79. अव्यक्त मुरली | 1 November 1970

1 November 1970 | हिंदी · “बाप समान बनने की युक्तियां”

“बाप समान बनने की युक्तियां”

आज हिम्मते बच्चे मददे बाप का प्रत्यक्ष सबूत देख रहे हैं। जो गायन है उसका साकार रूप देख रहे हैं। एक कदम बच्चे आगे आते हैं तो हजार गुणा बाप भी कितना दुर से सम्मुख आते हैं। आप कितना माइल से आये हो? बापदादा कितना दूर से आये हैं? ज्यादा स्नेही कौन? बच्चे वा बाप? इसमें भी बाप बच्चों को आगे बढ़ाते हैं। अभी भी इस पुरानी दुनियां में बाप से ज्यादा आकर्षण करने वाली वस्तु क्या है? जब मालूम पड़ गया कि यह पुरानी दुनिया है, सर्व-सम्बन्ध, सर्व-सम्पत्ति, सर्व-पदार्थ अल्पकाल और दिखावा मात्र है। फिर भी धोखा क्यों खाते हो? लिप्त क्यों होते हो? अपने गुप्त स्वरूप और बाप के गुप्त स्वरूप को प्रत्यक्ष करो तब बाप के गुप्त कर्तव्य को प्रत्यक्ष कर सकेंगे। आपका शक्ति स्वरूप प्रख्यात हो जायेगा। अभी गुप्त है। सिर्फ एक शब्द याद रखो तो अपने गुप्त रूप को प्रैक्टिकल में ला सकते हो। वह कौन सा शब्द है? सिर्फ अन्तर शब्द। अन्तर में दोनों रहस्य आ जाते हैं। अन्तर कांट्रास्ट को भी कहा जाता है और अन्तर अंदर को भी कहा जाता है। जैसे कहते हैं अन्तर्मुख वा अन्तर्यामी। तो अन्तर शब्द से दो अर्थ सिद्ध हो जाते हैं। अन्तर शब्द याद आने से एक तो हरेक बात का कान्ट्रास्ट करेंगे कि यह श्रेष्ठ है वा नहीं। दूसरा अन्तर की स्थिति में रहने से वा अन्तर स्वरूप में स्थित होने से आपका गुप्त स्वरूप प्रत्यक्ष हो जायेगा। एक शब्द को याद रखने से जीवन को बदल सकते हो। अभी जैसे समय की रफ्तार चल रही है उसी प्रमाण अभी यह पांव पृथ्वी पर नहीं रहने चाहिए। कौन सा पांव? जिससे याद की यात्रा करते हो। कहावत है ना कि फरिस्तों के पांव पृथ्वी पर नहीं होते। तो अभी यह बुद्धि पृथ्वी अर्थात् प्रकृति के आकर्षण से परे हो जायेगी फिर कोई भी चीज नीचे नहीं ला सकती है। फिर प्रकृति को अधीन करने वाले हो जायेंगे। न कि प्रकृति के अधीन होने वाले। जैसे साईन्स वाले आज प्रयत्न कर रहे हैं, पृथ्वी से परे जाने के लिये। वैसे ही साइलेन्स की शक्ति से इस प्रकृति के आकर्षण से परे, जब चाहें तब आधार लें, न कि प्रकृति जब चाहे तब अधीन कर दे। तो ऐसी स्थिति कहाँ तक बनी है? अभी तो बापदादा साथ चलने के लिये सूक्ष्मवतन में अपना कर्तव्य कर रहे हैं लेकिन यह भी कब तक? जाना तो अपने ही घर में हैं ना। इसलिये अभी जल्दी-जल्दी अपने को ऊपर की स्थिति में स्थित करने का प्रयत्न करो। साथ चलना, साथ रहना और फिर साथ में राज्य करना है ना। साथ कैसे होगा? समान बनने से। समान नहीं बनेंगे तो साथ कैसे होगा। अभी साथ उड़ना है, साथ रहना है। यह स्मृति में रखो तब अपने को जल्दी समान बना सकेंगे। नहीं तो कुछ दूर पड़ जायेंगे। वायदा भी है ना कि साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ ही राज्य करेंगे। सिर्फ राज्य करने समय बाप गुप्त हो जाते हैं। तो साथ कैसे रहेंगे? समान बनने से। समानता कैसे लायेंगे? साकार बाप के समान बनने से। अभी बापदादा कहते हो ना। उनमें समानता कैसे आई? समर्पणता से समानता सेकेण्ड में आई। ऐसे समर्पण करने की शक्ति चाहिए। जब समर्पण कर दिया तो फिर अपना वा अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता। जैसे किसको कोई चीज दी जाती है तो फिर अपना अधिकार और अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता है। अगर अन्य कोई अधिकार रखे भी तो उसको क्या कहेंगे? यह तो मैंने समर्पण कर ली। ऐसे हर वस्तु सर्व समर्पण करने के बाद अपना वा दूसरों का अधिकार रह कैसे सकता है। जब तक अपना वा अन्य का अधिकार रहता है तो इससे सिद्ध है कि सर्व समर्पण में कमी है। इसलिये समानता नहीं आती। जो सोच-सोच कर समर्पण होते हैं उनकी रिज़ल्ट अब भी पुरुषार्थ में वही सोच अर्थात् व्यर्थ संकल्प विघ्न रूप बनते हैं। समझा? अच्छा!

बाप समान

बनने

की युक्तियाँ

इस अव्यक्त मुरली में बापदादा बच्चों को बाप समान बनने की युक्तियाँ समझाते हैं। बाबा कहते हैं कि बच्चे एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो बाप हजार गुणा आगे बढ़कर सहयोग देते हैं। फिर भी पुरानी दुनिया के आकर्षण में फँसने का कारण क्या है? अपने गुप्त स्वरूप और बाप के गुप्त स्वरूप को प्रत्यक्ष कैसे करें? प्रकृति के आकर्षण से परे रहने की स्थिति कैसे बने? बाप के साथ चलने, साथ रहने और साथ राज्य करने के लिए समानता कैसे लाएँ?

इन सभी बातों का उत्तर बाबा ने विशेष रूप से ‘अन्तर’ शब्द, ऊँची स्थिति, समर्पणता और समानता के माध्यम से समझाया है।

 1. हिम्मते बच्चे, मददे बाप

बाबा कहते हैं कि आज बच्चे हिम्मत और बाप की मदद का प्रत्यक्ष सबूत देख रहे हैं। बच्चे एक कदम आगे आते हैं तो बाप हजार गुणा आगे बढ़कर सम्मुख आते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि बाप बच्चों को आगे बढ़ाते हैं। बच्चों को अपनी हिम्मत बनाए रखनी है और बाप की मदद का अनुभव करते हुए पुरुषार्थ में आगे बढ़ना है।

मुख्य शिक्षा:

पहला कदम बच्चे को उठाना है, लेकिन आगे बढ़ाने में बाप की मदद

साथ रहती है।

 2. पुरानी दुनिया के आकर्षण से मुक्त बनो

जब यह मालूम पड़ गया कि पुरानी दुनिया, उसके सम्बन्ध, सम्पत्ति और पदार्थ अल्पकाल के तथा दिखावा मात्र हैं, तो फिर भी धोखा क्यों खाते हैं? उनमें लिप्त क्यों होते हैं?

बाबा समझाते हैं कि जब तक पुरानी दुनिया के आकर्षण में बुद्धि फँसी रहती है, तब तक अपना गुप्त स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं हो सकता। अपने गुप्त स्वरूप और बाप के गुप्त स्वरूप को प्रत्यक्ष करने से बाप के गुप्त कर्तव्य को भी प्रत्यक्ष कर सकेंगे।

मुख्य शिक्षा:

दुनिया के अस्थायी आकर्षण को पहचानकर अपनी बुद्धि को श्रेष्ठ

स्थिति में लगाना है।

 3. ‘अन्तर’ शब्द में छिपी दो युक्तियाँ

बाबा कहते हैं कि केवल एक शब्द याद रखो—अन्तर। इस एक शब्द में दो रहस्य समाए हुए हैं।

 (क) अन्तर अर्थात् Contrast

हर बात का अन्तर करके देखना है कि यह श्रेष्ठ है या नहीं। अपने विचारों, संकल्पों और कर्मों को परखना है कि वे श्रेष्ठ हैं अथवा व्यर्थ।

 (ख) अन्तर अर्थात् अंदर

अन्तर्मुखी और अन्तर्यामी बनने के लिए अपनी आन्तरिक स्थिति में रहना है। जब हम अंदर की स्थिति में स्थित होंगे, तब हमारा गुप्त स्वरूप प्रत्यक्ष होगा।

इस प्रकार ‘अन्तर’ शब्द दोनों कार्य करता है—श्रेष्ठ और साधारण का अन्तर समझाता है तथा अंदर की स्थिति में रहने की स्मृति दिलाता है।

मुख्य शिक्षा: हर बात को परखो और अपनी आन्तरिक स्थिति में स्थित रहो।

 4. बुद्धि को प्रकृति के आकर्षण से परे करो

बाबा कहते हैं कि अब समय की रफ्तार के प्रमाण बुद्धि को पृथ्वी अर्थात् प्रकृति के आकर्षण से परे होना चाहिए।

यहाँ पृथ्वी से परे होने का भाव स्थूल रूप से कहीं उड़कर जाने का नहीं, बल्कि बुद्धि को प्रकृति के आकर्षण से मुक्त करने का है। फरिश्तों के पाँव पृथ्वी पर नहीं होते—इस कहावत के माध्यम से बाबा ऊँची स्थिति का संकेत देते हैं।

जब बुद्धि प्रकृति के आकर्षण से परे होगी, तब कोई भी चीज हमें नीचे नहीं ला सकेगी। फिर हम प्रकृति के अधीन होने के बजाय उसे अधीन करने वाले बनेंगे।

मुख्य शिक्षा: साइलेन्स की शक्ति से ऐसी स्थिति बनानी है जिसमें प्रकृति का आकर्षण हमें अपने अधीन न कर सके।

 5. साइलेन्स की शक्ति से ऊँची स्थिति

बाबा विज्ञान और साइलेन्स की शक्ति के प्रयासों में अन्तर बताते हैं। विज्ञान के द्वारा मनुष्य पृथ्वी से परे जाने का प्रयत्न कर रहा है, जबकि साइलेन्स की शक्ति से आत्मा प्रकृति के आकर्षण से परे जा सकती है।

ऐसी स्थिति में हम जब चाहें तब आधार लें, न कि प्रकृति जब चाहे तब हमें अपने अधीन कर दे।

बाबा बच्चों को आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करते हैं—हमारी स्थिति अभी कहाँ तक बनी है? क्या हम प्रकृति के आकर्षण से परे रह सकते हैं?

मुख्य शिक्षा: बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव में आने के बजाय आन्तरिक शान्ति और योगबल को बढ़ाना है।

 6. बाप के साथ चलना, साथ रहना और साथ राज्य करना

बाबा कहते हैं कि बापदादा अभी सूक्ष्मवतन में अपना कर्तव्य कर रहे हैं, लेकिन बच्चों को अपने घर में जाना है। इसलिए शीघ्रता से अपनी स्थिति ऊँची बनाने का प्रयत्न करना है।

बच्चों का लक्ष्य है—

– बाप के साथ चलना।

– बाप के साथ रहना।

– बापकेसाथ राज्यकरना।

बाबा स्पष्ट करते हैं कि साथ चलने और साथ रहने के लिए समान बनना आवश्यक है। यदि समानता नहीं होगी तो साथ कैसे रह सकेंगे?

इसलिए बाप की स्मृति में रहकर स्वयं को बाप समान बनाना है।

मुख्य शिक्षा: बाप के साथ रहने का आधार बाप समान बनना है।

 7. समर्पणता

से

समानता

बाबा उदाहरण देते हैं कि जब कोई वस्तु किसी को दे दी जाती है, तो उस वस्तु पर अपना अधिकार समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार सर्वस्व समर्पण करने के बाद अपना या दूसरों का अधिकार कैसे रह सकता है?

यदि समर्पण करने के बाद भी अपना या दूसरे का अधिकार बना रहता है, तो इससे सिद्ध होता है कि सर्व समर्पण में कमी है।

बाबा कहते हैं कि समर्पणता से समानता सेकण्ड में आती है। इसलिए समर्पण करने

की शक्ति चाहिए।

समर्पण केवल कहने या सोचने की बात नहीं है। समर्पण के बाद अधिकार-बुद्धि और बार-बार सोचने की प्रवृत्ति को समाप्त करना है।

मुख्य शिक्षा:

सच्ची समर्पणता अधिकार-बुद्धि को समाप्त करके समानता लाती है।

 8. सोच-सोचकर समर्पण करने का परिणाम

बाबा समझाते हैं कि जो सोच-सोचकर समर्पण होते हैं, उनके व्यर्थ संकल्प अब भी पुरुषार्थ

में विघ्न रूप बनते हैं।

जब मन बार-बार यह सोचता है कि क्या समर्पण करूँ, कितना करूँ या मेरा अधिकार कितना रहे, तब पूर्ण समर्पण नहीं हो पाता। इसी कारण समानता

आने में बाधा रहती है।

इसलिए समर्पण में दृढ़ता चाहिए। जब समर्पण कर दिया, तो फिर अधिकार-बुद्धि और व्यर्थ संकल्पों को स्थान नहीं देना है।

मुख्य शिक्षा: दृढ़ निश्चय से समर्पण करो, ताकि व्यर्थ संकल्प पुरुषार्थ में विघ्न न बनें।

 मुरली की मुख्य धारणाएँ

1. हिम्मत: बच्चे का एक कदम आगे बढ़ना और बाप की मदद का अनुभव करना।

2. अन्तर: श्रेष्ठ और साधारण का अन्तर पहचानना तथा अंदर की स्थिति में रहना।

3. गुप्त स्वरूप: आन्तरिक स्थिति में स्थित होकर अपने स्वरूप को प्रत्यक्ष करना।

4. प्रकृति से परे: प्रकृति के आकर्षण के अधीन न होना।

5. साइलेन्स की शक्ति: आन्तरिक शान्ति के बल से ऊँची स्थिति बनाना।

6. समानता: बाप के साथ चलने और रहने के लिए बाप समान बनना।

7. समर्पणता: अपना और दूसरों का अधिकार छोड़कर पूर्ण समर्पण करना।

8. दृढ़ निश्चय: सोच-सोचकर व्यर्थ संकल्पों में समय न गँवाना।

 आत्मचिंतन के प्रश्न

1. क्या मैं बाप की मदद का अनुभव करते हुए हिम्मत से आगे बढ़ताहूँ?

2. क्या पुरानी दुनिया के आकर्षण मेरी बुद्धि को अपनी ओर खींचते हैं?

3. क्या मैं प्रत्येक विचार और कर्म का अन्तर करके उसे परखता हूँ?

4. क्या मैं दिन में कुछ समय अन्तर्मुखी स्थिति में रहता हूँ?

5. क्या मैं प्रकृति के आकर्षण से परे रहने का अभ्यास करता हूँ?

6. क्या मेरी साइलेन्स की शक्ति परिस्थितियों में स्थिर रहने में मदद करती है?

7. क्या मेरा लक्ष्य बाप के साथ चलना, रहना और राज्य करना है?

8. क्या मैंने अधिकार-बुद्धि छोड़कर सच्ची समर्पणता अपनाई है?

9. क्या बार-बार सोचने वाले व्यर्थ संकल्प मेरे पुरुषार्थ में विघ्न बनते हैं?

10. आज मैं बाप समान बनने के लिए कौन-सा दृढ़ संकल्प करूँगा?

 छोटे प्रश्न और उत्तर

 भाग 1: हिम्मत और बाप की मदद

प्रश्न 1. बच्चे की हिम्मत का प्रत्यक्ष सबूत क्या है?\

उत्तर: बच्चे का पुरुषार्थ में आगे बढ़ना।

प्रश्न 2. बच्चे एक कदम आगे आते हैं तो बाप कितना आगे आते हैं?\

उत्तर: हजार गुणा आगे।

प्रश्न 3. बाप बच्चों को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं?

उत्तर: अपनी मदद और सहयोग से।

प्रश्न 4. पुरानी दुनिया के सम्बन्ध, सम्पत्ति और पदार्थ कैसे हैं?\

उत्तर: अल्पकाल के और दिखावा मात्र।

प्रश्न 5. पुरानी दुनिया के आकर्षण में फँसने से क्या होता है?\

उत्तर: हम धोखा खाते हैं और उनमें लिप्त होते हैं।

 भाग 2: ‘अन्तर’ शब्द की युक्ति

प्रश्न 6. बाबा ने कौन-सा एक शब्द याद रखने को कहा?\

उत्तर: अन्तर।

प्रश्न 7. ‘अन्तर’ शब्द के दो अर्थ क्या हैं?\

उत्तर: Contrast अर्थात् अन्तर करना और अंदर अर्थात् आन्तरिक स्थिति।

प्रश्न 8. Contrast करने का क्या अर्थ है?\

उत्तर: परखना कि कोई बात श्रेष्ठ है या नहीं।

प्रश्न 9. अंदर की स्थिति में रहने से क्या होगा?\

उत्तर: अपना गुप्त स्वरूप प्रत्यक्ष होगा।

प्रश्न 10. ‘अन्तर’ शब्द जीवन बदलने में कैसे सहायक है?\

उत्तर: यह श्रेष्ठता की परख और अन्तर्मुखता की स्मृति दिलाता है।

 भाग 3: प्रकृति से परे स्थिति

प्रश्न 11. बाबा के अनुसार बुद्धि को किससे परे होना है?\

उत्तर: प्रकृति के आकर्षण से।

प्रश्न 12. फरिश्तों के पाँव पृथ्वी पर नहीं होने का क्या संकेत है?\

उत्तर: ऊँची और प्रकृति के आकर्षण से परे स्थिति।

प्रश्न 13. प्रकृति के अधीन होने के बजाय क्या बनना है?\

उत्तर: प्रकृति को अधीन करने वाला।

प्रश्न 14. विज्ञान वाले किस दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं?\

उत्तर: पृथ्वी से परे जाने के लिए।

प्रश्न 15. साइलेन्स की शक्ति से क्या प्राप्त करना है?\

उत्तर: प्रकृति के आकर्षण से परे स्थिति।

प्रश्न 16. बाबा बच्चों को अपनी स्थिति के बारे में क्या जाँचने को कहते हैं?\

उत्तर: हमारी स्थिति कहाँ तक बनी है।

 भाग 4: बाप समान बनना

प्रश्न 17. बच्चों को कहाँ जाना है?\

उत्तर: अपने घर में।

प्रश्न 18. बाप के साथ बच्चों को क्या करना है?\

उत्तर: साथ चलना, साथ रहना और साथ राज्य करना।

प्रश्न 19. बाप के साथ रहने के लिए क्या आवश्यक है?\

उत्तर: बाप समान बनना।

प्रश्न 20. समानता लाने की एक प्रमुख युक्ति क्या है?\

उत्तर: साकार बाप के समान बनना।

प्रश्न 21. समर्पणता से समानता कब आती है?\

उत्तर: बाबा के अनुसार, सेकण्ड में।

 भाग 5: समर्पणता और दृढ़ संकल्प

प्रश्न 22. किसी वस्तु को दे देने के बाद किसका अधिकार समाप्त हो जाता है?\

उत्तर: अपना अधिकार और अन्य का अधिकार।

प्रश्न 23. सर्व समर्पण में कमी का संकेत क्या है?\

उत्तर: अपना या दूसरों का अधिकार बना रहना।

प्रश्न 24. समानता लाने के लिए किस शक्ति की आवश्यकता है?\

उत्तर: समर्पण करने की शक्ति।

प्रश्न 25. सोच-सोचकर समर्पण करने वालों के संकल्प कैसे बनते हैं?\

उत्तर: व्यर्थ संकल्प पुरुषार्थ में विघ्न बनते हैं।

प्रश्न 26. समर्पण के बाद किस बात को समाप्त करना है?\

उत्तर: अधिकार-बुद्धि को।

प्रश्न 27. समर्पण में किस बात की आवश्यकता है?\

उत्तर: दृढ़ निश्चय की।

प्रश्न 28. व्यर्थ संकल्पों का पुरुषार्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है?\

उत्तर: वे विघ्न रूप बनते हैं।

प्रश्न 29. बाप समान बनने के लिए किन दो बातों पर विशेष ध्यान देना है?\

उत्तर: समर्पणता और समानता।

प्रश्न 30. इस मुरली की मुख्य युक्ति क्या है?\

उत्तर: ‘अन्तर’ को याद रखकर अन्तर्मुखी बनना, प्रकृति के आकर्षण से परे रहना और समर्पणता द्वारा बाप समान बनना।

 निष्कर्ष

इस मुरली का मुख्य संदेश है कि बाप समान बनने के लिए केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं है। अपनी बुद्धि को श्रेष्ठ स्थिति में रखना, हर बात का अन्तर करके परखना, अंदर की स्थिति में रहना और प्रकृति के आकर्षण से परे होना आवश्यक है।

साथ ही, बाप के साथ चलने, रहने और राज्य करने के लिए समर्पणता द्वारा समानता लानी है। जब अपना और दूसरों का अधिकार समाप्त होगा तथा व्यर्थ संकल्पों को विराम मिलेगा, तब पुरुषार्थ में आने वाले विघ्न कम होंगे और बाप समान बनने की दिशा में प्रगति होगी।

आज का दृढ़ संकल्प:\

मैं ‘अन्तर’ शब्द को स्मृति में रखूँगा,श्रेष्ठ और साधारण की परख करूँगा, अन्तर्मुखी स्थिति में रहूँगा और दृढ़ समर्पणता द्वारा बाप समान बनने का पुरुषार्थ करूँगा।

📝 79. अव्यक्त मुरली | 1 November 1970

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