| 02-11-2026 | प्रात:मुरलीओम् शान्ति“बापदादा”‘ | मधुबन |
| “मीठे बच्चे – तुम यहाँ अपनी राजाई तकदीर बनाने आये हो, जितना याद में रहेंगे, पढ़ाई पर ध्यान देंगे उतना तकदीर श्रेष्ठ बनती जायेगी” | |
| प्रश्नः- | संगम पर किस श्रीमत का पालन कर 21 जन्मों के लिए तुम अपनी तकदीर श्रेष्ठ बना लेते हो? |
| उत्तर:- | संगम पर बाप की श्रीमत है – मीठे बच्चे निर्विकारी बनो। देही-अभिमानी बनने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करो। कभी कोई पाप कर्म नहीं करना तो 21 जन्मों के लिए तकदीर श्रेष्ठ बन जायेगी। |
| गीत:- | तकदीर जगाकर आई हूँ… |
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने यह गीत सुना। अब इन दो लाइन का अर्थ जिन्होंने समझा वह हाथ उठायें? यह किसने कहा – तकदीर जगाकर आई हूँ? आत्मा ने। सभी की आत्मा कहती है – मैं तकदीर बनाकर आयी हूँ, कौन सी तकदीर? नई दुनिया में जाने की तकदीर। नई दुनिया है स्वर्ग। यह पुरानी दुनिया है नर्क। तो यह सब आत्मायें कहती हैं। आत्मा को तो शरीर जरूर चाहिए तब तो बोले। जीव की आत्मायें कहती हैं हम आये हैं स्कूल में तकदीर बनाने। पढ़ाने वाला कौन है? शिवबाबा ज्ञान का सागर। मनुष्य को देवता अथवा पतित को पावन, नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाने वाला वह एक बाप ही है। इस नर्क को आग लगनी है। दुनिया में ऐसा कोई स्कूल नहीं जहाँ बच्चे कहें कि हम बेहद के बाप के पास आये हैं अथवा ऐसा भी कोई नहीं जो कहे मैं बाप भी हूँ, टीचर भी हूँ, गुरू भी हूँ। यह ब्रह्मा भी नहीं कह सकते हैं। एक शिवबाबा ही कहते हैं – मैं सभी का बाप, टीचर, गुरू हूँ। वही बैठ पढ़ाते हैं। तो अब बच्चों को तकदीर बनानी है। बच्चे कहते हैं हम आये हैं नई दुनिया के राजधानी की तकदीर बनाने। हमको मालूम है कि यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। बाप आकर नई दुनिया स्थापन करते हैं। तुम 21 जन्मों का राज्य-भाग्य लेने पढ़ते हो। गोया तुम राजाई तकदीर बनाने आये हो। यहाँ राजयोग सीख रहे हो। यह गीत तो भल उन नाटक वालों का बनाया हुआ है परन्तु इसका अर्थ फिर समझाया जाता है। जैसे बाप सभी वेदों, शास्त्रों का सार बैठ समझाते हैं। इस समय सारी दुनिया में है भक्ति। सतयुग में भक्ति, मन्दिर आदि होते नहीं। तुमने आधाकल्प भक्ति की है, अब तो भगवान मिल गया है। पहले-पहले भारत में इन देवी देवताओं का राज्य था, फिर 84 जन्म लेते-लेते तकदीर बिगड़ गई है। अब फिर से तकदीर बनाते हैं। बाप आये ही है तकदीर बनाने। बच्चों को कहते हैं मुझे याद करो। तुम बहुत ही पाप आत्मा बन पड़े हो। पहले-पहले भक्ति की जाती है शिवबाबा की, वह है अव्यभिचारी भक्ति। फिर भक्ति भी व्यभिचारी हो जाती है। तो बच्चों को पहले-पहले यह निश्चय होना चाहिए कि जिसको भगवान कहा जाता है वह हमको पढ़ाते हैं। उनको कोई शरीर है नहीं, वह इस शरीर में बैठ बोलते हैं। जैसे तुम्हारी आत्मा इस शरीर में आने से बोलने लगती है। कभी-कभी मनुष्य मर जाते हैं, फिर जब शमशान में ले जाते हैं तो आधे में चुरपुर करने लग पड़ते हैं। ऐसे आत्मा चली गई फिर आई, नहीं। आत्मा बिल्कुल सूक्ष्म है ना, तो कहाँ छिप गई। ऐसे कहेंगे अनकॉन्सेस हो गई, किसको पता नहीं पड़ा। ऐसे कभी-कभी हो जाता है। चिता से भी जाग पड़ते हैं, फिर उनको उठा लेते हैं। तो यह क्या हुआ? आत्मा कहाँ छिप गई। फिर अपने ठिकाने आ गई। आत्मा नहीं है तो शरीर एकदम मुर्दा हो जाता है। तो आत्माओं का देश है परमधाम। तुम जानते हो हम वहाँ उस घर के रहने वाले थे। पहले-पहले हम आत्मा घर से आये सतयुग में। भारतवासी जो देवी-देवता थे, वही आये होंगे। वास्तव में जो-जो धर्म स्थापन करते हैं, पिछाड़ी तक कायम रहते हैं। बुद्ध का धर्म कायम है, क्राइस्ट का धर्म कायम है। सिर्फ देवी-देवता धर्म वाले जो राज्य करते थे उनका नाम ही गुम है। कोई भी नहीं है जो अपने को देवी-देवता धर्म का कहता हो।
बाप समझाते हैं भारतवासी अपने धर्म को भूल गये हैं, हमारा गृहस्थ धर्म पवित्र था। सम्पूर्ण निर्विकारी, महाराजा-महारानी का राज्य था। उन्हों को कहते हैं भगवती लक्ष्मी और भगवान नारायण। वास्तव में भगवान एक है, उनको ही ज्ञान सागर कहा जाता है। इन लक्ष्मी-नारायण में तो कोई ज्ञान है नहीं। ज्ञान का सागर एक ही शिवबाबा है। वह बैठ तुम बच्चों को ज्ञान देते हैं। तुम अभी पढ़ रहे हो, यह पढ़ाई फिर वहाँ भूल जायेंगे। अभी तुम हर एक समझते हो हमारी आत्मा में 84 जन्मों का रिकार्ड भरा हुआ है। आत्मा अभी नॉलेज ले रही है। फिर सतयुग में जाकर अपना राज्य भाग्य करेगी। तुम कहेंगे हमने 84 का चक्र लगाया। अब बाबा से हम स्वर्ग की बादशाही ले रहे हैं। हर एक उस दादे से वर्सा लेते हैं, परन्तु अपने-अपने पुरुषार्थ अनुसार। इसमें कोई हिस्सा बाँटा नहीं जाता है। अज्ञान काल में बाँटा जाता है ना। बेहद का बाप कहते हैं हम वैकुण्ठ स्थापन करते हैं। उसमें ऊंच मर्तबा पाना, वह है तुम्हारे पुरुषार्थ पर मदार। जितना बाप को याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। पवित्र बनेंगे। सोना को भट्ठी में डालते हैं ना। तो उनसे खाद निकल सच्चे सोने की डल्ली बन जाती है। यह आत्मा भी सच्चा सोना थी, यहाँ पार्ट बजाने आती है। पहले है गोल्डन एजड फिर पहले चांदी की खाद पड़ी। आत्मा थोड़ी इमप्योर बन जाती है तो फिर आहिस्ते-आहिस्ते थोड़ा घटती जाती है। मकान भी पहले नया फिर आहिस्ते-आहिस्ते पुराना होता जाता है। 100 वर्ष के बाद कहेंगे पुराना। वैसे दुनिया भी नई और पुरानी होती है। आज से 5 हजार वर्ष पहले नई थी, इन देवी-देवताओं का राज्य जो था – वह कहाँ गया? 84 जन्म भोगते-भोगते पुराना हो गया। आत्मा भी मैली, तो शरीर भी मैला हो गया। गोरे से साँवरे हो गये। श्रीकृष्ण को भी गोरा और साँवरा दिखाते हैं ना। टाँग नर्क तरफ, मुँह स्वर्ग तरफ दिखाना है। तुम भी उस कुल के हो। तुम्हारी भी टाँग नर्क तरफ मुँह स्वर्ग तरफ है। अभी तुम पहले निर्वाणधाम में जाकर फिर स्वर्ग में आयेंगे। कलियुग को आग लग जायेगी। मूसलाधार बरसात, आग, अर्थक्वेक आदि होगी। पतित आत्मायें सब हिसाब-किताब चुक्तू कर घर चली जायेंगी। बाकी थोड़े बचेंगे। पवित्र आत्मायें आती जायेंगी। अभी तो सब हैं काँटे। काम कटारी चलाना, यह काँटा लगाना है। यहाँ तो बाप कहते हैं कि सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है। बाप कहते हैं – मुझे याद करो तो मैं तुमको स्वर्ग का वर्सा दूँगा, तुम पवित्र बन जायेंगे। तुम पावन थे तो गृहस्थ व्यवहार भी पवित्र था। अभी तुम पतित बने हो तो गृहस्थ व्यवहार भी अपवित्र, विकारी है। सतयुग में व्यवहार धन्धा भी सच्चा चलता है। वहाँ झूठ आदि बोलने की दरकार नहीं रहती, झूठ तब बोला जाता है जब बहुत पैसे कमाने का लोभ होता है। वहाँ तो अथाह पैसे मिलते हैं। अनाज आदि का कोई दाम नहीं रहता। वहाँ कोई गरीब होता ही नहीं, जो अच्छा पुरुषार्थ करेंगे वह महाराजा बनेंगे। हीरे जवाहरों के महल मिलेंगे। पुरुषार्थ पूरा नहीं करेंगे तो प्रजा में चले जायेंगे। राजा-रानी फिर प्रिन्स-प्रिन्सेज सारा घराना होता है ना। फिर प्रजा में भी नम्बरवार साहूकार और गरीब प्रजा होती है। वहाँ तो सब पवित्र होंगे। राजा-रानी, वजीर भी एक। वहाँ कोई बहुत वजीर नहीं रहते। राजा में ताकत रहती है राज्य चलाने की। तो जैसे बाप समझाते हैं तो बच्चों को भी समझाना चाहिए। हम भारतवासी देवी-देवता थे। सतयुग में हमारा राज्य था। गृहस्थ व्यवहार में हम पवित्र थे, स्वर्गवासी थे फिर पतित बनते-बनते नर्कवासी बने हैं फिर स्वर्गवासी बनते हैं। यह खेल बना हुआ है। स्वर्गवासी एक जन्म में बन जायेंगे फिर नर्कवासी बनने में 84 जन्म लेने पड़ेंगे। सीढ़ी में बड़ा क्लीयर दिखाया हुआ है। अभी बुद्धि में आया है कि हम जाकर स्वर्ग में राज्य करेंगे। अभी बाप से वर्सा ले रहे हैं। बाप ही सत्य बताकर नर से नारायण बनाते हैं। वे लोग जो सत्य नारायण की कथा सुनते हैं वह कोई नर से नारायण बनते नहीं। तो वह कथा झूठी हुई ना। यहाँ तुम बैठे ही हो नर से नारायण बनने के लिए, वह ऐसे थोड़ेही कहते कि पवित्र बनो, मामेकम् याद करो। सत्य-नारायण की कथा पूर्णमासी के दिन सुनाते हैं। अब इस समय पूर्णमासी कहा जाता है 16 कला चन्द्रमा को। जब पिछाड़ी होती है तब चन्द्रमा की लकीर जाकर रहती है, जिसको अमावस कहते हैं। अमावस माना अन्धियारी रात। सतयुग त्रेता को दिन, द्वापर कलियुग को रात कहा जाता है। यह सब प्वाइंट समझने की हैं। यह शिवबाबा बैठ पढ़ाते हैं। वह बाप भी है, टीचर भी है और गुरू भी है। इनमें प्रवेश कर आत्माओं को पढ़ाते हैं।
बाप कहते हैं जैसे इनकी आत्मा भ्रकुटी के बीच में बैठी है, मैं भी आकर यहाँ बैठता हूँ। तुमको बैठ समझाता हूँ। तुम पहले पावन थे फिर पतित बने हो। अब मुझ बाप को याद करो, पवित्र बनने बिगर घर वापिस जा नहीं सकते। पवित्र बनेंगे तब उड़ेंगे। सब पुकारते भी हैं हे पतित-पावन आओ, पावन बनाओ, तब हम उड़ें। अपने घर मुक्तिधाम में जायें। वह है हम आत्माओं का घर। पतित घर जा नहीं सकते। जो अच्छी रीति शिक्षा को धारण करेंगे तो जल्दी स्वर्ग में आयेंगे, नहीं तो देरी से आयेंगे। नये मकान में आना चाहिए ना। नये मकान में मजा है ना। पहले-पहले सतयुग में आना चाहिए। मम्मा बाबा सतयुग में जाते हैं, हम फिर देरी से क्यों जाये! तुम भी फॉलो करो ब्रह्मा को। बाप को याद करते रहो। कोई बात में तकलीफ होती है तो शिवबाबा से पूछो। श्रीमत से ही श्रेष्ठ बनेंगे। पुरानी दुनिया में तो पाँच विकारों रूपी रावण की मत पर चलते आये हो। पहले-पहले है देह-अभिमान। अभी तुम बच्चों को देही-अभिमानी बनना है। मैं आत्मा परमधाम की रहने वाली हूँ, उनको शान्तिधाम कहा जाता है। ऐसी-ऐसी बातें दूसरा कोई समझा न सके। बाप ही समझाते हैं, तुम्हारी आत्मा इन आरगन्स से सुनती है, सतयुग में कभी शरीर खराब होता ही नहीं। यहाँ तो बैठे-बैठे अकाले मृत्यु हो जाती है। सतयुग में ऐसी कोई बात होती नहीं, उसको कहा ही जाता है हेविन, स्वर्ग, पैराडाइज। फिर हम चक्र लगाकर पुनर्जन्म लेते-लेते 84 का चक्र पूरा किया है, फिर बाप आकर बच्चों को स्वर्ग का लायक बनाते हैं। अभी तुम नयी दुनिया के लायक बने हो। अभी तो नर्क है। अभी तुम आये हो नर्कवासी से स्वर्गवासी बनने की तकदीर बनाने। कहते हैं हम शिवबाबा के पास आये हैं तकदीर बनाने। कल्प-कल्प हर 5 हजार वर्ष बाद हम तकदीर बनाते हैं। हम स्वर्गवासी बनते हैं फिर रावण राज्य शुरू होने से हम विकारी बन जाते हैं। अभी सब विकारी पतित हैं तब आप आकर नई दुनिया स्थापन करते हैं। नई दुनिया में सिर्फ तुम बच्चे ही होंगे। बाकी सब शान्तिधाम में चले जायेंगे। ऊपर में आत्माओं का झाड़ है। फिर अपने-अपने समय पर आयेंगे। जब हमारा राज्य होगा तो वहाँ और धर्म वाले होंगे नहीं। फिर द्वापर में रावण राज्य शुरू होगा। यह सब बातें अच्छी रीति धारण करनी हैं। यहाँ नर्कवासी से स्वर्गवासी बनना है। नर्कवासी मनुष्य को असुर और स्वर्गवासी मनुष्य को देवता कहा जाता है। अब सभी आसुरी स्वभाव वाले हैं। अब बाप बैठ पुरुषार्थ कराते हैं। बाप कहते हैं पवित्र बनो। हर बात में पूछते रहो। कोई पूछते हैं कि बाबा धन्धे में झूठ बोलना पड़ता है, झूठ बोलने से थोड़ा पाप बनेगा। वह फिर बाप को याद करते रहेंगे तो पाप कट जायेंगे। आजकल की दुनिया में सब पाप करते रहते हैं। कितनी रिश्वत खाते रहते हैं। यह प्रदर्शनी का चित्र मैप्स हैं, ऐसे मैप्स कहाँ होते नहीं। अगर कोई देखकर कॉपी करके बनाये भी, परन्तु उनका अर्थ कुछ भी समझ नहीं सकेंगे। प्रदर्शनी मेले में तो बहुत आते हैं। कहा जाता है 7 रोज़ लिए समझने आओ तो तुम स्वर्गवासी बनने लायक बन जायेंगे। अभी नर्कवासी हो, सीढ़ी में देखो कितना क्लीयर है। यह है पतित दुनिया, पावन दुनिया ऊपर खड़ी है।
अभी तुम बच्चे शिवबाबा से प्रॉमिस करते हो बाबा हम नर्कवासी से स्वर्गवासी जरूर बनेंगे। अभी तुम तैयारी कर रहे हो शिवालय में जाने के लिए, इसलिए विकार में कभी नहीं जाना है। तूफान तो माया के बहुत आयेंगे परन्तु नंगन (पतित) नहीं होना है। पतित होने से बड़ी खता (भूल) हो जायेगी फिर धर्मराज की बहुत बड़ी सजा खानी पड़ेगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) मनुष्य से देवता बनने के लिए जो भी आसुरी स्वभाव है, झूठ बोलने की आदत है, उसका त्याग करना है। दैवी स्वभाव धारण करना है।
2) घर चलने के लिए पवित्र जरूर बनना है। माया के तूफान आते भी कर्मेन्द्रियों से कभी कोई विकर्म नहीं करना है।
| वरदान:- | अधिकारी पन की स्थिति द्वारा बाप को अपना साथी बनाने वाले सदा विजयी भव बाप को साथी बनाने का सहज तरीका है – अधिकारी पन की स्थिति। जब अधिकारी पन की स्थिति में स्थित रहते हो तब व्यर्थ संकल्प वा अशुद्ध संकल्पों की हलचल में वा अनेक रसों में बुद्धि डगमग नहीं होती। बुद्धि की एकाग्रता द्वारा सामना करने, परखने व निर्णय करने की शक्ति आ जाती है, जो सहज ही माया के अनेक प्रकार के वार से विजयी बना देती है। |
| स्लोगन:- | राजयोगी वह हैं जो सेकण्ड में सार से विस्तार और विस्तार से सार में जाने के अभ्यासी हैं। |
ये अव्यक्त इशारे – ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव करो
ब्रह्मा बाप ने सम्पूर्ण बनने के लिए अपने सर्व खजाने आदि से अन्तिम दिन तक सफल किये, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखा – सम्पूर्ण फरिश्ता बन गये। तो लक्ष्य रखो मुझे बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना ही है। कुछ भी पुरुषार्थ करना पड़े लेकिन निश्चित है कि बाप समान बनना ही है।
मुरली मंथन–90
02 नवम्बर 2026 | प्रातः मुरली
आज का मुख्य विषय
अपनी राजाई तकदीर बनाने के लिए याद और पवित्रता का पुरुषार्थ करो!
उपशीर्षक: देही-अभिमानी बनो, श्रीमत पर चलो और कोई भी विकर्म न करो — तभी 21 जन्मों के लिए श्रेष्ठ भाग्य बना सकेंगे।
- आज की मुरली का मूल संदेश
आज बाबा समझाते हैं कि हम यहाँ केवल सामान्य पढ़ाई करने नहीं, बल्कि नई दुनिया की राजधानी में श्रेष्ठ पद पाने की तकदीर बनाने आये हैं। इस पढ़ाई को पढ़ाने वाले स्वयं शिवबाबा हैं, जो बाप, टीचर और सतगुरु हैं।
मुरली का मुख्य सूत्र है:
“जितना याद में रहेंगे, पढ़ाई पर ध्यान देंगे उतना तकदीर श्रेष्ठ बनती जायेगी।”
2. मुख्य बिंदु एवं शीर्षक
- हम राजाई तकदीर बनाने आये हैं
- हमारा लक्ष्य नई दुनिया में श्रेष्ठ राज्य-भाग्य प्राप्त करना है।
- पुरुषार्थ के अनुसार हर आत्मा अपना पद प्राप्त करेगी।
- केवल सुनना नहीं, पढ़ाई को जीवन में धारण करना है।
- बाप की श्रीमत — निर्विकारी बनो
- संगम पर बाबा की मुख्य श्रीमत है — पवित्र बनो।
- देह-अभिमान छोड़ देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।
- कोई भी पाप कर्म या विकर्म नहीं करना है।
- याद से विकर्म विनाश होते हैं
- जितना बाप को याद करेंगे, उतना आत्मा पवित्र बनती जायेगी।
- जैसे सोने को भट्ठी में डालने से खाद निकलती है, वैसे याद से आत्मा की अशुद्धियाँ समाप्त होती हैं।
- याद और पवित्रता दोनों का अभ्यास आवश्यक है।
- शिवबाबा ही बाप, टीचर और सतगुरु हैं
- शिवबाबा ज्ञान सागर हैं और हमें पढ़ाते हैं।
- यह ज्ञान आत्मा अपने शरीर के कर्मेन्द्रियों द्वारा सुनती है।
- पढ़ाने वाले के प्रति निश्चय रखकर पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है।
- ब्रह्मा बाप को फॉलो करो
- बाबा कहते हैं कि ब्रह्मा बाप को फॉलो करो।
- किसी भी परिस्थिति में श्रीमत लेकर चलना है।
- कोई समस्या हो तो बाबा से पूछकर श्रेष्ठ निर्णय लेना है।
- आसुरी स्वभाव और झूठ का त्याग करो
- झूठ बोलना, लोभ और विकारी व्यवहार आसुरी स्वभाव हैं।
- मनुष्य से देवता बनने के लिए दैवी गुण धारण करने हैं।
- सत्यता और पवित्रता को अपने व्यवहार में लाना है।
- माया के तूफानों में भी कर्मेन्द्रियों को वश में रखो
- माया के तूफान आ सकते हैं, लेकिन उनके वश होकर विकर्म नहीं करना है।
- पवित्रता के संकल्प में दृढ़ रहना है।
- अपने लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटना है।
- अधिकारीपन की स्थिति से माया पर विजय
- स्वयं को आत्मा और बाप के वर्से का अधिकारी समझो।
- व्यर्थ और अशुद्ध संकल्पों से बुद्धि को डगमगाने नहीं देना है।
- एकाग्रता से सामना करने, परखने और निर्णय करने की शक्ति आती है।
- बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनो
- अपने समय, संकल्प और सभी खजानों को सफल करना है।
- अन्तिम लक्ष्य ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना है।
- पुरुषार्थ में दृढ़ निश्चय रखो।
- राजयोगी की पहचान
- सार से विस्तार और विस्तार से सार में सेकण्ड में जाने का अभ्यास हो।
- आवश्यक बात को समझना और अनावश्यक विस्तार से बचना — यही राजयोगी की विशेषता है।
उपरोक्त बिंदु 02-11-2026 की अपलोड की गई प्रातः मुरली के आधार पर संक्षेप में व्यवस्थित किए गए हैं।
- अन्य मुरलियों से आज की एक मुख्य शिक्षा का संबंध
चुना गया विषय: पवित्रता द्वारा श्रेष्ठ भाग्य का अधिकारी बनना।
आज की मुरली में बाबा स्पष्ट कहते हैं कि संगम पर निर्विकारी बनने और देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करने से 21 जन्मों के लिए श्रेष्ठ तकदीर बनती है।
इसी विषय से संबंधित एक पुरानी अव्यक्त मुरली:
- दिनांक: 04 दिसम्बर 1995
- शीर्षक: “यथार्थ निश्चय के फाउण्डेशन द्वारा सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करो” Brahma Kumaris Murli Portal+1
दोनों मुरलियों का विषयगत संबंध: 02 नवम्बर 2026 की मुरली में पवित्रता को श्रेष्ठ तकदीर बनाने की श्रीमत बताया गया है। 04 दिसम्बर 1995 की मुरली का शीर्षक भी निश्चय के आधार पर सम्पूर्ण पवित्रता धारण करने पर केंद्रित है। इस प्रकार दोनों में पवित्रता को आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है।
ध्यान दें: यह तुलना आधिकारिक मुरली पोर्टल पर उपलब्ध दिनांक और शीर्षक के आधार पर विषयगत तुलना है; 1995 की मुरली का पूरा पाठ यहाँ उद्धृत नहीं किया जा रहा है।
4. छोटे प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1. हम संगम पर किस उद्देश्य से आये हैं?
उत्तर: नई दुनिया की राजधानी में श्रेष्ठ राज्य-भाग्य बनाने।
प्रश्न 2. श्रेष्ठ तकदीर बनाने का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर: बाप की याद, पढ़ाई पर ध्यान और पवित्रता।
प्रश्न 3. संगम पर बाबा की मुख्य श्रीमत क्या है?
उत्तर: निर्विकारी बनो और देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।
प्रश्न 4. याद से आत्मा को क्या प्राप्ति होती है?
उत्तर: विकर्म विनाश होते हैं और आत्मा पवित्र बनती है।
प्रश्न 5. शिवबाबा के तीन स्वरूप कौन-से हैं?
उत्तर: बाप, टीचर और सतगुरु।
प्रश्न 6. बाबा किसे फॉलो करने की शिक्षा देते हैं?
उत्तर: ब्रह्मा बाप को।
प्रश्न 7. मनुष्य से देवता बनने के लिए क्या त्यागना है?
उत्तर: आसुरी स्वभाव, झूठ बोलने की आदत और विकर्म।
प्रश्न 8. माया के तूफान आने पर क्या करना है?
उत्तर: कर्मेन्द्रियों को वश में रखकर कोई विकर्म नहीं करना है।
प्रश्न 9. अधिकारीपन की स्थिति से क्या शक्ति मिलती है?
उत्तर: एकाग्रता, सामना करने, परखने और निर्णय करने की शक्ति।
प्रश्न 10. ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए क्या करना है?
उत्तर: अपने सभी खजानों को सफल कर सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना है।
प्रश्न 11. राजयोगी की विशेष पहचान क्या है?
उत्तर: सेकण्ड में सार से विस्तार और विस्तार से सार में जाने का अभ्यास।
5. आज का विशेष मंथन
प्रश्न: क्या मैं वास्तव में अपनी श्रेष्ठ तकदीर बनाने के लिए पुरुषार्थ कर रहा हूँ, या केवल ज्ञान सुनकर संतुष्ट हो जाता हूँ?
अपने आप से तीन प्रश्न पूछें:
- क्या मेरे संकल्प, बोल और कर्म पवित्रता के अनुरूप हैं?
- क्या माया के तूफान आने पर भी मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहता हूँ?
- क्या मेरा हर दिन बाप की याद और पढ़ाई में प्रगति कर रहा है?
आज का संकल्प:
“मैं आत्मा हूँ, परमधाम की निवासी हूँ। मैं देह-अभिमान छोड़ देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करूँगा। बाप की श्रीमत पर चलूँगा, किसी भी परिस्थिति में विकर्म नहीं करूँगा और अपनी श्रेष्ठ तकदीर बनाने के लिए प्रतिदिन याद और पढ़ाई में आगे बढ़ूँगा।”
6. आज का वरदान
अधिकारीपन की स्थिति द्वारा बाप को अपना साथी बनाने वाले सदा विजयी भव।
बाप को साथी बनाने के लिए अधिकारीपन की स्थिति में रहना है। व्यर्थ और अशुद्ध संकल्पों की हलचल में बुद्धि को डगमग नहीं होने देना है। एकाग्रता से माया पर विजय प्राप्त करनी है।
7. आज का स्लोगन
“राजयोगी वह हैं जो सेकण्ड में सार से विस्तार और विस्तार से सार में जाने के अभ्यासी हैं।”
8. आज की मुरली का निष्कर्ष
श्रेष्ठ तकदीर केवल इच्छा करने से नहीं बनती, बल्कि श्रेष्ठ पुरुषार्थ से बनती है। याद, पढ़ाई, पवित्रता और श्रीमत पर चलना — यही आज की मुरली का मुख्य संदेश है। हमें केवल स्वर्ग की तकदीर बनाने की बात नहीं करनी, बल्कि अपने वर्तमान जीवन को भी पवित्र और श्रेष्ठ बनाना है।
9. डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति 02 नवम्बर 2026 की प्रातः मुरली पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन और चिंतन है। मुख्य बिंदु, प्रश्नोत्तर और निष्कर्ष मूल मुरली की शिक्षाओं का सरल संक्षेप हैं। अन्य मुरली से तुलना के लिए आधिकारिक ब्रह्माकुमारीज़ मुरली पोर्टल पर उपलब्ध दिनांक और शीर्षक का संदर्भ लिया गया है। यह तुलना विषयगत है, किसी अन्य मुरली का शब्दशः उद्धरण नहीं। इसका उद्देश्य किसी धर्म, मत या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं, बल्कि मुरली की शिक्षाओं को समझना और जीवन में धारण करना है।
स्रोत: 02-11-2026 प्रातः मुरली — विशेष रूप से प्रश्न-उत्तर, धारणा, वरदान, स्लोगन और अव्यक्त इशारा। Pasted markdown.md
अन्य मुरली का संदर्भ: 04-12-1995 — ब्रह्माकुमारीज़ आधिकारिक मुरली पोर्टल।
📝 90. साकार मुरली | 02-11-2026
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
मुरली रिसर्च एवं मंथन — Om Shanti AI
Research linked to WordPress Post ID: 1691
मुख्य विषय
आत्मा और परमात्मा का स्वरूप — समानता एवं भिन्नता
मुख्य प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न: आत्मा और परमात्मा दोनों को बिन्दु स्वरूप कहा जाता है, तो दोनों में क्या समानता और क्या भिन्नता है?
उत्तर: दोनों चेतन, निराकार और बिन्दु स्वरूप हैं। लेकिन आत्मा और परमात्मा के गुण, भूमिका तथा कर्तव्य समान नहीं हैं। इस प्रश्न का विस्तृत उत्तर अन्य मुरलियों के प्रमाणों से भी जाँचना है।
मुख्य शिक्षाएँ
मुख्य शिक्षाएँ
1. आत्मा का स्वरूप और परमात्मा का स्वरूप।
2. आत्मा और परमात्मा की समानता।
3. दोनों की भूमिका और कर्तव्य में अंतर।
4. परमात्मा का ज्ञान सागर स्वरूप।
5. परमात्मा और आत्मा के अनादि संबंध का अध्ययन।
मूल उद्धरण एवं प्रमाण
शोध निष्कर्ष
अभी अंतिम निष्कर्ष निर्धारित नहीं किया गया है। दोनों के बिन्दु स्वरूप की समानता को उनके गुणों और भूमिका की समानता नहीं मानना चाहिए। इसके लिए अन्य मुरलियों से प्रमाण एकत्र करना आवश्यक है।
