01 A| अव्यक्त दिव्य सन्देश | 18-01-1969

1. तन और मन की हलचल को समाप्त कर देही-अभिमानी बनो

आज जब हम वतन में गई तो शिवबाबा बोले – साकार ब्रह्मा की आत्मा में आदि से अन्त तक 84 जन्मों के चक्र लगाने के संस्कार हैं तो आज भी वतन से चक्र लगाने गये थे। जैसे साइंस वाले रॉकेट द्वारा चन्द्रमा तक पहुंचे और जितना चन्द्रमा के नजदीक पहुंचते गये उतना इस धरती की आकर्षण से दूर होते गये। पृथ्वी की आकर्षण खत्म हो गई। वहाँ पहुँचने पर बहुत हल्कापन महसूस होता है। जैसे तुम बच्चे जब सूक्ष्मवतन में आते हो तो स्थूल आकर्षण खत्म हो जाती है तो वहाँ भी धरती की आकर्षण नहीं रहती है। यह है ध्यान द्वारा और वह है साइंस द्वारा। और भी एक अन्तर बापदादा सुना रहे थे – कि वह लोग जब रॉकेट में चलते हैं तो लौटने का कनेक्शन नीचे वालों से होता है लेकिन यहाँ तो जब चाहें, जैसे चाहें अपने हाथ में है। इसके बाद बाबा ने एक दृश्य दिखाया – एक लाइट की बहुत ऊंची पहाड़ी थी। उस पहाड़ी के नीचे शक्ति सेना और पाण्डव दल था। ऊपर में बापदादा खड़े थे। इसके बाद बहुत भीड़ हो गई। हम सभी वहाँ खड़े ऐसे लग रहे थे जैसे साकारी नहीं लेकिन मन्दिर के साक्षात्कार मूर्त खड़े हैं। सभी ऊपर देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन ऊपर देख नहीं सके। जैसे सभी बहुत तरस रहे थे। फिर थोड़ी देर में एक आकाशवाणी की तरह आवाज आई कि शक्तियों और पाण्डवों द्वारा ही कल्याण होना है। उस समय हम सबके चहरे पर बहुत ही रहमदिल का भाव था। उसके बाद फिर कई लोगों को शक्तियों और पाण्डवों से अव्यक्त बह्मा का साक्षात्कार, शिवबाबा का साक्षात्कार होने लगा। फिर तो वह सीन देखने की थी कोई हस रहा था, कोई पकड़ने की कोशिश कर रहा था, कोई प्रेम में आंसू बहा रहा था। लेकिन सारी शक्तियां आग के गोले समान तेजस्वी रूप में स्थित थी। इस पर बाबा ने सुनाया कि अन्त समय में तुम्हारा यह व्यक्त शरीर भी बिल्कुल स्थिर हो जायेगा। अभी तो पुराना हिसाब-किताब होने के कारण शरीर अपनी तरफ खींचता है लेकिन अन्त में बिल्कुल स्थिर, शान्त हो जायेगा। कोई भी हलचल न मन में, न तन में रहेगी। जिसको ही बाबा कहते हैं देही अभिमानी स्थिति। दृश्य समाप्त होने के बाद बाबा ने कहा – सभी बच्चों को कहना कि अभी देही अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो। जितना सर्विस पर ध्यान है उतना ही इस मुख्य बात पर भी ध्यान रहे कि देही अभिमानी बनना है।

अध्याय 1

“तन-मन की हलचल समाप्त कर देही-अभिमानी बनो”

18 जनवरी 1969 — अव्यक्त संदेश का प्रथम संदेश

1. अव्यक्त संदेशों का आरंभ — एक ऐतिहासिक क्षण

18 जनवरी 1969 का दिन ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय परिवार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन साकार रूप में ब्रह्मा बाबा ने अंतिम मुरली चलाई और उसके पश्चात् वे अव्यक्त अवस्था में चले गए।

इसके बाद 21 जनवरी को ब्रह्मा बाबा के अंतिम संस्कार के पश्चात्, भोग के समय दादी गुलजार के तन में शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा का अव्यक्त संदेश के रूप में आगमन हुआ।

यहीं से अव्यक्त संदेशों की एक नई यात्रा आरंभ हुई।

यह केवल एक संदेश प्राप्त होने की घटना नहीं थी, बल्कि साकार से अव्यक्त संबंध को अनुभव करने का एक नया माध्यम बना।


2. अव्यक्त संदेश कैसे प्राप्त होते थे?

दादी गुलजार ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि जब वे याद में बैठती थीं, तो ऐसा अनुभव होता था जैसे बाबा उनकी डोर खींच लेते हैं।

वे इस स्थूल संसार से न्यारी एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाती थीं जहाँ—

  • स्थूल शरीर का अनुभव नहीं रहता,
  • सामान्य आवाजों का अनुभव नहीं रहता,
  • केवल विशेष दृश्य अनुभव होते,
  • और उस अवस्था से लौटकर वे प्राप्त संदेशों को लिखतीं और सुनातीं।

इस प्रकार अव्यक्त वतन से संदेशों का आदान-प्रदान प्रारंभ हुआ।

यह संदेश बच्चों को अव्यक्त बाबा से अपने संबंध का अनुभव कराने वाले बने।


3. पहला संदेश — “तन और मन की हलचल समाप्त कर देही-अभिमानी बनो”

अव्यक्त संदेश का सबसे पहला और अत्यंत गहरा संदेश था:

“तन और मन की हलचल को समाप्त कर देही-अभिमानी बनो।”

विचार कीजिए—साकार ब्रह्मा बाबा का शरीर सामने रखा हुआ है और उसी समय ऊपर से संदेश आता है कि:

तन और मन की हलचल समाप्त करो।

इसका अर्थ है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी बड़ी हो, आत्मा को अपनी आंतरिक स्थिति को स्थिर रखना है।

दुःख, आश्चर्य, वियोग, चिंता, प्रश्न और भावनात्मक हलचल के बीच भी आत्मा को अपनी वास्तविक पहचान में स्थित होना है।

मुख्य शिक्षा

शरीर की अवस्था बदल सकती है, लेकिन आत्मा की स्थिति स्थिर रहनी चाहिए।


4. देही-अभिमानी स्थिति क्या है?

देही-अभिमानी का अर्थ है—

मैं यह शरीर नहीं, बल्कि शरीर को चलाने वाली आत्मा हूँ।

जब मन बार-बार शरीर, परिस्थितियों, संबंधों और घटनाओं की ओर आकर्षित होता है, तब देह-अभिमान बढ़ता है।

जब चेतना आत्मिक स्वरूप में स्थित होती है, तब देही-अभिमानी स्थिति मजबूत होती है।

इस स्थिति की पहचान है—

  • मन में अनावश्यक हलचल कम होना,
  • शरीर की परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित न होना,
  • इच्छाओं का कम होना,
  • गुणों से संपन्न होना,
  • आत्मिक स्थिरता,
  • और बाबा की याद में स्थित रहना।

5. ब्रह्मा बाबा की आत्मा और 84 जन्मों के संस्कार

अव्यक्त वतन में शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा के विषय में बताया कि साकार ब्रह्मा की आत्मा में आदि से अंत तक 84 जन्मों के चक्कर लगाने के संस्कार हैं।

इसीलिए अव्यक्त अवस्था में भी “चक्कर लगाने” का संस्कार दिखाई देता है।

यह उदाहरण हमें एक महत्वपूर्ण बात समझाता है—

संस्कार बहुत गहरे होते हैं।

व्यक्ति की वर्तमान स्थिति केवल वर्तमान परिस्थितियों से नहीं बनती, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे संस्कार भी उसकी प्रवृत्तियों को प्रभावित करते हैं।

इसलिए साधना का उद्देश्य केवल बाहरी व्यवहार बदलना नहीं, बल्कि पुराने संस्कारों को भी परिवर्तन करना है।


6. विज्ञान और सूक्ष्म वतन का उदाहरण

इस संदेश में सूक्ष्म वतन की स्थिति को समझाने के लिए विज्ञान का उदाहरण दिया गया है।

जब वैज्ञानिक रॉकेट के द्वारा पृथ्वी से दूर जाते हैं, तो जैसे-जैसे वे पृथ्वी से दूर होते जाते हैं, वैसे-वैसे पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव कम होता जाता है।

पृथ्वी का आकर्षण कम होने से हल्कापन अनुभव होता है।

इसी प्रकार ध्यान द्वारा जब आत्मा सूक्ष्म वतन की ओर जाती है, तो स्थूल संसार का आकर्षण कम अनुभव होता है।

महत्वपूर्ण अंतर

विज्ञान में शरीर को पृथ्वी से बाहर ले जाने का प्रयास होता है, जबकि ध्यान में आत्मा की चेतना स्थूल आकर्षण से ऊपर उठती है।

शरीर वहीं रहता है, लेकिन चेतना की स्थिति बदल जाती है।


7. पृथ्वी और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का उदाहरण

पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण चंद्रमा की तुलना में बहुत अधिक है।

उदाहरण के लिए, यदि पृथ्वी पर किसी व्यक्ति का वजन लगभग 60 किलो है, तो चंद्रमा पर वही व्यक्ति लगभग 6 किलो के बराबर महसूस होगा।

इस उदाहरण का आध्यात्मिक संकेत यह है कि—

आकर्षण बदलने से अनुभव बदल जाता है।

इसी प्रकार जब आत्मा स्थूल देह और स्थूल संसार के आकर्षण से ऊपर उठती है, तो उसे हल्कापन अनुभव होता है।

यहाँ विज्ञान केवल एक उदाहरण है; वास्तविक आध्यात्मिक शिक्षा है—

आत्मा को स्थूल आकर्षणों से ऊपर उठाकर आत्मिक चेतना में स्थित करना।


8. विज्ञान और ध्यान में अंतर

रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में जाने वाले व्यक्ति का पृथ्वी से संपर्क बनाए रखने के लिए तकनीकी व्यवस्था आवश्यक होती है।

लेकिन ध्यान की यात्रा में स्थिति अलग है।

आत्मा—

  • शरीर को छोड़े बिना,
  • मन को एकाग्र करके,
  • स्मृति के द्वारा,
  • चेतना को सूक्ष्म स्थिति में ले जा सकती है।

इसलिए यह यात्रा बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि अंतर्मुखी चेतना और याद से संबंधित है।


9. प्रकाश की ऊँची पहाड़ी का अद्भुत दृश्य

बाबा ने एक दृश्य दिखाया।

एक बहुत ऊँची, प्रकाशमय पहाड़ी थी।

उस पहाड़ी के नीचे—

शक्ति सेना और पांडव दल

स्थित थे।

ऊपर बाबा खड़े थे।

ब्रह्मा बाबा और शिव बाबा दोनों का अनुभव वहाँ था। शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के आकार में, लेकिन बिना स्थूल शरीर के अनुभव किए गए।

नीचे खड़े सभी लोग ऊपर देखने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन जैसे ऊपर देख नहीं पा रहे थे।

उनके भीतर बाबा को देखने की तीव्र तड़प थी।


10. आकाशवाणी — शक्तियों और पांडवों द्वारा कल्याण

कुछ समय बाद आकाशवाणी जैसी आवाज सुनाई दी:

“शक्तियों और पांडवों द्वारा ही कल्याण होना है।”

यह वाक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसमें बच्चों को अपनी जिम्मेदारी का बोध कराया गया है।

केवल बाबा को देखना या बाबा से अनुभव लेना पर्याप्त नहीं है।

अब बच्चों को स्वयं—

  • शक्ति बनना है,
  • पांडव बनना है,
  • सेवा करनी है,
  • दूसरों का कल्याण करना है,
  • और बाबा के कार्य को आगे बढ़ाना है।

11. अव्यक्त बाबा के साक्षात्कार और बच्चों की भावनाएँ

इसके बाद अनेक शक्तियों और पांडवों को अव्यक्त ब्रह्मा बाबा और शिव बाबा के साक्षात्कार होने लगे।

किसी के चेहरे पर हँसी थी।

कोई बाबा को पकड़ने का प्रयास कर रहा था।

कोई प्रेम में आँसू बहा रहा था।

अर्थात् प्रत्येक आत्मा का अनुभव उसकी अपनी भावना और स्थिति के अनुसार अलग था।

लेकिन सभी शक्तियाँ एक तेजस्वी रूप में स्थित दिखाई दीं।

यह दृश्य प्रेम, शक्ति, तड़प और आत्मिक अनुभव का संगम था।


12. अंत समय की देही-अभिमानी स्थिति

इस दृश्य के बाद बाबा ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भविष्य की स्थिति समझाई।

उन्होंने कहा कि अंत समय में बच्चों का यह व्यक्त शरीर भी बिल्कुल स्थिर हो जाएगा।

अभी पुराने हिसाब-किताब और संस्कारों के कारण शरीर अपनी ओर आकर्षित करता है।

इसलिए—

  • शरीर की ओर ध्यान जाता है,
  • मन में अनेक विचार आते हैं,
  • परिस्थितियाँ प्रभावित करती हैं,
  • पुरानी प्रवृत्तियाँ हलचल पैदा करती हैं।

लेकिन अंत में स्थिति ऐसी होगी कि—

न मन में हलचल होगी, न तन में।

यही देही-अभिमानी स्थिति की सिद्धि है।


13. मन की हलचल का वास्तविक अर्थ

मन की हलचल का अर्थ केवल चिंता या परेशानी नहीं है।

मन में अनेक प्रकार के विचारों का लगातार आना भी मन की हलचल है।

उदाहरण:

  • यह क्या होगा?
  • ऐसा क्यों हुआ?
  • आगे क्या होगा?
  • उसने ऐसा क्यों किया?
  • मुझे यह क्यों नहीं मिला?
  • मुझे यह कब मिलेगा?
  • मेरे साथ ऐसा ही क्यों होता है?

जब मन लगातार प्रश्नों, इच्छाओं, प्रतिक्रियाओं और कल्पनाओं में चलता रहता है, तब आत्मा स्थिर नहीं रहती।

इसलिए बाबा की शिक्षा है—

मन को विचारों की भीड़ से निकालकर आत्मिक स्मृति में स्थित करो।


14. देही-अभिमानी सिद्धि की पहचान

देही-अभिमानी सिद्धि केवल यह कह देने से नहीं आती कि “मैं आत्मा हूँ।”

इसकी वास्तविक पहचान व्यवहार में दिखाई देती है।

देही-अभिमानी आत्मा—

  1. परिस्थितियों में स्थिर रहती है।
  2. शरीर की अवस्था से अत्यधिक प्रभावित नहीं होती।
  3. अनावश्यक इच्छाओं को कम करती है।
  4. गुणों से संपन्न रहती है।
  5. मन की हलचल को समाप्त करने का पुरुषार्थ करती है।
  6. बाबा की याद को प्राथमिकता देती है।
  7. सेवा करते हुए भी अपनी आंतरिक स्थिति को नहीं खोती।

15. सेवा और देही-अभिमान — दोनों का संतुलन

बाबा ने विशेष रूप से कहा कि बच्चों का ध्यान जितना सर्विस पर है, उतना ही इस मुख्य बात पर भी होना चाहिए कि—

“देही-अभिमानी बनना है।”

यह बहुत गहरी शिक्षा है।

केवल सेवा में व्यस्त रहना पर्याप्त नहीं है।

यदि सेवा करते समय—

  • अहंकार आ जाए,
  • नाम-मान की इच्छा हो,
  • दूसरों से तुलना हो,
  • सफलता-असफलता मन को प्रभावित करे,
  • प्रशंसा की इच्छा हो,

तो सेवा के साथ देह-अभिमान जुड़ सकता है।

इसलिए वास्तविक सफलता है:

सेवा भी हो और आत्मिक स्थिति भी बनी रहे।


16. इस संदेश का केंद्रीय सूत्र

पूरे संदेश को एक सूत्र में समेटें तो शिक्षा है:

“हलचल से स्थिरता की ओर, देह-अभिमान से देही-अभिमान की ओर।”

बाहरी परिस्थिति कैसी भी हो—

मन स्थिर।

शरीर की स्थिति कैसी भी हो—

चेतना आत्मिक।

सेवा कितनी भी हो—

अभिमान रहित।

पुराने संस्कार कितने भी हों—

परिवर्तन का पुरुषार्थ जारी।

और बाबा से संबंध कितना भी गहरा हो—

उस संबंध की पहचान अपने जीवन में शक्ति और कल्याण के रूप में दिखाई दे।


17. आज के जीवन के लिए व्यावहारिक अभ्यास

इस संदेश को केवल सुनना नहीं, जीवन में उतारना है।

सुबह का अभ्यास

कुछ मिनट शांत होकर स्वयं से कहें:

“मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ।
मैं इस शरीर का मालिक हूँ, शरीर नहीं।
मैं बाबा की संतान हूँ।
मुझे मन की हलचल को समाप्त करना है।”

दिन में अभ्यास

जब मन में बहुत विचार चलें, तुरंत रुकें और पूछें:

“मैं अभी देह-अभिमान में हूँ या देही-अभिमान में?”

सेवा के समय

अपने आप से पूछें:

“मैं सेवा कर रहा हूँ या सेवा के साथ अपना नाम और मान भी खोज रहा हूँ?”

रात को

दिन का निरीक्षण करें:

  • कहाँ मन अशांत हुआ?
  • किस बात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया?
  • कहाँ देह-अभिमान आया?
  • कहाँ आत्मिक स्थिति बनी रही?
  • कल किस संस्कार पर विशेष पुरुषार्थ करना है?

18. पूरे संदेश का सार

18 जनवरी 1969 के इस प्रथम अव्यक्त संदेश का मूल संदेश अत्यंत स्पष्ट है—

बाबा का साकार शरीर सामने न होते हुए भी बाबा की शिक्षा और शक्ति समाप्त नहीं होती।

अब बच्चों को बाहरी सहारे से आगे बढ़कर अपनी आंतरिक शक्ति विकसित करनी है।

हमें—

तन की हलचल समाप्त करनी है।
मन की हलचल समाप्त करनी है।
देह-अभिमान समाप्त करना है।
देही-अभिमानी स्थिति प्राप्त करनी है।
पुराने संस्कारों को परिवर्तन करना है।
सेवा के साथ आत्मिक स्थिति बनाए रखनी है।
और शक्ति-पांडव बनकर विश्व-कल्याण का कार्य करना है।

अंतिम स्मृति-वाक्य

“जितना सर्विस पर ध्यान है, उतना ही देही-अभिमानी बनने पर भी ध्यान रहे।”

यही इस प्रथम अव्यक्त संदेश की सबसे बड़ी प्रेरणा है।


लघु प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. अव्यक्त संदेशों का आरंभ किस महत्वपूर्ण घटना के बाद हुआ?

उत्तर: ब्रह्मा बाबा के 18 जनवरी 1969 को साकार शरीर छोड़कर अव्यक्त होने के बाद।

प्रश्न 2. अव्यक्त संदेश किस माध्यम से प्राप्त होने लगे?

उत्तर: दादी गुलजार के माध्यम से।

प्रश्न 3. दादी गुलजार ने संदेश प्राप्त करने की स्थिति को कैसे बताया?

उत्तर: उन्होंने अनुभव किया कि बाबा उनकी डोर खींच लेते हैं और वे सूक्ष्म अवस्था में पहुँच जाती हैं।

प्रश्न 4. प्रथम अव्यक्त संदेश क्या था?

उत्तर: “तन और मन की हलचल समाप्त कर देही-अभिमानी बनो।”

प्रश्न 5. देही-अभिमानी का अर्थ क्या है?

उत्तर: स्वयं को शरीर न मानकर शरीर को चलाने वाली आत्मा समझना।

प्रश्न 6. ब्रह्मा बाबा की आत्मा में कौन-से संस्कार बताए गए?

उत्तर: 84 जन्मों के चक्कर लगाने के संस्कार।

प्रश्न 7. सूक्ष्म वतन जाने को किस वैज्ञानिक उदाहरण से समझाया गया?

उत्तर: रॉकेट द्वारा पृथ्वी से दूर जाने और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कम होने के उदाहरण से।

प्रश्न 8. पृथ्वी पर 60 किलो वजन चंद्रमा पर लगभग कितना होगा?

उत्तर: लगभग 6 किलो, क्योंकि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में लगभग दसवाँ भाग है।

प्रश्न 9. ध्यान और विज्ञान की यात्रा में क्या अंतर बताया गया?

उत्तर: विज्ञान में शरीर को बाहरी साधनों से अंतरिक्ष की ओर ले जाया जाता है, जबकि ध्यान में शरीर को वहीं रखते हुए आत्मा की चेतना स्थूल आकर्षण से ऊपर उठती है।

प्रश्न 10. बाबा ने किस प्रकार की पहाड़ी का दृश्य दिखाया?

उत्तर: एक बहुत ऊँची प्रकाशमय पहाड़ी का।

प्रश्न 11. पहाड़ी के नीचे कौन स्थित थे?

उत्तर: शक्ति सेना और पांडव दल।

प्रश्न 12. पहाड़ी के ऊपर कौन दिखाई दिए?

उत्तर: शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा।

प्रश्न 13. आकाशवाणी में क्या संदेश दिया गया?

उत्तर: “शक्तियों और पांडवों द्वारा ही कल्याण होना है।”

प्रश्न 14. अव्यक्त बाबा के साक्षात्कार से बच्चों में कैसी भावनाएँ दिखाई दीं?

उत्तर: कोई हँस रहा था, कोई बाबा को पकड़ने का प्रयास कर रहा था और कोई प्रेम में आँसू बहा रहा था।

प्रश्न 15. अंत समय में शरीर की कैसी स्थिति बताई गई?

उत्तर: शरीर बिल्कुल स्थिर और शांत हो जाएगा।

प्रश्न 16. मन की हलचल किसे कहा गया?

उत्तर: मन में अनेक प्रकार के विचारों का लगातार आना।

प्रश्न 17. देही-अभिमानी सिद्धि की पहचान क्या है?

उत्तर: तन और मन की हलचल समाप्त होकर आत्मा का स्थिर, शांत और गुण-संपन्न स्थिति में रहना।

प्रश्न 18. अभी शरीर आत्मा को अपनी ओर क्यों खींचता है?

उत्तर: पुराने हिसाब-किताब और संस्कारों के कारण।

प्रश्न 19. बाबा ने बच्चों को किस बात का पुरुषार्थ करने को कहा?

उत्तर: अभी से देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करने को।

प्रश्न 20. सेवा के साथ किस बात पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए?

उत्तर: देही-अभिमानी स्थिति बनाने पर।

प्रश्न 21. क्या केवल सेवा करना ही पर्याप्त है?

उत्तर: नहीं। सेवा के साथ आत्मिक स्थिति और देही-अभिमान भी आवश्यक है।

प्रश्न 22. देही-अभिमानी आत्मा की एक मुख्य पहचान क्या है?

उत्तर: परिस्थितियों में भी मन की स्थिरता बनाए रखना।

प्रश्न 23. इस संदेश का सबसे बड़ा आध्यात्मिक परिवर्तन क्या है?

उत्तर: देह-अभिमान और मन की हलचल से निकलकर देही-अभिमानी और शांत स्थिति में आना।

प्रश्न 24. “शक्तियाँ और पांडव” बनने का क्या संकेत है?

उत्तर: स्वयं में शक्ति धारण करके सेवा और विश्व-कल्याण का निमित्त बनना।

प्रश्न 25. 18 जनवरी 1969 के प्रथम अव्यक्त संदेश का एक वाक्य में सार क्या है?

उत्तर: “तन-मन की हलचल समाप्त करो, देही-अभिमानी बनो और सेवा के साथ आत्मिक स्थिति को शक्तिशाली बनाओ।”

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