पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त कर बीजरूप अवस्था बनाओ
आज जब मैं वतन में गई तो बापदादा हम सभी बच्चों का स्वागत करने के लिए सामने उपस्थित थे। और जैसे ही मैं पहुंची तो जैसे साकार रूप में दृष्टि से याद लेते थे वैसे ही अनुभव हुआ लेकिन आज की दृष्टि में विशेष प्रेम के सागर का रूप इमर्ज था। एक-एक बच्चे की याद नयनों में समाई हुई थी। बाबा ने कहा याद तो सभी बच्चों ने भेजी है, लेकिन इसमें दो प्रकार की याद है। कई बच्चों की याद अव्यक्त है और कईयों की याद में अव्यक्त भाव के साथ व्यक्त भाव मिक्स है। 75 प्रतिशत बच्चों की याद अव्यक्त थी लेकिन 25 प्रतिशत की याद मिक्स थी। फिर बाबा ने सभी को स्नेह और शक्ति भरी दृष्टि देते गिट्टी खिलाई। फिर एक दृश्य इमर्ज हुआ – क्या देखा सभी बच्चों का संगठन खड़ा है और ऊपर से बहुत फूलों की वर्षा हो रही है। बिल्कुल चारों और फूल के सिवाए और कुछ देखने में नहीं आ रहा था। बाबा ने सुनाया – बच्ची, बापदादा ने स्नेह और शक्ति तो बच्चों को दी ही है लेकिन साथ-साथ दिव्य गुण रूपी फूलों की वर्षा शिक्षा के रूप में भी बहुत की है। परन्तु दिव्य गुणों की शिक्षा को हरेक बच्चे ने यथाशक्ति ही धारण किया है। इसके बाद फिर दूसरा दृश्य दिखाया – तीन प्रकार के गुलाब के फूल थे एक लोहे का, दूसरा हल्का पीतल का और तीसरा रीयल गुलाब था। तो बाबा ने कहा बच्चों की रिजल्ट भी इस प्रकार है। जो लोहे का फूल है – यह बच्चों के कड़े संस्कार की निशानी थे। जैसे लोहे को बहुत ठोकना पड़ता है, जब तक गर्म न करो, हथौड़ी न लगाओ तो मुड़ नहीं सकता। इस तरह कई बच्चों के संस्कार लोहे की तरह हैं जो कितना भी भट्ठी में पड़े रहें लेकिन बदलते ही नहीं। दूसरे हैं जो मोड़ने से वा मेहनत से कुछ बदलते हैं। तीसरे वह जो नेचुरल ही गुलाब हैं। यह वही बच्चे हैं जिन्होंने गुलाब समान बनने में कुछ मेहनत नहीं ली। ऐसे सुनाते-सुनाते बाबा ने रीयल गुलाब के फूल को अपने हाथ में उठाकर थोड़ा घुमाया। घुमाते ही उनके सारे पत्ते गिर गये। और सिर्फ बीच का बीज रह गया। तो बाबा बोले, देखो बच्ची जैसे इनके पत्ते कितना जल्दी और सहज अलग हो गये – ऐसे ही बच्चों को ऐसा पुरुषार्थ करना है जो एकदम फट से पुराने संस्कार, पुराने देह के सम्बन्धियों रूपी पत्ते छंट जायें। और फिर बीजरूप अवस्था में स्थित हो जाएं। तो सभी बच्चों को यही सन्देश देना कि अपने को चेक करो कि अगर समय आ जाए तो कोई भी संस्कार रूपी पत्ते अटक तो नहीं जायेंगे, जो मेहनत करनी पड़े? कर्मातीत अवस्था सहज ही बन जायेगी या कोई कर्मबन्धन उस समय अटक डालेगा? अगर कोई कमी है तो चेक करो और भरने की कोशिश करो।
पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त कर बीजरूप अवस्था बनाओ
1. बापदादा का प्रेम और शक्तिशाली दृष्टि
आज जब मैं वतन में गई, तो बापदादा हम सभी बच्चों का स्वागत करने के लिए सामने उपस्थित थे। जैसे साकार रूप में बाबा दृष्टि देकर याद स्वीकार करते थे, वैसे ही आज भी अनुभव हुआ। लेकिन आज की दृष्टि में विशेष रूप से प्रेम के सागर स्वरूप की झलक दिखाई दे रही थी। एक-एक बच्चे की याद बाबा के नयनों में समाई हुई थी।
बाबा ने बताया कि सभी बच्चों ने याद भेजी है, लेकिन याद करने के भाव में अंतर है। कुछ बच्चों की याद पूर्णतः अव्यक्त थी, जबकि कुछ बच्चों की याद में अव्यक्त भाव के साथ व्यक्त भाव भी मिला हुआ था।
- 75 प्रतिशत बच्चों की याद अव्यक्त भाव वाली थी।
- 25 प्रतिशत बच्चों की याद में व्यक्त और अव्यक्त दोनों भाव मिले हुए थे।
इसके बाद बाबा ने सभी बच्चों को स्नेह और शक्ति से भरपूर दृष्टि दी तथा गिट्टी खिलाई।
प्रश्न: बाबा की दृष्टि में विशेष रूप से कौन-सा स्वरूप इमर्ज था?
उत्तर: प्रेम के सागर स्वरूप का।
प्रश्न: बच्चों की याद में कितने प्रकार के भाव दिखाई दिए?
उत्तर: अव्यक्त भाव और व्यक्त-अव्यक्त मिश्रित भाव।
2. दिव्य गुणों के फूलों की वर्षा
इसके बाद एक सुंदर दृश्य दिखाई दिया। सभी बच्चे एक संगठन के रूप में खड़े थे और ऊपर से बहुत सारे फूलों की वर्षा हो रही थी। चारों ओर फूलों के सिवाय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
बाबा ने समझाया कि बापदादा ने बच्चों को केवल स्नेह और शक्ति ही नहीं दी है, बल्कि शिक्षा के रूप में दिव्य गुणों के फूलों की भी बहुत वर्षा की है।
लेकिन हर बच्चे ने अपनी-अपनी यथाशक्ति के अनुसार ही उन दिव्य गुणों को धारण किया है।
इसका अर्थ है कि ज्ञान सुनना और शिक्षा प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक पुरुषार्थ है उन शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करना और अपने स्वभाव, संस्कार तथा व्यवहार को दिव्य बनाना।
प्रश्न: फूलों की वर्षा किस बात की निशानी थी?
उत्तर: दिव्य गुणों की शिक्षा की।
प्रश्न: बच्चों को प्राप्त शिक्षा का वास्तविक फल क्या है?
उत्तर: दिव्य गुणों को जीवन में धारण करना।
3. तीन प्रकार के गुलाब — तीन प्रकार के संस्कार
इसके बाद बाबा ने तीन प्रकार के गुलाब के फूल दिखाए।
- लोहे का गुलाब।
- हल्के पीतल का गुलाब।
- वास्तविक गुलाब का फूल।
बाबा ने बताया कि ये तीनों फूल बच्चों की संस्कारों की स्थिति को दर्शाते हैं।
(क) लोहे का फूल — कठोर संस्कार
लोहे को मोड़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। उसे गर्म करना पड़ता है और हथौड़ी से चोट लगानी पड़ती है। इसी प्रकार कुछ बच्चों के संस्कार बहुत कठोर होते हैं।
वे ज्ञान सुनते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं और भट्ठी में भी रहते हैं, लेकिन उनके संस्कारों में परिवर्तन नहीं आता। पुराने स्वभाव, आदतें और प्रतिक्रियाएँ बार-बार सामने आ जाती हैं।
ऐसे बच्चों को अपने संस्कारों को बदलने के लिए विशेष पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।
प्रश्न: लोहे का फूल किसका प्रतीक है?
उत्तर: कठोर और कठिनाई से बदलने वाले संस्कारों का।
प्रश्न: ऐसे संस्कारों को बदलने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: दृढ़ संकल्प, निरंतर अभ्यास और विशेष पुरुषार्थ।
(ख) पीतल का फूल — मेहनत से बदलने वाले संस्कार
दूसरा फूल हल्के पीतल का था। यह उन बच्चों की निशानी है जिनके संस्कार प्रयास करने से कुछ बदलते हैं।
ऐसे बच्चे शिक्षा सुनकर अपने व्यवहार में सुधार लाते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ बदलते ही कभी-कभी पुराने संस्कार फिर से उभर आते हैं।
इसलिए केवल कुछ समय के लिए परिवर्तन लाना पर्याप्त नहीं है। संस्कारों को इतना शक्तिशाली बनाना है कि वे हर परिस्थिति में दिव्य बने रहें।
प्रश्न: पीतल का फूल किस प्रकार के संस्कारों को दर्शाता है?
उत्तर: वे संस्कार जो मेहनत और अभ्यास से बदलते हैं।
प्रश्न: संस्कारों में स्थायी परिवर्तन कैसे आएगा?
उत्तर: ज्ञान, योग और स्व-परिवर्तन के निरंतर अभ्यास से।
(ग) वास्तविक गुलाब — सहज और प्राकृतिक दिव्यता
तीसरा फूल वास्तविक गुलाब था। यह उन बच्चों का प्रतीक था जिन्होंने गुलाब समान बनने के लिए अधिक संघर्ष नहीं किया, बल्कि दिव्य गुणों को सहज रूप से अपने जीवन में धारण किया।
उनका स्वभाव प्रेमपूर्ण, मधुर और निर्मल होता है। वे परिस्थितियों के प्रभाव में आकर अपनी आंतरिक शांति और श्रेष्ठता को नहीं खोते।
उनके लिए दिव्य गुण कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाते हैं।
प्रश्न: वास्तविक गुलाब किस प्रकार के बच्चों की निशानी है?
उत्तर: उन बच्चों की, जिनमें दिव्य गुण सहज और स्वाभाविक बन गए हैं।
प्रश्न: हमारा लक्ष्य कैसा बनना है?
उत्तर: सहज रूप से दिव्य गुणों से सम्पन्न बनना।
4. गुलाब के पत्ते गिरते ही बीज शेष रह गया
बाबा ने वास्तविक गुलाब के फूल को अपने हाथ में उठाया और थोड़ा घुमाया। घुमाते ही उसके सारे पत्ते अलग होकर गिर गए और केवल बीच का बीज रह गया।
बाबा ने इस दृश्य के माध्यम से बहुत गहरी शिक्षा दी।
जिस प्रकार गुलाब के पत्ते सहज ही अलग हो गए, उसी प्रकार बच्चों को ऐसा पुरुषार्थ करना है कि पुराने संस्कार और देह के संबंधों से जुड़ी आसक्तियाँ एकदम समाप्त हो जाएँ।
यह अवस्था केवल बाहरी त्याग की नहीं, बल्कि मन और बुद्धि को पुराने बंधनों से मुक्त करने की है।
जब आत्मा पुराने संस्कारों, देह-अभिमान और व्यर्थ आकर्षणों से मुक्त होती है, तब वह अपनी मूल आत्मिक स्थिति में सहज स्थित हो सकती है।
प्रश्न: गुलाब के पत्ते गिरने के बाद क्या शेष रह गया?
उत्तर: केवल बीच का बीज।
प्रश्न: पत्तों के गिरने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर: पुराने संस्कारों और आसक्तियों से मुक्त होना।
5. बीजरूप अवस्था — आत्मा की मूल स्थिति
बीजरूप अवस्था का अर्थ है अपने को आत्मा समझकर परमात्मा की याद में स्थित होना तथा बाहरी परिस्थितियों और पुराने संस्कारों से प्रभावित न होना।
इस अवस्था में मन व्यर्थ संकल्पों से मुक्त होता है और बुद्धि एकाग्र रहती है। आत्मा अपने मूल गुणों — शांति, प्रेम, पवित्रता और शक्ति — का अनुभव करती है।
बीजरूप अवस्था का अभ्यास हमें यह पहचानने में सहायता करता है कि कौन-से संस्कार अभी भी हमारे पुरुषार्थ में बाधा डाल रहे हैं।
प्रश्न: बीजरूप अवस्था का आधार क्या है?
उत्तर: आत्म-अभिमानी स्थिति और परमात्मा की याद।
प्रश्न: बीजरूप अवस्था में स्थित होने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: मन एकाग्र होता है, पुराने संस्कारों का प्रभाव कम होता है और आत्मिक शक्ति बढ़ती है।
6. देह के संबंधों रूपी पत्तों से न्यारा बनना
बाबा ने विशेष रूप से कहा कि पुराने संस्कारों के साथ-साथ देह के संबंधियों रूपी पत्ते भी सहज ही छंट जाने चाहिए।
इसका भाव यह नहीं है कि हम अपने पारिवारिक या सामाजिक कर्तव्यों को छोड़ दें। इसका अर्थ है कि संबंधों को निभाते हुए भी मन में देह-अभिमान, अत्यधिक मोह, अपेक्षा और आसक्ति न रहे।
संबंधों में प्रेम हो, लेकिन प्रेम के साथ बंधन न हो। जिम्मेदारी हो, लेकिन जिम्मेदारी के कारण आत्मिक स्थिति कमजोर न हो।
जब हम संबंधों को परमात्मा की देन और सेवा का माध्यम समझकर निभाते हैं, तब धीरे-धीरे आसक्ति के स्थान पर निर्मल प्रेम विकसित होता है।
प्रश्न: संबंधों से न्यारा बनने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: संबंध निभाते हुए भी मोह और आसक्ति से मुक्त रहना।
प्रश्न: क्या बीजरूप अवस्था का अर्थ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ छोड़ना है?
उत्तर: नहीं। जिम्मेदारियाँ निभाते हुए आत्मिक स्थिति में स्थिर रहना है।
7. कर्मातीत अवस्था की तैयारी
बाबा ने सभी बच्चों को संदेश दिया कि स्वयं को चेक करो। यदि अचानक ऐसा समय आ जाए जब कर्मातीत अवस्था में स्थित होना आवश्यक हो, तो क्या कोई पुराना संस्कार या कर्मबंधन हमें रोक देगा?
क्या हम सहज ही अपनी आत्मिक स्थिति में स्थित हो सकेंगे, या किसी परिस्थिति, संबंध, इच्छा अथवा आदत के कारण मन भटकने लगेगा?
यह आत्म-परीक्षण डरने के लिए नहीं, बल्कि अपनी कमी पहचानकर उसे दूर करने के लिए है।
कर्मातीत अवस्था की तैयारी केवल अंतिम समय पर नहीं होती। इसके लिए प्रतिदिन अपने संकल्पों, स्वभाव, व्यवहार और कर्मों को श्रेष्ठ बनाना आवश्यक है।
प्रश्न: बाबा ने बच्चों को स्वयं को चेक करने की शिक्षा क्यों दी?
उत्तर: यह जानने के लिए कि कोई पुराना संस्कार या कर्मबंधन पुरुषार्थ में बाधा तो नहीं बनेगा।
प्रश्न: कर्मातीत अवस्था की तैयारी कब करनी चाहिए?
उत्तर: प्रतिदिन, निरंतर आत्म-परीक्षण और पुरुषार्थ द्वारा।
8. स्व-परिवर्तन के लिए प्रतिदिन का पुरुषार्थ
पुराने संस्कारों को समाप्त करने के लिए केवल संकल्प करना पर्याप्त नहीं है। हमें उन्हें पहचानकर उनके स्थान पर श्रेष्ठ संस्कार धारण करने होंगे।
प्रतिदिन स्वयं से कुछ प्रश्न पूछें:
- क्या आज किसी परिस्थिति में मेरा पुराना संस्कार उभरा?
- क्या किसी व्यक्ति के व्यवहार से मेरी शांति भंग हुई?
- क्या मेरे मन में किसी संबंध के प्रति अत्यधिक मोह या अपेक्षा रही?
- क्या मैंने ज्ञान को केवल सुना, या उसे कर्म में भी लाया?
- क्या मैं कुछ समय सहज बीजरूप अवस्था में स्थित रहा?
- यदि कोई कठिन परिस्थिति आए, तो क्या मैं आत्मिक स्थिति में स्थिर रह सकूँगा?
जिस कमी का पता चले, उसे स्वीकार करके परमात्मा की याद, दृढ़ संकल्प और नियमित अभ्यास द्वारा बदलने का प्रयास करें।
प्रश्न: पुराने संस्कार बदलने का पहला कदम क्या है?
उत्तर: उन्हें ईमानदारी से पहचानना और स्वीकार करना।
प्रश्न: स्व-परिवर्तन का सबसे प्रभावी आधार क्या है?
उत्तर: ज्ञान, योग, आत्म-परीक्षण और निरंतर अभ्यास।
9. आज का मुख्य संदेश
बापदादा की शिक्षा हमें याद दिलाती है कि हमारा लक्ष्य केवल ज्ञानवान बनना नहीं, बल्कि ज्ञान-स्वरूप बनना है। केवल दिव्य गुणों की शिक्षा सुनना नहीं, बल्कि उन गुणों को अपने स्वभाव में उतारना है।
लोहे के फूल से पीतल के फूल और फिर वास्तविक गुलाब के समान सहज दिव्यता की ओर बढ़ना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
जिस प्रकार गुलाब के पत्ते सहज ही अलग हो गए और बीज शेष रह गया, उसी प्रकार हमें पुराने संस्कारों, देह-अभिमान और आसक्तियों से मुक्त होकर बीजरूप अवस्था में स्थित होने का अभ्यास करना है।
अंतिम स्व-चिंतन प्रश्न:
- क्या मेरे पुराने संस्कार अभी भी मुझे प्रभावित करते हैं?
- क्या मैं संबंधों में रहते हुए न्यारा और प्यारा रह सकता हूँ?
- क्या मेरे दिव्य गुण सहज रूप से मेरे व्यवहार में दिखाई देते हैं?
- क्या मैं किसी भी परिस्थिति में आत्मिक स्थिति में स्थित होने का अभ्यास कर रहा हूँ?
- क्या मैं कर्मातीत अवस्था की तैयारी आज से ही कर रहा हूँ?
संकल्प
“मैं आत्मा अपने पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त कर, देह-अभिमान और आसक्ति से न्यारी बनूँगा। परमात्मा की याद में स्थित होकर अपने दिव्य गुणों को सहज स्वभाव बनाऊँगा और बीजरूप अवस्था का नियमित अभ्यास करूँगा।”
निष्कर्ष
पुराने संस्कार रूपी पत्तों को समाप्त करो, दिव्य गुणों को स्वभाव बनाओ और बीजरूप अवस्था में स्थित होकर कर्मातीत बनने का पुरुषार्थ करो।
Quiz not found.
