं। गोप देखते-देखते रह जाते हैं। गोपों को ज़िम्मेवारी भी देनी है। यूँ तो दी हुई है। जैसे आप लोगों के चित्र में दिखाया है ना कि द्वापर के बाद ताज उतर जाते हैं। तो यह जिम्मेवारी का ताज भी दिया हुआ तो है लेकिन कभी-कभी जानबूझ कर भी उतार देते हैं और माया भी उतार देती है। सतयुग में तो ताज इतना हल्का होता है जो मालूम भी नहीं पड़ता है कि कुछ बोझ सिर पर है। सतयुग की सीन सीनरियां सामने आती हैं कि नहीं? सतयुग के नज़ारे स्वयं ही सामने आते हैं या लाते हो? जितना-जितना आगे बढ़ेंगे तो न चाहते हुए भी सतयुगी नज़ारे स्वयं ही सामने आयेंगे। लाने की भी जरूरत नहीं। जितना-जितना नज़दीक होते जायेंगे, उतना-उतना नज़ारे भी नज़दीक होते जायेंगे।
सतयुग में चलना है और खेल-पाल करना है। यह तो निश्चित है ही आज जो भी सभी बैठे हैं उनमें से कौन समझता है कि हम श्रीकृष्ण के साथ पहले जन्म में आयेंगे? उनके फैमिली में आयेंगे वा सखी सखा बनेंगे वा तो स्कूल के साथी बनेंगे? जो समझते हैं तीनों में से कोई न कोई जरूर बनेंगे ऐसे निश्चय बुद्धि कौन है? (सभी ने हाथ उठाया) नज़दीक आने वालों की संगमयुग में निशानी क्या होगी? यहाँ कौन अपने को नज़दीक समझते हैं? यज्ञ सर्विस वा जो बापदादा का कार्य है उसमें जो नज़दीक होगा वही वहाँ खेल-पाल आदि में नज़दीक होंगे। यज्ञ की जिम्मेवारी वा बापदादा के कार्य की जिम्मेवारी के नज़दीक जितना-जितना होंगे उतना वहाँ भी नज़दीक होंगे। नजदीक होने की परख कैसे होगी? हरेक को अपने आप से पूछना चाहिए – जितनी बुद्धि, जितना तन-मन-धन और जितना समय लौकिक जिम्मेवारियों में देते हो उतना ही इस तरफ देते हो? इस तरफ ज्यादा देना चाहिए। अगर ज्यादा नहीं तो उसका वज़न एक जैसा है? अगर दोनों तरफ का एक जितना है तो भी नज़दीक गिना जायेगा। इस हिसाब से अपने को परखना है। अभी तक रिजल्ट में लौकिक जिम्मेवारियों का बोझ ज्यादा देखने में आता है। खास मुख्य गोपों को यह बातें जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि आज का दिन जो बीता कितना समय लौकिक जिम्मेवारी तरफ दिया और कितना समय अलौकिक वा पारलौकिक जिम्मेवारी तरफ दिया? कितने मददगार बने? यह चेकिंग करते रहेंगे तो पता पड़ेगा कि कौन सा तरफ खाली है। सभी प्रकार की परिस्थितियों में रहते हुए भी कम से कम दोनों तरफ एक जितना ज़रूर होना चाहिए। कम नहीं। उस तरफ कम हुआ तो हर्जा नहीं। इस तरफ कम नहीं होना चाहिए। तो फिर लौकिक ज़िम्मेवारी के कमी को भी ठीक कर सकेंगे। परमार्थ से व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है। कोई-कोई कहते हैं पहले व्यवहार को ठीक कर परमार्थ में लगें। यह ठीक नहीं है। तो यह खास ध्यान रखना है।खास गोपों में बापदादा की उम्मीद है जो गोप ही पूरी कर सकते हैं। गोपियों से नहीं हो सकती। वह कौन सी उम्मीद है? पाण्डवों का मुख्य कार्य यही है जो कई प्रकार के लोग और कई प्रकार की परीक्षायें समय प्रति समय आने वाली भी हैं और आती भी रहती हैं तो परीक्षा और लोगों की परख यह विशेष गोपों का काम है। क्योंकि पाण्डवों को शक्तियों की रखवाली करने का मुख्य कार्य है। शक्तियों का काम है तीर लगाना लेकिन हर प्रकार की परीक्षा और लोगों को परखना और शक्तियों की रखवाली करना पाण्डवों का काम है। इतनी ज़िम्मेवारी उठा सकते हो? कि शक्तियों के रखवाली की आप को आवश्यकता है? कहां-कहां देखने मे आता है पाण्डव अपनी रखवाली की औरों से उम्मीद रखते हैं लेकिन पाण्डवों को अपनी रखवाली के साथ चारों ओर की रखवाली करनी है। बेहद में दृष्टि होनी चाहिए न कि हद में। अगर अपनी ही रखवाली नहीं करेंगे तो फिर औरों की मुश्किल हो जायेगी।
सुस्ती का मीठा रूप — आलस्य
दिनांक: 9 जून 1969
प्रस्तावना
इस मुरली में बापदादा ने अव्यक्त स्थिति में स्थित रहने के अभ्यास और पुरुषार्थ में आने वाली मुख्य रुकावट पर ध्यान दिलाया है। बाबा ने बताया कि पुरुषार्थ करने की इच्छा, उमंग और लक्ष्य होते हुए भी यदि परिणाम नहीं मिलता, तो उसका एक मुख्य कारण आलस्य और अलबेलापन है।
आलस्य का मीठा रूप यह है कि आत्मा स्वयं को समझदार, ज्ञानी और संतुष्ट समझने लगती है। वह सोचती है कि ज्ञान तो समझ लिया, सेवा भी कर रहे हैं और जीवन चल ही रहा है। इससे पुरुषार्थ की प्रारम्भिक तड़प कम हो जाती है।
बाबा ने विशेष पुरुषार्थ, याद की यात्रा, लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों का संतुलन तथा गोपों की विशेष जिम्मेदारी पर भी ध्यान दिलाया है।
1. अव्यक्त स्थिति की पहचान
बापदादा ने पूछा कि व्यक्त में रहते हुए अव्यक्त स्थिति में रहने का अनुभव कितना है? अव्यक्त स्थिति की पहचान और उसकी परख का ज्ञान होना आवश्यक है।
व्यक्त में कार्य करते हुए भी व्यक्त का भान न रहे, यही अव्यक्त स्थिति का अभ्यास है।
बाबा ने पूछा कि अधिक-से-अधिक कितने समय अव्यक्त स्थिति में रहना चाहिए। उत्तर आया—आठ घंटे। सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से आठ घंटे भी कम-से-कम बताए गए।
लेकिन वर्तमान पुरुषार्थ की स्थिति को देखते हुए मैजारिटी अभी उस लक्ष्य तक नहीं पहुँची थी।
मुख्य शिक्षा: व्यक्त में रहते हुए भी अव्यक्त स्थिति में रहने का अभ्यास बढ़ाना है।
2. पुरुषार्थ करते हुए भी कमी क्यों?
बाबा ने पूछा कि सभी पुरुषार्थी हैं, लक्ष्य भी है, उमंग भी है और लायक बनने की इच्छा भी है, फिर भी अव्यक्त स्थिति में अधिक समय क्यों नहीं रह पाते?
ज्ञान का कोर्स पूरा हो चुका है और रिवाइज कोर्स भी चल रहा है। समझ भी मिली है, फिर भी कभी-कभी आत्मा अन्तर्मुख रहने के बजाय बहिर्मुख क्यों हो जाती है?
बाबा ने इस कमी का मुख्य कारण समझाया—आलस्य और अलबेलापन।
मुख्य शिक्षा: केवल ज्ञान और इच्छा पर्याप्त नहीं हैं; पुरुषार्थ में निरन्तर अटेन्शन आवश्यक है।
3. सुस्ती का मीठा रूप — आलस्य
बापदादा ने बताया कि सुस्ती का मीठा रूप आलस्य है। आलस्य भी कई प्रकार का होता है और मैजारिटी में किसी-न-किसी रूप में आलस्य तथा अलबेलापन आ गया है।
इच्छा और पुरुषार्थ होने के बावजूद अलबेलापन आत्मा को उस प्रकार पुरुषार्थ नहीं करने देता, जिस प्रकार करना चाहिए।
विशेष बात यह है कि कभी-कभी बुद्धि में अधिक ज्ञान आ जाने से स्वयं को ज्यादा समझदार समझने का भाव आ जाता है। इससे पुरुषार्थ में अलबेलापन बढ़ जाता है।
मुख्य शिक्षा: ज्ञान का अभिमान या अपनी समझ से संतुष्ट होना पुरुषार्थ को ढीला न बनाए।
4. पुरुषार्थ की प्रारम्भिक तड़प बनाए रखो
बाबा ने समझाया कि पहले पुरुषार्थ में बहुत तड़प थी—ऐसा बनकर दिखाएँगे, यह करके दिखाएँगे। लेकिन धीरे-धीरे वह तड़प कम हो गई।
आत्मा सोचने लगती है कि ज्ञान तो समझ लिया, सेवा तो कर ही रहे हैं और जीवन भी चल रहा है। इस प्रकार स्वयं से ही तृप्त हो जाती है।
बाबा ने कहा कि ऐसी तृप्त आत्मा नहीं बनना है। पुरुषार्थ में सदा आगे बढ़ने की तड़प रहनी चाहिए।
बांधेली आत्माओं का उदाहरण देकर बताया कि उनकी तड़प उन्हें तीव्र पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरित करती है।
मुख्य शिक्षा: अपने वर्तमान पुरुषार्थ से संतुष्ट होकर रुकना नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की तड़प बनाए रखनी है।
5. बालक और मालिक बनने की समझ
बाबा ने एक विशेष बात समझाई—
जहाँ बालक बनना चाहिए, वहाँ मालिक बन जाते हो और जहाँ मालिक बनना चाहिए, वहाँ बालक बन जाते हो।
अर्थात् जहाँ बाप के प्रति समर्पण और आज्ञाकारीपन चाहिए, वहाँ स्वयं को बड़ा समझने लगते हैं। वहीं जहाँ अपने पुरुषार्थ और जिम्मेदारी में शक्ति दिखानी चाहिए, वहाँ ढीले पड़ जाते हैं।
राज्य के अधिकारी बनने का लक्ष्य तो है, लेकिन उसके अनुरूप शक्तिशाली पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
मुख्य शिक्षा: बाप के आगे बालक बनो और पुरुषार्थ तथा जिम्मेदारी में शक्तिशाली बनो।
6. शक्तिशाली पुरुषार्थ की आवश्यकता
बाबा ने कहा कि सभी पुरुषार्थी तो हैं, लेकिन पुरुषार्थ में जितनी शक्ति होनी चाहिए, उतनी नहीं है।
ढीला-ढीला पुरुषार्थ अब नहीं चल सकता। समय थोड़ा है और आने वाली परीक्षाएँ कड़ी होंगी।
यदि परीक्षा कड़ी हो और पुरुषार्थ साधारण हो, तो परिणाम अच्छा कैसे होगा?
इसलिए अब साधारण पुरुषार्थ के दिन बीत रहे हैं। विशेष पुरुषार्थ का लक्ष्य रखकर आगे बढ़ना है।
मुख्य शिक्षा: आने वाली परीक्षाओं का सामना करने के लिए अभी से शक्तिशाली पुरुषार्थ करना है।
7. अमृतवेले पुरुषार्थ में शक्ति भरो
बाबा ने विशेष सुझाव दिया कि जैसे अमृतवेले रूह-रूहान करते हो, वैसे ही अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने के लिए कोई विशेष पॉइंट बुद्धि में रखो।
सुबह उठते ही ऐसी कोई विशेष शिक्षा या पॉइंट सामने रखो, जिससे पूरे दिन पुरुषार्थ में शक्ति बनी रहे।
इससे साधारण पुरुषार्थ के बजाय विशेष पुरुषार्थ की स्थिति बनेगी।
मुख्य शिक्षा: अमृतवेले केवल याद नहीं, बल्कि अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने का संकल्प भी करना है।
8. याद की यात्रा — मुख्य श्रीमत
गोपों से बाबा ने पूछा कि वे कितने प्रतिशत श्रीमत पर चलते हैं। फिर मुख्य श्रीमत बताई कि ज्यादा-से-ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना है।
याद की यात्रा से ही पवित्रता, दैवी गुण और सेवा की सफलता प्राप्त होती है।
बाबा ने समझाया कि जो 75 प्रतिशत श्रीमत पर चलते हैं, उनका याद का चार्ट भी 75 प्रतिशत होना चाहिए। तभी उन्हें पूरी-पूरी श्रीमत पर चलने वाला कहा जा सकता है।
मुख्य शिक्षा: याद की यात्रा को जीवन का मुख्य आधार बनाना है।
9. गोपों की जिम्मेदारी और जिम्मेदारी का ताज
बाबा ने विशेष रूप से गोपों को आगे किया और गोपियों को पीछे बुलाया।
समझाया कि गोपों को जिम्मेदारी का ताज मिला हुआ है, लेकिन कभी-कभी वे जानबूझकर भी उसे उतार देते हैं और कभी माया भी उसे उतार देती है।
जिम्मेदारी का ताज बोझ नहीं, बल्कि पुरुषार्थ और सेवा का प्रतीक है।
सतयुग में ताज इतना हल्का होता है कि उसके होने का बोझ भी महसूस नहीं होता।
मुख्य शिक्षा: जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना, बल्कि उसे सहजता और खुशी से निभाना है।
10. सतयुगी नज़ारे और नज़दीक आत्माओं की पहचान
बाबा ने समझाया कि जैसे-जैसे आत्माएँ आगे बढ़ेंगी, सतयुग के नज़ारे स्वयं सामने आते जाएँगे।
बाबा ने पूछा कि कौन अपने को श्रीकृष्ण के साथ पहले जन्म में आने वाला समझता है—उनकी फैमिली में, सखी-सखा के रूप में या स्कूल के साथी के रूप में?
सभी ने निश्चय व्यक्त किया कि वे इनमें से किसी-न-किसी रूप में अवश्य होंगे।
फिर बाबा ने नज़दीक आत्माओं की पहचान समझाई कि संगमयुग में जो यज्ञ सेवा और बापदादा के कार्य की जिम्मेदारी में नज़दीक होंगे, वे भविष्य में भी नज़दीक होंगे।
मुख्य शिक्षा: भविष्य की नज़दीकी का आधार वर्तमान में यज्ञ और बापदादा के कार्य के प्रति नज़दीकी है।
11. लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों का संतुलन
बाबा ने कहा कि हरेक को स्वयं से पूछना चाहिए कि जितना समय, बुद्धि, तन-मन-धन लौकिक जिम्मेदारियों में देते हैं, उतना ही अलौकिक और पारलौकिक जिम्मेदारियों में देते हैं या नहीं।
इस तरफ का समय और सहयोग कम नहीं होना चाहिए। दोनों तरफ का हिसाब चेक करना आवश्यक है।
बाबा ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ लोग सोचते हैं कि पहले व्यवहार को ठीक करें, फिर परमार्थ में लगेंगे। यह सोच ठीक नहीं है।
परमार्थ से व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है।
मुख्य शिक्षा: लौकिक जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अलौकिक और पारलौकिक जिम्मेदारियों को कम नहीं होने देना है।
12. प्रतिदिन अपनी जिम्मेदारी का हिसाब चेक करो
बाबा ने विशेष रूप से गोपों को प्रेरणा दी कि हर दिन चेक करें—
- आज कितना समय लौकिक जिम्मेदारियों में दिया?
- कितना समय अलौकिक और पारलौकिक जिम्मेदारियों में दिया?
- यज्ञ कार्य में कितने मददगार बने?
- किस तरफ समय और सहयोग कम रहा?
ऐसी चेकिंग से स्वयं को अपनी स्थिति और जिम्मेदारी का स्पष्ट अनुभव होगा।
मुख्य शिक्षा: प्रतिदिन अपने समय और सहयोग का हिसाब रखकर संतुलन बनाए रखना है।
13. गोपों की विशेष जिम्मेदारी — शक्तियों की रखवाली
बाबा ने बताया कि गोपों से विशेष उम्मीद है, जिसे गोप ही पूरा कर सकते हैं।
समय-समय पर अनेक प्रकार के लोग और परीक्षाएँ सामने आएँगी। इन लोगों को परखना और परीक्षाओं का सामना करना गोपों का विशेष कार्य है।
पाण्डवों का मुख्य कार्य शक्तियों की रखवाली करना है। शक्तियों का काम तीर लगाना है, जबकि पाण्डवों को चारों ओर की रखवाली करनी है।
मुख्य शिक्षा: केवल अपनी नहीं, बल्कि शक्तियों और संगठन की भी जिम्मेदारी उठानी है।
14. बेहद की दृष्टि रखो
बाबा ने समझाया कि गोपों को केवल अपनी हद तक सीमित नहीं रहना है। उनकी दृष्टि बेहद की होनी चाहिए।
कभी-कभी पाण्डव अपनी रखवाली के लिए दूसरों से उम्मीद रखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी रखवाली के साथ चारों ओर की रखवाली भी करनी है।
यदि वे स्वयं अपनी स्थिति और मर्यादा की रखवाली नहीं करेंगे, तो दूसरों की रखवाली करना भी मुश्किल होगा।
मुख्य शिक्षा: स्वयं शक्तिशाली बनकर बेहद की जिम्मेदारी निभानी है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: अव्यक्त स्थिति और आलस्य
प्रश्न 1. अव्यक्त स्थिति की पहचान क्या है?
उत्तर: व्यक्त में कार्य करते हुए भी व्यक्त का भान न रहना।
प्रश्न 2. सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से अव्यक्त स्थिति में कम-से-कम कितना समय रहना चाहिए?
उत्तर: आठ घंटे।
प्रश्न 3. पुरुषार्थी होते हुए भी अव्यक्त स्थिति में कमी का मुख्य कारण क्या बताया?
उत्तर: आलस्य और अलबेलापन।
प्रश्न 4. सुस्ती का मीठा रूप क्या है?
उत्तर: आलस्य।
प्रश्न 5. अधिक ज्ञान होने पर भी क्या कमी आ सकती है?
उत्तर: स्वयं को ज्यादा समझदार समझने से अलबेलापन आ सकता है।
भाग 2: तीव्र और शक्तिशाली पुरुषार्थ
प्रश्न 6. पुरुषार्थ में पहले कौन-सी विशेषता थी?
उत्तर: कुछ करके दिखाने की तड़प।
प्रश्न 7. बाबा कैसी तृप्त आत्मा बनने से मना करते हैं?
उत्तर: जो ज्ञान और सेवा से स्वयं को पूर्ण समझकर पुरुषार्थ में रुक जाती है।
प्रश्न 8. पुरुषार्थ में क्या बनाए रखना है?
उत्तर: आगे बढ़ने की तड़प।
प्रश्न 9. बाबा ने बालक और मालिक के बारे में क्या समझाया?
उत्तर: जहाँ बालक बनना चाहिए वहाँ मालिक बन जाते हैं और जहाँ मालिक बनना चाहिए वहाँ बालक बन जाते हैं।
प्रश्न 10. अब किस प्रकार का पुरुषार्थ आवश्यक है?
उत्तर: शक्तिशाली और विशेष पुरुषार्थ।
भाग 3: अमृतवेला और याद की यात्रा
प्रश्न 11. अमृतवेले पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने के लिए क्या करना है?
उत्तर: कोई विशेष पॉइंट बुद्धि में रखकर पुरुषार्थ में शक्ति भरनी है।
प्रश्न 12. बाबा ने मुख्य श्रीमत क्या बताई?
उत्तर: ज्यादा-से-ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना।
प्रश्न 13. याद की यात्रा से कौन-सी प्राप्तियाँ होती हैं?
उत्तर: पवित्रता, दैवी गुण और सेवा की सफलता।
प्रश्न 14. 75 प्रतिशत श्रीमत पर चलने वाले का याद का चार्ट कितना होना चाहिए?
उत्तर: 75 प्रतिशत।
प्रश्न 15. साधारण पुरुषार्थ के स्थान पर अब क्या करना है?
उत्तर: विशेष और शक्तिशाली पुरुषार्थ।
भाग 4: गोपों की जिम्मेदारी
प्रश्न 16. बाबा ने विशेष रूप से किस संगठन से मुलाकात की?
उत्तर: गोपों से।
प्रश्न 17. गोपों को कौन-सा ताज मिला हुआ है?
उत्तर: जिम्मेदारी का ताज।
प्रश्न 18. नज़दीक आत्माओं की पहचान क्या है?
उत्तर: यज्ञ सेवा और बापदादा के कार्य की जिम्मेदारी में नज़दीक होना।
प्रश्न 19. लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों में क्या करना है?
उत्तर: दोनों का समय और सहयोग चेक करके संतुलन रखना है।
प्रश्न 20. बाबा के अनुसार परमार्थ से क्या सिद्ध होता है?
उत्तर: व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है।
भाग 5: शक्तियों की रखवाली
प्रश्न 21. गोपों से बाबा की विशेष उम्मीद क्या है?
उत्तर: लोगों को परखना, परीक्षाओं का सामना करना और शक्तियों की रखवाली करना।
प्रश्न 22. शक्तियों का मुख्य कार्य क्या बताया?
उत्तर: तीर लगाना।
प्रश्न 23. पाण्डवों का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर: शक्तियों की रखवाली करना।
प्रश्न 24. पाण्डवों को किस प्रकार की दृष्टि रखनी चाहिए?
उत्तर: बेहद की दृष्टि।
प्रश्न 25. गोपों को अपनी रखवाली के साथ किसकी रखवाली करनी है?
उत्तर: चारों ओर की और शक्तियों की रखवाली।
भाग 6: स्व-चेकिंग और जिम्मेदारी
प्रश्न 26. प्रतिदिन किस बात का हिसाब रखना है?
उत्तर: लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों में दिए गए समय और सहयोग का।
प्रश्न 27. पुरुषार्थ में अलबेलापन आने से क्या होता है?
उत्तर: पुरुषार्थ की गति और शक्ति कम हो जाती है।
प्रश्न 28. सतयुगी नज़ारे कब स्वयं सामने आते हैं?
उत्तर: जैसे-जैसे आत्माएँ आगे और नज़दीक होती जाती हैं।
प्रश्न 29. जिम्मेदारी का ताज कैसा होना चाहिए?
उत्तर: सहज और हल्का अनुभव होना चाहिए।
प्रश्न 30. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: आलस्य और अलबेलेपन को समाप्त करके शक्तिशाली पुरुषार्थ, याद की यात्रा और बेहद की जिम्मेदारी निभानी है।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या मैं व्यक्त में कार्य करते हुए अव्यक्त स्थिति का अनुभव करता हूँ?
- क्या मेरे पुरुषार्थ में कहीं आलस्य या अलबेलापन आ गया है?
- क्या मैं अपने वर्तमान पुरुषार्थ से संतुष्ट होकर रुक तो नहीं गया हूँ?
- क्या मेरे अन्दर पहले जैसी पुरुषार्थ की तड़प है?
- क्या मैं अमृतवेले कोई विशेष पॉइंट लेकर पूरे दिन पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाता हूँ?
- क्या मेरा याद का चार्ट मेरी श्रीमत के पालन के अनुरूप है?
- क्या मैं जिम्मेदारी के ताज को सहजता से धारण करता हूँ?
- क्या मैं लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों का समय प्रतिदिन चेक करता हूँ?
- क्या मैं परमार्थ को प्राथमिकता देकर व्यवहार को भी सिद्ध करता हूँ?
- क्या मैं अपनी रखवाली के साथ दूसरों की और शक्तियों की भी रखवाली करता हूँ?
निष्कर्ष
9 जून 1969 की इस मुरली का मुख्य संदेश है कि सुस्ती का मीठा रूप आलस्य है, इसलिए अलबेलेपन को समाप्त करके शक्तिशाली पुरुषार्थ करना है।
केवल ज्ञानवान बनना या पुरुषार्थ करने की इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है। पुरुषार्थ में तड़प, शक्ति और निरन्तर अटेन्शन आवश्यक है। अमृतवेले विशेष पॉइंट लेकर याद की यात्रा में रहना है। लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों का संतुलन रखना है और विशेष रूप से गोपों को शक्तियों की रखवाली की बेहद जिम्मेदारी निभानी है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“मैं नम्बरवन पुरुषार्थी बन रहा हूँ, बन चुका नहीं हूँ। आलस्य और अलबेलेपन को समाप्त कर शक्तिशाली पुरुषार्थ करूँगा।”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल मुरली पाठ पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 20 अव्यक्त मुरली |09 June 1969
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
