31 December 1970 | हिंदी · “अमृतवेले से परिवर्तन शक्ति का प्रयोग”
“अमृतवेले से परिवर्तन शक्ति का प्रयोग”
आज बापदादा वर्तमान और भविष्य दोनों काल के राज्य अधिकारी अर्थात् विश्व-कल्याणकारी और विश्व के राज्य अधिकारी दोनों ही रूप में बच्चों को देख रहे हैं। जितना-जितना विश्व-कल्याणकारी उतना ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं। इन दोनों अधिकारों को प्राप्त करने के लिए विशेष स्व परिवर्तन की शक्ति चाहिए। उस दिन भी सुनाया था कि परिवर्तन शक्ति को अमृतवेले से लेकर रात तक कैसे कार्य में लगाओ।
पहला परिवर्तन – आंख खुलते ही मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, यह है आदि समय का आदि परिवर्तन संकल्प, इसी आदि संकल्प के साथ सारे दिन की दिनचर्या का आधार है। अगर आदि संकल्प में परिवर्तन नहीं हुआ तो सारा दिन स्वराज्य वा विश्व-कल्याण में सफल नहीं हो सकेंगे। आदि समय से परिवर्तन शक्ति कार्य में लाओ। जैसे सृष्टि को आदि में ब्रह्म से देव-आत्मा सतोप्रधान आत्मा पार्ट में आयेगी, ऐसे हर रोज़ अमृतवेला आदिकाल है। इसलिए इस आदिकाल के समय भी उठते ही पहला संकल्प याद में ब्राह्मण आत्मा पधारे – बाप से मिलन मनाने के लिए। यही समर्थ संकल्प, श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ बोल, श्रेष्ठ कर्म का आधार बन जायेगा। पहला परिवर्तन -‘मैं कौन!’ तो यही फाउन्डेशन परिवर्तन शक्ति का आधार है। इसके बाद –
दूसरा परिवर्तन ‘मैं किसका हूँ’ सर्व सम्बन्ध किससे हैं! सर्व प्राप्तियां किससे हैं! पहले देह का परिवर्तन फिर देह के सम्बन्ध का परिवर्तन, फिर सम्बन्ध के आधार पर प्राप्तियों का परिवर्तन – इस परिवर्तन को ही सहज याद कहा जाता है। तो आदि में परिवर्तन शक्ति के आधार पर अधिकारी बन सकते हो।
अमृतवेले के बाद अपने देह के कार्यक्रम करते हुए कौन-से परिवर्तन की आवश्यकता है? जिससे निरन्तर सहजयोगी बन जायेंगे। सदा यह संकल्प रखो – ‘कि मैं चैतन्य सर्वश्रेष्ठ मूर्ति हूँ और यह मन्दिर है, चैतन्य मूर्ति का यह देह चैतन्य मन्दिर है। मन्दिर को सजा रहे हैं। इस मन्दिर के अन्दर स्वयं बापदादा की प्रिय मूर्ति विराजमान है। जिस मूर्ति के गुणों की माला स्वयं बापदादा सिमरण करते हैं। जिस मूर्ति की महिमा स्वयं बाप करते हैं। ऐसी विशेष मूर्ति का विशेष मन्दिर है।’ जितनी मूर्ति वैल्यूबुल होती है मूर्ति के आधार पर मन्दिर की भी वैल्यू होती है। तो परिवर्तन क्या करना है? मेरा शरीर नहीं लेकिन बापदादा की वैल्यूबुल मूर्ति का यह मन्दिर है। स्वयं ही मूर्ति स्वयं ही मन्दिर का ट्रस्टी बन मन्दिर को सजाते रहो। इस परिवर्तन संकल्प के आधार पर मेरापन अर्थात् देहभान परिवर्तन हो जायेगा। इसके बाद – अपना गॉडली स्टूडेन्ट रूप सदा स्मृति में रहे। इसमें विशेष परिवर्तन संकल्प कौन-सा चाहिए? जिससे हर सेकेण्ड की पढाई हर अमूल्य बोल की धारणा से हर सेकेण्ड वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ प्रालब्ध बन जाए। इसमें सदा यह परिवर्तन संकल्प चाहिए कि मैं साधारण स्टूडेन्ट नहीं, साधारण पढ़ाई नहीं लेकिन डायरेक्ट बाप रोज दूरदेश से हमको पढ़ाने आते हैं। भगवान के वर्शंस हमारी पढ़ाई है। श्री-श्री की श्रीमत् हमारी पढ़ाई है, जिस पढ़ाई का हर बोल पद्मों की कमाई जमा कराने वाला है। अगर एक बोल भी धारण नहीं किया तो बोल मिस नहीं किया लेकिन पद्मों की कमाई अनेक जन्मों की श्रेष्ठ प्रालब्ध वा श्रेष्ठ पद के प्राप्ति में कमी की। ऐसा परिवर्तन संकल्प ‘भगवान बोल रहे हैं’, हम सुन रहे हैं। मेरे लिए बाप टीचर बनकर आये हैं। मैं स्पेशल लाडला स्टूडेन्ट हूँ – इसलिए मेरे लिए आये हैं। कहाँ से आये हैं, कौन आये हैं, और क्या पढ़ा रहा है? यही परिवर्तन श्रेष्ठ संकल्प रोज़ क्लास के समय धारण कर पढ़ाई करो। साधारण क्लास नहीं, सुनाने वाले व्यक्ति को नहीं देखो। लेकिन बोलने वाले बोल किसके हैं, उसको सामने देखो। व्यक्त में अव्यक्त बाप और निराकारी बाप को देखो। तो समझा – क्या परिवर्तन करना है। आगे चलो – पढ़ाई भी पढ ली – अभी क्या करना है? अभी सेवा का पार्ट आया। सेवा में किसी भी प्रकार की सेवा चाहे प्रवृत्ति की, चाहे व्यवहार की, चाहे ईश्वरीय सेवा, प्रवृत्ति चाहे लौकिक सम्बन्ध हो, कर्मबन्धन के आधार से सम्बन्ध हो लेकिन प्रवृत्ति में सेवा करते परिवर्तन संकल्प यही करो – मरजीवा जन्म हुआ अर्थात् लौकिक कर्मबन्धन समाप्त हुआ। कर्मबन्धन समझकर नहीं चलो। कर्मबन्धन, कर्मबन्धन सोचने और कहने से ही बन्ध जाते हो। लेकिन यह लौकिक कर्मबन्धन का सम्बन्ध अब मरजीवे जन्म के कारण श्रीमत् के आधार पर सेवा के सम्बन्ध का आधार है। कर्मबन्धन नहीं, सेवा का सम्बन्ध है। सेवा के सम्बन्ध में वैरायटी प्रकार की आत्माओं का ज्ञान धारण कर, सेवा का सम्बन्ध समझ करके चलेंगे तो बन्धन में तंग नहीं होंगे। लेकिन अति पाप आत्मा, अति अपकारी आत्मा, बगुले के ऊपर भी नफरत नहीं, घृणा नहीं, निरादर नहीं लेकिन विश्व-कल्याणकारी स्थिति में स्थित हो रहमदिल बन तरस की भावना रखते हुए सेवा का सम्बन्ध समझकर सेवा करेंगे और जितने ही होपलेस केस की सेवा करेंगे तो उतने ही प्राइज़ के अधिकारी बनेंगे। नामीग्रामी विश्व-कल्याणकारी गाये जायेंगे। पीस-मेकर की प्राइज़ लेंगे। तो प्रवृत्ति में कर्मबन्धन के बजाए सेवा का सम्बन्घ है – यह परिवर्तन संकल्प करो। लेकिन सेवा करते-करते अटैचमेंट में नहीं आ जाना। कभी डॉक्टर भी पेशेन्ट की अटैचमेंट में आ जाते हैं।
सेवा का सम्बन्ध अर्थात् त्याग और तपस्वी रूप। सच्ची सेवा के लक्षण यही त्याग और तपस्या है। ऐसे ही व्यवहार में भी डायरेक्शन प्रमाण निमित्त मात्र शरीर निर्वाह लेकिन मूल आधार आत्मा का निर्वाह, शरीर निर्वाह के पीछे आत्मा का निर्वाह भूल नहीं जाना चाहिए। व्यवहार करते शरीर निर्वाह और आत्म निर्वाह दोनों का बैलेन्स हो। नहीं तो व्यवहार माया जाल बन जायेगा। ऐसी जाल जो जितना बढ़ाते जायेंगे उतना फंसते जायेंगे। धन की वृद्धि करते हुए भी याद की विधि भूलनी नहीं चाहिए। याद की विधि और धन की वृद्धि दोनों साथ-साथ होना चाहिए। धन की वृद्धि के पीछे विधि को छोड़ नहीं देना है। इसको कहा जाता है लौकिक स्थूल कर्म भी कर्मयोगी की स्टेज में परिवर्तन करो। सिर्फ कर्म करने वाले नहीं लेकिन कर्मयोगी हो। कर्म अर्थात् व्यवहार योग अर्थात् परमार्थ। परमार्थ अर्थात् परमपिता की सेवा अर्थ कर रहे हैं। तो व्यवहार और परमार्थ दोनों साथ-साथ रहे। इसको कहा जाता है श्रीमत् पर चलने वाले कर्मयोगी। व्यवहार के समय परिवर्तन क्या करना है? मैं सिर्फ व्यवहारी नहीं लेकिन व्यवहारी और परमार्थी अर्थात जो कर रहा हूँ वह ईश्वरीय सेवा अर्थ कर रहा हूँ। व्यवहारी और परमार्थी कम्बाइंड हूँ। यही परिवर्तन संकल्प सदा स्मृति में रहे तो मन और तन डबल कमाई करते रहेंगे। स्थूल धन भी आता रहेगा। और मन से अविनाशी धन भी जमा होता रहेगा। एक ही तन द्वारा एक ही समय मन और धन की डबल कमाई होती रहेगी। तो सदा यह याद रहे कि डबल कमाई करने वाला हूँ। इस ईश्वरीय सेवा में सदा निमित्त मात्र का मंत्र वा करनहार की स्मृति का संकल्प सदा याद रहे। करावनहार भूले नहीं। तो सेवा में सदा निर्माण ही निर्माण करते रहेंगे। अच्छा…।
और आगे चलो, आगे चल अनेक प्रकार के व्यक्ति और वैभव अनेक प्रकार की वस्तुओं से सम्पर्क करते हो। इसमें भी सदा व्यक्ति में व्यक्त भाव के बजाए आत्मिक भाव धारण करो। वस्तुओं वा वैभवों में अनासक्त भाव धारण करो तो वैभव और वस्तु अनासक्त के आगे दासी के रूप में होगी और आसक्त भाव वाले के आगे चुम्बक की तरह फंसाने वाली होगी। जो छुड़ाना चाहो तो भी छूट नहीं सकते। इसलिए व्यक्ति और वैभव में आत्म भाव और अनासक्त भाव का परिवर्तन करो।
और आगे चलो – कोई भी पुरानी दुनिया के आकर्षणमय दृश्य अल्पकाल के सुख के साधन यूज करते हो वा देखते हो तो उन साधनों वा दृश्य को देख कहाँ-कहाँ साधना को भूल साधन में आ जाते हो। साधनों के वशीभूत हो जाते हो। साधनों के आधार पर साधना – ऐसे समझो जैसे रेत के फाउन्डेशन के ऊपर बिल्डिंग खड़ी कर रहे हो। उसका क्या हाल होगा? बार-बार हलचल में डगमग होंगे। गिरा कि गिरा यही हालत होगी। इसलिए यही परिवर्तन करो कि साधन विनाशी और साधना अविनाशी। विनाशी साधन के आधार पर अविनाशी साधना हो नहीं सकती। साधन निमित्त मात्र हैं, साधना निर्माण का आधार है। तो साधन को महत्व नहीं दो साधना को महत्व दो। तो सदा ये समझो कि मैं सिद्धि स्वरूप हूँ न कि साधन स्वरूप। साधना सिद्धि को प्राप्त करायेगी। साधनों की आकर्षण में सिद्धि स्वरूप को नहीं भूल जाओ। हर लौकिक चीज़ को देख, लौकिक बातों को सुन, लौकिक दृश्य को देख, लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करो अर्थात् ज्ञान-स्वरूप हो हर बात से ज्ञान उठाओ। बात में नहीं जाओ, ज्ञान में जाओ तो समझा, क्या परिवर्तन करना है। अच्छा…।
और आगे चलो – अभी बाकी क्या रह गया! अभी सोना रह गया। सोना अर्थात् सोने की दुनिया में सोना। सोने को भी परिवर्तन करो। बेड पर नहीं सोओ। लेकिन कहाँ सोयेंगे। बाप के याद की गोदी में सोयेंगे। फरिश्तों की दुनिया में स्वत्नों में सैर करो तो स्वप्न भी परिवर्तन करो और सोना भी परिवर्तन करो। आदि से अन्त तक परिवर्तन करो। समझा – कैसे परिवर्तन शक्ति यूज करो।
इस नये वर्ष की सौगात परिवर्तन शक्ति की सौगात है। स्व परिवर्तन और विश्व परिवर्तन इसी गिफ्ट की लिफ्ट से विश्व के परिवर्तन का समय समीप लायेंगे। नये साल की मुबारक तो सब देते हैं लेकिन बापदादा नये वर्ष में सदा तीव्र पुरुषार्थी बनने की नवीनता की इन-एडवांस मुबारक दे रहे हैं। नया वर्ष, नये संस्कार, नया स्वभाव, नया उमंग उत्साह, विश्व को नया बनाने का श्रेष्ठ संकल्प, सर्व को मुक्ति जीवनमुक्ति का वरदान देने का सदा श्रेष्ठ संकल्प ऐसे नवीनता की मुबारक हो, बधाई हो। पुराने संस्कारों, पुरानी चाल, पुरानी ढाल, पुराने की विदाई की बधाई हो। अच्छा…।
ऐसे हर कर्म में परिवर्तन शक्ति द्वारा स्व परिवर्तन और विश्व परिवर्तन करने वाले, हर सेकेण्ड, हर संकल्प हर कर्म नया अर्थात् गोल्डन एज करने वाले श्रेष्ठ अर्थात् सतोप्रधान करने वाले, नये वर्ष में स्व में और विश्व में नया चमत्कार दिखाने वाले जो अब तक असम्भव समझ रहे हैं स्व के प्रति वा विश्व के प्रति, उस असम्भव को सहज सम्भव करने वाले, ऐसे सदा सफलतामूर्त श्रेष्ठ सिद्धि स्वरूप आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
31 दिसम्बर 1970 | हिंदी
अमृतवेले से परिवर्तन शक्ति का प्रयोग
प्रस्तावना
इस अव्यक्त मुरली में बापदादा बच्चों को परिवर्तन शक्ति का प्रयोग अमृतवेले से लेकर रात तक करने की विधि समझाते हैं। विश्व-कल्याणकारी बनने और विश्व के राज्य अधिकारी बनने के लिए पहले स्वयं में परिवर्तन करना आवश्यक है।
यह परिवर्तन केवल विचारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्मृति, सम्बन्ध, प्राप्ति, दिनचर्या, पढ़ाई, सेवा, व्यवहार, व्यक्ति, वैभव, साधन और यहाँ तक कि सोने की विधि तक में दिखाई देना चाहिए।
बापदादा की विशेष प्रेरणा है कि हर आत्मा पुराने संस्कारों और पुरानी चाल को बदलकर नये संस्कार, नया स्वभाव और नया उमंग-उत्साह धारण करे।
1. स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन
बापदादा बच्चों को वर्तमान और भविष्य दोनों काल के राज्य अधिकारी के रूप में देखते हैं। वर्तमान में विश्व-कल्याणकारी और भविष्य में विश्व के राज्य अधिकारी बनने के लिए विशेष रूप से स्व-परिवर्तन की शक्ति चाहिए।
जितना स्वयं विश्व-कल्याणकारी बनेंगे, उतना ही विश्व के राज्य अधिकारी बनेंगे। इसलिए विश्व-परिवर्तन की शुरुआत स्वयं के परिवर्तन से होती है।
मुख्य शिक्षा: पहले स्वयं को बदलना है, तभी विश्व-परिवर्तन में निमित्त बन सकेंगे।
2. पहला परिवर्तन — मैं कौन हूँ?
दिन का पहला परिवर्तन आँख खुलते ही करना है। पहला संकल्प होना चाहिए—“मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।”
बापदादा बताते हैं कि अमृतवेला प्रतिदिन का आदिकाल है। जैसे सृष्टि के आदि में आत्माएँ अपने श्रेष्ठ दैवी स्वरूप में आईं, वैसे ही हर दिन अमृतवेले उठते ही अपनी ब्राह्मण आत्मा की स्मृति में आना है।
यह समर्थ संकल्प ही पूरे दिन के श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ बोल और श्रेष्ठ कर्म का आधार बनेगा।
यदि पहला संकल्प ही श्रेष्ठ नहीं होगा, तो दिनभर स्वराज्य और विश्व-कल्याण में सफलता प्राप्त करना कठिन होगा।
मुख्य शिक्षा: आँख खुलते ही आत्मिक स्मृति में स्थित होना है।
3. दूसरा परिवर्तन — मैं किसका हूँ?
पहले देह की स्मृति का परिवर्तन करना है, फिर देह के सम्बन्धों की स्मृति का और उसके बाद प्राप्तियों की स्मृति का।
स्वयं से पूछना है—
- मैं किसका हूँ?
- मेरे सर्व सम्बन्ध किससे हैं?
- मेरी सर्व प्राप्तियाँ किससे हैं?
जब आत्मा अपने सर्व सम्बन्ध और प्राप्तियों का आधार बाप को बनाती है, तब सहज याद की स्थिति बनती है।
मुख्य शिक्षा: आत्मिक पहचान के बाद अपने सर्व सम्बन्ध और प्राप्तियों का आधार बाप को बनाना है।
4. देह को चैतन्य मन्दिर समझना
अमृतवेले के बाद दैनिक कार्य करते समय भी परिवर्तन शक्ति का प्रयोग करना है।
संकल्प रखना है—मैं चैतन्य सर्वश्रेष्ठ मूर्ति हूँ और यह देह चैतन्य मन्दिर है। इस मन्दिर में बापदादा की प्रिय मूर्ति विराजमान है। इसलिए इस मन्दिर की सम्भाल और सजावट करनी है।
जैसे मूर्ति की वैल्यू के आधार पर मन्दिर की वैल्यू होती है, वैसे ही आत्मा के श्रेष्ठ स्वरूप की स्मृति से देह के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है।
अपने को शरीर का मालिक समझकर देहभान में नहीं आना है, बल्कि स्वयं को इस मन्दिर का ट्रस्टी समझकर इसकी सम्भाल करनी है।
मुख्य शिक्षा: मेरा शरीर नहीं, यह श्रेष्ठ आत्मा का चैतन्य मन्दिर है।
5. गॉडली स्टूडेन्ट की स्मृति
पढ़ाई के समय अपने गॉडली स्टूडेन्ट रूप को सदा स्मृति में रखना है।
संकल्प करना है कि मैं साधारण स्टूडेन्ट नहीं हूँ। स्वयं भगवान टीचर बनकर मुझे पढ़ाने आते हैं। भगवान के वर्शंस और श्री-श्री की श्रीमत् मेरी पढ़ाई है।
पढ़ाई का प्रत्येक बोल अमूल्य है। यदि एक बोल भी धारण नहीं किया, तो केवल बोल नहीं छूटा, बल्कि अनेक जन्मों की श्रेष्ठ प्रालब्ध और श्रेष्ठ पद की प्राप्ति में कमी रह सकती है।
इसलिए क्लास में केवल सुनाने वाले व्यक्ति को नहीं देखना है, बल्कि यह समझना है कि बोल किसके हैं। व्यक्त में अव्यक्त बाप और निराकारी बाप को सामने रखकर पढ़ाई करनी है।
मुख्य शिक्षा: भगवान को टीचर समझकर हर बोल को जीवन में धारण करना है।
6. लौकिक सम्बन्ध को सेवा का सम्बन्ध बनाना
पढ़ाई के बाद सेवा का पार्ट आता है। प्रवृत्ति, व्यवहार और ईश्वरीय सेवा—सभी में परिवर्तन संकल्प आवश्यक है।
बापदादा समझाते हैं कि मरजीवा जन्म लेने के बाद लौकिक कर्मबन्धन को ही आधार बनाकर नहीं चलना है। श्रीमत् के आधार पर लौकिक सम्बन्धों को सेवा का सम्बन्ध समझना है।
जब सम्बन्ध को कर्मबन्धन समझते हैं, तो बन्धन की भावना बढ़ सकती है। लेकिन उसे सेवा का सम्बन्ध समझकर चलने से अनेक प्रकार की आत्माओं को समझने और उनकी सेवा करने की शक्ति आती है।
अति पाप आत्मा या अति अपकारी आत्मा के प्रति भी नफरत, घृणा और निरादर नहीं रखना है। विश्व-कल्याणकारी स्थिति में रहमदिल बनकर सेवा करनी है।
बापदादा बताते हैं कि जितने होपलेस केस की सेवा करेंगे, उतने ही प्राइज़ के अधिकारी बनेंगे।
मुख्य शिक्षा: सम्बन्धों में बन्धन की भावना के बजाय सेवा की भावना रखनी है।
7. सेवा में त्याग और तपस्या
सेवा का सम्बन्ध त्याग और तपस्वी रूप का प्रतीक होना चाहिए। सच्ची सेवा के लक्षण त्याग और तपस्या हैं।
सेवा करते समय किसी व्यक्ति के प्रति अटैचमेंट में नहीं आना है। बापदादा उदाहरण देते हैं कि कभी-कभी डॉक्टर भी अपने पेशेन्ट के प्रति अटैचमेंट में आ जाते हैं।
इसी प्रकार सेवा करते हुए आत्मा को अपनी श्रेष्ठ स्थिति में रहना है। सेवा का उद्देश्य कल्याण करना है, न कि किसी व्यक्ति के मोह में बँध जाना।
मुख्य शिक्षा: सेवा करो, लेकिन अटैचमेंट में नहीं आओ।
8. व्यवहार और परमार्थ का सन्तुलन
व्यवहार करते समय केवल शरीर का निर्वाह नहीं, बल्कि आत्मा का निर्वाह भी याद रखना है।
स्थूल व्यवहार और आत्मिक उन्नति दोनों में सन्तुलन होना चाहिए। यदि व्यवहार के विस्तार में आत्मिक उन्नति भूल जाएँ, तो वही व्यवहार माया का जाल बन सकता है।
धन की वृद्धि करते हुए याद की विधि नहीं भूलनी है। धन की वृद्धि और याद की विधि दोनों साथ-साथ चलें।
लौकिक कर्मों को कर्मयोगी की स्टेज में बदलना है। केवल कर्म करने वाला नहीं, बल्कि कर्मयोगी बनना है।
मुख्य शिक्षा: व्यवहार करते हुए आत्मिक उन्नति और परमपिता की याद का सन्तुलन रखना है।
9. व्यवहारी और परमार्थी — दोनों साथ-साथ
बापदादा विशेष परिवर्तन संकल्प देते हैं—
“मैं सिर्फ व्यवहारी नहीं, लेकिन व्यवहारी और परमार्थी कम्बाइंड हूँ।”
जो भी कर्म कर रहे हैं, उसे ईश्वरीय सेवा के अर्थ में करना है। इस स्मृति से तन और मन दोनों की डबल कमाई होती रहेगी।
स्थूल धन भी आता रहेगा और मन से अविनाशी धन भी जमा होता रहेगा। एक ही तन द्वारा, एक ही समय में, मन और धन की डबल कमाई सम्भव है।
सेवा करते समय स्वयं को निमित्त मात्र समझना है और करनहार के बजाय करावनहार को नहीं भूलना है। जब करावनहार की स्मृति रहेगी, तब सेवा में निर्माण ही निर्माण होता रहेगा।
मुख्य शिक्षा: हर कर्म को व्यवहार और परमार्थ दोनों का माध्यम बनाना है।
10. व्यक्ति में आत्मिक भाव और वैभव में अनासक्त भाव
अनेक प्रकार के व्यक्तियों और वैभवों से सम्पर्क होता है। इस समय व्यक्ति में व्यक्त भाव के बजाय आत्मिक भाव धारण करना है।
व्यक्ति को केवल उसके बाहरी रूप या व्यवहार से नहीं देखना है, बल्कि आत्मिक भाव से देखना है।
वस्तुओं और वैभवों में अनासक्त भाव रखना है। अनासक्त आत्मा के लिए वैभव दासी के समान होता है, लेकिन आसक्त भाव वाले के लिए वही वैभव चुम्बक की तरह बाँधने वाला बन सकता है।
मुख्य शिक्षा: व्यक्तियों में आत्मिक भाव और वस्तुओं में अनासक्त भाव रखना है।
11. साधन नहीं, साधना को महत्व देना
पुरानी दुनिया के आकर्षक दृश्य और अल्पकाल के सुख के साधन कभी-कभी आत्मा को साधना से दूर कर देते हैं। साधनों के वशीभूत होकर साधना को भूल जाना उचित नहीं है।
बापदादा समझाते हैं कि साधनों के आधार पर साधना करना ऐसा है जैसे रेत की नींव पर इमारत खड़ी करना। ऐसी इमारत बार-बार डगमगाएगी।
इसलिए परिवर्तन करना है—
- साधन विनाशी हैं।
- साधना अविनाशी है।
- साधन निमित्त मात्र हैं।
- साधना सिद्धि प्राप्त कराने का आधार है।
हर लौकिक चीज़, बात या दृश्य से ज्ञान लेना है। बात में नहीं जाना, ज्ञान में जाना है।
मुख्य शिक्षा: साधनों की आकर्षण में सिद्धि स्वरूप को नहीं भूलना है।
12. सिद्धि स्वरूप बनना
बापदादा कहते हैं कि अपने को साधन स्वरूप नहीं, बल्कि सिद्धि स्वरूप समझना है।
साधनों का उपयोग आवश्यकता के अनुसार करना है, लेकिन अपनी साधना को उनके अधीन नहीं करना है। जब साधना को महत्व देंगे, तब साधन आत्मा को बाँधने के बजाय उसके कार्य में सहायक बनेंगे।
लौकिक बातों को ज्ञान के आधार पर अलौकिक दृष्टिकोण में बदलना है। हर परिस्थिति से ज्ञान ग्रहण करना है।
मुख्य शिक्षा: साधनों का उपयोग करो, लेकिन अपनी साधना और श्रेष्ठ स्थिति को सर्वोपरि रखो।
13. सोने की विधि में भी परिवर्तन
बापदादा कहते हैं कि दिनभर के पुरुषार्थ के बाद सोने की विधि में भी परिवर्तन करना है।
सोना अर्थात् सोने की दुनिया में सोना। बाप की याद की गोदी में सोने की भावना रखनी है। फरिश्तों की दुनिया में स्वप्नों में सैर करने की बात कही गई है।
अर्थात् दिन के आरम्भ से अन्त तक परिवर्तन शक्ति का प्रयोग करना है। केवल जागते समय ही नहीं, बल्कि सोने से पहले भी श्रेष्ठ स्मृति रखनी है।
मुख्य शिक्षा: दिन का अन्त भी बाप की याद और श्रेष्ठ संकल्पों में करना है।
14. नये वर्ष की सौगात — परिवर्तन शक्ति
बापदादा नये वर्ष की विशेष सौगात के रूप में परिवर्तन शक्ति देते हैं।
स्व-परिवर्तन और विश्व-परिवर्तन इसी शक्ति के आधार पर आगे बढ़ते हैं। नये वर्ष में नवीनता लानी है—नये संस्कार, नया स्वभाव, नया उमंग-उत्साह और विश्व को नया बनाने का श्रेष्ठ संकल्प।
साथ ही सभी को मुक्ति और जीवनमुक्ति का वरदान देने का श्रेष्ठ संकल्प रखना है।
पुराने संस्कारों, पुरानी चाल और पुरानी ढाल को विदाई देकर नवीनता धारण करनी है।
मुख्य शिक्षा: नये वर्ष में केवल तारीख नहीं, अपने संस्कार और स्वभाव भी नये बनाने हैं।
15. हर कर्म में परिवर्तन शक्ति का प्रयोग
बापदादा की प्रेरणा है कि हर सेकण्ड, हर संकल्प और हर कर्म को नया अर्थात् गोल्डन एज के समान श्रेष्ठ और सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ करना है।
स्वयं के प्रति और विश्व के प्रति जो परिवर्तन असम्भव लगता है, उसे दृढ़ संकल्प और परिवर्तन शक्ति से सहज सम्भव बनाना है।
जब आत्मा स्वयं में परिवर्तन करती है, तो उसके श्रेष्ठ संस्कार, दृष्टि और कर्म विश्व-परिवर्तन में सहयोगी बनते हैं।
मुख्य शिक्षा: स्व-परिवर्तन के द्वारा विश्व-परिवर्तन का निमित्त बनना है।
मुरली पर आधारित 30 छोटे प्रश्न और उत्तर
भाग 1: स्व-परिवर्तन और अमृतवेला
प्रश्न 1. विश्व-कल्याणकारी और विश्व के राज्य अधिकारी बनने के लिए कौन-सी शक्ति चाहिए?
उत्तर: स्व-परिवर्तन की शक्ति।
प्रश्न 2. दिन का पहला परिवर्तन कब करना है?
उत्तर: आँख खुलते ही।
प्रश्न 3. पहला परिवर्तन संकल्प क्या है?
उत्तर: मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।
प्रश्न 4. अमृतवेले को किसके समान बताया गया है?
उत्तर: प्रतिदिन के आदिकाल के समान।
प्रश्न 5. अमृतवेले उठते ही किस स्मृति में आना है?
उत्तर: ब्राह्मण आत्मा की स्मृति में, बाप से मिलन मनाने के लिए।
भाग 2: सम्बन्ध और देह की स्मृति
प्रश्न 6. पहले देह की स्मृति बदलने के बाद क्या बदलना है?
उत्तर: देह के सम्बन्धों और प्राप्तियों की स्मृति।
प्रश्न 7. देह को क्या समझना है?
उत्तर: चैतन्य मूर्ति का चैतन्य मन्दिर।
प्रश्न 8. देह की सम्भाल किस भावना से करनी है?
उत्तर: स्वयं को मन्दिर का ट्रस्टी समझकर।
प्रश्न 9. पढ़ाई के समय अपने को क्या समझना है?
उत्तर: गॉडली स्टूडेन्ट।
प्रश्न 10. पढ़ाई के प्रत्येक बोल को कैसा समझना है?
उत्तर: अमूल्य और श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने वाला।
भाग 3: पढ़ाई और सेवा
प्रश्न 11. क्लास में केवल किसे नहीं देखना है?
उत्तर: सुनाने वाले व्यक्ति को।
प्रश्न 12. लौकिक सम्बन्धों को किस रूप में देखना है?
उत्तर: श्रीमत् के आधार पर सेवा के सम्बन्ध के रूप में।
प्रश्न 13. अपकारी आत्माओं के प्रति कौन-सी भावना नहीं रखनी है?
उत्तर: नफरत, घृणा और निरादर की भावना।
प्रश्न 14. सच्ची सेवा के लक्षण क्या हैं?
उत्तर: त्याग और तपस्या।
प्रश्न 15. सेवा करते समय किससे बचना है?
उत्तर: अटैचमेंट में आने से।
भाग 4: व्यवहार, परमार्थ और कमाई
प्रश्न 16. व्यवहार करते समय किसका निर्वाह नहीं भूलना है?
उत्तर: आत्मा का निर्वाह।
प्रश्न 17. धन की वृद्धि करते हुए किसे नहीं भूलना है?
उत्तर: याद की विधि को।
प्रश्न 18. केवल कर्म करने वाला नहीं, बल्कि क्या बनना है?
उत्तर: कर्मयोगी।
प्रश्न 19. व्यवहारी के साथ और क्या बनना है?
उत्तर: परमार्थी।
प्रश्न 20. डबल कमाई किन दो रूपों में बताई गई है?
उत्तर: स्थूल धन और मन से अविनाशी धन की कमाई।
भाग 5: आत्मिक भाव और अनासक्ति
प्रश्न 21. व्यक्ति में कौन-सा भाव धारण करना है?
उत्तर: आत्मिक भाव।
प्रश्न 22. वस्तुओं और वैभवों में कौन-सा भाव रखना है?
उत्तर: अनासक्त भाव।
प्रश्न 23. साधनों के आधार पर साधना करना किसके समान बताया गया है?
उत्तर: रेत की नींव पर इमारत खड़ी करने के समान।
प्रश्न 24. साधन और साधना में किसे अधिक महत्व देना है?
उत्तर: साधना को।
प्रश्न 25. अपने को साधन स्वरूप नहीं, बल्कि क्या समझना है?
उत्तर: सिद्धि स्वरूप।
भाग 6: सोना और नवीनता
प्रश्न 26. सोने से पहले किसकी याद में सोना है?
उत्तर: बाप की याद में।
प्रश्न 27. नये वर्ष की सौगात क्या है?
उत्तर: परिवर्तन शक्ति की सौगात।
प्रश्न 28. नये वर्ष में किन बातों में नवीनता लानी है?
उत्तर: संस्कार, स्वभाव, उमंग-उत्साह और श्रेष्ठ संकल्प में।
प्रश्न 29. किस परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन का समय समीप आएगा?
उत्तर: स्व-परिवर्तन और परिवर्तन शक्ति के प्रयोग से।
प्रश्न 30. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: अमृतवेले से रात तक हर संकल्प, सम्बन्ध और कर्म में परिवर्तन शक्ति का प्रयोग करना।
स्व-चिंतन के प्रश्न
- क्या आँख खुलते ही मेरा पहला संकल्प आत्मिक स्मृति का होता है?
- क्या मैं अपने सर्व सम्बन्धों और प्राप्तियों का आधार बाप को बनाता हूँ?
- क्या मैं अपने शरीर को चैतन्य मन्दिर समझकर उसकी सम्भाल करता हूँ?
- क्या मैं पढ़ाई के प्रत्येक बोल को अमूल्य समझकर धारण करता हूँ?
- क्या मैं लौकिक सम्बन्धों को कर्मबन्धन के बजाय सेवा का सम्बन्ध समझता हूँ?
- क्या मेरी सेवा में त्याग, तपस्या और रहमदिल भाव है?
- क्या व्यवहार करते हुए मैं आत्मिक उन्नति और याद का सन्तुलन रखता हूँ?
- क्या मैं व्यक्तियों में आत्मिक भाव और वैभवों में अनासक्त भाव रखता हूँ?
- क्या मैं साधनों को महत्व देने के कारण साधना को भूल जाता हूँ?
- क्या मैं पुराने संस्कारों को विदाई देकर नये संस्कार धारण कर रहा हूँ?
निष्कर्ष
31 दिसम्बर 1970 की इस अव्यक्त मुरली का मुख्य संदेश है कि परिवर्तन शक्ति का प्रयोग केवल किसी विशेष समय पर नहीं, बल्कि अमृतवेले से लेकर रात तक करना है।
पहले अपनी आत्मिक पहचान बदलनी है, फिर सम्बन्धों और प्राप्तियों की स्मृति को श्रेष्ठ बनाना है। देह को चैतन्य मन्दिर समझना, भगवान को टीचर मानकर पढ़ाई करना, लौकिक सम्बन्धों को सेवा का सम्बन्ध बनाना, व्यवहार और परमार्थ में सन्तुलन रखना तथा साधनों के आकर्षण से मुक्त रहना—ये सभी परिवर्तन शक्ति के व्यावहारिक रूप हैं।
नये वर्ष की वास्तविक नवीनता पुराने संस्कारों को विदाई देकर नया स्वभाव, नया उमंग-उत्साह और विश्व-कल्याण का श्रेष्ठ संकल्प धारण करने में है।
मुख्य स्मृति-मंत्र
“स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन।”
दैनिक अभ्यास: अमृतवेले से रात तक हर संकल्प, हर सम्बन्ध और हर कर्म में स्वयं से पूछें—“इस समय मुझे कौन-सा श्रेष्ठ परिवर्तन करना है?”
नोट: यह अध्याय आपके द्वारा दिए गए मूल मुरली-पाठ पर आधारित है। प्रश्नोत्तर उसी पाठ की शिक्षाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
📝 85. अव्यक्त मुरली |31 December 1970
20 Questions × 5 Marks = 100 Marks
